खैर या खादिर (Black Catechu)

     वृक्ष की लकड़ी के टुकड़ों को उबालकर निकाला और जमाया हुआ रस जो पान में चूने के साथ लगाकर खाया जाता है, खैर या कत्था कहलाता है। खैर की शाखाओं तथा छाल को उबालकर ही कत्था निकाला जाता है। इतना ही नहीं खैर या खादिर का प्रयोग धार्मिक कार्यों में भी किया जाता है। इसके अलावा खादिर या खैर का उपयोग औषधि रूप में किया जाता है।आयुर्वेदिक ग्रंथों में यह बताया गया है कि खैर या खादिर कुष्ठ, एक्ज़िमा इत्यादि चर्म रोगों की अच्छी दवा है। खैर (खादिर) स्वाद में तीखा और कसैला होता है। इसकी तासीर ठंडी होती है। इसमें भूख जगाने और खाना आसानी से पचाने के गुण होते हैं। यह बल देने वाला, ग्रहणी तथा दांतों को मजबूत करने वाला होता है। यह पेट के दर्द से आराम दिलाता है।यह यज्ञ–हवन आदि कामों की समिधा में प्रयोग की जाने वाली नवग्रह लकड़ियों में से एक है। खैर का पेड़ बहुत ही मजबूत होते हैं। इसका तना हड्डियों की तरह कठोर होता है।

खैर (खादिर) के उपयोग

  1. खादिर या खैर, नीम और जामुन अथवा कुटज की छाल को सेंधा नमक के साथ गोमूत्र में पीस लें। इसका लेप करने से रूसी से छुटकारा मिलता है।
  2. खैर से मुंह के सभी प्रकार के रोगों में लाभ मिलता है। खैर (खादिर) और अन्य पदार्थों से बनी खदिरादि गुटिका को चूसने से इन रोगों में आराम मिलता है। खदिरादि तेल का प्रयोग भी इन रोगों में आराम मिलता है।
  3. खैर की छाल का काढ़ा बनाकर इसे दांतों के बीच की कैविटी में डालने (गण्डूष बनाकर रखने) से दांत के रोगों में लाभ होता है।
  4. खैर (खादिर)का सेवन से मसूड़ों से खून निकलना भी रुक जाता है।
  5. खैर (खादिर) की छाल तथा बादाम के छिलकों को जलाकर भस्म बना लें। इनसे मंजन करने से भी दांत के रोगों में लाभ होता है।
  6. खदिर सार को मुंह में रखकर चूसने से मुंह के छाले और सूजन कम होते हैं।
  7. इसके अलावा, त्रिफला तथा खदिर के पेड़ की छाल का काढ़ा बनाकर गरारा (गले में अटकाकर घुमाना) करने से भी छाले और सूजन कम होते हैं।
  8. खदिर सार अथवा खदिर चूर्ण को तेल से भिगो कर रखें। गले में खराश हो तो इसे मुंह में रखने से खराश दूर होती है।
  9. दमा-खांसी के उपचार के लिए खैर की लकड़ी को जला लें। इसे जल में बुझाकर, जल को तुरंत ढक दें। इस जली लकड़ी के धुंए का सुगंध को सूंघें। इसके साथ ही सुगन्धित जल को पीने से खांसी में लाभ होता है।
  10. 500 मिग्रा खदिर-सार में बराबर मात्रा में हल्दी तथा मिश्री मिलाकर खाने से खांसी में लाभ होता है।
  11. खदिर-सार के 1 ग्राम मात्रा में बराबर मात्रा में बेल गिरी का चूर्ण मिलाकर खिलाने से दस्त शांत हो जाती है।
  12. खैर तथा त्रिफला से बने 50 मिली काढ़ा में 6 ग्राम घी तथा 3 ग्राम वायविडङ्ग चूर्ण मिला लें। इसे पीने से भगंदर में लाभ होता है।
  13. खादिर या खैर के फूल के 500 मिग्रा चूर्ण में 125 मिग्रा जीरक को मिला लें। इसे शक्कर मिले दूध में डालकर सेवन किया जाए तो डायबिटीज में लाभ होता है।
  14. खदिर की छाल का काढ़ा बनाकर योनि को धोने से श्वेत तथा लाल दोनों तरह के ल्यूकोरिया में लाभ होता है।
  15. हड्डियों के दर्द (आमवात) में खदिर की जड़ का चूर्ण सेवन करें। इसे 1 से 3 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए। इससे गठिया में लाभ होता है।
  16. रोजाना सुबह खदिर, विजयसार एवं शाल के सार भाग में गाय के मूत्र के साथ मधु मिलाकर पिएं। इससे हाथी पांव या फाइलेरिया खत्म हो जाता है।
  17. कुष्ठ रोग के उपचार के लिए खैर (खादिर) कई रूपों में उपयोग किया जा सकता है। औषधि रूप में खाने, काढ़ा इत्यादि रूप में पीने लेप बनाकर त्वचा पर लगाने इत्यादि रूप में बाहरी और भीतरी दोनों तरह के प्रयोगों के लिए खैर का प्रयोग अच्छा परिणाम देता है।
  18. खैर (खादिर) की जड़ को जलाने से रस नीचे गिरता है। ऐसे रस को घड़े में जमा करके उसमें मात्रा के अनुसार मधु, घी एवं आँवला का रस मिलाकर पीने से कुष्ठ दूर होने लगता है।
  19. इसके साथ ही इसके सेवन से कुष्ठ प्रभावित अंगों को नया जीवन मिलता है।
  20. खैर (खादिर) की पेस्ट एवं काढ़ा को घी में पकाकर खाने से रक्त तथा पित्त के असंतुलन से हुए कुष्ठ में लाभ होता है। सभी प्रकार के कुष्ठों में खदिर तथा विजयसार का किसी भी तरह से प्रयोग करना अच्छा होता है।
  21. खदिरसार अथवा खदिरोदक का सेवन करने से सफेद कुष्ठ (सफ़ेद दाग) में लाभ होता है। इन्हें विभिन्न कुष्ठ नाशक घी अथवा तेल इत्यादि योगों के साथ सेवन करने से भी सफ़ेद कुष्ठ में लाभ होता है।
  22. खैर की छाल, आंवला तथा बाकुची का काढ़ा बनाकर इसे 10 से 30 मिली की मात्रा में पिलाने से भी सफ़ेद कुष्ठ में लाभ होता है।
  23. खदिर एवं विजयसार को जल में डुबोकर छान लें। इसे गर्म करके ठंडा कर लें। इस जल को पीने से चेचक (शीतला) में लाभ होता है।
  24. खदिर एवं श्लेष्मातक को मिलाकर जल से स्नान आदि करने से भी इस रोग में लाभ होता है। चेचक के इलाज में खैर के पेड़ लाभ मिलने से जल्दी राहत मिलती है।
  25. चेचक, कुष्ठ, दाद-खाज, खुजली तथा फोड़े आदि रोगों में खैर (खादिर) के प्रयोग से बहुत तेजी से लाभ होता है। इस लाभ के लिए खैर, त्रिफला, नीम, परवल, गुडूची तथा वासा आदि द्रव्यों से बनी खदिराष्टक काढञा को 20 से 30 मिली की मात्रा में सेवन किया जाना चाहिए।
  26. खैर (खादिर) की छाल एवं कुटज के बीज से बनी काढ़ा से घाव को धोने पर घाव साफ़ होता और धीरे धीरे ख़त्म हो जाता है।
  27. खैर की छाल के चूर्ण में घी मिलाकर त्वचा पर लगाने से गर्मी से होने वाले फोड़े तथा फुन्सी आदि रोगों के उपचार में लाभ होता है।
  28. खैर, प्रियंगु, लाल कचनार तथा सेमल के फूल के चूर्ण 2 से 4 ग्राम लेकर मधु के साथ इसका सेवन करने से रक्तपित्त में बहुत लाभ होता है।
  29. जामुन, अर्जुन, लाल कचनार, शिरीष, लोध्र, विजयसार, सेमल तथा सहिजन के फूलों के चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से भी इस रोग में लाभ होता है। इससे नाक-कान आदि से खून बहना रुक जाता है।
  30. खदिर सार तथा चिरायता का काढ़ा बनाकर, 10 से 30 मिली की मात्रा में पिलाने से प्लीहा वृद्धि तथा बुखार आदि पर नियंत्रण होता है।
  31. चिरायता के 10-30 मिली काढ़ा में 500 मिग्रा खदिर सार को मिलाकर पीने से बुखार उतर जाता है।
  32. खैर (खादिर) की छाल को पीसकर सूजन वाली जगह पर लेप लगाने से सूजन कम हो जाती है और जल्द आराम होता है।
  33. खैर (खादिर) की छाल के चूर्ण को घाव पर डालने से घाव से बहता हुआ खून तुरंत रुक जाता है एवं जले हुए स्थान पर लगाने से घाव भर जाता है।
  34. खैर और अन्य पदार्थों से बने खदिरारिष्ट का 20 से 30 मिली की मात्रा में सेवन करने से महाकुष्ठ, दिल की बीमारियाँ, ट्यूमर, गांठ, इत्यादि पर नियंत्रण होता है।
  35. इसके सेवन से खून की कमी (अनीमिया) भी दूर होती है तथा पेट के कीड़े मरते हैं। खांसी, दमा तथा प्लीहा वृद्धि आदि रोगों में भी इस दवा से लाभ होता है।
  36. खैर (खादिर) की जड़ तथा नीम के फल को बराबर मात्रा में मिलाकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट की 2 से 3 ग्राम मात्रा को को हल्के गर्म जल के साथ सेवन करने से विष का प्रभाव कम हो जाता है।

  • खैर (खादिर) के बहुत ज्यादा सेवन करने से नपुंसकता की शिकायत हो सकती है। 

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