वरुण (Temple plant)
इसके स्वयंजात वृक्ष भारत में सर्वत्र विशेषत मध्य भारत, बंगाल, आसाम, मलाबार, कर्नाटक आदि में अधिक पाए जाते हैं। दक्षिण में जलीय स्थानों में अधिक होते हैं। चरकसंहिता में वरुण का उल्लेख देशेमानि में नहीं किया गया है। सुश्रुत में वरुणादिगण में अश्मरी और मूत्रकृच्छ्र की चिकित्सा के अन्तर्गत वरुण का उल्लेख मिलता है। वृन्दमाधव ने वरुण का अश्मरीघ्न-कर्म में उल्लेख किया है। बाजारों में देखा गया है कि पंसारी लोग इसके स्थान पर बेल के पत्र और छाल दे देते हैं या असली बरना में बेल पत्रादि देते हैं। अत परीक्षा करके लेना चाहिए। इसके पत्रों को मसलने से तीक्ष्ण व तीव्र असहनीय गन्ध आती है तथा स्वाद में कड़वापन, जीभ में कुछ झनझनाहट पैदा करने वाली तीक्ष्णता होती है। वरुण के उपयोग नेत्ररोग-वरुण की छाल को पीसकर नेत्र के बाह्य-भाग पर लेप करने से नेत्ररोगों में लाभ होता है। गण्डमाला-50 मिली वरुण मूलत्वक् क्वाथ में मधु मिलाकर नियमित सेवन करने से चिरकालीन गण्डमाला का शमन होता है। 20 मिली वरुण मूल क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से कण्ठगत लसिका ग्रन्थि शोथ (सूजन) में लाभ होता है। गण्डमाला-वरुण छाल को...