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Showing posts from January, 2021

वरुण (Temple plant)

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     इसके स्वयंजात वृक्ष भारत में सर्वत्र विशेषत मध्य भारत, बंगाल, आसाम, मलाबार, कर्नाटक आदि में अधिक पाए जाते हैं। दक्षिण में जलीय स्थानों में अधिक होते हैं। चरकसंहिता में वरुण का उल्लेख देशेमानि में नहीं किया गया है। सुश्रुत में वरुणादिगण में अश्मरी और मूत्रकृच्छ्र की चिकित्सा के अन्तर्गत वरुण का उल्लेख मिलता है। वृन्दमाधव ने वरुण का अश्मरीघ्न-कर्म में उल्लेख किया है। बाजारों में देखा गया है कि पंसारी लोग इसके स्थान पर बेल के पत्र और छाल दे देते हैं या असली बरना में बेल पत्रादि देते हैं। अत परीक्षा करके लेना चाहिए। इसके पत्रों को मसलने से तीक्ष्ण व तीव्र असहनीय गन्ध आती है तथा स्वाद में कड़वापन, जीभ में कुछ झनझनाहट पैदा करने वाली तीक्ष्णता होती है। वरुण के उपयोग नेत्ररोग-वरुण की छाल को पीसकर नेत्र के बाह्य-भाग पर लेप करने से नेत्ररोगों में लाभ होता है। गण्डमाला-50 मिली वरुण मूलत्वक् क्वाथ में मधु मिलाकर नियमित सेवन करने से चिरकालीन गण्डमाला का शमन होता है। 20 मिली वरुण मूल क्वाथ में मधु मिलाकर पीने से कण्ठगत लसिका ग्रन्थि शोथ (सूजन) में लाभ होता है। गण्डमाला-वरुण छाल को...

हुरहुर (Dog mustard)

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     यह वनस्पति समस्त भारत में परती भूमि में खरपतवार के रूप में प्राप्त होती है। पुष्पभेद के आधार पर इसकी दो प्रजातियां होती हैं। 1. हुरहुर श्वेत 2. हुरहुर पीत।  हुरहुर पीत (Cleome viscosa Linn.)  यह 30-90 सेमी तक ऊँचा, दृढ़, तीक्ष्ण एवं पूतिगंधयुक्त, सीधा, चिपचिपा शाकीय पौधा होता है। इसके पुष्प पीत वर्ण के होते हैं। हुरहुर श्वेत (Cleome gynandra Linn.) यह 30-90 सेमी ऊँचा, शाखित, ग्रन्थिल-रोमश शाकीय पौधा होता है। इसकी काण्ड एवं शाखाएँ रेखित, श्वेत वर्ण के फैले हुए रोमों से आवृत होती हैं।  इसके पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं। इसकी फलियाँ 5-10 सेमी लम्बी, 4.5 मिमी व्यास की चिपचिपी तथा रोमश होती हैं। इसके बीज गहरे भूरे से कृष्ण वर्ण के तथा खुरदरे, वृक्काकार होते हैं। हुरहुर पीत  के उपयोग शिरशूल-हुरहुर पत्र को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है। कर्णस्राव-हुरहुर पत्र-स्वरस में मधु, तिल तैल तथा सैंधव लवण मिलाकर 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णशूल, कर्णशोथ तथा मध्य कर्णगत विकारों में लाभ होता है। कर्ण विकार-हुरहुर–पत्र–स्वरस में तुलसी पत्र स्वरस ...

हृत्पत्री (Foxglove)

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     यह बालुकामय छायादार भूमि पर 1500-2500 मी की ऊँचाई पर तथा भारत में मुख्यत जम्मू-कश्मीर, दार्जिलिंग और नीलगिरि पहाड़ियों पर उत्पन्न होता है। इसका प्रयोग मुख्यरूप से हृदय विकारों की चिकित्सा में किया जाता है। इसके पुष्प तिल के समान होते है इसलिये इसको तिल पुष्पी कहते हैं। इसके पत्र हृदय के आकार के होते है इसलिये इसको हृदपर्णी भी कहा जाता है। यह 60-180 सेमी ऊंचा, द्विवर्षायु अथवा बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है।  इसके पुष्प तिल के पुष्प के समान, घण्टिकाकार, बृहत्, अनेक, बैंगनी, गुलाबी, पीत, श्वेत तथा गहरे रक्त वर्ण के होते हैं। हृत्पत्री के पत्रों का प्रयोग औषध के रूप में किया जाता है। फूल खिलने के बाद पत्तियों का संग्रह किया जाता है। पत्तियों को धूप में सुखाकर निर्वात डिब्बों में भरकर रख देते हैं। सूखी पत्तियों का चूर्ण हरे रंग का, किंचित् गन्धयुक्त तथा स्वाद में तिक्त होता है। हृत्पत्री के उपयोग श्वसनतंत्र की बीमारीयों में तम्बाकू की तरह चिलम में भरकर पीने से यह अत्यन्त लाभकारी होता है, परन्तु यह प्रयोग लम्बे समय तक नहीं करना चाहिए; इससे मस्तिष्क में दुष्प्रभाव...

त्रिकोशकी (Madras pea pumpkin)

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     समस्त भारत में लगभग 1800 मी0 की ऊचाईं तक यह लतारूपी वनस्पति प्राप्त होती है। इसकी बेल छोटी, खुरदुरी तथा रोमों से युक्त होती है। यह वर्षाकाल में उत्पन्न होकर इधर-उधर फैलती है। इसकी मूल श्वेतवर्ण की, महीन कण्टकों से युक्त तथा सुतली जैसी मोटी होती है। इसकी डण्डी एवं शाखाएं भी सुतली जैसी मोटी तथा खड़ी श्वेतधारियों से युक्त होती हैं। और इन पर छोटे और बड़े रोएं होते हैं। नवीन शाखाओं पर रोएं अधिक होते हैं। इसके फल चने या मटर जैसे एक ही स्थान में 1-4 की संख्या में लगे हुए होते हैं। कच्ची अवस्था में हरे वर्ण के तथा लम्बे  श्वेत रोमों से युक्त होते हैं और जैसे-जैसे पकते जाते हैं, इनके रोम कम होते जाते हैं। पूर्णत पक जाने पर चमकते हुए लाल रंग के तथा श्वेत वर्ण की लम्बी धारियों से युक्त होते हैं। प्रत्येक फल में चपटे, पीले या श्वेत रंग के 5-8 बीज होते हैं। त्रिकोशकी के उपयोग शिरशूल-अगमकी मूल को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है। दंतशूल-अगमकी मूल को चबाकर थूक देने से दंतशूल का शमन होता है। श्वास-कास-1 ग्राम अगमकी के पञ्चाङ्ग चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से...

कुरी (Beggar tick)

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     यह सर्वत्र उष्णकटिबंधीय भागों में सड़क के किनारे पर परती भूमि पर पाया जाता है। भारत में यह साधारणतया 2000 मी की ऊँचाई पर खरपतवार के रूप में पाया जाता है। यह लगभग 60- 90 सेमी0 तक ऊचा शाकीय पौधा है। इसके पुष्प पीत वर्ण के होते हैं। कुरी के उपयोग कर्णशूल-ताजे पौधे से प्राप्त स्वरस को 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णशूल में लाभ होता है। श्वासकष्ट-इसके मूल एवं बीज का प्रयोग श्वासकष्ट में किया जाता है। 2-5 ग्राम मूल का क्वाथ बनाकर पीने से श्वास तथा कास में लाभ होता है। 1-2 चम्मच पत्र स्वरस को नियमित रूप से कुछ समय तक पिलाने से प्रमेह में लाभ होता है तथा उदरकृमियों का शमन होता है। 5 ग्राम बीज तथा मूल का क्वाथ बनाकर, इसमें अजवायन मिलाकर पिलाने से मासिक-विकारों में लाभ होता है। व्रण-पञ्चाङ्ग को पीसकर व्रण में लगाने से व्रण का रोपण होता है। इसके पत्रों को पीसकर रस निकालकर अंगुलियों के मध्य में होने वाले व्रणों पर लगाने से व्रण का रोपण होता है। पत्रों को पीसकर लगाने से कण्डू का शमन होता है। 5 ग्राम पञ्चाङ्ग का क्वाथ बनाकर पीने से जीर्ण ज्वर तथा रक्तार्बुद में लाभ होता है। इस...

राखीफूल (Stinking passion flower)

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     समस्त भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी लता पाई जाती है। इसकी दो प्रजातियां होती हैं 1. जंगली कृष्ण कमल (Passiflora foetida Linn.) 2. कृष्ण कमल (Passiflora edulis Sims.)। इसके पुष्प अत्यन्त सुन्दर तथा देखने में राखी जैसे लगते हैं। इसलिए इन्हें राखीपुष्प कहा जाता है। जंगली कृष्ण कमल (Passiflora foetida Linn.) इसके पुष्प हरिताभ-श्वेत, गुलाबी, गहरे रक्त वर्ण के अथवा बैंगनी वर्ण के होते हैं। इसके फल संख्या में अनेक, गोलाकार, चिकने तथा हरित वर्ण के व अनेक बीजों से युक्त होते हैं। कृष्ण कमल (Passiflora edulis Sims.) इसके पुष्प श्वेत तथा बैंगनी वर्ण के होते हैं। इसके फल गोलाकार, अण्डाकार, गूदेदार, पक्वावस्था में पीत अथवा गहरे बैंगनी वर्ण के कठोर आवरण से युक्त व रसदार होते हैं। इसके बीज काले रंग के होते हैं। राखीपुष्प  के उपयोग पत्र को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल, पामा, जीर्ण व्रण, क्षत व भ्रम का शमन होता है। अक्षिशोथ-पत्रों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों तरफ लगाने से अक्षिशोथ का शमन होता है। दंतरोग-इसका प्रयोग शीताद दन्त रोग तथा अन्य विटामिन-C की कमी से उत्पन्न ह...

राजादन (Six stamens balata)

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     भारत के समस्त प्रान्तों में यह विशेषत गुजरात, दक्कन प्रायद्वीप, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों, उत्तरप्रदेश तथा मध्य प्रदेश में पाई जाती है। इसके फल चपटे, कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर पीले रंग के व जैतून के आकार जैसे होते हैं। इसके बीजों के भीतर की पीताभ गिरी या मज्जा से तैल निकाला जाता है। चरक संहिता में पित्तजप्रदर की चिकित्सा में तथा सुश्रुत-संहिता में झाँई की चिकित्सा में व परूषकादिगण में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। राजादन के उपयोग शिरशूल (सिर दर्द)-खिरनी मूल को पीसकर मस्तक पर लेप करने से (सिर दर्द) शिरशूल में लाभ होता है। नेत्ररोग-खिरनी के बीजों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों तरफ लगाने से नेत्रशूल, नेत्रदाह आदि नेत्र विकारों का शमन होता है। मुखरोग-(स्नैहिक धूम) शाल, राजादन, एरण्ड, सारवृक्ष आदि को पीसकर उसमें घृत तथा मधु मिलाकर, श्योनाक के वृंत (डंठल) पर लेप करके जला कर धूम का सेवन करने से सर्वसर मुखरोग में लाभ होता है। दन्त रोग-खिरनी छाल चूर्ण को दांतों पर मलने से दन्तरोगों का शमन होता है। तृष्णा-राजादन को रातभर जल में डाल कर मसलकर, छानकर प्रात शर्करा, मधु एवं म...

लोबिया (Chinese beans)

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     समस्त भारत में इसकी खेती की जाती है तथा इसका प्रयोग साग के रूप में किया जाता है। यह जमीन पर फैलने वाला वल्लरीनुमा शाकीय पौधा होता है। इसके पुष्प गुलाबी अथवा श्वेत वर्ण के होते हैं। इसकी फली अत्यधिक लम्बी होती है तथा बीज संख्या में लगभग 10-20  फली के अनुसार छोटे तथा बड़े, भूरे-हल्के रक्त वर्ण के अथवा हल्के बैंगनी अथवा कृष्ण वर्ण के होते हैं। लोबिया के उपयोग राजमाष के हरे बीजों को गुड़ के साथ सेवन करने से नेत्र रोग व बच्चों के कुपोषण जन्य रोगों में लाभ होता है। छर्दि (उलटी)-राजमाष के बीजों का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से उत्क्लेश (मिचली), छर्दि (उलटी) व मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है। युवानपिडका-राजमाष पत्र अर्क को लगाने से युवानपिडका (मुंहासों) का शमन होता है। शोथ-राजमाष के बीजों को पीसकर लगाने से शोथ का शमन होता है।

रामबाँस (Century Plant)

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     यह पौधा समस्त भारत के शुष्क वन्य भागों में साधारणतया खुले स्थानों एवं सड़कों के किनारे पाया जाता है। स्थानीय लोग इसकी पत्तियों का प्रयोग रस्सी बनाने के लिए करते हैं। रामबाँस की एक प्रजाति से निकलने वाले कन्द को कई स्थानों पर लोग कन्दमूल के नाम से बेचते हैं। इसका पौधा प्रकन्दयुक्त होता है इसके पत्र  मोटे, अग्रभाग पर नुकीलें, बड़े तथा किनारों पर कांटो से युक्त होते हैं। इसके पत्र देखने में घृतकुमारी के पत्रों जैसे किन्तु उससे बड़े, मोटे व कठोर होते हैं। इसके पुष्प श्वेत अथवा पीताभ-हरित वर्ण के होते हैं। उपरोक्त वर्णित मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त निम्नलिखित दो प्रजातियों का प्रयोग भी चिकित्सा में किया जाता है। Agave angustifolia Haw. (पाण्डर पर्णिका)- यह भारत के हिमालयी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। कई स्थानों पर शोभनीय पौधे के रूप में लगाया जाता है। यह बहुवर्षायु पौधा होता है, इसके पत्ते सीधे, दोनों सिरों पर पतले, किनारों पर कटे हुए तथा चक्करदार क्रम में व्यवस्थित होती है। इस पौधे में सैपोजेनिन पाया जाता है तथा सैपोनिन, कार्टीसोन ड्रग्स का स्रोत होता है। इस...

रुद्रवन्ती (Littoralbind weed)

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     रुद्रवन्ती भारत के हिमालयी उच्च स्तरीय कुछ क्षेत्रों में प्राप्त होती है। इसका क्षुप चने के जैसा होता है। रूदन्ती के संदर्भ में अनेक अवधारणाएं प्रचलन में है प्राचीनकाल में कीमियागिरी व अन्य प्रयोगों के लिए भी रूदन्ती के उपयोग का वर्णन आता है। इसके अन्वेषण करने पर हमें रूद्रवन्ती की दो प्रजातियां Astragalus candolleanus Royle ex Benth.  तथा Cresa cratica प्राप्त होती हैं परन्तु औषधीय गुणों के आधार पर हिमालयी क्षेत्रों में पाई जाने वाली रूदन्ती अत्यन्त गुणकारी होती है। हिमालय में रहने वाले लोग अनेक व्याधियों के शमन के लिए इसी रूदन्ती का प्रयोग करते हैं। Astragalus candolleanus Royle ex Benth.-इसका छोटा, शाखा-प्रशाखाओं से युक्त जमीन पर फैला हुआ क्षुप होता है। इसके पत्र चने के जैसे हरे रंग के तथा रोमश होते हैं। इसके पुष्प पीत वर्ण के तथा छोटे होते हैं। Cresa cratica Linn.-इसका क्षुप सीधा, छोटा तथा शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होता है। इसके पत्र 6-8 मिमी लम्बे, चने के जैसे, अग्रभाग पर नुकीले तथा रोमश होते हैं। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं। रुद्रवन्ती के उपय...

रुद्रजटा (Quail grass)

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     समस्त भारत में यह शृंङ्गारिक पौधे के रूप में घरों के बाहर तथा बगीचों में लगाया जाता है। इसके पुष्प बहुत ही सुन्दर एवं आकर्षक होते है। जो देखने पर मुर्गे की कलगी जैसे दिखाई देते हैं। इसलिए इसे मुर्गकेश या लाल मुर्गा कहते हैं। इसके पुष्प पीत, गुलाबी, बैंगनी अथवा रक्त वर्ण के, मखमली तथा चपटे होते हैं। बीज कृष्ण वर्ण के, चपटे तथा चिकने व छोटे होते हैं। रुद्रजटा के उपयोग 3-4 बूँद पत्र-स्वरस में समभाग जल मिलाकर नाक में डालने से नकसीर बन्द हो जाती है। खाँसी-500 मिग्रा रुद्रजटा बीज चूर्ण में शहद मिलाकर खाने से खाँसी में लाभ होता है। 2-3 ग्राम पञ्चाङ्ग का क्वाथ बनाकर पीने से कास तथा श्वास में लाभ होता है। रुद्रजटा पञ्चाङ्ग में अर्जुन छाल मिलाकर इसका क्वाथ बनाकर पीने से हृद्शूल तथा हृद विकारों में लाभ होता है। अतिसार-रुद्रजटा के पुष्पों का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से अतिसार में लाभ होता है। रुद्रजटा के बीजों का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से प्रवाहिका व मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है। 2 ग्राम रुद्रजटा पञ्चाङ्ग में समभाग मकोय पञ्चाङ्ग तथा पुनर्नवा मू...

शितिवारक (Cock”s Comb)

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     भारत के हिमालयी क्षेत्रों में लगभग 1500 मी की ऊँचाई तक तथा समस्त मैदानी भागों में बेकार पड़ी भूमि व सड़कों के किनारे पर पाया जाता है। इसके पुष्प शुभ श्वेत से गुलाबी वर्ण होते हैं। इसके फल अण्डाकार तथा गोलाकार होते हैं; जिसमें 4-8, झिल्लीदार, कृष्ण वर्ण के चमकीले, बीज होते हैं। शितिवारक के उपयोग  मुखव्रण-बीजों का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मुखव्रण में लाभ होता है। मधुमेह-1 ग्राम बीज चूर्ण का सेवन करने से मधुमेह में लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र-बीजों का क्वाथ बनाकर पीने से मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राश्मरी में लाभ होता है। रक्तप्रदर-पुष्पों का फाण्ट बनाकर पीने से रक्तप्रदर, श्वेतप्रदर एवं गर्भाशयगत रक्तस्राव में लाभ होता है। संधिशूल-बीज सहित पञ्चाङ्ग को पीसकर जोड़ों पर लगाने से संधिशूल तथा शोथ का शमन होता है। बलवर्धनार्थ-बीज चूर्ण में दुग्ध एवं शर्करा मिलाकर सेवन करने से बल की वृद्धि होती है।

रोहितक (Desert teak)

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     समस्त भारत के शुष्क भागों में लगभग 900 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। चरकसंहिता में हृद्रोग में एंव सुश्रुत में पैतिक काचरोग में रोहितक का प्रयोग बताया गया है। डल्हण ने रोहितक पुष्प को दाड़िमसदृश पुष्प की उपमा दी है। इसके पुष्प अनार के पुष्प के जैसे सुंदर, रक्त या गहरे नारंगी वर्ण के होते हैं। इसके पुष्प एंव पत्र अनार के जैसे होते हैं, इसलिए इसे दाड़िमपुष्पक व दाड़िमच्छद कहा जाता है। इसके पुष्प एंव छाल लाल वर्ण की होती है इसलिए इसे रक्त पुष्पक व रक्तवल्क कहा जाता है। रोहितक के उपयोग प्लीहोदर-(रोहितकादि योग)-रोहितक की पतली लता समान शाखाओं के छोटे-छोटे टुकड़ों को सातदिनों तक हरीतकी के क्वाथ अथवा गोमूत्र में डाल कर, फिर हाथों से मसलकर, कपड़े से छानकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से समस्त उदररोग, कृमिरोग, कामला, गुल्म, प्रमेह, अर्श आदि व्याधियों में लाभ होता है। इसे प्रतिदिन प्रात काल पीना चाहिए। यकृत्प्लीहोदर-5 ग्राम रोहीतक घृत का सेवन करने से यकृत्प्लीहोदर, गुल्म, श्वास आदि रोगों में लाभ होता है। 15-20 मिली रोहीतक क्वाथ का सेवन करने से यकृत् विकारों में लाभ होता है। 1...

रंगून की बेल (Rangoon creeper)

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     समस्त भारत में घरों व बगीचों में श्रृंगारिक बेल के रूप में इसे लगाया जाता है। इसके पुष्प अनेक, श्वेत-गुलाबी अथवा रक्त वर्ण के तथा सुगन्धित होते हैं।    रंगून की बेल के उपयोग 1. शिरशूल-रंगून की बेल के पुष्पों को पीसकर मस्तक पर लगाने से पित्तविकृतिजन्य शिरशूल का शमन होता है। 2. कृमि रोग-इसके 2-3 पक्व बीजों को पीसकर मधु के साथ सेवन करने से गोल कृमियों (उदर कृमियों) का शमन होता है। 3. उदरशूल-इसकी 20 पत्तियों को 300 मिली जल में उबालकर 75 मिली शेष रहने पर छानकर पीने से आध्मान एवं उदरशूल का शमन होता है। 4. अतिसार-इसके 2-4 भुने हुए बीजों का सेवन करने से अतिसार एवं प्रवाहिका में लाभ होता है। 5. रक्तार्श-पत्रों का सेवन रक्तार्श में लाभप्रद है। 6. रोमकूपशोथ-पत्र-स्वरस को लगाने से जीर्ण व्रण तथा रोमकूप शोथ में लाभ होता है। पत्तों को पीसकर लगाने से कण्डू व दद्रु का शमन होता है। 9. ज्वर-2-4 बीजों को भूनकर पीसकर शहद मिलाकर सेवन करने से ज्वर का शमन होता है। 10. फक्करोग-इसके बीजों का प्रयोग फक्क (Rickets) रोगग्रस्त बच्चों की चिकित्सा में किया जाता है। 11. कृमिरोग-4-5 ब...

बड़हल (Monkey jack)

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     बड़हल या बड़हर या एक फलदार वृक्ष है। इसका वृक्ष १०-१५ मीटर ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ २५-३० सेमी लम्बी एवं १५-२० सेमी चौड़ी होती हैं। इसके फल गोल आकार के या बेडौल होते हैं। हरे रंग का कच्चा फल पकने पर पीला हो जाता है जिसे खाया जाता है। इसके अन्दर छोटे-छोटे कोए (जैसे कटहल में) होते हैं। फल का आकार २ से पाँच इंच का होता है। उत्तरी भारत के अर्ध सदाहरित एवं आर्द्र पर्णपाती जंगलों व उष्णकटिबंधीय हिमालय में लगभग 1200 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। मुख्यत यह उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडू तथा अंडमान द्वीप में पाया जाता है। समस्त फलों में इसका फल निकृष्ठ माना जाता है। बड़हल के उपयोग नेत्र रोग-5-10 मिली लकुच स्वरस में सैंधवनमक तथा शहद मिलाकर कांसे (कांस्य पात्र) के बर्तन में रगड़कर, अञ्जन (काजल) की तरह लगाने से पिल्ल नामक नेत्र रोग का शमन होता है। कर्णरोग-लकुच के फल में थोड़ा नमक डालकर रख दें तथा फिर रगड़कर उसका रस निकाल लें, इस रस (1-2 बूँद) को लगातार तीन दिन तक कान में डालने से कान की पीड़ा तथा पूय (मवाद) का शमन होता है। मुखशोधनार्थ-आर्दक को लकुच स्वरस ...

लताकस्तूरी (Musk-mallow)

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     भारत के समस्त उष्णकटिबंधीय प्रदेशों विशेषतया महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तथा उत्तराखण्ड के कई स्थानों पर इसकी खेती की जाती है। इसके पौधे देखने में भिण्डी के समान होते हैं। लता कस्तूरी का पौधा पूर्ण रूप से रोमो से आवृत होता है। इसके पुष्प भिण्डी के पुष्प के समान, बड़े, पीत वर्ण के, मध्य में बैंगनी वर्ण के, बिन्दु से होते हैं। इसके फल रोमों से युक्त तथा अग्र भाग पर नुकीले होते हैं। इसके बीज कृष्ण अथवा धूसर भूरे वर्ण के तथा कस्तूरी गंधी होते हैं। लताकस्तूरी की कई प्रजातियां पाई जाती है जो आकार प्रकार में इसके समान दिखाई देती है परन्तु यह गुणों में अल्प होती है। उपरोक्त वर्णित मुख्य लताकस्तूरी के अतिरिक्त निम्नलिखित दो प्रजातियों का प्रयोग भी चिकित्सा में किया जाता है। Abelmoschus crinitus Wall.  (अरण्यकस्तूरिका)- यह लताकस्तूरी की तरह दिखने वाला 0.5-1.5 मी तक ऊँचा रोमश क्षुप होता है। इसके पत्र 10-15 सेमी चौड़े तथा हस्ताकार व लताकस्तूरी के जैसे होते हैं। इसके पुष्प पीत वर्ण के तथा फल लताकस्तूरी से छोटे, रोमश तथा कोणीय होते है। Abelmoschus manihot (Linn.) Medi...

लसुन बेल (Cross vine)

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     समस्त भारत में प्राय घरों के बाहर या बाग-बगीचों में  शृंगारिक पौधे के रूप में इसकी बेलें लगी हुई मिलती है। इसके पुष्प अत्यन्त सुन्दर तथा नीले वर्ण के होते हैं। पौधे के किसी भी भाग को तोड़कर मसलने से लसुन के जैसी गन्ध आती है, इसलिए इसे लसुन बेल कहते है। लसुन बेल के उपयोग लसुनबेल के पत्रों को पीसकर त्वचा में लगाने से दद्रु, पामा, कण्डू (खुजली) एवं अन्य त्वक् विकारों का शमन होता है। इसके पत्रों को तैल में पकाकर, छानकर त्वचा में लगाने से त्वक् विकारों का शमन होता है। पत्र को पीसकर गरमकर पुल्टिस बांधने से फोड़ा पककर फूट जाता है। लसुन बेल पञ्चाङ्ग में सोंठ मिलाकर तेल पाक करके अभ्यंग करने से वातज विकारों का शमन होता है। पत्र को गर्मकर बांधने से शोथ का शमन होता है। इसके पत्रों को धनिया के साथ समान मात्रा में मिलाकर चटनी बनाकर सेवन करने से यह कृमिनाशक तथा क्षुधावर्धक होता है। लसुनबेल को घर के आस-पास लगाने से विषाणुओं का प्रभाव कम हो जाता है।

पाठा (Velvet leaf)

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     पाठा एक ऐसी वनस्पति है जिसे आपने अक्सर सड़कों या खेतों के किनारे की झाड़ियों में देखा होगा। आयुर्वेदिक ग्रंथों में पाठा का भरपूर उल्लेख पाया जाता है। इसे दाइयों की जड़ी भी कहा जाता है क्योंकि अनेक प्रकार के स्त्री रोगों तथा प्रसव तथा बार-बार होने वाले गर्भपात आदि में यह काफी लाभकारी होता है। पाठा आरोही लता जाति का एक पौधा है। यह पेड़ों के सहारे ऊपर चढ़ती है या जमीन पर फैलने है। इससे लता पर लता निकलती रहती है और इसकी लता पत्तों भरी होती है। इसकी लताएँ रेखित, पतली तथा रोमयुक्त होती हैं। इसके पत्ते गिलोय के पत्ते जैसे तथा सुगन्धित होते हैं। इसके पत्ते हल्के नुकीले तथा गोल, फूल छोटे औऱ सफेद रंग के और फल मकोय जैसे छोटे-छोटे होते हैं। फलों का रंग लाला होता है। पाठा स्वाद में कड़वा तथा तीखा होता है। यह जल्दी पच जाता है लेकिन पेट के लिए गरम होता है। इसमें काफी मात्रा में फाइबर यानी रेशे होते हैं। यह कफ तथा वात को शान्त करता है। पाठा के दो प्रकार हैं – छोटा और बडी़। गुण दोनों के समान हैं।  पाठा के उपयोग पाठा के जड़ का चूर्ण बनाकर नाक से सूँघने (नस्य लेने) पर आध...

नींबू बिजौरा (Citron)

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     नींबू बिजौरा नाम से आपको पता चल ही गया होगा कि यह एक प्रकार का नींबू है, लेकिन इसका आकार आम नींबू से बड़ा होता है। चरक के हृद्य एवं छर्दिनिग्रहण गणों में तथा सुश्रुत-संहिता में नींबू बिजौरा के गुण-धर्म का उल्लेख मिलता है। इसका फल नींबू से काफी बड़ा होता है। यह मीठे और खट्टे के भेद से दो प्रकार का होता है। मीठे फल का बिजौरा लाल-गुलाबी रंग का होता है। इसका छिलका बहुत मोटा होता है। इसके मध्यम कद के झाड़ीनुमा वृक्ष होते हैं। इसके पत्ते कुछ बड़े, चौड़े और लम्बे होते हैं। फूल सफेद रंग के तथा सुगन्धित होते हैं। इसके फल गोल, आगे के भाग में उभारयुक्त  तथा अधिक बीजयुक्त होते हैं। फल की छाल छोटे-छोटे उभारों से युक्त मोटी, सुगन्धित तथा स्वाद में कड़वी होती है।बिजौरा नींबू फल के रस को वर्षा में सेंधानमक के साथ, शरद् में मिश्री या चीनी के साथ, हेमन्त में नमक, अदरख, हींग, काली मरिच तथा शिशिर व भ्रंशत में भी हेमन्त के समान व ग्रीष्म में गुड़ के साथ इसका सेवन अति लाभप्रद होता है। नींबू बिजौरा के उपयोग बिजौरा नींबू की केसर को पीसकर, पेस्ट बनाकर सिर पर लेप करने से पित्तज-शिरो...

सुगंधबाला (Fragrant swamp mallow)

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     सुगंधबाला 1 मी तक ऊँचा, सीधा, शाकीय पौधा होता है। इसकी जड़ 42.5-50 सेमी लम्बी, 6 मिमी मोटी, चिकनी, भूरे रंग की होती है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इसकी सुगंध कस्तूरी की तरह होती है। सुगन्धबाला कड़वा, छोटा, लघु, रूखा और ठंडे तासीर का होता है। यह पित्त और कफ कम करनेवाला, पाचक शक्ति व खाने की रुचि बढ़ाने वाला, जलन व बार-बार प्यास लगने की इच्छा कम करने वाला तथा घाव को जल्दी सूखाने में मदद करनेवाला होता है। पूरे भारतवर्ष में  सुगंधबाला खरपतवार के रुप में पाया जाता है।  सुगंधबाला के उपयोग हरीतकी को गोमूत्र में पकाकर चूर्ण बनाकर, उसमें जटामांसी, ह्रीबेर तथा कूठ का चूर्ण मिला कर सेवन करने से मुँह की दुर्गंध तथा अन्य मुखरोगों में लाभ होता है। स्वर्ण गैरिक तथा ह्रीबेर के सूक्ष्म चूर्ण (1-3 ग्राम) में मधु मिलाकर चावल के धोवन में घोलकर पीने से उल्टी में लाभ होता है। सुगंधबाला से बने पेस्ट को तण्डुलोदक के साथ मिलाकर कर सेवन करने से उल्टी (वमन) में लाभ होता है। सोंठ तथा ह्रीबेर से षड्ङ़्गपानीय-विधि द्वारा सिद्ध जल का सेवन करने से अतिसार या दस्त को रोकने में मदद मि...

कासनी (Chicory)

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     कासनी बारहमासी पौधा होता है। आयुर्वेद में कासनी जड़ी बूटी औषधि के रुप में प्रयोग में लाया जाता है। कासनी को चिकोरा भी कहा जाता है। कासनी का फूल नीले रंग का होता है। और कासनी को कॉफी के जगह पर भी इस्तेमाल किया जाता है और इसमें कैफीन नहीं होता है। कासनी का उपयोग कासनी बीज का चूर्ण (1-2 ग्राम) अथवा काढ़ा (10-20 मिली) का सेवन करने से सिर दर्द कम होता है। कासनी पत्ते के रस को माथे पर लगाने से या कासनी पत्ते के रस को चन्दन के साथ पीसकर मस्तक पर लगाने से सिरदर्द कम होता है। 2 ग्राम कासनी के पत्तों को पीसकर, ठण्डे पानी के साथ सेवन करने से खून की उल्टी से राहत मिलती है। कासनी के बीजों का काढ़ा बनाकर गरारा करने से मुखपाक तथा मसूड़ों के दर्द से राहत मिलती है। 10-20 मिली कासनी बीज के काढ़े का सेवन करने से पित्त के कारण जो उल्टी होती है उससे राहत दिलाने में मदद मिलती है। कासनी के बीजों का काढ़ा बनाकर 15-20 मिली मात्रा में पिलाने से भी उल्टी से राहत मिलती है। खान-पान में असंतुलन होने पर शरीर की सभी क्रिया असंतुलित हो जाती है। 5-10 मिली कासनी पत्ते का रस या 15-20 मिली कासनी पत्ते क...

काकोदुम्बर (Wild fig)

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     काकोदुम्बर गुलर का फूल या कठूमर का एक किस्म होता है। लेकिन इस अनजान गुलर के किस्म के अनगिनत गुणों के कारण आयुर्वेद में काकोदुम्बर को औषधी के रूप में उपयोग किया जाता है। काकोदुम्बर के वृक्ष के पुराने हो जाने पर इसकी छाल गांठदार हो जाती है। गूलर या अंजीर वृक्ष के समान ही इसके सब अंगों को तोड़ने पर दूध निकलता है। इसका वृक्ष बहुत जल्दी बढ़कर 2-3 वर्षों में फल देने लगते हैं। यह शीघ्र बढ़ने वाला, सदाहरित लगभग 5-8 मी ऊँचा, छोटा वृक्ष होता है। इसके तने की टहनियां-नये अवस्था में सफेद से भूरे रंग के होते हैं।  इसके पत्ते गुलर के पत्ते जैसे ही, परन्तु उससे कुछ बड़े, 10-30 सेमी लम्बे, 5-15 सेमी चौड़े, स्पर्श में खुरदरे तथा शीर्ष पर नुकीले होते हैं। इसके फूल गोलाकार, अण्डाकार, गूलर या अंजीर के फल जैसे ही, किन्तु उनसे कुछ छोटे या रोमश तथा पके अवस्था में हरे-पीले रंग के होते है। काकोदुम्बर का उपयोग काकोदुम्बर के कच्चे फलों को सिरके के साथ पीसकर उसमें नमक मिलाकर सिर में लगाने से खालित्य (सिर का गंजापन) में लाभ होता है। काकोदुम्बर पात्राधानी से बने काढ़े से गरारा करने से गले में...

पलाश (The Forest flame)

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     वैदिक काल में पलाश का प्रमुख उपयोग यज्ञ कर्मों के लिए किया जाता था। पलाश एक वृक्ष है जिसके फूल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके आकर्षक फूलो के कारण इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। पलाश का फूल उत्तर प्रदेश का राज्य पुष्प है और इसको 'भारतीय डाकतार विभाग' द्वारा डाक टिकट पर प्रकाशित कर सम्मानित किया जा चुका है।प्राचीन काल से ही होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है। भारत भर मे इसे जाना जाता है। एक "लता पलाश" भी होता है। लता पलाश दो प्रकार का होता है। एक तो लाल पुष्पो वाला और दूसरा सफेद पुष्पो वाला। लाल फूलो वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम " ब्यूटिया मोनोस्पर्मा " है। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेजो मे दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद फूलो वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम " ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा " है जबकि लाल फूलो वाले को " ब्यूटिया सुपरबा " कहा जाता है। एक पीले पुष्पों वाला पलाश भी होता है। पलाश का उपयोग पलाश की ताजी जड़ों का अर्क निकालकर एक-एक बू...

गोखरू (Land caltrops)

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     गोखरू वर्षा ऋतु में जमीन पर फैलकर बढ़ने वाला, शाखा-प्रशाखायुक्त पौधा होता है। इसके तने 1.5 मी लम्बे, और जमीन पर फैले हुए होते हैं। शाखाओं के नये भाग मुलायम होते हैं; पत्ते चने के पत्तों के समान, परन्तु आकार में कुछ बड़े होते हैं। इसके फूल पीले, छोटे, चक्राकार, कांटों से युक्त, चमकीले लगभग 0.7-2 सेमी व्यास या डाइमीटर के होते हैं। इसमें चने के आकार के कड़े और कँटीले फल लगते हैं। इसके फल छोटे, गोल, चपटे, पांच कोण वाले, 2-6 कंटक युक्त व अनेक बीजी होते हैं। इसकी जड़ मुलायम रेशेदार, 10-15 सेमी लम्बी, हल्के भूरे रंग के एवं थोड़े सुगन्धित होते हैं। गोखुरू अगस्त से दिसम्बर महीने में फलते-फूलते हैं। गोखुर के गुण अनगिनत है। जिसके कारण ही यह सेहत और रोगों दोनों के लिए औषधि के रुप में काम करता है।  गोखरू के उपयोग  10-20 मिली गोखरू काढ़ा को सुबह-शाम पिलाने से पित्त के बढ़ जाने के कारण जो सिर दर्द होता है उससे आराम मिलता है।  2 ग्राम गोखुर के फल चूर्ण को 2-3 नग सूखे अंजीर के साथ दिन में तीन बार कुछ दिनों तक लगातार सेवन करने से दमा में लाभ होता है। गोक्षुर तथा अश...

अर्जुन (Arjuna myrobalan)

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     सदियों से आयुर्वेद में सदाबहार वृक्ष अर्जुन को औषधि के रुप में ही इस्तेमाल किया गया है। अर्जुन प्रकृति से शीतल, हृदय के लिए हितकारी, कसैला; छोटे-मोटे कटने-छिलने पर, विष, रक्त संबंधी रोग, मेद या मोटापा, प्रमेह या डायबिटीज, व्रण या अल्सर, कफ तथा पित्त कम होता है। अर्जुन से हृदय की मांसपेशियों को बल मिलता है, हृदय की पोषण-क्रिया अच्छी होती है। मांसपेशियों को बल मिलने से हृदय की धड़कन ठीक और सबल होती है। सूक्ष्म रक्तवाहिनियों (artery)  का संकोच होता है, इस प्रकार इससे हृदय सशक्त और उत्तेजित होता है। इससे रक्त वाहिनियों के द्वारा होने वाले रक्त का स्राव भी कम होता है, जिससे सूजन कम होती है। अर्जुन के उपयोग  3-4 बूँद अर्जुन के पत्ते का रस कान में डालने से कान का दर्द कम होता है। अर्जुन मूल चूर्ण में मीठा तैल (तिल तैल) मिलाकर मुँह के अंदर लेप कर लें। इसके पश्चात् गुनगुने पानी का कुल्ला करने से मुखपाक में लाभ होता है। हृदय की सामान्य धड़कन जब 72 से बढ़कर 150 से ऊपर रहने लगे तो एक गिलास टमाटर के रस में 1 चम्मच अर्जुन की छाल का चूर्ण मिलाकर नियमित सेवन करने...

काली मूसली (Black musli)

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     काली मूसली एक बहुवर्षायु कोमल क्षुप होती है जिसकी जड़ फाइबर युक्त मांसल (ठोस) होती है। काली मूसली स्वाद में हल्का मीठापन और कड़वापन लिए हुए होती है लेकिन इसकी तासीर गर्म होती है। काली मूसली के पत्ते ताड़ (ताल) के पत्तों की तरह होते हैं। पीले रंग के फूलों के कारण इसको स्वर्ण पुष्पी या हिरण्या पुष्पी भी कहते हैं। इसकी जड़ें  बाहर से मोटी एवं काले-भूरे रंग की तथा अन्दर से सफेद रंग की, मांसल व तंतुयुक्त होती है। काली मूसली का उपयोग  समान मात्रा में काली मूशली, गुडूची सत्त्, केंवाच बीज, गोक्षुर, सेमल, आँवला तथा शर्करा को घी और दूध के साथ मिलाकर पिएं। मूसली कंद 1 भाग, मखाना दो भाग तथा 3 भाग गोक्षुर के चूर्ण का क्षीरपाक कर मिश्री तथा टंकण मिलाकर तीन सप्ताह तक सुबह गुनगुना करके पीने से सेक्स की इच्छा बढ़ती है। 2-4 ग्राम काली मूसली जड़ के चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से शुक्रदोषों में लाभ होता है। 1 ग्राम मूसली चूर्ण में मिश्री मिलाकर खाने से शीघ्रपतन तथा वीर्य विकार आदि दोष मिटते हैं। 2-4 ग्राम काली मूसली के चूर्ण को गाय के घी में मिलाकर खिलाने से वीर्य की पुष्टि हो...

सफेद मूसली (Indian spider plant)

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     सफेद मूसली को शक्तिवर्द्धक जड़ी बूटी माना जाता है, इसलिए आयुर्वेद में औषधि के रूप में इसका बहुत इस्तेमाल किया जाता है। सफेद मूसली की जड़ और बीज, विशेष रूप से औषधि के रूप में बहुत फायदेमंद होते हैं। इसकी जड़ों में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, फाइबर, कैल्शियम, पोटैशियम, मैग्नीशियम आदि अत्यधित मात्रा में पाए जाते हैं। मूसली के फूल सफेद रंग के होते हैं। इसकी जड़ मोटी तथा गुच्छों में होती है। इसका कंद मीठा, कामोत्तेजक और कफ को कम करने में मदद करता है। यह स्तनों में दूध को बढ़ाने में मदद करता है।  सफेद मूसली का उपयोग 2-4 ग्राम सफेद मूसली के चूर्ण में बराबर भाग मिश्री मिला लें। इसे दूध के साथ सेवन करें। इससे स्तनों में दूध की वृद्धि होती है। 2-4 ग्राम सफ़ेद मूसली की जड़ के चूर्ण को दूध में मिला लें। इसका प्रयोग करने से दस्त, पेचिश तथा भूख की कमी जैसी परेशानियों में लाभ मिलता है। 1-2 ग्राम कंद के चूर्ण का सेवन करने से दस्त, पेट की गड़बड़ी, पेट दर्द और भूख ना लगने की समस्या ठीक होती है। पेशाब करते समय दर्द होता है। इस रोग में  मूसली बहुत फायदेमंद होता है। मूसली जड़ के चूर...