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Showing posts from December, 2020

शालाकी (Indian olibanum tree)

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     शालाकी को लोबान भी कहते हैं। लोबान एक बहुत ही उत्तम जड़ी-बूटी भी है और लोबान के फायदे से कई रोगों को ठीक कर सकते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, जोड़ों के दर्द और सूजन की परेशानी, ल्यूकोरिया, कब्ज और बवासीर सहित कई रोगों में शालाकी के इस्तेमाल से फायदे मिलते हैं। शालाकी स्वाद में तीखा, कड़वा और कसैला होता है। यह पचने में आसान होता है। यह वात, पित्त, कफ को ठीक करता है। यह टूटी हुई हड्डियों को जोड़ता है। घाव, मोटापा, योनि विकार, खून की गर्मी, और पेचिश में भी लोबान से लाभ मिलता है। शालाकी के पेड़ की छाल, राख के रंग की होती है। इसके पत्ते नीम के पत्ते की तरह होते हैं।  इसके पत्तों को हाथी बड़े चाव से खाते हैं, इसलिए इसे गजभक्ष्या भी कहते हैं। शालाकी (लोबान) का पौधा लगभग 18 मीटर तक ऊँचा, मंझले से बड़े आकार का होता है। इस पेड़ में फैली हुई शाखाएं और ढेर सारे पत्ते होते हैं। इसका तना गोंदयुक्त और छाल धूसर, चिकनी और पतली होती है। छाल लालिमायुक्त पीली या हरा रंग लिए सफेद रंग की तथा कागज के समान छूटने वाली होती है। शालाकी (लोबान) के उपयोग शालाकी की छाल को पीसकर ललाट पर...

अगरु (Eagle wood)

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     अगरु एक बहुत ही उत्तम जड़ी-बूटी है, प्राचीन काल से ही लोग भारत में अगरु का उपयोग कर रहे हैं। इसकी लकड़ी से राल यानी गोंद की तरह का कोमल व सुगन्धित पदार्थ निकलता है, जो अगरबत्ती बनाने व सुगंधित उबटन की तरह शरीर पर मलने के काम आता है। इसके अलावा अगरु का उपयोग बीमारियों के इलाज के लिए भी किया जाता है।अगरु कड़वा और तीखा, पचने में हल्का और चिकना होता है। यह कफ तथा वात को शान्त करने वाला और पित्त को बढ़ाने वाला होता है। अगरु सुगंधित, लेप लगाने पर शीतल, हृदय के लिए लाभकारी, भोजन के प्रति रुचि बढ़ाने वाला और मोटापा कम करता है। यह त्वचा के रंग को निखारता है। आंख तथा कान के रोगों, कुष्ठ, हिचकी, उल्टी, श्वास फूलना, गुप्त रोगों, पीलिया, खुजली, फुन्सियाँ तथा विष-विकारों की चिकित्सा में इसका औषधीय प्रयोग किया जाता है। अगुरु के सार का तेल भी समान गुणों वाला ही होता तथा पुराने घावों को ठीक करता है।  पेट के कीड़े और कुष्ठ रोग को ठीक करता है।अगरु वृक्ष विशाल तथा सदा हरा-भरा रहने वाला होता है। कृष्णागुरु को पानी में डालने पर (लकड़ी भारी होने के कारण) डूब जाता है। अगरु की अनेक...

कुटज (Coness tree)

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     कुटकी भारत की बहुत ही प्रचलित और प्राचीन औषधि है। यह स्‍वाद में कड़वा होता है। इस वृक्ष का पत्‍ता, छाल और बीज बच्‍चों से लेकर बुजुर्ग तक के बीमारियों के लिए बेहत उपयोगी है। कुटज को आमतौर पर करची, दूधी, इन्द्रजव, कड़वा इंद्र जौ आदि नामों से भी पुकारा जाता है। इसकी दो प्रजातियां होती हैं। कुटज, श्‍वेत कुटज  श्‍वेत कुटज की भी दो प्रजातियाँ होती हैं  Wrightia tinctoria R. Br. तथा Wrightia tomentosa Roem.& Schult. मलेरिया बुखार तथा मियादी बुखार (टॉयफॉयड) में यह औषधि बहुत प्रभावशाली है। इसके बीज पेट की गैस को दूर करने वाले,सेक्स स्टेमना बढ़ाने वाले और पौष्टिक होते हैं। 10 मिलीग्राम छाल के रस को चावलों के धुले हुई पानी (मांड) के साथ पीने से बवासीर, संग्रहणी आदि रोगों में विशेष लाभ होता है।    कुटज के उपयोग दांत के दर्द में कुटज के छाल का काढ़ा बनाकर कुल्‍ला करने से लाभ होता है।   नागरमोथा, अतीस, पान, कुटज  की छाल तथा लाक्षा चूर्ण को बराबर बराबर (2-5 ग्राम) लें। इसे जल के साथ सेवन करने से दस्‍त पर रोक लगती है। 5-10 मिलीग्राम कुटज छाल के...

अमरबेल (Giant-dodder)

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     अमरबेल एक प्रकार की लता है जो बबूल, कीकर, बेर पर एक पीले जाल के रूप में लिपटी रहती है। इसको आकाशबेल, अमरबेल, अमरबल्लरी भी कहते हैं। प्राय: यह खेतों में भी मिलती है, पौधा एकशाकीय परजीवी है जिसमें पत्तियों और पर्णहरित का पूर्णत: अभाव होता है। इसीलिए इसका रंग पीतमिश्रित सुनहरा या हल्का लाल होता है। इसका तना लंबा, पतला, शाखायुक्त और चिकना होता है। तने से अनेक मजबूत पतली-पतली और मांसल शाखाएँ निकलती हैं जो आश्रयी पौधे (होस्ट) को अपने भार से झुका देती हैं। इसके फूल छोटे, सफेद या गुलाबी, घंटाकार, अवृत्त या संवृत्त और हल्की सुगंध से युक्त होते हैं। यह बहुत विनाशकारी लता है जो अपने पोषक पौधे को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है। इसमें पुष्पागमन वसंत में और फलागम ग्रीष्म ऋतु में होता है। इसकी लता और बीज का उपयोग औषधि के रूप में होता है। इसके रस में कस्कुटीन नामक ऐल्केलायड, अमरबेलीन, तथा पीताभ हरित वर्ण का तेल पाया जाता है। इसका स्वाद तिक्त और काषाय होता है। इसका रस रक्तशोधक, कटुपौष्टिक तथा पित्त कफ को नष्ट करनेवाला होता है। फोड़े-फुंसियों और खुजली पर भी इसका प्रयोग किया जाता है। पंजाब ...

ज्वार (Broom corn)

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     ज्वार एक प्रमुख फसल है। ज्वार कम वर्षा वाले क्षेत्र में अनाज तथा चारा दोनों के लिए बोई जाती हैं। ज्वार जानवरों का महत्वपूर्ण एवं पौष्टिक चारा हैं। यह खरीफ की मुख्य फसलों में है। यह एक प्रकार की घास है जिसकी बाली के दाने मोटे अनाजों में गिने जाते हैं। ज्वार एक पोषक तत्व है। ज्वार में मिनरल, प्रोटीन, और विटमिन बी कॉम्प्लेक्स जैसे कई पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। इसके अलावा ज्वार में काफी मात्रा में पोटेशियम, फॉस्फोरस, कैल्शियम और आयरन भी होता है। ज्वार काफी कम कैलोरी में अधिक पोषण देता है। लोग ज्वार का प्रयोग अनाज के रूप में करते हैं।  ज्वार का उपयोग  ज्वार के रस को ललाट पर लगाने से सिरदर्द से आराम मिलता है। ज्वार के आटे को काजल की तरह आँखों में लगाने से आँख के रोगों में लाभ होता है। ज्वार के रस को गुनगुना करके 1-2 बूंद कान में डालने से बहते कान की बीमारी में लाभ होता है। ज्वार के बीजों को जलाकर उनकी राख से दांतों को मलें। इससे दांतों का हिलना, मसूड़ों से खून निकलना तथा मुख के बदबू आने की समस्या ठीक होती है। ज्वार के भुने हुए फलों को गुड़ के...

नागरमोथा (Umbrella edge), (Cypriol)

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     नागरमोथा एक पौधा है जो पूरे भारत में खरपतवार के रूप में उगता है। इससे इत्र बनता है और औषधि के रूप में इसका उपयोग होता है। संस्कृत में इसे नागरमुस्तक या भद्र मुस्तक कहते हैं। यह नमी वाले तथा जलीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। नागरमोथा पूरे भारत में नमी तथा जलीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके झाड़ीनुमा पौधे समुद्र तल से 6 हजार फुट की ऊंचाई तक पाये जाते हैं। नागरमोथा नदी और नालों के किनारे की नमी वाली भूमि में पैदा होते हैं। पुष्प (फूल) जुलाई में तथा फल दिसम्बर के महीने में आते हैं। नागरमोथा तीखा और कड़वा होता है। इसकी तासीर ठंडी होती है। यह पचने में हल्का होता है। यह कफ, पित्त, खून की अशुद्धता को ठीक करने में सहायता करता है।  नागरमोथा का पौधा अधिकांशतः तालाबों और नदियों के किनारे नमी वाली जमीन में होता है। इसमें फूल जुलाई तथा फल दिसम्बर में लगते हैं। नागरमोथा तीन प्रकार का होता हैः– 1.मोथा 2.नागरमोथा 3.केवटीमोथा      नागरमोथा का पौदा कोमल, पतला, सुगंधित और घास की तरह छोटा होता है। नागरमोथा का तना जमीन से ऊपर सीधा, तिकोना और बिन...

पुत्रजीवक (Child life tree)

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     पुत्रजीवक एक औषधि है जिसका सेवन संतान की प्राप्ति के लिए किया जाता है। संतान की प्राप्ति के लिए महिलाएं रूद्राक्ष की तरह इसके बीजों की माला गले में धारण करती हैं। इसके बीजों को धागे में गूथकर पुत्र प्राप्ति के लिए स्त्रियां गले में पहनती हैं। बच्चों के गले में भी पहनाती हैं जिससे वे स्वस्थ बने रहें। इसके बीज, पत्ते या जड़ को दूध के साथ सेवन करने से कमजोर गर्भाश्य को मजबूती मिलती है और महिला को पुत्र की प्राप्ति होती है। इसे भारत में पुत्र प्राप्ति के आयुर्वेदिक मेडिसिन या पुत्र प्राप्ति की दवा के रूप में उपयोग किया जाता है। प्राचीन युग से पुत्रजीवक का प्रयोग आयुर्वेद में प्रजनन संबंधी रोगों के लिए औषधि के रूप में किया जाता रहा है। पितौजिया मधुर, कड़वा, रूखा और ठंडे तासीर का होता है। यह कफवात दूर करने में भी मदद करता है। पुत्रजीवक का पेड़ 12-15 मी ऊँचा, छोटे से मध्यम आकार का सदाहरित वृक्ष होता है। इसके फल गोल-नुकीले, अण्डाकार होते हैं। बीज बेर की गुठली के जैसे कड़े, झुर्रीदार तथा 5 मिमी व्यास (डाइमीटर) के होते हैं। इसके फल वेदनाशामक होते हैं। इसके बीज के सेवन से कमजोर...

सारिवा (Indian sarsaparilla)

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     सारिवा एक प्रकार की लता है। यह पेड़ों के ऊपर फैलती है। यह वर्षा ऋतु में हरी-भरी होती है। वर्षा की पहली बौछार से ही इसकी जड़ से नए अंकुरण होने लगते हैं। सारिवा के पौधे उत्तरी भारत, ख़ासकर पंजाब के जंगली क्षेत्रों में पाई जाती है। यह लाल मिट्टी वाली पहाड़ी भूमि में जहाँ कीचड़ हो, वहां अधिक मात्रा में पाई जाती है।सारिवा चार प्रकार की होती हैं। सारिवा (Hemidesmus indicus (Linn.) R. Br.) सारिवा की लताएं लम्बी और पतली होती हैं तथा ज्यादातर जमीन पर फैलती हैं। ये नीचे से ऊपर की ओर जाती हैं। ये लताएं रसीली और  चिकनी होती हैं। इसकी शाखाएँ लम्बी, चिकनी तथा पतली होती हैं। शाखाओं की संख्या अधिक होती है। लताओं का रंग हरी छाया लिए हुए भूरे रंग का होता है। कभी इन लताओं पर स्पष्ट रोएँ होते हैं तो कभी नहीं भी होते हैं। इसकी जड़ 30 सेमी लम्बी और 3-6 मिमी मोटी होती हैं। जड़ गोलाकार, कठोर एवं चारों ओर सफ़ेद रंग की होती हैं। जड़ की त्वचा भूरे रंग की होती है जिसकी  चौड़ाई में दरार देखने को मिलती है। जड़ की लम्बाई में धारियाँ बनी होती है। कृष्ण सारिवा (Ichnocarpus frutescens (Linn.) R.Br...

जैतून (olive)

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     जैतून स्वाद में कसैला होता है और वात तथा पित्त को शान्त करता है। यह रेचक यानी मल को निकालने वाला, शरीर को बल देने वाला और पेशाब लाने वाला होता है। जैतून घावों में पीव यानी पस नहीं बनने देता और रक्त को पतला करता है। जैतून का फल भूख बढ़ाता है, लीवर की समस्याएं दूर करता है। मासिक धर्म लाता है, एक्जिमा रोग को ठीक करता है और प्यास, जलन दूर करने के साथ ही आँखों के लिए भी लाभदायक होता है। जैतून में फूल और फल लगने का समय अक्टूबर से अप्रैल तक होता है। जैतून के फलों से तेल निकाला जाता है। यह तेल साफ तथा पारदर्शी, सुनहरे रंग का तथा हल्का गंधयुक्त होता है। यह तेल खाने और लगाने दोनों के ही काम आता है। जैतून के उपयोग जैतून के कच्चे फलों को जलाकर उसकी राख में शहद मिला लें। इसे सिर में लगाने से सिर के गंजेपन तथा सिर में होने वाली फुन्सियों की समस्या में लाभ होता है। 5 मिली जैतून के पत्तों के रस को गुनगुना करके उसमें शहद मिला लें। इसमें 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द दूर होता है। जैतून के कच्चे फलों को पानी में पकाकर उसका काढ़ा बना लें। इस काढ़े से गरारा करने पर दांत...

जयंती (Common sesban)

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     जयंती एक अद्भुत वनस्पति है। जयंती दलहन प्रजाति का एक बहुउपयोगी पौधा है जो हमें भोजन, दवा और ईंधन तीनों उपलब्ध कराता है। हालांकि इसके बीज जहरीले होते हैं, परंतु इसे तीन दिनों तक पानी में भिगोने से इसका जहरीला प्रभाव जाता रहता है और तब इसे खाया जाता है। स्वाद में कड़वा तथा तीखा, पेट के लिए गरम और जल्द पचने वाली वनस्पति है। जयंती कफ तथा पित को शान्त करती है। आयुर्वेद की संहिताओं में जयंती के पत्तों के रस के प्रयोग का विशेष वर्णन प्राप्त होता है। पीले/सफेद, लाल और काले फूलों के आधार पर इसकी तीन प्रजातियां होती हैं। पीले फूलों वाली जंयती सभी जगह पाई जाती है, परन्तु सफेद फूलों वाली जयंती दुर्लभ होती है। सफेद जयंती के जड़ का प्रयोग कुष्ठ आदि त्वचा विकारों में अत्यन्त लाभकारी होता है। जयंती का उपयोग जयंती के पत्तों को पीसकर सिर में लगाने से या जयंती के पत्तों का काढा.बनाकर सिर को धोने से बालों का झड़ना बंद होता है और गंजापन भी दूर होता है। 1-2 ग्राम जयन्ती के बीज का चूर्ण तथा 5 मिली जयन्ती की छाल के रस का सेवन करने से पेचिश तथा पाचन की समस्याओं में लाभ होता है...

शिवलिंगी (Bryony)

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     शिवलिंगी पेड़ पर चढ़ने वाली एक लता है जो बरसात के दिनों में अत्यधिक मात्रा में पाई जाती है। लता में से बहुत-सी शाखाएं निकली कर चारों ओर फैली हुई होती हैं। इसका तना चिकना, चमकीला तथा शाखाएं सुतली जैसी पतली, धारीदार व रोएंदार होती हैं। इसके पत्ते करेले के पत्ते जैसे, ऊपर से हरे एवं खुरदरे तथा नीचे से चिकने होते हैं। इसके फूल छोटे और हरे-पीले रंग के होते हैं। इसके फल गोलाकार, चिकने, आठ सफेद धारियों से युक्त होते हैं। कच्चे फल हरे रंग के होते हैं जो पकने पर लाल हो जाते हैं। इसके बीज भूरे रंग के तथा शिवलिंग की आकृति के समान होते हैं।शिवलिंगी स्वाद में कड़वी, पेट के लिए गरम और दुर्गन्ध वाली होती है। यह शरीर के धातुओं को पुष्ट करती है। यह सभी कुष्ठ रोग को ठीक करने वाली होती है। शिवलिंगी हल्की विरेचक यानी मल निकालने वाली और शरीर को बल देने वाली होती है। इसके फल यौन शक्ति बढ़ाने वाले एवं बलवर्धक तथा बुखार को कम करने वाले होते हैं। शिवलिंगी के बीज लीवर, सांस की बीमारी, पाचन तंत्र आदि के लिए भी लाभदायक होते हैं। ये शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। शिवलिंगी के ...

बहेड़ा (Bastard myrobalan)

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     बहेड़ा या बिभीतकी के पेड़ बहुत ऊंचे, फैले हुए और लंबे होते हैं। इसके पेड़ 18 से 30 मीटर तक ऊंचे होते हैं जिसकी छाल लगभग 2 सेंटीमीटर मोटी होती है। इसके पेड़ पहाडों और ऊंची भूमि में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसकी छाया स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होती है। इसके पत्ते बरगद के पत्तों के समान होते हैं तथा पेड़ लगभग सभी प्रदेशों में पाये जाते हैं। इसके पत्ते लगभग 10 सेंटीमीटर से लेकर 20 सेंटीमीटर तक लम्बे तथा और 6 सेंटीमीटर से लेकर 9 सेंटीमीटर तक चौडे़ होते हैं। इसका फल अण्डे के आकार का गोल और लम्बाई में 3 सेमी तक होता है, जिसे बहेड़ा के नाम से जाना जाता है। इसके अंदर एक मींगी निकलती है, जो मीठी होती है। औषधि के रूप में अधिकतर इसके फल के छिलके का उपयोग किया जाता है। बहेड़ा, त्रिफला का एक अंग है। वसंत ऋतु में बहेड़ा के पेड़ से पत्ते झड़ जाने के बाद इस पर ताम्बे के रंग के नई टहनी या शाखा निकलते हैं। गर्मी के मौसम के आगमन तक इसी टहनी या शाका के साथ फूल खिलते हैं। वसंत के पहले तक इसके फल पक जाते हैं। बहेड़ा के फलों का छिलका कफनाशक होता है। यह कंठ और सांस की नली से जुड़ी बीमारी पर ब...

चिचिण्डा (Snake gourd)

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     चिचिण्डा भारत में आसानी से मिलने वाली एक प्रकार की शाक (सब्जी) है। यह अच्छी वर्षा वाले इलाकों में लता रूप में पाई जाती है। चिचिण्डा का प्रयोग सामान्य तौर पर भोजन के लिए होता ही है।  इसके साथ ही चिचिण्डा का उपयोग औषधीय गुणों के लिए भी किया जाता है। चिचिण्डा के फल भूख को बढ़ाने वाले होते हैं। इस लता में औषधीय गुण इतनी अधिक होती है कि इसके फल, फूल, पत्ते, जड़, पंचांग आदि सभी अंगों का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। चिचिण्डा का उपयोग चिचिण्डा के फलों की सब्जी बनाकर खाने से पाचन आसान हो जाता है और कब्ज में बहुत लाभ होता है। इसके फलों की शाक बनाकर सेवन करने से चर्म रोगों में लाभ होता है। चिचिण्डा के फलों को पीसकर इसका लेप सूजन के ऊपर लगाने से सूजन कम हो जाती है। चिचिंडा की पत्तियों में एंटीऑक्सीडेंट गुण पाए जाते हैं जो अन्य  सब्ज़ी में पाए जाने विटामिन सी के साथ मिलकर शरीर को पूर्णतः स्वस्थ बनाये रखने यानी इम्युनिटी को मजबूत बनाने में मदद करते हैं।   यदि इसका सेवन कुछ दिनों तक लगातार किया जाए तो यह याददाश्त को कमजोर कर देता है। इसके अधिक प्रयोग ...

कुटकी (Picrorhiza root)

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     कुटकी एक जड़ी-बूटी है। आयुर्वेद में कुटकी के बारे में विस्तार से अनेक अच्छी और महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। कुटकी का इस्तेमाल रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। बरसों से आयुर्वेदाचार्य मरीज को स्वस्थ करने के लिए कुटकी का उपयोग करते आ रहे हैं। कुटकी का स्वाद कड़वा और तीखा होता है। इसलिए इसे कटुम्भरा भी कहा जाता है। कुटकी का उपयोग कुटकी चूर्ण का काढ़ा बना लें। 10-15 मि.ली. काढ़े में गोमूत्र अर्क मिलाकर पीने से गले के रोगों में लाभ होता है। कुटकी के काढ़े से गरारा करने से मुंह का स्वाद ठीक होता है और मुँह के छाले ठीक होते हैं।  कुटकी आदि औषधियों से बने काढ़े का 10-15 मि.ली. मात्रा में सेवन करें। इससे प्यास लगने, मुंह सूखने, शरीर की जलन और खाँसी आदि की परेशानी ठीक होती है। 1-2 ग्राम स्वर्ण गैरिक तथा कुटकी के बराबर मात्रा चूर्ण में मधु मिला लें। इसका सेवन करने से हिचकी में लाभ होता है। दुरालभा, पिप्पली, कुटकी और हरीतकी को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस 1-2 ग्राम चूर्ण में मधु एवं घी मिलाकर सेवन करने से खांसी में लाभ होता है। मुलेठी और कुटकी से बने ...

वेत्र (Common rattan)

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     वेत्र एक प्रकार की लंबी झाड़ी होती है जिसके तने मजबूत और लचीले होते हैं। हिन्दी में वेत्र को बेंत कहते हैं। बेंत की छड़ी अत्यन्त मजबूत होती है। आयुर्वेद के अनुसार, बेंत की छड़ी तथा फर्नीचर बनाई जाती है। इसके अलावा भी बेंत के कई फायदे हैं। क्या आपको पता है कि एसिडिटी, डायबिटीज, पित्त दोष, कफ विकार आदि में बेंत के फायदे मिलते हैं। इतना ही नहीं, पेट में कीड़े होने पर, ल्यूकोरिया, पेशाब संबंधित रोगों में भी बेंत से लाभ मिलता है। इसके अलावा बेंत अवसाद (डिप्रेशन) को दूर करने में मदद करता है।  वेत्र के उपयोग बेंत की जड़ को पीसकर चावल के धोवन के साथ पिलाने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है। बेंत का क्षार बनाकर 500 मिग्रा क्षार में शहद मिलाकर सेवन करने से मूत्राश्मरी में चूर्ण होकर अश्मरी या पथरी निकल जाती है तथा यह मूत्रल होता है। पत्ते के रस को पीने से जलन कम होता है तथा प्रमेह या डायबिटीज से आराम मिलता है। बेंत के कोमल डंठलों तथा जड़ को काटकर सुखाकर काढ़ा बनाकर पीने से प्रमेह तथा प्रदर में लाभ होता है। बेंत की जड़ को कुट कर 10 ग्राम चूर्ण को 100 मिली जल में मि...

रेवंदचीनी (Rhubarb)

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     रेवंदचीनी एक पहाड़ी वनस्पति है, जिसकी जड़ चिकित्सा के लिए प्रयोग में लाई जाती है। रेवातिका स्वाद में कड़वी और तीखी होती है। इसकी तासीर ठंडी होती है। रेवंदचीनी की जड़ सख्त लकड़ी जैसी और मोटी होती है। इसकी जड़ भूरे पीले रंग की होती है। जड़ का कोई निश्चित आकार नहीं होता है। रेवंदचीनी हिमालयी वनों में पायी जाने वाली औषधि है। रेवंदचीनी के उपयोग दांतों के दर्द से जल्द राहत पाने के लिए रेवंदचीनी की जड़ को कूटकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को दांतों पर मंजन की तरह मलने से दर्द दूर होता है। इससे दांत-मुंह के अन्य रोग, दुर्गन्ध आदि से भी मुक्ति मिलती है। 12-12 ग्राम की मात्रा में  घृतकुमारी (एलोवेरा) का गूदा, सनाय के पत्ते तथा शुण्ठी के चूर्ण लें। इसमें 6-6 ग्राम काला नमक और सेंधा नमक मिलाएं। इसमें 3-3 ग्राम की मात्रा में विडङ्ग तथा रेवंदचीनी का चूर्ण मिलाकर मिश्रण बनाएं। इस मिश्रण को 1-2 ग्राम लें और इसमें मधु मिलाकर सेवन करें। इससे कब्ज की परेशानी खत्म होती है।  रेवंदचीनी की जड़ को पीसकर इसका लेप बवासीर के मस्सों पर लगाएं। इससे बवासीर का दर्द कम होता है। इससे खून आना बंद...

चुक्रिका (Bladder dock)

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     हिन्दी में चुक्रिका को अम्बारी या पालंग साग कहते हैं। चुक्रिका को आयुर्वेद में पेट संबंधी बीमारियां पेचिश, दस्त, उल्टी, पीलिया जैसे बीमारियों के लिये सबसे ज्यादा औषधि के रूप में सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है।वैसे तो चुक्रिका की कई प्रजातियां होती हैं। आम तौर पर चुक्रिका की पत्तियों एवं कोमल डंठलों का साग बनाया जाता है। इसकी पत्तियां तथा डंठल खट्टा होता है। यह उभयलिंगी, अरोमिल, चिकना, 15-30 सेमी लम्बा, वर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके पत्ते सरल, 2.5-7.5 सेमी लम्बे, अण्डाकार तथा आधार पर शंक्वाकार, 3-5 शिरायुक्त तथा खट्टे होते हैं। इसके फूल 2.5-3.8 सेमी लम्बे, सफेद या गुलाबी रंग के होते हैं। इसके फल 1.2 सेमी व्यास या डाईमीटर के, छोटे, सफेद अथवा गुलाबी रंग के होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जुलाई से दिसम्बर तक होता है। चुक्रिका स्वाद में हल्का मधुर और अम्लिय होता है, लेकिन इसकी तासीर गर्म होती है। यह शरीर में वात दोष को कम करने वाला , कफपित्त ,रुचि और भूख बढ़ाने वाला होता है। सारक यानि लैक्सिटिव, पथ्य या आहार तथा देर से पचने वाला होता है। यह गुल्म या ट्यूमर, दर्द, अग...

कोकिलाक्ष (Marsh barbel)

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     कोकिलाक्ष को तालमखाना कहते हैं। सामान्य तौर पर इसके बीज का प्रयोग आयुर्वेद में किया जाता है। ये एक तरह का कंटीला पौधा होता है जो नदी, तालाब के किनारे गीली मिट्टी में उगता है। इसके बीजों का इस्तेमाल सबसे ज्यादा यौन संबंधी समस्याओं के लिए किया जाता है। प्राचीन काल से तालमखाना का प्रयोग कई तरह के बीमारियों के लिए औषधि के रुप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। क्योंकि तालमखाना या कोकिलाक्ष के बीज के औषधीय गुण अनगिनत होते हैं। कोकिलाक्ष के पत्ते मधुर, कड़‍वे तथा शोफ (Dropsy), शूल या दर्द, विष, खाने की कम इच्छा, पेट संबंधी रोग, पाण्डु या पीलिया रोग, विबंध या कब्ज, मूत्ररोग नाशक तथा वात कम करने वाले होते हैं। तालमखाने की जड़ शीतल, दर्दनिवारक या दर्द कम करने वाला, मूत्रल तथा बलकारक होती है। कोकिलाक्ष का उपयोग कोकिलाक्ष के पत्तों का चूर्ण बनाकर, 1-2 ग्राम चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से खाँसी में लाभ होता है। 2-4 ग्राम तालमखाना बीज चूर्ण में शहद तथा घी मिलाकर खिलाने से सांस लेने की तकलीफ में लाभ होता है। तालमखाना की जड़ का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से जलोदर ...

गुलब्बास (Four o’ clock plant)

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     गुलाबास (कृष्णकली) एक फूल है। यह फूल दोपहर के बाद चार बजे शाम को खिलता है, इसलिए अंग्रेजी में इसे फॉर ओ क्लॉक फ्लावर भी कहा जाता है। यौनशक्ति बढ़ाने, कब्ज की समस्या रोगों के इलाज में गुलाबास (कृष्णकली) के फायदे मिलते हैं। इसके अलावा सूजन कम करने, डायबिटीज, खजुली आदि में भी गुलब्बास से लाभ मिलता है।आयुर्वेद में गुलब्बास (कृष्णकली) के फायदे के बारे में अनेक बातें बताई गई हैं। गुलब्बास मोटे-कंदीय जड़ वाला शाकीय पौधा होता है। यह लगभग 1 मीटर ऊँचा, बहुवर्षिय शाक होता है। इसकी शाखाएँ द्वि-विभाजित होती हैं। इसका तना मांसल तथा पर्वसन्धियों से युक्त होता है। इसके पत्ते साधारण तथा आगे के भाग नुकीले होते हैं। इसके फूल पाँच परिदल पत्ते वाले, लाल, पीला, सफेद या बैंगनी रंग के, धब्बेदार होते हैं, जो सिर्फ शाम के समय खिलते हैं। इसके फूल ठंडे प्रकृति के होते हैं। इसके फल गोलाकार, लाल रंग के, झुर्रीदार तथा गोल मरिच के समान होते हैं। इसकी जड़ बेलनाकार, लगभग 10 सेमी व्यास या डाईमीटर की होती है। कंद का भीतरी भाग हरा और सफेद रंग का होता है। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल जुलाई से जनवरी तक होता है...

विधारा (Elephant creeper)

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     विधारा सदाबहार लता है जो भारतीय उपमहाद्वीप की देशज है। यहाँ से यह हवाई, अफ्रीका, केरेबियन देशों में गई है। इसे 'अधोगुडा' भी कहते हैं। इसकी दो प्रजातियाँ हैं: अर्गीरिया नर्वोसा प्रजाति नर्वोसा (Argyreia nervosa var. nervosa) तथा अर्गीरिया नर्वोसा प्रजाति स्पेसिओसा (Argyrea nervosa var. speciosa) जो आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयुक्त होती है। अर्गीरिया नर्वोसा प्रजाति नर्वोसा से मन:प्रभावी औषधि (psychoactive drug) बनाए जाते हैं। वर्षा ऋतु में इसके फूल आते हैं। विधारा को घाव बेल भी कहते हैं। यह मांस को जल्दी भर देता है या कहें कि जोड़ देता है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग रसायन यानी सातों धातुओं को पुष्ट करने वाले पदार्थ के रूप में किया जाता है। आधुनिक वैज्ञानिक समुद्रशोष को ही विधारा मानते हैं तथा दक्षिण में मुम्बई, सूरत आदि के बाजारों में बरधारा या विधारा के नाम से समुद्रशोष या फांग की मूल या शाखाओं के टुकड़े ही प्राय देखने में आते हैं। इसका एक मात्र कारण यही है कि समुद्रशोष (Salvia plebeia R. Br.) और विधारा में बहुत कुछ समानता पाई जाती है, लेकिन सच यह है कि दोनों पौधे पूरी ...

गूलर (Cluster fig)

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     गूलर फिकस कुल का एक विशाल वृक्ष है। इसे संस्कृत में उडुम्बर, बांग्ला में डुमुर, मराठी में उदुम्बर, गुजराती में उम्बरा, अरबी में जमीझ, फारसी में अंजीरे आदमसकी शाखाओं में से फल उत्पन्न होते हैं। फल गोल-गोल अंजीर की तरह होते हैं और इसमें से सफेद-सफेद दूध निकलता है। इसके पत्ते लभेड़े के पत्तों जैसे होते हैं। नदी के उदुम्बर के पत्ते और फूल गूलर के पत्तों-फल से छोटे होते हैं। गूलर, २ प्रकार का होता है- नदी उदुम्बर और कठूमर। कठूमर के पत्ते गूलर के पत्तों से बडे होते हैं। इसके पत्तों को छूने से हाथों में खुजली होने लगती है और पत्तों में से दूध निकलता है।कहावत है कि जिसने गूलर का फूल देख लिया, उसका भाग्य चमक जाता है। यह भी कहा जाता है कि गूलर का सेवन करने वाला वृद्ध भी युवा हो जाता है, क्योंकि गूलर का पेड़ या गूलर का फूल कोई साधारण पेड़ या फूल नहीं है, बल्कि यह एक बहुत ही उत्तम जड़ी-बूटी भी है। इसके तने या डाल आदि में किसी भी स्थान पर चीरा लगाने से सफेद दूध निकलता है। दूध को थोड़ी देर रखने पर पीला हो जाता है, इसलिए इसे हेमदुग्धक कहा जाता है। गूलर के फलों में ढेर सारे कीड...