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Showing posts from August, 2020

अपामार्ग, चिरचिरा (Washerman’s plant)

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      अपामार्ग  एक औषधीय वनस्पति है। हिन्दी  में इसे 'चिरचिटा', 'लटजीरा', 'चिरचिरा ' आदि नामों से जाना जाता है।इसे लहचिचरा भी कहा जाता है। वर्षा के साथ ही यह अंकुरित होती है, ऋतु के अंत तक बढ़ती है तथा शीत ऋतु में पुष्प फलों से शोभित होती है। ग्रीष्म ऋतु की गर्मी में परिपक्व होकर फलों के साथ ही क्षुप भी शुष्क हो जाता है। इसके पुष्प हरी गुलाबी आभा युक्त तथा बीज चावल सदृश होते हैं, जिन्हें ताण्डूल कहते हैं। शरद ऋतु के अंत में पंचांग (मूल, तना, पत्र, पुष्प, बीज) का संग्रह करके छाया में सुखाकर बन्द पात्रों में रखते हैं। बीज तथा मूल के पौधे के सूखने पर संग्रहीत करते हैं। इन्हें एक वर्ष तक प्रयुक्त किया जा सकता है। अपामार्ग (चिरचिरा) के उपयोग   इसे वज्र दन्ती भी कहते हैं। इसकी जड़ से दातून करने से दांतों की जड़ें मजबूत और दाँत मोती की तरह चमकते हैं। बिच्छू के काटने पर एक कटोरी में ५० ग्राम लाही के तेल को उबालो और उस उबलते हुए तेल में लटजीरा के पौधे को उखाड़ कर और उसका रस निचोड़ कर डालो इससे जो वाष्प निकले उसमें बिच्छूसे कटे हुए भाग की सिकाई करो। शीघ्र ल...

बाँस (Bamboo)

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      बाँस, एक अत्यंत उपयोगी घास है, जो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में पाई जाती है। बाँस एक सामूहिक शब्द है, जिसमें अनेक जातियाँ सम्मिलित हैं। इसके लगभग २४ वंश भारत में पाए जाते हैं।इसके परिवार के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य दूब, गेहूँ, मक्का, जौ और धान हैं। यह पृथ्वी पर सबसे तेज बढ़ने वाला काष्ठीय पौधा है। इसकी कुछ प्रजातियाँ एक दिन (२४ घंटे) में १२१ सेंटीमीटर (४७.६ इंच) तक बढ़ जाती हैं। थोड़े समय के लिए ही सही पर कभी-कभी तो इसके बढ़ने की रफ्तार १ मीटर (३९ मीटर) प्रति घंटा तक पहुँच जाती है।   यह पौधा अपने जीवन में एक बार ही फल धारण करता है। फूल सफेद आता है। पश्चिमी एशिया एवं दक्षिण-पश्चिमी एशिया में बाँस एक महत्वपूर्ण पौधा है। इसका आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। इससे घर तो बनाए ही जाते हैं, यह भोजन का भी स्रोत है। सौ ग्राम बाँस के बीज में ६०.३६ ग्राम कार्बोहाइड्रेट और २६५.६ किलो कैलोरी ऊर्जा रहती है। इतने अधिक कार्बोहाइड्रेट और इतनी अधिक ऊर्जा वाला कोई भी पदार्थ स्वास्थ्यवर्धक अवश्य होगा। बाँस का पेड़ अन्य पेड़ों की अपेक्षा ३० प्रतिशत अधिक ऑक्सीजन छोड़ता और कार्बन डाईऑक्...

पिप्पली (Long pepper)

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      पिप्पली   एक  पुष्पीय पौधा है। इसकी खेती इसके फल के लिये की जाती है। इस फल को सुखाकर मसाले, छौंक एवं औदषधीय गुणों के लिये  आयुर्वेद  में प्रयोग किया जाता है। इसका स्वाद अपने परिवार के ही एक सदस्य  काली मिर्च  जैसा ही किन्तु उससे अधिक तीखा होता है।  पिप्पली के फल कई छोटे फलों से मिल कर बना होता है, जिनमें से हरेक एक खसखस के दाने के बराबर होता है। ये सभी मिलकर एक  हेज़ल वृक्ष  की तरह दिखने वाले आकार में जुड़े रहते हैं। इस फल में ऍल्कलॉयड पाइपराइन होता है, जो इसे इसका तीखापन देता है। इसकी अन्य प्रजातियाँ जावा एवं इण्डोनेशिया में पायी जाती हैं। इसमें सुगन्धित तेल (0.७%), पाइपराइन (४-५%) तथा पिपलार्टिन नामक क्षाराभ पाए जाते हैं।    पिप्पली के  उपयोग दांतों के रोग के इलाज के लिए  1-2 ग्राम पीपली चूर्ण में सेंधा नमक, हल्दी और सरसों का तेल मिलाकर दांतों पर लगाएं। इससे दांतों का दर्द ठीक होता है। पीप्पली चूर्ण  में मधु एवं घी मिलाकर दांतों पर लेप करने से भी दांत के दर्द में फायदा होता है। 3 ग्...

गेहूं (Wheat)

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      गेहूं प्रोटीन का एक बहुत अच्छा स्रोत है इसमें 14 .70% प्रोटीन पाया जाता है जो कि शरीर के लिये आवश्यक प्रोटीन मात्रा को पूरा करने में मदद करता है। गेहूं की खेती दुनिया भर में की जाती है। विश्व भर में, भोजन के लिए उगाई जाने वाली धान्य फसलों मे मक्का के बाद गेहूं दूसरी सबसे ज्यादा उगाई जाने वाले फसल है, धान का स्थान गेहूं के ठीक बाद तीसरे स्थान पर आता है। यह घास कुल का पौधा है गेहूं के दाने और दानों को पीस कर प्राप्त हुआ आटा रोटी, डबलरोटी (ब्रेड), कुकीज, केक, दलिया, पास्ता, रस, सिवईं, नूडल्स आदि बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। गेहूं का किण्वन कर बियर, शराब, वोद्का और जैवईंधन बनाया जाता है। गेहूं की एक सीमित मात्रा मे पशुओं के चारे के रूप में प्रयोग किया जाता है और इसके भूसे को पशुओं के चारे या छत/छप्पर के लिए निर्माण सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।हालांकि दुनिया भर मे आहार प्रोटीन और खाद्य आपूर्ति का अधिकांश गेहूं द्वारा पूरा किया जाता है, लेकिन गेहूं मे पाये जाने वाले एक प्रोटीन ग्लूटेन के कारण विश्व का 100 से 200 लोगों में से एक व्यक्ति पेट के रोगों ...

अजमोदा (Celery)

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     अजमोदा   ढेर सारे पत्तों और सफेद फूलों वाली द्विवार्षिक पौधा है। इसके चमकीले हरे पत्ते बिखरे तथा सिकुडे हुए होते हैं। अजमोदा के दो प्रमुख प्रकार हैं। एक जो पत्तों के लिए बढ़ाई जाती हैं और दूसरी जो शलजम जैसी जडों के लिए बढ़ाई जाती है।   अजमोदा को कई स्थानों पर सेलेरी या बोकचॉय के नाम से भी जाना जाता है। लंबे समय से तिब्बती और चीनी इलाकों में इसका प्रयोग सब्जी की भांति किया जाता रहा है। अजमोदा का पौधा अजवायन  के पौधे से मिलता-जुलता होता है, लेकिन इसका पौधा अजवायन के पौधे से थोड़ा बड़ा होता है और इसके दाने भी अजवायन से बड़े आकार के होते हैं।    सब्जियों के अलावा अजमोदा का प्रयोग सूप और सलाद में अधिक किया जाता है, लेकिन आपको यह नहीं पता होगा कि इस अजमोदा का उपयोग करके आप अनेक बीमारियों से भी बच सकते हैं। अजमोदा का प्रयोग करके एक आयुर्वेदिक औषधि भी बनाई जाती है, जिसमें वैसे तो ढेर सारी जड़ी-बूटियाँ मिली होती हैं। इसे ही अजमोदादि चूर्ण ही जाता है। लगभग सभी प्राचीन एवं आधुनिक आयुर्वेदीय ग्रन्थों में अजमोदा का वर्णन पाया जाता है। यूनानियों को अजमोद...

ओल या सूरन (Yam)

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      जिमीकंद एक बहुवर्षीय भूमिगत सब्जी है। जिसका वर्णन भारतीय धर्मग्रंथों में भी पाया जाता है। भारत के विभिन्न राज्यों में जिमीकंद के भिन्न-भिन्न नाम ओल या सूरन हैं। पहले इसे गृहवाटिका में या घरों के अगल-बगल की जमीन में ही उगाया जाता था। परन्तु अब तो जिमीकंद की व्यवसायिक खेती होने लगी है। जिमीकंद एक सब्जी ही नहीं वरन यह एक बहुमूल्य जड़ीबूटी है जो सभी को स्वस्थ एवं निरोग रखने में मदद करता है। भोज्य पदार्थों के संचन हेतु यह भूमिगत तना का रूपांतर है जिसे घनकंद कहते हैं। यह परिवर्तित तना बहुत अधिक जैसा-तैसा फूला रहता है एवं इसकी सतह पर पर्वसंधियाँ रहती हैं जिनपर शल्क-पत्र लगे रहते हैं। सतह पर जहाँ-तहाँ अपस्थानिक जड़ें लगी रहती हैं। अगले सिरे पर अग्रकलिका तथा शल्कपत्रों के अक्ष पर छोटी-छोटी कलिकाएँ होती हैं। इस पौधे का फल यानी जड़ को बवासीर के दवा में भी उपयोग किया जाता है। जिमीकंद का उपयोग वन सूरण को पानी में घिसकर या सूखे हुए कंद को पानी के साथ पीसकर लगाने से कर्णमूलशोथ में लाभ होता है। 10-12 ग्राम जंगली सूरण कल्क को दही के मध्य रखकर या दही लपेट कर निगल जाने से ...

गेंदा (Marigold)

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      गेंदा  बहुत ही उपयोगी एवं आसानी से उगाया जाने वाला फूलों का पौधा है। यह मुख्य रूप से सजावटी फसल है।   यह जितना खूबसूरत होता है उतना ही यह आपके शरीर के लिए फायदेमंद भी होता है। आयुर्वेद के अनुसार, गेंदा के कई सारे औषधीय गुण हैं, और यह एक जड़ी-बूटी भी है। आप  मोच आने पर, सूजन की समस्या और घाव  में गेंदा के इस्तेमाल से फायदे मिलते हैं। इसके अलावा आप,   डायबिटीज, सुजाक और मूत्र रोग  में भी गेंदा के औषधीय गुण से लाभ मिलता है।  इतना ही नहीं  आंखों की बीमारी, नाक से खून बहने पर और कान दर्द सहित सांसों से संबंधित बीमारियों  में गेंदा के औषधीय गुण के फायदा मिलता है।  खांसी, हाथों-पैरों की त्वचा का फटने और चोट आने पर  भी गेंदा से लाभ ले सकते हैं। गेंदा के पौधे के उपयोग गेंदे के फूल की कली को पीस लें। इसे आंखों के बाहर चारों तरफ लगाएं। इससे आंखों की बीमारी जैसे आंखों के फूलने आदि में लाभ होता है। गेंदा के पत्ते के रस को आंखों के बाहर चारों तरफ लगाने से भी आंखों के रोग में लाभ होता है। 1 से 2 बूंद गेंदा के प...

नील (Indigo)

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      नील एक पादप है। यही नील रंजक का मूल प्राकृतिक स्रोत था। यह एशिया और अफ्रीका के उष्ण तथा शीतोष्ण क्षेत्रों में पैदा होता है। आजकल अधिकांश रंजक संश्लेषण द्वारा कृत्रिम रूप से बनाए जाते हैं न कि इस पौधे से प्राप्त किये जाते हैं। नील के अलावा इस पादप का उपयोग मृदा को उपजाऊ बनाने के लिए भी किया जाता है। कुछ प्रकार के नील अफीम नाम से जाने जाते हैं। ब्रिटिश शासन में भारत में इनकी खेती की जाती थी। भारत में अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा इसकी जबरन खेती कराने को लेकर किसानों ने कई आन्दोलन तक किये। इस पौधे की पत्तियों के प्रसंस्करण से नील रंजक प्राप्त किया जाता है।नील प्रकृति से कड़वा, तीखा, गर्म, लघु, रूखा, तीक्ष्ण, कफवात से आराम दिलाने वाला, तथा बालों के लिए हितकर होता है। नील के   उपयोग समान मात्रा में त्रिफला (आँवला, हरीतकी, बहेड़ा), नील के पत्ते, लौहभस्म तथा भृङ्गराज चूर्ण को अकेले या इसमें आम की गुठली का चूर्ण मिला कर, आरनाल या भेड़ के मूत्र से पीसकर बालों पर लेप करने से बाल सफेद नहीं ...

चिरौंजी (Cuddapah almond)

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     चिरौंजी या चारोली पयार या पयाल नामक वृक्ष के फलों के बीज की गिरी है जो खाने में बहुत स्वादिष्ट होती है। इसका प्रयोग भारतीय पकवानों, मिठाइयों और खीर व सेंवई इत्यादि में किया जाता है। चारोली वर्षभर उपयोग में आने वाला पदार्थ है जिसे संवर्द्धक और पौष्टिक जानकर सूखे मेवों में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। चारोली का वृक्ष अधिकतर सूखे पर्वतीय प्रदेशों में पाया जाता है। दक्षिण भारत, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, छोटा नागपुर आदि स्थानों पर यह वृक्ष विशेष रूप से पैदा होता है। इस वृक्ष की लंबाई तकरीबन ५० से ६० फीट के आसपास की होती है। इस वृक्ष के फल से निकाली गई गुठली को मींगी कहते हैं। यह मधुर बल वीर्यवर्द्धक, हृदय के लिए उत्तम, स्निग्ध, विष्टंभी, वात पित्त शामक तथा आमवर्द्धक होती है। जिसका सेवन रूग्णावस्था और शारीरिक दुर्बलता में किया जाता है। चारोली का यह पका हुआ फल भारी होने के साथ-साथ मधुर, स्निग्ध, शीतवीर्य तथा दस्तावार और वात पित्त, जलन, प्यास और ज्वर का शमन करने वाला होता है। इस ...

केसर (Saffron)

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       केसर का पौधा छोटे आकार का होता है।केसर का पौधा कई सालों तक जीवित रहता है। इसकी जड़ के नीचे प्याज के समान गांठदार शल्ककन्द होता है। इसके पत्ते घास के समान लम्बे, एवं पतले होते हैं। केसर के फूल नीले, बैंगनी, लाल-नारंगी रंग के होते हैं। फूल के स्त्रीकेशर के सूखे हुए आगे वाले भाग (stigma) को केशर (saffron) कहते हैं। आयुर्वेद में केसर के तीन प्रकार बताए गए हैं। सभी के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं जो ये हैंः- 1.काश्मीरज केसर कश्मीरी केसर लाल रंग का होता है। यह केसर सूक्ष्म तन्तुओं से युक्त होता है। यह कमल जैसे गन्ध वाला होता है। केसर की तीनों श्रेणियों में यह उत्तम श्रेणी का माना जाता है। 2.बाल्हीकज केसर यह बलख-बुखारा देश का केसर है। यह सूक्ष्म तन्तुयुक्त, और पाले रंग का होता है। इसका गन्ध मधु जैसा होता है। यह केसर कश्मीरी केसर के कम गुण वाला माना गया है। 3.पारसीकज-पारस केसर यह ईरान देश का केसर है। यह स्थूल तन्तुयुक्त, हल्का पीले रंग का, और मधु जैसे गन्ध वाला होता है। इस केसर को भी कश्मीरी केसर से कम गुणी वाला बताया गया है।        केसर विश्व का ...

दूब (Scutch grass)

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     दूब  या दुर्वा  एक  घास  है जो जमीन पर पसरती है। हिन्दू संस्कारों एवं कर्मकाण्डों में इसका उपयोग किया जाता है। मारवाडी भाषा में इसे ध्रो कहा जाता हैँ।   इसके औषधीय गुणों के अनुसार दूब त्रिदोष को हरने वाली एक ऐसी औषधि है जो वात कफ पित्त के समस्त विकारों को नष्ट करते हुए वात-कफ और पित्त को सम करती है। दूब सेवन के साथ यदि  कपाल भाति  की क्रिया का नियमित यौगिक अभ्यास किया जाये तो शरीर के भीतर के त्रिदोष को नियंत्रित कर देता है। यह कान्तिवर्धक, रक्त स्तंभक, उदर रोग, पीलिया इत्यादि में अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। श्वेत दूर्वा विशेषतः वमन, कफ, पित्त, दाह, आमातिसार, रक्त पित्त, एवं कास आदि विकारों में विशेष रूप से प्रयोजनीय है। सेवन की दृष्टि से दूब की जड़ का 2 चम्मच पेस्ट एक कप पानी में मिलाकर पीना चाहिए।  घर के आगे खाली जगह में इसे लगा कर सुंदरता देखी जा सकती है। दूर्वा घास के  उपयोग दूब घास तथा चूने को समान मात्रा में लेकर पानी में पीसकर कपाल पर लेप करने से सिरदर्द से आराम मिलता है। दूर्वा को पीसकर पलकों पर बांध...

मुलेठी (licorice)

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     मुलेठी  एक झाड़ीनुमा पौधा होता है।  इसमें गुलाबी और जामुनी रंग के फूल होते है। इसके फल लम्‍बे चपटे तथा कांटे होते है। इसकी पत्तियाँ सयुक्‍त होती है। मूल जड़ों से छोटी-छोटी जडे निकलती है। इसकी खेती पूरे  भारतवर्ष  में होती है। मुलहठी नाम से प्रचलित अंग इस वृक्ष की जड़ के लंबे टुकड़े का नाम है। इसमें मिलावट बहुत पायी जाती है। असली मुलहठी अन्दर से पीली, रेशेदार व हल्की गंध वाली होती है। ताजी जड़ तो मधुर होती है, पर सूखने पर कुछ तिक्त और अम्ल जैसे स्वाद की हो जाती है। विदेशी आयातित औषधियों में मिश्री मुलहठी को सर्वोत्तम माना गया है। मुलहठी की अनुप्रस्थ काट करने पर उसके कटे हुए तल पर कुछ छल्ले स्पष्ट दिखाई देते हैं, जिन्हें कैम्बियम रिंग्स कहते हैं।     वनौषधि निर्देशिका के लेखक के अनुसार उत्तम मुलहठी में किसी भी प्रकार की तिक्तता नहीं पायी जाती है। विद्वान लेखक लिखते हैं कि यदि मुलहठी को गंधकाम्ल (सल्फ्यूरिक एसिड 80 प्रतिशत वी.वी.) में भिगाया जाए तो वह शेष पीले रंग का हो जाता है। यह पहचान का एक आधार है। ताजा मुलहठी में 50 प्रतिशत जल होता ह...