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Showing posts from May, 2021

ख़ुबानी (Apricot)

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     खुबानी गुठली वाला फल होता है और इसकी खास बात ये है कि खुबानी को कच्चा और सूखे मेवे दोनों रुपों में खाया जा सकता है। खुबानी पौष्टिकता के भरपूर होने के कारण खुबानी के फायदे भी स्वास्थ्य के दृष्टि से बहुत होते हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आयुर्वेद में खुबानी का प्रयोग औषधि के रुप में बहुतायत मात्रा में की जाती है। खुबानी आड़ू या प्लम जैसा होता है जिसका छिलका थोड़ा खुरदुरा और मुलायम जैसा होता है। आयुर्वेद के अनुसार खुबानी मीठा और गर्म तासीर का होता है। खुबानी के गुणों के कारण यह वात और कफ को कम करने के साथ कमजोरी दूर करने में मददगार होता है। इसके अलावा खुबानी स्पर्म या शुक्र की क्ववालिटी और संख्या बढ़ाने में भी सहायता करता है। खुबानी आग से जलने पर दर्द  और जलन कम करने में भी फायदेमंद होता है। खुबानी के फल का जलीय एवं ऐथेनॉल सार क्षयरोगरोधी यानि ट्युबरक्लोसिस को होने से रोकने में मदद करता है। साथ ही खुबानी का ब्युटैनॉलिक-सार जीवाणुरोधी भी होता है। खुबानी का सार बैक्टिरीया से लड़ने में मदद करता है। खुबानी का उपयोग 1-2 बूंद खुबानी के बीज का तेल कान में डालने से क...

अंजीर (Fig)

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     अंजीरअच्छी सेहत के लिए एक लोकप्रिय प्राचीन घरेलू उपचार है। ये पौष्टिक होने के साथ-साथ स्वादिष्ट भी होते हैं। अंजीर विभिन्न आवश्यक पोषक तत्वों का एक मिश्रण है। वे फाइटोन्यूट्रिएंट्स, एंटीऑक्सिडेंट्स और विटामिन से भरपूर होते हैं। अंजीर को फल या ड्राई फ्रूट के रूप में खाया जा सकता है। अंजीर का सेवन या तो ताजा या सूखा के रूप में किया जा सकता है और इसका स्वाद मीठा होता है। फिकस कैरिका शहतूत परिवार में फूलों के पौधों की एक एशियाई प्रजाति है, जिसे आम अंजीर के रूप में जाना जाता है। अंजीर मध्य पूर्व और भू मध्य क्षेत्रों के शुष्क और धूप स्थानों में उगाए जाने वाले फल हैं। इनकी खेती प्राचीन काल से की जाती रही है। खाद्य अंजीर उन पहले पौधों में से एक है जिनकी खेती मनुष्यों द्वारा की गई थी। अंजीर के पेड़ की छाल चिकनी और सफेद रंग की होती है। इसका पेड़ मुख्य रूप से सूखी और धूप वाली जगह पर तेजी से बढ़ता है और जड़ें बहुत गहरी होती हैं। यह पहाड़ी क्षेत्र में भी आसानी से उग सकता है। पेड़ की ऊंचाई 9-10 मीटर हो सकती है। ये हिमालय और शिवालिक क्षेत्रों में बहुतायत में पाए जाते हैं। ईरान, भार...

सीताफल, शरीफा (Custurd apple)

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     सीताफल को शरीफा भी बोलते हैं। इसका स्वाद अन्य फलों से अलग होता है। सीतफल एक ऐसा आहार है, जो शरीर को स्वस्थ बनाने के साथ-साथ कई बीमारियों के उपचार के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है। इसका फल गोल होता है। फल के अंदर का हिस्सा मांसल, या गुदायुक्त होता है। सीताफल के बीज चिकने, चमकीले, भूरे-काले रंग के होते हैं। जब सीताफल कच्ची अवस्था में होता है, तो यह थोड़ा पीला, और हरा रंग का होता है। यह आम फलों की तरह ही एक स्वादिष्ट फल है, जिसको लोग बड़ी पसंद से खाते हैं। सीताफल  का इस्तेमाल कफ दोष को ठीक करने के लिए, खून की मात्रा को बढ़ाने के लिए, उल्टी, दांतों के दर्द से आराम पाने के लिए किया जाता है।आयुर्वेद के अनुसार, सीताफल का प्रयोग एक-दो नहीं बल्कि, अनेक रोगों के इलाज के लिए किया जा सकता है।  सीताफल का उपयोग  शरीफा के वृक्ष के तने का काढ़ा बना लें। इसे 15-30 मिली मात्रा में पिएं। इससे दस्त पर रोक लगती है। महिलाएं 1-2 ग्राम शरीफा की जड़ के चूर्ण का सेवन करे। इससे प्रसूता संबंधित विकार में लाभ होता है। रोम छिद्र विकार को ठीक करने के लिए सीताफल के पत्ते का पेस...

बेल (wood apple)

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     बेल मुख्य रुप से भारत में पाया जाने वाला एक पौधा है। आमतौर पर लोग जूस या शरबत के रुप में बेल का सेवन ज्यादा करते हैं।हिंदू धर्म में इसे एक पवित्र पौधा माना जाता है और पूजा में बेल के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आयुर्वेद में इसे महत्वपूर्ण औषधि माना गया है जो पाचन संबंधी कई बीमारियों में फायदेमंद है।  इस फल का हर हिस्सा ही सेहत के लिए के लिए गुणकारी है, बाहर से यह फल जितना ही कठोर होता है अंदर से उतना ही मुलायम और गूदेदार होता है। इसके गूदे में मौजूद बीज भी कई बीमारियों के इलाज में फायदा पहुंचाते हैं। बेल के फल में विटामिन सी, कैल्शियम, फाइबर, प्रोटीन और आयरन भी अधिक मात्रा में मिलते हैं। बेल के नियमित सेवन से शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की आपूर्ति होती है साथ ही शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। बेल के उपयोग  डायरिया और पेचिश :  आधा चम्मच बेलगिरी के चूर्ण को पानी के साथ मिलाकर दिन में दो बार इसका सेवन करें। बार बार शौच जाने की समस्या :  दो चम्मच बेल के गूदे को आधा गिलास पानी में मिलाकर जूस बना लें और दिन में दो बार इसका से...

नींबू (Lemon)

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     नींबू से सब परिचित हैं। लोग नींबू का इस्तेमाल कर कई व्यंजन बनाते हैं।नींबू की चटनी को बहुत ही पसंद से खाई जाती है। नींबू की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जहां दूसरे फल पकने पर मीठे हो जाते हैं, वहीं नींबू का स्वाद हर समय खट्टा ही रहता है। नींबू विटामिन C का मुख्य स्रोत है। नींबू के सेवन से स्कर्वी रोग भी ठीक होता है। इतना ही नहीं नींबू का प्रयोग कर कई और भी बीमारी ठीक की जा सकती है। नींबू की कई जातियां पाई जाती है, जैसे- कागजी नींबू, बिजौरी नींबू, जम्मीरी नींबू, मीठा नींबू इत्यादि। औषधी के रूप में कागजी नींबू का ही प्रयोग करना चाहिए। इसका आकार छोटा या मध्यम होता है। इसका वृक्ष कांटों से युक्त, झाड़ीनुमा होता है। इसके फूल छोटे, सफेद अथवा गुलाबी रंग के होते हैं। फूलों से सुगंध आती है। नींबू के उपयोग 1 कप पीने लायक गर्म दूध में आधा नींबू निचोड़-कर दूध फटने से तुरन्त पहले पी जायें। यह रक्तस्राव को तुरन्त बंद कर देता है। इस प्रयोग को एक या दो बार से अधिक न करें। 5 मिली फल के रस में मधु, नारिकेलोदक और नमक मिलाकर सेवन करें। इससे अधिक प्यास लगने की परेशानी ठीक होती है। जीभ...

बथुआ (Wild spinach)

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     बथुआ हर सब्जी मार्केट में आसानी से मिल जाता है, और देश भर में लोग बथुआ  का सेवन करते हैं। आप भी जरूर बथुआ को खाते होंगे, लेकिन आपको केवल यह पता होगा कि बथुआ को साग के रूप में खाया जाता है। बथुआ एक महत्त्वपूर्ण तथा स्वास्थ्यवर्धक शाक (Bathua vegetable) है। इस पौधे के पत्ते  शीतादरोधी (Antiscorbutic) तथा पूयरोधी (Antidiuretic) होते हैं।  बथुए में अनेक प्रकार के लवण एवं क्षार पाए जाते हैं, जिससे यह पेट रोग के लिए फायदेमंद होता ही है साथ ही अनेक बीमारियों में भी काम में लाया जा सकता है। बथुआ  के  उपयोग बथुआ के बीजों (1-2 ग्राम) का चूर्ण बना लें। इसे मधु के साथ सेवन करें। इससे रक्तपित्त में लाभ होता है। दांत में दर्द हो रहा हो तो बथुआ के बीज का चूर्ण बनाकर दांतों पर रगड़ें। इससे दांत का दर्द तो ठीक होता ही है, साथ ही मसूड़ों की सूजन भी कम हो जाती है।   बथुआ के पत्तों को उबालकर पीस लें। इसे सूजन वाले अंग पर लगाने से सूजन कम हो जाती है।  बथुआ के पत्तों की सब्जी बनाकर सेवन करें। इससे खांसी में आराम मिलता है। बथुआ के रस (5 मिली) में नमक...

आलू (Potato)

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      आलू सबसे आम और महत्वपूर्ण भोजन स्रोतों में एक है। भारत के हर रसोईघर में आलू के बिना कोई भी व्यंजन बनाना मुश्किल होता है। लेकिन क्या आप इसके फायदों के बारे में जानते हैं। वैसे आम तौर पर लोगों का मानना है कि आलू खाने से वजन बढ़ता है लेकिन ये सच नहीं है। आलू में इतने पौष्टिक तत्व और गुण हैं कि इस खाद्द पदार्थ को कई बीमारियों के लिए औषधि के रुप में उपयोग किया जाता है। आलू मीठा और गर्म तासीर का होता है। यह खाने में रुची बढ़ाने के साथ-साथ सूजन कम करने में मददगार होता है। इससे प्राप्त सोलैनिन (Solanine) वेदना कम करने वाला तथा तंत्रिका शूलरोधी (Anti-neuralgic) यानि नर्व के दर्द से राहत दिलाता है। 50-200 मिग्रा की मात्रा में सोलैनीन का प्रयोग करने से कण्डू यानि चर्म रोग कम होता है। आलू पचाने में भारी तथा मल को गाढ़ा करने वाला होता है। लेकिन इसको ज्यादा खाने से शरीर में आलस्य पैदा होता है। आलू के उपयोग आलू के भुने हुए कंद या गांठ  का सेवन करने से मुखपाक या मुँह के छाले कम होते हैं। 2-5 मिली आलू के पत्ते के रस में मधु तथा सेंधा नमक मिलाकर सेवन करने से गले की जलन (कण्ठदाह)...

प्याज (Onion)

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     प्याज का प्रयोग लगभग हर घर में किया जाता है। प्रायः प्याज का इस्तेमाल सब्जी को स्वादिष्ट बनाने के लिए किया जाता है। अनेक लोग प्याज  को सलाद के रूप में खाते हैं। क्या आपको पता है कि प्याज का प्रयोग सब्जी या सलाद के अलावा एक औषधि के रूप में भी किया जाता है। प्याज औषधीय गुणों वाला खाद्य पदार्थ है। इसकी दो प्रजातियाँ होती हैं। इसकी जड़ का प्रयोग सलाद या सब्जियों के पूरक के रूप में सबसे अधिक किया जाता है। प्याज का ऊपरी तना को भी खाया जाता है। इसकी जड़ और तने के रस का प्रयोग उपचारों के लिए किया जाता है। रंगों एवं आकार के आधार पर प्याज की कई प्रजातियाँ होती हैं। रंगों में यह मुख्यतः दो प्रकार का होता है। एक लाल और एक सफ़ेद। कुछ विद्वान इसे ‘प्याज’ और ‘जंगली प्याज’ के रूप में भी दो वर्गों में बाँटते हैं। औषधि के रूप में प्रयोग के लिए सफ़ेद रंग की प्याज को उत्तम माना गया है। प्याज को विटामिन ‘ए’ का अच्छा स्रोत भी माना जाता है। प्याज के रस में हल्की मात्रा में सेंधा नमक मिलाकर, छानकर आँख में 2-2 बूँद डालने से रतौंधी में लाभ मिलता है। इसे प्रयोग से पहले चिकित्सक से परामर्श जरू...

मटर (Pea)

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     मटर एक दलहन है, जिससे आप लोग अच्छे से परीचित होंगे। मटर का इस्तेमाल कई प्रकार के खाद्य पदार्थों में किया जाता है। ठंड के मौसम में तो मटर के बिना शायद ही कोई सब्जी बनाई जाती होगी। सच यह है कि मटर सभी लोगों को पसंद होता है, और लोग इससे बहुत पसंद से खाते हैं। मटर से सिर्फ सब्जी ही नहीं बनाई जाती है, बल्कि मटर का सेवन दाल, पराठे आदि अन्य आहार में भी किया जाता है। इसके अलावा और भी मटर के फायदे हैं। आयुर्वेद में ऐसा ही बताया गया है। पतंजलि के अनुसार, मटर में अनेक प्रकार के पौषक तत्व होते हैं। जो आपके शरीर के लिए फायदेमंद साबित होते हैं। मटर के उपयोग से आप शरीर की जलन, खून संबंधित विकार, सांसों के रोग, खांसी, भूख की कमी का इलाज कर सकते हैं। डायबिटीज, कुष्ठ रोग, चेचक जैसी कई बीमारियों में भी आप मटर का लाभ पा सकते हैं। मटर के उपयोग भुनी हुई मटर, तथा नारंगी के छिलकों को दूध में पीस लें। इस उबटन को शरीर पर लगाना है। इससे आपकी त्वचा में निखार आता है। हरी मटर में अरहर, दालचीनी तथा इलायची मिला लें। इसका जूस बना लें। इसका सेवन करने से भूख बढ़ जाती है। मटर, मसूर, गेहूं तथा हरेणु (छो...

बैंगन (Brinjal)

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     बैंगन का उपयोग मुख्य रूप से सब्जी के रूप में किया जाता है और देश के कई हिस्सों में इसकी खेती की जाती है. बैंगन के पौधे लगभग 60-100 सेमी ऊँचाई वाले और पत्तेदार होते हैं. इसके फूल बैगनी रंग के होते हैं और इसके फल गहरे बैगनी, सफ़ेद या पीले रंग के लंबे अंडाकार आकार में होते हैं.   बैंगन के उपयोग बैंगन के जड़ के रस की 1-2 बूँद मात्रा कान में डालने से कान का दर्द और सूजन कम होता है.  बैंगन की जड़ का पाउडर बना लें और इसे दांतों पर रगड़ें. इससे दांतों का दर्द दूर होता है.  5 मिली बैंगन की पत्तियों के रस में 5 मिली अदरक का रस मिलाकर पीने से उल्टी रुक जाती है. बैंगन के पत्तों को महीन पीसकर उसमें जीरा और शक्कर मिलाकर सेवन करें. इसके सेवन से रक्तस्राव और दर्द दोनों से आराम मिलता है.  पेशाब करते समय जलन एवं दर्द की समस्या से परेशान रहते हैं, तो बैंगन के जड़ के रस की 5 मिली मात्रा का सेवन करें. बैंगन को भूनकर उसे पीस लें और दर्द वाली जगह पर कपड़े में लपेटकर बांधें. इससे दर्द जल्दी दूर होता है.  बैंगन की जड़ के चूर्ण को पानी में उबालकर और फिर ठंडा करके घाव को...

अरबी (Egyptian arum)

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     अरबी की खेती कन्द, और पत्तों के लिए होती है। यह वातकारक है, इसलिए अरबी से बने व्यंजनों में वात के शमन के लिए अजवायन को डाला जाता है। यह वातकारक होते हुए भी हृदय रोगों में फायदेमंद होता है। इसके सेवन से शरीर को पौष्टिक तत्व मिलता है। अरबी को तेल में पकाकर खाने से इसका स्वाद बहुत ही उत्तम हो जाता है। अरबी के उपयोग अरवी के कंद का रस निकालकर सिर पर मालिश करें। इससे बालों का गिरना बंद हो जाता है।  अरबी कन्द के रस में छाछ, या दही मिला लें। इसे पीने से सिर दर्द से आराम मिलता है। अरबी के पत्ते के 1-2 बूंद रस को कान में डालें। इससे ना सिर्फ कान बहना रुक जाता है, बल्कि कान का दर्द भी ठीक हो जाता है। अरबी के पत्तों और कन्द की सब्जी बनाकर सेवन करें। इससे आंखों के रोग में फायदा होता है। अरबी के पत्तेऔर इसकी डंडियों का रस निकाल लें। इसमें नमक मिला लें। इसका लेप करने से गांठों, और मांसपेशियों की सूजन ठीक हो जाती है। नींद न आने की परेशानी में अरबी के पत्तों, तथा कन्द का साग बनाकर सेवन करें। इससे अनिद्रा की परेशानी ठीक हो जाती है। अरबी के कंद का काढ़ा बनाकर पिएं। इससे कब्ज की पर...

करेला (Bitter gourd)

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     करेला स्वाद में कड़वा, और थोड़ा-सा तीखा होता है। मधुमेह के रोगी विशेषतः करेला के रस, और सब्जी का सेवन करते हैं। करेला का सेवन अनेक बीमारियों जैसे- पाचनतंत्र की खराबी, भूख की कमी, पेट दर्द, बुखार, और आंखों के रोग में लाभ पहुंचाता है। योनि या गर्भाशय रोग, कुष्ठ रोगों, तथा अन्य बीमारियों में भी आप करेला से फायदा ले सकते हैं। करेले से कमजोरी दूर होती है, और जलन, कफ, सांसों से संबंधित विकार में लाभ मिलता है। चिड़चिड़ाहट, सुजाक, बवासीर आदि में भी करेले से फायदा मिलता है। करेला के बीज घाव, आहार नलिका, तिल्ली विकार, और लिवर से संबंधित समस्याओं में करेला लाभदायक होता है।  करेला के उपयोग करेले के पत्ते के रस को सिर में लगाने से रूसी की समस्या खत्म होती है। करेला के पत्ते के रस में हल्दी मिलाकर प्रयोग करने से भी डैंड्रफ से छुटकारा मिलता है।ज्यादा जोर से बोलने, या चिल्लाने से आपका गला बैठ गया है। आवाज सही से निकल पा रही है, तो 5 ग्राम करेला के जड़ के पेस्ट को मधु, या 5 मिली तुलसी के रस के साथ मिलाकर सेवन करें। इससे परेशानी ठीक होती है। सूखे करेला को सिरके में पीस लें। इसे ग...

चुकन्दर (Beetroot)

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     चुकंदर एक ऐसा मूसला जड़ वाला वनस्पति है जो लगभग पूरे साल पाया जाता है। इसको सलाद, सब्जी और जूस के रुप में सेवन करते हैं। चुकंदर न सिर्फ सौन्दर्य दृष्टि से फायदेमंद है बल्कि ये स्वास्थ्यवर्द्धक भी है। चुकंदर देखने में छोटा होता है लेकिन चुकंदर के फायदे अनगिनत होते हैं। चुकंदर 30-90 सेमी ऊँचा, मांसल, कंद (bulb), मोटा तना वाला, शाकीय पौधा होता है। इसके पत्ते मूली या शलगम के पत्ते जैसे होते हैं। चुकंदर के फूल 2-3 के गुच्छों में या एकल, लम्बे बेलनाकार स्पाइक जैसे होते हैं। इसकी जड़ बैंगनी लाल रंग की होती है। चुकंदर सितम्बर से फरवरी महीने में फलता-फूलता है। चुकंदर एक ऐसा सब्जी है जो शरीर के लिए बहुत लाभकारी होता है लेकिन इसके साथ-साथ चुकंदर के औषधीय गुण भी बहुत है। चुकन्दर आँखों के लिए अच्छा, चर्बी कम करने वाला तथा कृमिनाशक होता है। चुकंदर के फायदे अनेक हैं। चुकन्दर तीखा, पित्त बढ़ाने वाला तथा अर्श या पाइल्स में फायदेमंद होता है। लाल चुकन्दर पुष्टिकारक होता है। सफेद चुकन्दर मूत्र रोग में फायदेमंद होता है। इसकी जड़ मीठी और ठंडे तासीर की होती है। चुकंदर की जड़ कफ निकालने वाल...

अगस्त (Scarlet wisteria tree)

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     अगस्त एक ऐसी जड़ी बूटी है जिसके बारे में  बहुत कम लोगों को पता है। ये सर्दी के दिनों में ही उगते हैं। इसके फूलों से कई तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं। लोग इसके फूलों से सब्जी, पकौड़े, अचार, गुलकंद आदि बनाते हैं। मुनिराज अगस्त के नाम से इसकी प्रसिद्धि इसलिए हुई कि जब अगस्त तारे का उदय होता है तब इसके वृक्षों पर फूल लगते हैं। राजनिघंटुकार ने सफेद, पीला, नीला और लाल फूलों के आधार पर इसकी चार प्रजातियां बताई हैं परन्तु अधिकांश रुप में सफेद रंग का फूल ही प्राप्त होता है। इसके कोमल पत्ते, फूल और फलियों का साग बनाकर खाया जाता है।      अगस्त-के फूल-मधुर कड़वा, गुण में रूखे; कफ पित्त दूर करने वाले, ज्वर या बुखार में लाभकारी, प्रतिश्याय (Coryza), रतौंधी, पीनस-रोग में फायदेमंद होते है। अगस्त के पत्ते-कड़वे, तीखे, थोड़े गर्म प्रकृति के, कृमि, कंडू या खुजली, रक्तपित्त (नाक-कान से खून बहना), विष तथा प्रतिश्याय को दूर करने वाले होते हैं। अगस्त की फली कड़वी, छोटी, रुचि,बुद्धि और यादाश्त बढ़ाने वाली होने के साथ-साथ  पांडु या एनीमिया में लाभकारी होती है। इसके अल...

पिठवन (Dabra)

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     पिठवन के अतिरिक्त पिठवन की (Uraria lagopoides) तथा (Uraria rufescens) आदि जातियां पाई जाती हैं। दोनों के गुणधर्म समान हैं तथा दोनों ही प्रकार के पिठवन दशमूल में लघुंचमूल के अंग हैं। इन पर वर्षाकाल में फूल तथा शीतकाल में फली आती है। अथर्ववेद में पृश्निपर्णी को जीवाणुनाशक, कमजोरी दूर करने वाला तथा मोटापा को कम करने वाला माना जाता है। बृहत्रयी में रक्तार्श या खूनी बवासीर, वातविकार या गठिया के इलाज में मददगार होता है। चरक-संहिता में सूजन को कम करने वाला माना जाता है। पिठवन के पौधे पूरे भारत की ऊसर भूमि तथा जंगली प्रदेशों में, लगभग 2000 मी की ऊंचाई तक नैसर्गिक रूप से उत्पन्न होते हैं। पिठवन के उपयोग पिठवन की 10 ग्राम जड़ को 400 मिली पानी में पकाकर चतुर्थांश शेष का काढ़ा बनाकर और काढ़े में मिश्री मिलाकर पिलाने से प्रतिश्याय यानि सर्दी-जुकाम में लाभ होता है। ताम्र पत्ते में पृश्निपर्णी जड़, सेंधानमक तथा मरिच चूर्ण मिला कर काञ्जी से पीस कर आँखों में काजल की तरह लगाने से पिल्ल रोग से आराम मिलता है। बकरी के दूध में आधा-भाग जल मिला कर समान मात्रा में सुगन्धबाला, नीलकमल, सो...

टिंडे (Round gourd)

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     टिंडा एक ऐसी शाकाहारी सब्जी है, जो पौष्टिकता से भरपूर है। टिंडा को हजम करना आसान होता है। टिंडा में एन्टी-ऑक्सिडेंट, फाइबर, कैराटिनॉयड, विटामिन सी, आयरन या पोटाशियम होता है, जो टिंडे को सूपरफूड बनाने में मदद करता है। टिंडे की सब्जी खाते तो सब लोग है,लेकिन आयुर्वेद में इसका औषधि के रूप में भी उपयोग किया जाता है। इसकी लताएं हर जगह फैल जाती हैं। टिंडा का तना कोणीय आकार का और रोम वाला होता है। टिंडा के पत्ते ककड़ी के पत्ते जैसे पतले, रोमश और लगभग 6 सेमी लम्बे होते हैं। टिंडा के फूल छोटे, पीले, 3 सेमी व्यास या डाइमीटर के और गुच्छे में होते हैं। इसके फल अंडा के आकार के, 6-10 सेमी व्यास के, हरे और सफेद रंग के या धब्बेदार पीले रंग के होते हैं। टिंडा के भीतर का भाग मुलायम और रस वाला होता है। बीज संख्या में अनेक, बड़े और अण्डाकार, 8 मिमी लम्बे, पीले सफेद रंग के और चिकने होते हैं। टिंडा त्वचा और बालों के लिए फायदेमंद होने के साथ-साथ पाचन तंत्र के लिए भी अच्छा होता है। इसके अलावा टिंडे की सब्जी कई और रोगों के लिए भी लाभकारी है, जैसे- टिंडा का फल आमाशय रस को बढ़ाने वाला, रक्त को ...

मूली (Radish)

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     मूली को मिलाकर कई तरह की सब्जियां बनाई जाती हैं। लंबी और पतली-सी दिखने वाली मूली को लोग बहुत पसंद से खाते हैं क्योंकि लोगों को यह पता है कि मूली के अनेक फायदे हैं। क्या आपको जानकारी है कि मूली एक औषधि भी है। भारत में मूली को सब्जी के साथ-साथ सलाद के रूप में प्रयोग किया जाता है। मूली के नए पत्ते देखने में सरसों के पत्तों जैसे होते हैं। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं। फूल दिखने में सरसों के फूलों की तरह ही होते हैं। रंगों के अनुसार, मूली दो प्रकार की होती है। सफेद मूली, लाल मूली। इसके बीज और जड़ से सफेद रंग का तेल निकाला जाता है। मूली के उपयोग मूली से बने जूस बनाएं, या सूखी मूली से काढ़ा बनाएं। इसे 50-100 मिली की मात्रा में 1-1 घंटे के बाद पिएं। इससे हिचकी की समस्या में लाभ होता है। मूली के बीजों को नींबू के रस में पीस लें। इसे बीमार अंग पर लगाएं। इससे दाद-खाज-खुजली ठीक होती है। 5 ग्राम तिल के साथ मूली के 1-2 ग्राम बीजों का सेवन करें। ऐसा दिन में दो-तीन बार करने से सूजन ठीक होती है। मूली के रस को काजल की तरह आंखों में लगाएं। इससे आंखों की बीमारी ठीक होती है।  मूली ...

जंगली बादाम (Tropical almond)

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     जंगली बादाम का पौधा समुद्र तटीय इलाकों में ऊंचाई पर पाया जाता है। जंगली बादाम के फल चपटे, नुकीले-अण्डाकार होते हैं और इनके किनारे लाल और बैगनी रंग के होते हैं। इसके प्रत्येक फल में एक बीज होता है। साल के हर सीजन में इसमें फल और फूल उगते रहते हैं। जंगली बादाम अम्ल, मधुर, कषाय, शीत तथा पित्तशामक होता है। यह मलरोधक, कफ तथा शुक्रवर्धक होता है। इसकी छाल, पत्र तथा कच्चे फल स्तम्भक, मृदुविरेचक, पाचक, मूत्रल, स्वेदल तथा पूयरोधी होते हैं। इसके बीज पोषक, मधुर, तिक्त तथा स्तम्भक होते हैं। इसके फल अम्ल, मधुर, पोषक, पाचक, तीक्ष्ण, शैत्यकारक, वाजीकर, पित्तशामक तथा आंतों के लिए हितकर होते हैं। इसके फल मधुमेहनाशक क्रियाशीलता प्रदर्शित करते हैं। जंगली बादाम के उपयोग जंगली बादाम की पत्तियों का रस नाक में 1-2 बूँद डालने से या पीने से सिरदर्द में आराम मिलता है।  जंगली बादाम की गिरी को सरसों के तेल के साथ पीसकर सिर पर लगाने से भी सिर का दर्द दूर होता है। जंगली बादाम की पत्तियों के रस की 5 एमएल  मात्रा लें और इसमें काला नमक मिलाकर इसका सेवन करें। इसे पीने से पेट दर्द से आराम मिल...

जामुन (black berry)

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     जामुन देखने में काले और छोटे होते हैं तो क्या हुआ, आयुर्वेद के अनुसार, जामुन के बहुत सारे औषधीय गुण होते हैं। इन औषधीय गुणों के कारण जामुन के फायदे अनेक हैं। गर्मी के मौसम में आम के आने के समय जामुन भी आ जाता है। आयुर्वेद में जामुन को सबसे ज्यादा मधुमेह को नियंत्रण करने के लिए जाना जाता है। इसके साथ ही जामुन, खाना को हजम करने के साथ-साथ दांतों के लिए, आंखों के लिए, पेट के लिए, चेहरे के लिए, किडनी स्टोन के लिए भी फायदेमंद होता है। जामुन में आयरन, कैल्शियम, प्रोटीन, फाइबर, कार्बोहाइड्रेड भी होता है, इसलिए ये बच्चों के सेहत के लिए भी बहुत अच्छा होता है। जामुन का फल खाने की इच्छा बढ़ाने के साथ-साथ लीवर को स्वस्थ रखने में भी मदद करता है। जम्बुफल की गिरी पाचन क्रिया को सुधारती है। इससे पेशाब और खून में शर्करा की मात्रा कम होती है।  जामुन के उपयोग जामुन या इसकी पत्तियों के रस को त्वचा पर लगाने से ये अधिक मात्रा में तैल को त्वचा पर आने से रोकता है जिससे पिम्पल्स जैसी  समस्याओ में आराम मिलता है जामुन में कषाय गुण होने के कारण त्वचा के विकारो में फायदेमंद ह...

पिस्ता (Pistachio nut)

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     पिस्ता का पेड़ लगभग 10 मीटर ऊँचा, छोटा, आम के वृक्ष के जैसा दिखता है। इसके पत्तों पर एक प्रकार का कीटकोष (कीड़ों का घर) बनता है। यह एक ओर से गुलाबी, और दूसरी ओर से पीला-सफेद रंग का होता है। इसके फल 10-20 मिमी लम्बे एवं 6-12 मिमी व्यास के होते हैं। पिस्ता फल का छिलका हल्के पीले से गहरे पीले रंग के होते हैं। पिस्ता फल के बाहरी छिलके को निकाल कर, भीतर के पीले भाग को खाने में प्रयोग किया जाता है, इसे ही गिरी कहते हैं। गिरी पर लाल रंग का महीन छिलका होता है। आयुर्वेद के अनुसार, पिस्ता कफ-पित्त-वर्द्धक, वात दोष से आराम दिलाने वाला, शक्ति प्रदान करने वाला माना जाता है। पिस्ता के पेड़ में फूल और फल जनवरी से जून महीने में आते हैं। आमतौर पर पिस्ता को लोग आहार के रूप में खाते हैं। डायट पर रहने वाले लोग भी पिस्ता का सेवन करते हैं। पिस्ता में फाइबर, कार्बोहाइड्रेड, एमिनो एसिड, फैट होता है, जो ना सिर्फ सिर दर्द , मुंह की दुर्गंध, दस्त, खुजली में फायदेमंद होता है बल्कि कमजोरी दूर करने के साथ-साथ यादाश्त को तेज करने में मदद करता है। इसके फल का प्रयोग मेवे की तरह पौष्टिक पकवान बनाने म...

मूंगफली (Groundnuts, Peanuts)

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     आयुर्वेद के अनुसार, मूंगफली दस्त पर रोक लगाती है। मूंगफली के बीज शरीर को स्वस्थ रखते हैं। त्वचा विकार, किडनी और सर्दी-खांसी जैसी बीमारियों में मूंगफली खाने के फायदे मिलते हैं। यह एक ऐसी औषधि है जो आसानी से बाजार में मिल जाती है, इसलिए आइए जानते हैं कि आप किस-किस रोग में मूंगफली से लाभ ले सकते हैं। मूंगफली की देश भर में कई प्रजातियां होती हैं। इसको देशी बादाम या चीनियां बादाम भी कहा जाता है। इसके पत्ते मेथी के पत्तों के जैसे होते हैं, लेकिन दोनों में कुछ अंतर होता है। मूंगफली के पत्ते मेथी के पत्ते से कुछ बड़े तथा चमकीले हरे रंग के होते हैं। इसके फूल सुनहरे-पीले रंग के होते हैं। इसके पौधों में से फूल बारीक-बारीक तन्तु  के रूप में निकलकर जमीन के अन्दर घुसते हैं, और जमीन में ही तन्तुओं से मूंगफली तैयार होती है। जिसको पकने के बाद खोदकर निकाला जाता है। मूंगफली के उपयोग मूंगफली को छीलकर उसकी भस्म बना लें। 1 ग्राम भस्म को शहद या गुनगुने जल के साथ सेवन करने से खांसी और सर्दी में लाभ होता है। 1-2 बूँद मूंगफली बीज के तेल को पान में डालकर खाने से दस्त और पेट दर्द में ...

कृष्णबीज (Blue Morning glory)

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     कृष्णबीज को कालादान भी कहते हैं। कच्चीअवस्था में इसके बीजों को खाया जाता है। जो स्वाद में ईषद् मधुर तथा कषाय होते हैं।कालादाना की बेल पतली, लम्बी, हरी तथा सघन, लम्बे, रोमों से बनी होती है। इसके तने पतले, शाखित और बेलनाकार होते हैं।  शरद-ऋतु में फलों के पक जाने पर यह बीज स्वयं नीचे गिर जाते हैं। इन्हीं बीजों को कालादाना कहते हैं। काला दाना की मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त इसकी एक और प्रजाति होती है। जिसका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। इसको अन्तकोटर श्वेतपुष्पी, करपत्री कृष्णबीज भी कहते हैं। यह साल में एक बार उगने वाली, आरोही या जमीन पर फैलने वाली लता होती है। पौधे का पूरा भाग चमकीले रोमों से ढका रहता है। इसकी जड़ विरेचक गुण संपन्न होती है। कृष्णबीज की दो प्रजातियां होती है, एक कालादान और दूसरा कृष्णबीज।  कालादान       यह प्रकृति से कड़वा होता है। इसके अलावा यह पाचक, कृमि को निकालने में सहायक, विरेचक, सूजन कम करने वाला, रक्त को शुद्ध करने वाला, बुखार के लक्षणों को दूर करने वाला, वेदना कम करने वाला, तथा मूत्र संबंधी रोगों के इलाज में स...