Posts

Showing posts from March, 2021

मण्डूकपर्णी (Indian pennywort)

Image
     इसकी प्रसरणशील लता अल्प सुगन्धित, दुर्बल तथा कोमल होती है। मण्डूक के समान पत्र वाली तथा मण्डूकवत् इतस्तत फैलने के कारण इसे मण्डूकपर्णी कहा गया है। यह बूटी सम्पूर्ण भारतवर्ष में जलाशयों के किनारे उत्पन्न होती है परन्तु हरिद्वार से लेकर लगभग 600 मी की ऊँचाई तक यह विशेष रूप से दर्शन देती हुई आभास कराती है कि यह विशेष रूप से ब्रह्म प्रभावित क्षेत्र है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिव्य बूटी के सेवन से ब्रह्म की साधना में मदद मिलती है। इसी से साधक जन प्राय इस बूटी का सेवन करते रहते हैं। वैदिक काल में माण्डूकी द्रव्य का वर्णन मिलता है। संहिताग्रन्थ में मेध्य रसायन के रूप में मण्डूकपर्णी का विवेचन किया गया है। निघण्टु ग्रन्थों में मण्डूकपर्णी और ब्राह्मी को एक-दूसरे का पर्याय बतलाकर संदिग्धता उत्पन्न कर दी गई, किन्तु आजकल मण्डूकपर्णी से Centella asiatica और ब्राह्मी से Baccopa monnieri का ग्रहण करते हैं। चरक-संहिता के अपस्मार चिकित्सा में वर्णित ब्राह्मीघृत, ब्राह्मी-रसायन व शाकवर्ग में मण्डूकपर्णी का उल्लेख प्राप्त होता है। चरक-संहिता में निर्दिष्ट किया गया है कि उदररोग से पीड़ि...

ब्राह्मी (Water hyssop)

Image
     यह वनस्पति समस्त भारत में आर्द्र एवं दलदली भूमि पर लगभग 1200 मी की ऊँचाई तक पाई जाती है। बंगाल में इसका अधिक प्रयोग किया जाता है, अत इसे बंगीय ब्राह्मी भी कहते है। जल के समीप पैदा होने तथा स्वाद में नीम जैसी कड़वी होने की वजह से इसे जलनीम भी कहा जाता है। इसका पौधा लगभग 10-30 सेमी लम्बा, भूमि पर फैलने वाला, मांसल तथा शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होता है। इसकी पत्तियाँ मांसल तथा चिपचिपे स्राव से युक्त होती हैं। इसके पुष्प श्वेत अथवा गहरे नीलाभ वर्ण के होते हैं। इसकी फली लम्बी, अण्डाकार, चिकनी तथा नुकीली होती हैं। ब्राह्मी के उपयोग तोतलापन-ब्राह्मी की पत्तियों को चबाने से तोतलापन ठीक होता है। श्वसनीशोथ-5 मिली ब्राह्मी पत्र-स्वरस का सेवन करने से श्वसनी-शोथ में लाभ होता है। रक्तज-अतिसार-5 मिली ब्राह्मी स्वरस या 1-2 ग्राम ब्राह्मी चूर्ण का सेवन कराने से रक्तज अतिसार का शमन होता है। मूत्रदाह-5 मिली ब्राह्मी स्वरस को जल के साथ मिलाकर सेवन करने से मूत्रदाह तथा मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है। प्रसवोत्तर शूल-ब्राह्मी के उबले पत्रों का सेवन करने से प्रसव के पश्चात् होने वाली वेदना का श...

भव्य (Elephants apple)

Image
     यह पौधा समस्त भारत में नदी-नालों के किनारे तथा आद्र वनों 1200 मी0 की ऊचाई तक पाया जाता है। कुछ विद्वान कमरख को भव्य फल मानते है,किन्तु कमरख तथा भव्य फल आपस में पूर्णतया भिन्न है इसका वर्णन चरक व सुश्रुत-संहिता के सूत्र स्थान में प्राप्त होता है। Dillenia indica Linn.  (भव्य फल) इसका पौधा लगभग 10-25 मी ऊँचा, मध्यम आकार का, सुन्दर व सदाहरित होता है। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के व सुगन्धित होते हैं। इसके फल गोलाकार, छोटे नारियल के जैसे, कठोर छिलके वाले, लगभग 7-15 सेमी व्यास के, बाह्यदलों से घिरे हुए होते हैं। उपरोक्त वर्णित भव्य फल के अतिरिक्त इसकी निम्नलिखित प्रजाति का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। भारत के कई प्रदेशों में विशेषतया मध्यप्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के तराई इलाकों में दीपावली के दिन लक्ष्मी का स्वरूप मानकर इस पौधे की पूजा की जाती है तथा पूजा-पाठ करने के लिए इसकी लकड़ी का पीढ़ा भी बनाया जाता है। इस वृक्ष के संदर्भ में कहा जाता है कि इसकी लकड़ी की खाट बनाकर सोने से शरीर की वेदनाओं का शमन होता है। Dillenia pentagyna Roxb. (इषत्फल भव्य)- यह मध्यम आकार का ल...

भारंगी (Serrate glory bower)

Image
     प्राय समस्त भारत में विशेषत भारत के पर्वतीय प्रदेशों के वन्य प्रदेशो में लगभग1200-1500 मी की ऊँचाई तक इसके क्षुप पाए जाते हैं। श्वास रोग में भारंगी की मूल विशेष लाभप्रद होती है। इसका काण्ड ब्राह्मण की लाठी के सदृश होता है। इसलिए इसे ब्राह्मणयष्टिका भी कहा जाता है। इसका 0.6-2.4 मी ऊँचा, बहुवर्षायु, झाड़ीदार क्षुप होता है। इसके पत्र काण्ड पर चक्रदार क्रम में लगे हुए तीक्ष्ण, चमकीले हरे रंग के होते हैं। इसके पुष्प अनेक, सुंदर, पाण्डुर नील वर्ण से बैंगनी नील एवं श्वेत वर्ण के होते हैं। इसके फल 6 मिमी लम्बे, 4-8 मिमी चौड़े, गोलाकार, कृष्ण वर्ण के तथा पकने पर जामुनी रंग के होते हैं। इसकी मूल ग्रन्थियुक्त होती है। इसकी मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त निम्नलिखित तीन प्रजातियाँ और पाई जाती हैं, जिनका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है 1. भाण्डीर (Clerodendrum infortunatum L.) 2. लञ्जई (Clerodendrum inerme (L.) Gaertn.) तथा 3. भारंगी (Clerodendrum indicum (L.) Kuntze)। भारंगी के उपयोग मस्तक शूल-भारंगी की मूल को गर्म जल में घिसकर मस्तक पर लेप करने से मस्तक शूल का शमन होता है।...

भूतृण (Lemon grass)

Image
     समस्त भारत में मुख्यत महाराष्ट्र, गुजरात एवं पंजाब में इसकी खेती की जाती है। यह एक प्रकार की सुगन्धित घास है जो लगभग 1.8 मी ऊँची तथा बहुवर्षायु होती है। इसके पत्र सुगन्धित (नींबू की गंध युक्त), नीचे चौड़े, ऊपर की ओर संकरे तथा धारदार किनारे वाले होते हैं। इसकी मूल प्रकन्दयुक्त होती है। इसकी पत्तियों का प्रयोग चाय बनाने में किया जाता है। भूतृण के पत्तों से निर्मित चाय अत्यन्त रुचिकर, सुगन्धित तथा बलकारक होती है। इसकी मुख्य प्रजाति [Cymbopogon citratus DC. (भूतृण)]  के अतिरिक्त कई प्रजातियाँ पाई जाती हैं, परन्तु मुख्यतया तीन प्रजातियों का प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। 1. लामज्जक (Cymbopogon jwarancusa (Jones.) Schult.) 2. सुगन्धक (Cymbopogon pendulus (Nees ex Steud.) W.Watson) 3. रोहिष घास (Cymbopogon schoenanthus (Linn.) Spreng.)। भूतृण के उपयोग प्रतिश्याय-भूतृण के पत्रों का फाण्ट बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से प्रतिश्याय में लाभ होता है। मुख दौर्गन्ध्य-भूतृण का क्वाथ बनाकर गरारा करने से या भूतृण की पत्तियों को चबाने से मुखदौर्गन्ध्य का शमन होता ह...

भांगरा (Eclipta)

Image
     घने मुलायम काले केशों के लिए प्रसिद्ध भांगरा के स्वयंजात पौधे 1800 मी की ऊँचाई तक आर्दभूमि व जलाशयों के समीप बारह मास उगते हैं। पुष्प के आधार पर इसकी  दो प्रजातियाँ पाई जाती है। श्वेत पुष्प से युक्त प्रजाति को भृंगराज तथा पीतपुष्प युक्त प्रजाति को पीतभृंगराज या अवन्तिका के नाम से जाना जाता है। पीतभृंगराज, श्वेत भृंगराज से अल्प गुण वाला होता है। इसके पौधे बंगाल, आसाम, कोंकण और तमिलनाडू में अधिक बहुतायत से पाए जाते हैं। चरक और सुश्रुत संहिता में कास एवं श्वास व्याधि में भृंङ्गराज तैल का प्रयोग बताया गया है। वाग्भट में रसायनार्थ एवं श्वित्र में भृङ्गराज का उल्लेख मिलता है। भृङ्गराज मूल को विरेचक कहा गया है।Eclipta prostrata (Linn.) Linn. (भांगरा) इसका 15-70 सेमी ऊँचा, सीधा अथवा जमीन पर फैलने वाला, छोटा वर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसकी शाखाएं रोमावृत और ग्रन्थियों पर मूलयुक्त होती हैं। इसके काण्ड कृष्ण वर्ण के, मृदु रोमों से युक्त तथा अनेक शाखा-प्रशाखायुक्त होते हैं। इसके पत्तों को मसलने से कृष्णाभ, हरितवर्णी रस निकलता है, जो शीघ्र ही काला पड़ जाता है। इसके पुष्प श्...

भूर्जपत्र (Himalayan silver birch)

Image
     भारत में यह शीतोष्णकटिबंधीय हिमालय में कश्मीर में 2100-3600 मी तथा सिक्किम में 2700-4200 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। यह 12-15 मी तक ऊँचा, छोटे से मध्यमाकार का, पर्णपाती वृक्ष होता है। इसकी काण्डत्वक् श्वेत वर्ण की तथा अन्त त्वक् गुलाबी वर्ण की, कागज के समान पतली होती है, जो काण्ड से आसानी से पृथक् हो जाती है। इसके पत्र नवीन अवस्था में पीत वर्णी निर्यासी शल्कों से युक्त तथा चिपचिपे होते हैं। इसके पुष्प मंजरियों में लगे हुए होते हैं। इस वृक्ष की छाल को भोजपत्र कहते हैं। यह कागज के समान अथवा केले के सूखे पत्तें के समान होती है। प्राचीन काल में जब कागज उपलब्ध नहीं होता था, तब कागज के स्थान पर लिखने के लिए इसका प्रयोग किया जाता था। इस पर लिखी पाण्डुलिपियां वर्षों तक सुरक्षित रहती हैं। भूर्जपत्र के उपयोग कर्णस्राव-भोजपत्र काण्ड त्वक् का क्वाथ बनाकर कान को धोने से कर्णस्राव तथा कर्णवेदना का शमन होता है। अफारा-भोजपत्र की छाल का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से आध्मान, कामला व पित्त-विकृतिजन्य ज्वर में लाभ होता है। कुष्ठ-भोजपत्र वृक्ष की गाँठ, लहसुन, शिर...

मत्स्याक्षी (Sessile joyweed)

Image
     यह सभी उष्णकटिबंधीय देशों में पाई जाती है। समस्त भारत में यह नमी वाले उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अंडमान एवं हिमालय में 1200 मी की ऊँचाई तक पाई जाती है। यह शाक जलासन्न या आर्द्र-भूमि में अधिक होती है। Alternanthera sessilis (Linn.) R.Br. ex DC. (मत्स्याक्षी)-यह जमीन पर फैलने वाली, शाखा-प्रशाखायुक्त, वर्षायु, शाक होती है। इसकी शाखाएँ मूल से निकली हुई, फैली हुई, 7.5-45 सेमी लम्बी बहुधा बैंगनी वर्ण की, अरोमश होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत, वृंतहीन, छोटे, लगभग 2.5-7.5 सेमी लम्बे एवं 0.3-2 सेमी चौड़े अग्रभाग नुकीले तथा हरे रंग के होते हैं। इसके पुष्प अत्यधिक छोटे, श्वेत अथवा गुलाबी वर्ण के होते हैं। इनके फूलों से मछली के समान गंध आती है। इसके फल अति चौड़े अधोमुख, हृदयाकार, गोलाकार अथवा अण्डाकार तथा बीज छोटे, चर्मिल, वर्तुलाकार, 1.2-1.5 मिमी व्यास के होते हैं। इसका पुष्पकाल फलकाल अगस्त से दिसम्बर तक होता है। उपरोक्त वर्णित मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त निम्नलिखित दो प्रजातियों का प्रयोग भी चिकित्सा में किया जाता है। Alternanthera philoxeroides (Mart.) Griseb. (शिखर मत्स्याक्षी...

मैनफल (Emetic Nut)

Image
     समस्त भारत विशेषत हिमालय में लगभग 1200मी0 की  ऊचाई तक इसके पौधे पाये जाते हैं। इसके पौधे लगभग 9 मी0 तक ऊचें व मजबूत कांटों से युक्त होते हैं। इसके फल गोल, कच्ची अवस्था में हरे पक्वावस्था में पीत वर्ण के तथा चिकने होते हैं।  फल के सूख जाने पर मज्जा भी सूख जाती है, किन्तु बीज उसमें चिपके रहते हैं, इसे मदनफल पिप्पली कहते है। इसके बीज कृष्णवर्ण के तथा फलमज्जा में दबे हुए होते हैं। चरकसंहिता में वर्णित वमनोपग दशेमानि में इसका उल्लेख नहीं है, किन्तु वमनार्थ मदनफल की प्रशंसा करते हुए मदनसर्वगदा विरोधि तु‘ ऐसा उल्लेख मिलता है। ग्रहणी में भल्लातक क्षार में मदनफल का प्रयोग एवं मदनपुष्प की शिरोविरेचन के रूप में गणना की गई है। चरकसंहिता के कल्प स्थान में मदनफल कल्प का वर्णन विशेष रूप से वमन हेतु प्राप्त होता है। मैनफल के उपयोग अर्धावभेदक- समान मात्रा में मैनफल और मिश्री लेकर, थोडे से गाय के दूध के साथ पीसकर सूर्योदय से पहले ही 1-2 बूँद नाक में डालने से सूर्य उदय के साथ आरम्भ होने वाले शिर शूल का शमन होता है। शिरोरोग-4 पिप्पली, 1 मदनफल तथा 250 मिग्रा अफीम के चूर्ण ...

मधुरपर्णी (Sweet herb)

Image
     समस्त भारत में मुख्यतया राजस्थान, केरल एवं महाराष्ट्र में इसकी खेती की जाती है। इसका पौधा लगभग 1 मी0 तक ऊचा तथा रोमश काण्ड से युक्त होता है। इसके पत्र मीठे होते हैं, इसलिए इसे मधुरपर्णी कहते हैं। यह पौधा मूलत दक्षिण अमेरिका के पैराग्वे में प्राप्त होता है। जहाँ यह नदियों के किनारे या नमी वाली भूमि पर मिलता है। मधुरपर्णी के उपयोग मुखपाक-इसके पत्रों का काढ़ा बनाकर गरारा करने से मुखपाक में लाभ होता है। मधुरपर्णी के पत्रों का प्रयोग मधुमेह, हृद्दाह, उच्चरक्त कोलेस्ट्रॉलजन्य उच्च रक्तचाप अजीर्ण, उदररोग, क्षुधानाश, ग्रहणी व्रण व अवसाद जन्य विकारों की चिकित्सा में किया जाता है। मुलेठी तथा स्टीविया के पत्रों का क्वाथ बनाकर पिलाने से अम्लपित्त तथा उदर विकारों में लाभ होता है। स्टीविया पञ्चाङ्ग को छाया में सुखाकर उसमें बड़ी इलायची, अदरख तथा तुलसी पत्र मिलाकर क्वाथ बनाकर पीने से क्षुधा की वृद्धि होती है तथा कफज-विकारों का शमन होता है। स्टीविया पञ्चाङ्ग में कुटकी तथा पुनर्नवा मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से यकृत्शोथ में लाभ होता है। स्टीविया पञ्चाङ्ग को छाया में सुखाकर चूर्...

मधूक (Honey tree)

Image
     यह वृक्ष समस्त भारत के शुष्क पर्णपाती वनों में लगभग 1200 मी तक की ऊँचाई पर विशेष रूप से उत्पन्न होता है। इसका वृक्ष लगभग 12-15 मी तक ऊँचा, बहुवर्षायु, सदाहरित तथा शाखा-प्रशाखाओं से युक्त होता है। इसके पुष्पों का प्रयोग महुवे के रूप में किया जाता है इसके पुष्प प्रारम्भिक अवस्था में सुगन्धित, हल्के श्वेताभ, पीतवर्ण के, मांसल तथा शाखाओं के अन्त भाग पर घने गुच्छों में लगे हुए होते हैं। इसके फूलों से मदिरा का निर्माण किया जाता है। चरकसंहिता के ग्रहणीचिकित्सा में मधूकसार और मधुकपुष्प तथा सुश्रुतसंहिता में हिक्का, शुक्रवैवर्ण्यनाशनार्थ तथा भग्नास्थि बन्धनार्थ मधूक का प्रयोग मिलता है। मधूक के उपयोग शिरोरोग-मधूक पुष्प तथा द्राक्षा शर्करा के कल्क एवं गोदुग्ध से सिद्ध घृत का नस्य लेने से शिरोरोग में लाभ होता है। कफज शिरोरोग-कफज शिरोरोग में स्नेहन के बाद महुए के सार से शिरोविरेचन कराना चाहिए। शिर शूल-बीज तैल को सिर में लगाने से शिरशूल का शमन होता है। सव्रण शुक्र-मधूक वृक्ष के सार भाग में मधु मिलाकर नित्य अंजन करने से सव्रण शुक्र रोग में लाभ होता है। अक्षिपाक-समभाग महुआ वृक्ष के ...

ममीरा (Golden thread root)

Image
     यह शाकीय पौधा समस्त भारत में मुख्यत आसाम, सिक्किम, पश्चिम बंगाल एवं अरुणाचल प्रदेश में पाया जाता है। इसके फल छोटी फलियों की तरह होते हैं और उनमें बहुत छोटे-छोटे तिल के समान बीज रहते हैं। ममीरा नेत्ररोगों की उत्तम औषधि है। इसकी जड़ें सुनहरे पीले रंग की रेशेयुक्त, स्वाद में कड़वी, टेढ़ी, बाहर से भूरी या श्याम वर्ण की तथा अन्दर से गाँठदार होती हैं। इसकी मूल का प्रयोग औषधि कार्य हेतु किया जाता है। ममीरा के उपयोग अभिष्यन्द-ममीरा पत्र का अंजन बनाकर लगाने से अभिष्यंद (आँख का आना), दृष्टिदौर्बल्य, अव्रण शुक्ल तथा तिमिर आदि नेत्र रोगों में लाभ होता है। नेत्र रोग-ममीरा मूल का क्वाथ बनाकर नेत्रों को धोने से नेत्र विकारों का शमन होता है। दंतशूल-ममीरा मूल को दाँतों के बीच में रखकर चबाने से दंतशूल का शमन होता है। क्षुधावर्धनार्थ-ममीरा मूल का फाण्ट बनाकर 10-15 मिली मात्रा में सेवन करने से अरुचि का शमन होता है तथा क्षुधा (भूख) की वृद्धि होती है। अजीर्ण-ममीरा मूल चूर्ण (1-3 ग्राम) का सेवन करने से अजीर्ण व प्रमेह में लाभ होता है। मूत्रकृच्छ्र-ममीरा मूल का क्वाथ बनाकर 10-15 म...

मरूवक (Sweet marjoram)

Image
     यह पौधा समस्त भारत में विशेषकर कर्नाटक, आंध्रप्रदेश तथा तमिल घरों की वाटिका में सुगन्धित पत्रों के कारण उगाया जाता है। तुलसी की तरह दिखने वाला यह पौधा अत्यन्त सुगन्धित होता है। इसका पत्र-स्वरस कृमिनाशक होता है। इसके पुष्प बैंगनी अथवा कदाचित् श्वेत वर्ण के तथा फल चिकने होते हैं। यह मूलत यूरोप तथा उत्तरी अफ्रीका का निवासी है। उत्तरी तथा दक्षिणी अमेरिका में भी इसकी खेती की जाती है। मरूवक के उपयोग शिर शूल-मरुवक के ताजे पौधे को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है। पोथकी-मरुबक और लहसुन के स्वरस को मिलाकर 1-2 बूँद नेत्र में डालने से पोथकी में लाभ होता है। नेत्ररोग-मरुबक पत्रस्वरस से पलाश बीज चूर्ण को भावित कर अंजन करने से नेत्रशुक्र (फूली) में लाभ होता है। कर्णपूय-मरुवक पत्र-स्वरस (2-3 बूँद) को कान में डालने से कर्णपूय का शमन होता है। कास-5 मिली मरुआ पत्र-स्वरस में समभाग मधु मिलाकर सेवन करने से कास में लाभ होता है। 5-10 मिली मरुआ मूल-स्वरस का सुबह-शाम सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है व उदरगत कृमियों का शमन होता है। उदरशूल-4 ग्राम मरुवक पत्र तथा बीज चूर्ण...

आवर्तनी (East Indian screw tree)

Image
     इसका क्षुप झेलम नदी के किनारे से लेकर बिहार, पश्चिम बंगाल, मध्य, पश्चिम एवं दक्षिण भारत के वन्य प्रदेशों में पाया जाता है। इसका क्षुप लगभग 5 मी0 ऊचाँ होता है इसके फल मुड़े हुए होते हैं तथा इनके फलों का प्रयोग मरोड़युक्त पेचिश तथा अतिसार की चिकित्सा में किया जाता है। इसलिए इसे मरोड़फली कहते हैं। आवर्तनी के उपयोग आवर्तनी फल को पीसकर कर्णपाली में लगाने से कर्णपाली के व्रणों का शीघ्र रोपण होता है। आवर्तनी फल स्वरस को 1-2 बूँद कान में डालने से कर्णशूल का शमन होता है। आवर्तनी फलों को एरण्ड तैल या नारियल तैल में पकाकर छानकर 1-2 बूँद तैल को कान में डालने से कर्णस्राव का शमन होता है। उदरशूल-1-2 ग्राम आवर्तनी फल चूर्ण का सेवन करने से मरोड़ युक्त उदरशूल का शमन होता है। मरोड़फली का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पिलाने से उदरशूल का शमन होता है। आंत्रकृमि-मरोड़फली में समभाग वायविडंग मिलाकर क्वाथ करके 10-20 मिली क्वाथ को पिलाने से उदरात्र कृमियों का शमन होता है। अफारा-500 मिग्रा मरोड़फली चूर्ण में काला नमक मिलाकर खाने से आध्मान (अफारा) में लाभ होता है। अतिसार-1 ग्राम मरोड़...

मसण्डा (श्रीपर्ण) (White lady)

Image
     यह भारत तथा मलाया द्वीप में पाया जाता है। भारत में यह उष्णकटिबंधीय भागों में देहरादून, पूर्व की ओर आसाम, मेघालय के खासिया पहाड़ी क्षेत्रों में 1200 मी तक की ऊँचाई पर, दक्षिण एवं पश्चिमी भारतीय प्रायद्वीप, कोंकण, दक्कन, महाराष्ट्र, कर्नाटक, मालाबार, तीन्नरवेल्ली के पहाड़ी क्षेत्रों एवं अंडमान द्वीप में पाया जाता है। समस्त उष्णकटिबंधीय भागों में कृषि किया जाता है। इसकी कई प्रजातियां होती हैं। यह सुन्दर, सीधा अथवा फैला हुआ क्षुप अथवा कदाचित् वृक्षक होता है। इसकी शाखाएँ दीर्घ, टेढ़ी-मेढ़ी, बेलनाकार, काण्डत्वक्धूसर वर्ण की होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत, 7.5-12.5 सेमी लम्बे, 5-9 सेमी चौड़े, अण्डाकार, ऊर्ध्व पृष्ठ पर अत्यधिक अथवा अल्प रोमश, अधपृष्ठ पर श्वेत मुलायम घन रोमश होते हैं। इसके पुष्प बाह्य-भाग में पीताभ-हरित वर्ण के, अन्त भाग नारंगी रक्त वर्ण के होते हैं। इसके फल गोलाकार, अर्धगोलाकार अथवा अण्डाकार, अरोमश, हरित वर्ण के, मांसल, 1-1.3 सेमी व्यास के तथा बीज संख्या में अनेक व सूक्ष्म होते हैं। इसका पुष्पकाल तथा फलकाल अप्रैल से अगस्त तक होता है। मसण्डा (श्रीपर्ण) के उप...

माजूफल (Gall oak)

Image
     भारत में उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश आदि क्षेत्रों में इसका वृक्ष पाया जाता है। इसका वृक्ष लगभग 2-5 मी0 ऊँचा होता है। इसकी नवीन शाखाओं में ऐडलीरिआ गैलीटिंकटोरी‘ नामक कीट अन्दर जाकर अण्डे देते हैं। उन अण्डों के आस-पास स्वरस एकत्रित होकर ग्रन्थि बनती है। कीटक सहित इस ग्रन्थि को माजूफल या मायाफल कहते हैं। माजूफल गोलाकर अथवा अंडाकार, 6-50 मिमी व्यास का, चिकना, चमकीला, धूसर, भूरे वर्ण का होता है। माजूफल के उपयोग खालित्य-माजूफल को सिरके के साथ पीसकर सिर पर लगाने से खालित्य में लाभ होता है। नकसीर से आराम दिलाये माजूफल माजूफल चूर्ण का नस्य लेने से नकसीर में लाभ होता है। दंतरोग में फायदेमंद है माजूफल 1-1 भाग मंजिष्ठा, खदिर सार, कासीस, रूमीमस्तगी, 1/2 भाग तुत्थ तथा 4 भाग मायाफल के चूर्ण से दाँतों का मंजन करने से दंतरोगों का शमन होता है। दन्तवेष्ट-माजूफल के क्वाथ का गरारा करने से दन्तवेष्ट, रक्तष्ठीवन तथा दंत रोगों में लाभ होता है। मुखपाक-  मायाफल क्वाथ या फाण्ट का कवल धारण करने से मुखपाक में लाभ होता है। माजूफल चूर्ण का दांतों पर मंजन करने से हिलते हुए दांत भी वज्र के स...

माणक (Giant taro)

Image
     भारत के समस्त उष्णकटिबंधीय प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। मानकन्द में मीठी और कड़वी दो प्रजातियां होती हैं। इनमें से मीठी जाति का उपयोग किया जाता है। मानकन्द में श्वेत-सार और कैल्शियम मिश्रित ऑक्जेलिक क्षार रहता है। ऑक्जेलिक क्षार की उपस्थिति के कारण ही यह अत्यन्त तीक्ष्ण होता है। इसके पत्र बड़े, गोलाकार तथा पंखे के समान दिखने वाले होते हैं। इसके कन्द को घनकन्द कहते है। यह घनकन्द ऊपर से काले रंग का, अन्दर से श्वेत वर्ण का तथा गोल व बड़े आकार का होता है। माणक के उपयोग मानकन्द के छोटे-छोटे टुकड़े करके उन्हें एक कपड़े में बांध कर पोटली बना लें, इस पोटली को तवे पर गर्म करके मस्तक पर सेंक करने से शिरोरोग में लाभ होता है। कर्णस्राव-बच्चों के कान से यदि पूय (पीव) निकल रहा हो तो, मानकन्द डंठल के स्वरस (1-2 बूँद) को कान में डालने से कर्णस्राव में लाभ होता है। जिह्वा-स्तम्भ-मानकन्द को जलाकर उसकी भस्म बना लें, अब भस्म में सेंधानमक तथा तैल मिलाकर जीभ पर घर्षण करने या मालिश करने से दीर्घकाल से जड़ जिह्वा में भी गति आने लगती है। मुख-क्षत-मानकन्द की भस्म में शहद मिलाकर मु...

माषपर्णी (Blue wiss)

Image
     यह उड़द की एक जंगली प्रजाति होती है जो कि समस्त भारत में पायी जाती है। इसकी उड़द के समान फैलने वाली, विस्तृत, रोमश बहुवर्षायु लता होती है। इसकी फली पतली, सीधी अथवा थोड़ी मुड़ी हुई, नवीन अवस्था में रोमश तथा पक्वावस्था में लगभग अरोमश होती है। प्रत्येक फली में 8-12, गोलाकार, चिकने, गहरे भूरे वर्ण के बीज होते हैं। चरक-संहिता के जीवनीय, शुक्रजनन, मधुरस्कन्ध तथा सुश्रुत-संहिता के आकुल्यादि गणों में इसकी गणना की गई है। यह शुक्रवर्धक, वृष्य, स्तन्यवर्धक तथा बलकारक होती है। माषपर्णी के उपयोग पित्तज-कास-मेदा, जीवक, माषपर्णी आदि द्रव्यों से निर्मित मेदादि घृत का सेवन (5 ग्राम) करने से पित्तज कास में लाभ होता है। माषपर्णी से निर्मित कल्क (1-2 ग्राम) का सेवन करने से कास में लाभ होता है। अतिसार-माषपर्णी के बीजों का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से अतिसार में लाभ होता है। योनिरोग-माषपर्णी आदि द्रव्यों में पकाए हुए बलादि यमकस्नेह को मात्रानुसार नियमित सेवन करने से वातज तथा पित्तज योनिरोगों का शमन होता है। माषपर्णी से सिद्ध तैल का पिचु धारण करने से योनि विकारों का ...

मांसरोहिणी (Red wood tree)

Image
     समस्त भारत के शुष्क पर्णपाती पहाड़ी स्थानों में इसके वृक्ष पाये जाते हैं। इसका प्रयोग व्रण की चिकित्सा में किया जाता है। इसके प्रयोग से मांस को रोहण होता है इसलिए इसे मांसरोहिणी कहते हैं। इसका वृक्ष लगभग 25 मी0 ऊँचा होता है। इसकी काष्ठ को काटने से हल्के रक्त वर्ण का द्रव पदार्थ निकलता है। इसके फल कृष्ण वर्ण के तथा नाशपाती के आकार के होते हैं। चरक संहिता में बल्य तथा सुश्रुत-संहिता के न्यग्रोधादि गणों में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। मांसरोहिणी के उपयोग मुंह के छाले-मांसरोहिणी काण्ड-त्वक् का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मुंह के छाले मिटते हैं। उदरशूल-काण्डत्वक् सत्त् का प्रयोग पेटदर्द की चिकित्सा में किया जाता है। अतिसार-1-2 ग्राम छाल चूर्ण का सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है। 1-2 ग्राम रोहिणी चूर्ण का सेवन करने से पुरानी आँव व अतिसार में लाभ होता है। मूत्र-विकार-1 ग्राम मांसरोहिणी त्वक् चूर्ण में सेंधानमक मिलाकर सेवन करने से मूत्र विकारों में लाभ होता है। स्तन्य-शोधनार्थ-10-20 मिली रोहिणी क्वाथ का सेवन करने से स्तन्य-विकारों का शमन होकर, स्तन्य का शोधन होता है। योनि ...

मुक्तवर्चा (Indian acalypha)

Image
     भारत के उष्ण प्रदेशों में विशेषत बंगाल तथा बिहार से आसाम तक और दक्षिण में कोंकण से त्रावणकोर तक एवं गुजरात व काठियावाड़ में सड़कों के किनारे या बेकार पड़ी भूमि पर खरपतवार के रूप में उत्पन्न होता है। यह श्वास रोगों में अत्यन्त उपयोगी है। इसकी दो प्रजातियों का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। Acalypha indica Linn. (कुप्पी)- इसकी मुख्य प्रजाति यह 30-90 सेमी ऊंचा, सीधा, वर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसकी शाखा लम्बी तथा अनेक भागों में विभक्त, सूक्ष्म रोमश तथा कोण-युक्त होती है। इसके पत्र सरल, 2.5-5 सेमी लम्बे, एकांतर, अण्डाकार, गोलाकार, अग्र भाग पर नुकीले, चिकने तथा मृदु रोमश होते हैं एवं शाखाओं पर चक्करदार क्रम में लगे होते हैं। इसके पुष्प दलहीन, छोटे, 2.5-7.5 सेमी लम्बे, पीताभ-हरे रंग के होते हैं, जो देखने में कुप्पी की आकृति वाले होते हैं। इसके फल एक बीज युक्त, सहपत्रों से घिरे हुए, लघु तथा दृढ़लोमी होते हैं। इसके बीज संख्या में एक, हल्के भूरे वर्ण के, चिकने, अण्डाकार, तीक्ष्ण होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से फरवरी तक होता है। उपरोक्त वर्णित कुप्पी की मुख्य प्...

कलिहारी (The Glory lily)

Image
     समस्त भारत में लगभग 1500 मी की ऊँचाई तक विशेषत उत्तर-पश्चिमी हिमालय, आसाम, बंगाल एवं दक्षिणी भारत में इसकी बेलें पाई जाती है। इसकी बेलें सुन्दर पुष्पों से युक्त होती हैं। इनके पुष्प देखने में अग्नि की शिखा या अग्नि की लौ के समान दिखाई देते हैं, इसलिए इसे अग्निशिखा, अग्निज्वाला या अग्निमुखी आदि नामों से जाना जाता है। इसके कंद भूमिगत, श्वेत वर्ण के, मांसल, बेलनाकार, द्वि-विभाजित से V-आकार के होते हैं। इसका कन्द विषाक्त होता है, अत सावधानीपूर्वक इसका प्रयोग करना चाहिए। कलिहारी के उपयोग शिरशूल-निर्गुण्डी, कलिहारी तथा गुञ्जा से तैल को पकाकर, छानकर सिर पर लगाने से शिरशूल (सिर दर्द) का शमन होता है। बाह्यकृमि-कलिहारी पत्र-स्वरस को सिर पर लगाने से यूका (लीख) आदि बाह्य-कृमियों का शमन होता है। इद्रलुप्त (गंजापन)-कलिहारी मूल को कनेर स्वरस में पीसकर सिर पर लगाने से इन्द्रलुप्त (गंजापन) में लाभ होता है। कर्णकृमि-सूर्यावर्तक स्वरस, निर्गुण्डी स्वरस तथा कलिहारी मूल स्वरस में त्रिकटु का सूक्ष्म चूर्ण मिलाकर 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णगत कृमियों का शमन होता है। कर्णशूल-कलिहारी...

श्लेष्मातक (Indian cherry)

Image
     समस्त भारत में यह मुख्यत अर्ध पर्णपाती वनों में लगभग1000 मी की ऊँचाई तक इसके सदाहरित वृक्ष पाये जाते हैं। इसकी दो प्रजातियां 1. श्लेष्मातक (Cordia dichotoma Forst.f.) तथा 2. लघु श्लेष्मातक (Cordia gharaf (Forst.) Ehrenb ex Aschers.) पाई जाती हैं जिनका प्रयोग चिकित्सा में जाता है। श्लेष्मातक (Cordia dichotoma Forst.f.) इसका वृक्ष लगभग 14 मी उढचाँ तथा सदा हरित होता है। इसकी छोटी शाखाएं लाल रंगयुक्त भूरे वर्ण की होती हैं। इसके पत्र छोटे तथा चिकने होते हैं, जो पूरे बढ़ने पर कुछ खुरदरे हो जाते हैं। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं। इसके फल गुच्छों में लगते हैं जो कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर गुलाबी पीले हो जाते हैं। इसके बीज पारदर्शी, चिपचिपे, मधुर, खाद्य फलभित्ति से घिरे हुए होते हैं। लघु श्लेष्मातक (Cordia gharaf (Forst.) Ehrenb ex Aschers.) इसक वृक्ष श्लेष्मातक से छोटा होता है। इसके पुष्प श्वेत वर्ण के तथा छोटे होते हैं। इसके फल पक्वावस्था में पीत अथवा रक्ताभ भूरे वर्ण के, चिकनी पारभासी खाद्य फलभित्ति युक्त होते हैं। उपरोक्त वर्णित श्लेष्मातक की मुख्य प्रजाति के अ...

लोणी (Garden Purslane)

Image
     यह समस्त भारत में लगभग 1500 मी की ऊँचाई  तक वर्षा ऋतु में इसके स्वयं जात पौधे उत्पन्न होते हैं। बिहार आदि कुछ स्थानों पर शाक हेतु इसकी खेती भी की जाती है। इसके पत्ते मांसल तथा चिकने होते हैं। पत्तों को मसलने पर एक विशिष्ट प्रकार की गन्ध आती है तथा पिच्छिल स्राव निकलता है। इसके पुष्प पीले रंग तथा छोटे होते हैं। इसकी शाक का प्रयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों के निर्माण व चिकित्सा में किया जाता है। लोणी के उपयोग शिरशूल-लोनी के पत्तों को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है। लोनी के पत्तों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों ओर लगाने से नेत्र विकारों का शमन होता है। कर्णशूल-लोनी पत्र-स्वरस (1-2 बूंद) को कान में डालने से, कर्णशूल (कान दर्द) का शमन होता है। दन्तशूल-लोनी पञ्चाङ्ग को पीसकर दांतों पर रगड़ने से दन्तशूल का शमन होता है। मुंहासे-लोनी के बीजों को गोदुग्ध के साथ पीसकर लगाने से मुंहासे मिटते हैं। रक्तनिष्ठीवन-5 मिली लोनी पत्र-स्वरस का सेवन करने से रक्तनिष्ठीवन (थूक में रक्त आना) में लाभ होता है। लोनी के काण्ड एवं पत्र का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने ...