मण्डूकपर्णी (Indian pennywort)
इसकी प्रसरणशील लता अल्प सुगन्धित, दुर्बल तथा कोमल होती है। मण्डूक के समान पत्र वाली तथा मण्डूकवत् इतस्तत फैलने के कारण इसे मण्डूकपर्णी कहा गया है। यह बूटी सम्पूर्ण भारतवर्ष में जलाशयों के किनारे उत्पन्न होती है परन्तु हरिद्वार से लेकर लगभग 600 मी की ऊँचाई तक यह विशेष रूप से दर्शन देती हुई आभास कराती है कि यह विशेष रूप से ब्रह्म प्रभावित क्षेत्र है। ऐसा कहा जाता है कि इस दिव्य बूटी के सेवन से ब्रह्म की साधना में मदद मिलती है। इसी से साधक जन प्राय इस बूटी का सेवन करते रहते हैं। वैदिक काल में माण्डूकी द्रव्य का वर्णन मिलता है। संहिताग्रन्थ में मेध्य रसायन के रूप में मण्डूकपर्णी का विवेचन किया गया है। निघण्टु ग्रन्थों में मण्डूकपर्णी और ब्राह्मी को एक-दूसरे का पर्याय बतलाकर संदिग्धता उत्पन्न कर दी गई, किन्तु आजकल मण्डूकपर्णी से Centella asiatica और ब्राह्मी से Baccopa monnieri का ग्रहण करते हैं। चरक-संहिता के अपस्मार चिकित्सा में वर्णित ब्राह्मीघृत, ब्राह्मी-रसायन व शाकवर्ग में मण्डूकपर्णी का उल्लेख प्राप्त होता है। चरक-संहिता में निर्दिष्ट किया गया है कि उदररोग से पीड़ि...