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Showing posts from February, 2021

शटी (कपूर कचरी) (Ginger lily)

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     यह भारत में हिमालय, उत्तराखण्ड, नेपाल तथा भूटान में 1500-2500 मी की ऊंचाई तक तथा आर्द्र व छायादार स्थानों में उत्पन्न होती है। चरकसंहिता में हिक्कानिग्रहण एवं श्वासहर दशेमानि में इसकी गणना की गई है तथा शटी के शाक को ग्राही बताया है। अर्श तथा अतिसार में शटी का शाक हितकर बताया है। वातव्याधि, हृद्रोग, कास, ग्रहणी, ज्वर, राजयक्ष्मा और गुल्म में अन्य द्रव्यों के साथ इसका प्रयोग मिलता है। कास में इसका उपयोग अधिक मिलता है। साथ ही अगस्त्यहरीतकी, अमृतप्राशघृत एवं उदररोग में प्रयुक्त नारायण चूर्ण के पाठ में शटी का उल्लेख मिलता है। सुश्रुत संहिता में ज्वर, गुल्म, श्वास-कास में प्रयुक्त शट्यादि क्वाथ, बृहत्यादि क्वाथ योग में शटी का प्रयोग मिलता है। इसकी दो प्रजातियाँ पायी जाती है जिसका प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। प्रथम प्रजाति को शटी तथा द्वतीय प्रजाति को सुलोचना या गुलबकाबली के नाम से जाना जाता है। गुलबकाबली का विशेष रूप से नेत्रों के विकारों में प्रयोग किया जाता है। 1. Hedychium spicatum ex Smith  (शटी)-यह 1 मी ऊँचा, हरिद्रा के समान प्रकन्दो से युक्त लघु काण्डयुक्त ...

शणपुष्पी (Warted crotalaria)

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     यह समस्त भारत में उसर तथा परती भूमि पर स्वत ही उत्पन्न होती है तथा कई स्थानों पर इसकी खेती की जाती है। इसका पौधा बहुशाखित तथा 60-90 सेमी ऊँचा  होता है। इसके पुष्प चमकीले पीले रंग के होते हैं। इसकी फली 2.5-3.8 सेमी लम्बी, दीर्घायत-बेलनाकार, सवृंत तथा बीज संख्या में 10-15, पीत वर्ण के, 5 मिमी लम्बे व चमकीले होते हैं। शणपुष्पी के उपयोग उदर-विकार एव मुखगत व्रण-10-20 मिली पत्र क्वाथ का सेवन करने से अतिसार तथा प्रवाहिका का शमन होता है। तथा गण्डूष धारण करने से मुख रोग तथा कण्ठ रोगों में लाभ होता है। आमवात-पत्र तथा बीजों को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है। व्रण-शणपुष्पी के पत्रों को पीसकर व्रणों पर लगाने से गम्भीर व्रणों का रोपण शीघ्र होता है। तथा गुनगुना करके जोड़ों पर लगाने से वेदना तथा शोथ का शमन होता है। जंगली शणपुष्पी के पत्रों को पीसकर लगाने से पामा, पूययुक्त चर्म विस्फोट तथा अन्य त्वग् रोगों में लाभ होता है। पत्र तथा मूल को पीसकर लगाने से कुष्ठ में लाभ होता है। सूजन-शणपुष्पी के बीजों को पीसकर गुनगुना करके लेप करने से सर्वाङ्ग शोथ का शमन होता है।

शण (Indian hemp)

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     समस्त भारत में इसकी खेती की जाती है। प्राचीन आयुर्वेदीय निघण्टुओं एवं संहिताओं में इसका उल्लेख प्राप्त होता है। आचार्य सुश्रुत ने व्रण के सीवन के लिए शण सूत्रों का प्रयोग किया है। यह लगभग 2.4 मी ऊँचा, वर्षायु, शाकीय पौधा होता हैं। इसके पत्र साधारण, 2.5-10 सेमी लम्बे, 0.5-2 सेमी चौड़े, अग्र भाग पर नुकीले तथा दोनों सतह पर रेशमी चमकीले रोमों से आच्छादित होते हैं। इसकी फली मखमली, 10-15 बीजयुक्त तथा लगभग 2.5-3 सेमी तक लम्बी होती है। बीज 6 मिमी लम्बे, हृदयाकार, गहरे भूरे या काले वर्ण के होते हैं। शण के उपयोग मुखरोग-शण बीज का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मुख रोगों में लाभ होता है। वातज गलगण्ड-शण आदि द्रव्यों को सुरा तथा काँजी में पीसकर लेप करने से वातज गलगण्ड में लाभ होता है। गलगण्ड में स्वेदन, लेखन तथा स्रावण कर्म करने के पश्चात् शण आदि द्रव्यों को पीसकर उपनाह बाँधने से गलगण्ड में लाभ होता है। हिक्का-1-2 ग्राम शण आदि द्रव्यों से निर्मित मुक्ताद्य चूर्ण को मधु एवं घृत के साथ सेवन करने से हिक्का, श्वास तथा कास का शीघ्र शमन होता है एवं अञ्जन करने से तिमिर, कास, नीलिका, नेत्...

शतपुष्पा (Indian dill fruit)

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     समस्त भारत में इसकी खेती की जाती है। सोया का उपयोग घरेलू औषधि के रूप में और आयुर्वेद शास्त्र में प्राचीन काल से हो रहा है। अनेक देशों में प्रसूता की पाचन क्रिया और दुग्ध को बढ़ाने के लिए तथा मुखशोधन के लिए भोजन करने के पश्चात् सोया खिलाने का रिवाज है। आचार्य चरक ने आस्थापनोपग एवं अनुवासनोपग दशेमानि में इसकी गणना की है। चरकसंहिता में पार्श्वांस-शूल में लेपार्थ एवं अपरापातन के समय शतपुष्पादि से सिद्ध तैल का पिचु धारण करने का विधान है। काश्यपसंहिता में शतपुष्पा-शतावरीकल्प‘ नामक एक स्वतत्र अध्याय का वर्णन किया गया है। इसका पौधा 30-90 सेमी ऊँचा तथा सुगन्धित होता है। शतपुष्पा के उपयोग मुख-दौर्गन्ध्य-सोया का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मुख का शोधन होता है तथा मुख दौर्गन्ध्य का शमन होता है। कफज-विकार-कफज-विकारों के शमन हेतु सोया क्वाथ का प्रयोग किया जाता है। इसके प्रयोग से वमन द्वारा दोषों का निर्हरण हो जाता है। अतिसार-1 ग्राम सोया चूर्ण में समभाग मेथी दाना चूर्ण मिलाकर तक्र (छाछ) के साथ सेवन करने से अतिसार का शमन होता है। उदरकृमि-1 ग्राम सोया चूर्ण में 250 मिग्रा डीकामाली (ना...

मूर्वा (Tenacious condor vine)

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      हिमालय में यह 1600 मी की ऊँचाई तक उत्तराखण्ड, आसाम व दक्षिण भारत में पाई जाती है। चरक संहिता के स्तन्यशोधन तथा सुश्रुत संहिता के आरग्वधादि व पटोलादि-गणों में इसकी गणना की गई है। इसकी लता लम्बी तथा मजबूत काण्ड वाली होती है इसलिए इसको दृढ़सूत्रिका नाम से जाना जाता है। मूर्वा के उपयोग नेत्ररोग-समभाग सौवीर (काञ्जी), सेंधानमक, तैल तथा मूर्वा मूल कल्क को कांस्य पात्र में घिस कर सूक्ष्म कल्क से नेत्रों का अंजन करने से नेत्र वेदना आदि विकारों का शमन होता है। खाँसी-1 ग्राम मूर्वा मूल चूर्ण में शहद मिलाकर खाने से खाँसी में लाभ होता है। छर्दि-1 ग्राम मूर्वा मूल चूर्ण में मधु मिलाकर चावल के धोवन के साथ पीने से तीनों दोषों से उत्पन्न छर्दि का शमन होता है। 1 ग्राम मूर्वा चूर्ण को चावल के धोवन के साथ पीने से पित्तज छर्दि का शमन होता है। पाण्डु रोग-मूर्वा, आँवला तथा हरिद्रा चूर्ण (1-2 ग्राम) में मधु मिलाकर गोमूत्र के साथ सेवन करने से अथवा त्रिफला तथा भृंगराज स्वरस से पकाए हुए घृत का सेवन करने से पाण्डु रोग (खून की कमी) में लाभ होता है। पूयमेह-10-20 मिली मूर्वा मूल क्वाथ का सेव...

शरपुंखा (Wild indigo)

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     समस्त भारत के हिमालय क्षेत्रों में लगभग 2,000 मी की ऊंचाई तक इसके स्वयंजात पौधे होते हैं। पुष्प भेद से शरपुंखा के दो भेद होते है रक्तपुष्पी (Tephrosia purpurea (Linn.) Pers.) और श्वेतपुष्पी (Tephrosia candida (Roxb.) DC.)। प्राय शरपुंखा के नाम से लाल या बैगंनी रंग के फूल वाली वनस्पति का ग्रहण एवं प्रयोग किया जाता है। चरकसंहिता में शरपुंखा का उल्लेख नहीं हैं। सुश्रुत-संहिता के अलर्क-विष की चिकित्सा में धतूरे के साथ शरपुंखा मूल के प्रयोग का वर्णन प्राप्त होता है। इसके पत्रकों को तोड़ने से, यह बाण के अग्र भाग के समान टूटते हैं, इसलिए इसे शरपुंखा कहते हैं। शरपुंखा (Tephrosia purpurea (Linn.) Pers.) यह 30-60 सेमी तक ऊँचा, शाखा-प्रशाखायुक्त, लगभग सीधा, बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके पुष्प गुलाबी, रक्त अथवा बैंगनी वर्ण के, 4-9 मिमी लम्बे होते हैं। श्वेतपुष्पी शरपुंखा (Tephrosia candida (Roxb.) DC.) यह 1-2.5 मी ऊँचा, बहुवर्षायु, शाकीय पौधा होता है। इसका काण्ड कंटकयुक्त, धूसर-श्वेत वर्ण का तथा सघन रोमश होता है। पुष्प श्वेत वर्ण के होते हैं। शरपुंखा के उपयोग दंतरोग-20-40 ...

शालपर्णी (Sal leaved desmodium)

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     यह समस्त भारत के वनों, खुले प्राकृतावास में एवं हिमालय पर 1600 मी की ऊँचाई तक पाई जाती है। शालपर्णी सुप्रसिद्ध योग दशमूल का एक अंग है। इसके पत्ते शाल के जैसे होते हैं, इसलिए इसे शालपर्णी कहते हैं। चरकसंहिता में शालपर्णी का मूलासव एवं राजयक्ष्मा व क्षतक्षीण-चिकित्सा तथा रसायनपाद में उल्लेख प्राप्त होता है। इसके अतिरिक्त अर्श में प्रयुक्त सुनिष्णकघृत में भी शालपर्णी का उल्लेख मिलता है। सुश्रुतसंहिता में अतिसार, वाताभिष्यन्द तथा विष रोगों की चिकित्सा में इसका प्रयोग मिलता है। शालपर्णी की निम्नलिखित दो प्रजातियों को प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है – 1. Desmodium gangeticum (Linn.) (शालपर्णी)- यह 60-120 सेमी ऊँचा क्षुप होता है। इसकी शाखाएं झुकी हुई तथा फैली हुई होती हैं। इसके पत्र शालपत्र के समान एवं तीक्ष्णाग्र होते हैं। पत्र का ऊपरी पृष्ठ मसृण, हरे रंग का और अधर पृष्ठ फीके हरे रंग का तथा रोमश होता है। इसकी फलियों में रोम अत्याधिक  मात्रा में होते है जिसके कारण यह कपड़ों में चिपक जाती है। 2. Phyllodium pulchellum (L.) (प्रांशु शालपर्णी)- यह 0.5-2 मी तक ऊँचा, झाड़ीद...

मूषिकपर्णी (Kidney leaf morning glory)

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     समस्त भारत में लगभग 900 मी की ऊँचाई तक इसकी लता वनों में पाई जाती है। इसकी लता शाखा-प्रशाखायुक्त तथा भूमि पर फैलने वाली होती है। इसके पत्ते नीलशंखपुष्पी की तरह होते है जो कि देखने में चूहों के कान के सदृश होती है इसलिए इसे मूसापर्णी या मूसाकर्णी भी कहा जाता है। मूषिकपर्णी के उपयोग 1-2 बूँद मूसाकानी पत्र-स्वरस को कान में डालने से कर्ण रोगों का शमन होता है। मुंह के छाले-मूसाकानी के पत्तों को चबाने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं। खाँसी-10 ग्राम मूसाकानी पञ्चाङ्ग को 200 मिली पानी में पकाकर छानकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से खाँसी में लाभ होता है। आंत्रकृमि-मूषाकर्णी चूर्ण को जौ के आटे में मिलाकर पुपूलिका (पूड़ी) बनाकर काञ्जी के साथ सेवन करने से आंत के कीड़ों का शमन होता है। पेट के कीड़े-5 मिली मूसाकानी पत्र-स्वरस को पिलाने से उदर कृमियों का शमन होता है। अफारा-मूसाकानी की जड़ को पानी में पीसकर पेट पर लगाने से आध्मान में लाभ होता है। मूत्र-विकार-मूसाकानी को काली मरिच के साथ पीसकर पिलाने से मूत्र-विकारों का शमन होता है। गर्भप्रदयोग-मूषाकर्णी मूल को पीसकर योनि में लगा...

नील शंखपुष्पी (Tropical speedwell)

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     भारत में हिमालय के शुष्क भागों एवं चारागाहों में लगभग 1800 मी की ऊँचाई तक प्राप्त होती है। इसकी दो प्रजातियों का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। 1. Evolvulus alsinoides (Linn.) Linn. (विष्णुकान्ता) 2. Evolvulus  nummularius  (Linn.) Linn. (लक्ष्मीकान्ता)। विष्णुकान्ता का प्रयोग शंखपुष्पी के स्थान पर भी किया जाता है। कुछ विद्वान् इसे नीलशंखपुष्पी मानते हैं। शंखपुष्पी के पंचाग में इसके पंचाग की मिलावट भी की जाती है। Evolvulus alsinoides (Linn.) Linn. (विष्णुकान्ता)-यह छोटा, भूस्तारी, फैला हुआ, मुलायम, रोमश शाखाओं से युक्त, बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसके पुष्प नीले अथवा श्वेत वर्ण के, होते हैं। फल गोलाकार, 4 कपाटीय, 3-4 मिमी लम्बे होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से फरवरी तक होता है। 2. Evolvulus  nummularius  (Linn.) (लक्ष्मीकान्ता)-यह सर्वत्र बेकार पड़ी भूमि, सड़कों के किनारों पर, घास के मैदान तथा मिश्रित वनों में जमीन पर फैलने वाली शाखा-प्रशाखायुक्त वनस्पति है। इसकी प्रत्येक ग्रन्थि से मूल निकलकर जमीन पर लगी रहती है। इसके पुष्प सफेद ...

सदापुष्पा (Red Periwinkle)

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     समस्त भारत में घरों, मन्दिरों व बगीचों में  शृङ्गारिक पौधे के रूप में इसको लगाया जाता है। यह मूलत मेडागास्कर का पौधा माना जाता है। यह 30-90 सेमी ऊँचा, सीधा, शाखा-प्रशाखायुक्त, सुंदर, बहुवर्षायु पौधा होता है। इसके पत्र गहरे हरित वर्ण के, चमकीले, पूतिगंधी, अग्र भाग पर गोलाकार तथा आधार पर नुकीले होते हैं। इसके पुष्प सुगन्धित, श्वेत से गुलाबी-बैंगनी वर्ण के तथा 5 बाह्यदलपुंजयुक्त होते हैं। इसके फल पतले, रोमश, 2-3 सेमी लम्बे तथा बेलनाकार होते हैं। इसके बीज अनेक, छोटे तथा कृष्ण वर्ण के होते हैं। सदापुष्पा के उपयोग हृद्-विकार-सदाबहार मूल तथा अर्जुन छाल को समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से हृदयावरोध, हृदशूल तथा उच्च रक्तचाप आदि विकारों में लाभ होता है। यह क्वाथ रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को नियत्रित करता है। मधुमेह-सदापुष्पा पञ्चाङ्गग चूर्ण (1-2 ग्राम) या काढ़े (10-20 मिली) का सेवन करने से मधुमेह में लाभ होता है। सदाबहार की 3-4 पत्तियों तथा पुष्पों को मसलकर गोली बनाकर प्रात खाली पेट जल के साथ सेवन करने से मधुमेह में लाभ होता है। सदाबहार के पुष्पों को सुखाकर...

सनाय (Indian senna)

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     समस्त भारत में मुख्यत गुजरात के कच्छ एवं तमिलनाडू में इसकी खेती की जाती है। इसके पत्तों का प्रयोग विरेचनार्थ किया जाता है तथा यह पंचसकार चूर्ण का एक अंग है। यह 75-150 सेमी ऊँचा, सीधा, बहुवर्षायु क्षुप होता है। इसके पुष्प पीत वर्ण के तथा कुछ सुगन्धित होते हैं। इसकी फली चिपटी, 3.5-7.0 मिमी लम्बी, 20 मिमी चौड़ी, अपक्व अवस्था में हरी तथा पकने पर गहरे भूरे वर्ण की होती है। प्रत्येक फली में 5-7 गहरे भूरे वर्ण के बीज होते हैं। सनाय के उपयोग श्वास-10 मिली आँवला स्वरस के साथ 1-2 ग्राम सनाय पत्र चूर्ण का सेवन करने से श्वास में लाभ होता है। उदर रोग-1-2 ग्राम सनाय पत्र चूर्ण का नियमित सेवन करने से मल का सम्यक् निर्हरण होकर उदर रोगों में लाभ होता है। विबन्ध-1-2 ग्राम सनाय चूर्ण को 5-10 मिली इमली स्वरस में मिलाकर सेवन करने से विबन्ध में लाभ होता है। अग्निमांद्य-1-2 ग्राम सनाय चूर्ण में समभाग शर्करा मिलाकर, बिजौरा नींबू स्वरस के साथ सेवन करने से अग्निदीप्त होती है तथा भूख बढ़ती है। वातजगुल्म-1-2 ग्राम सनाय पत्र चूर्ण में समभाग वच चूर्ण मिलाकर सेवन करने से वातजगुल्म में लाभ होत...

सतौना (Devil tree)

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     यह भारत के समस्त शुष्क पर्णपाती एवं सदाहरित वनों, पश्चिमी उष्णकटिबंधीय हिमालय में एवं असम में प्राप्त होता है तथा इसे सड़कों के किनारे या बगीचों में शृंगारिक पौधे के रूप में लगाया जाता है। चरकसंहिता के तिक्तस्कन्ध, कुष्ठघ्न, उदर्दप्रशमन, शिरोविरेचन तथा सुश्रुतसंहिता के आरग्वधादिगण, लाक्षादिगण तथा अधोभागहर गणों में इसकी गणना की गई है। चरकसंहिता में कुष्ठ, विसर्प तथा मूत्रकृच्छ्र की चिकित्सा में तथा सुश्रुत-संहिता में व्रण, कुष्ठ, प्रमेह, मधुमेह, जीर्ण ज्वर तथा अपस्मार आदि व्याधियों की चिकित्सा में प्रयुक्त विभिन्न कल्पों के घटक द्रव्यों के रूप में सप्तपर्ण का उल्लेख मिलता है। Alstonia scholaris (Linn.) R. Br. यह लगभग 12-18 मी तक ऊँचा, बृहत्, सदाहरित, सुन्दर वृक्ष होता है। इसके पत्र सरल, 4-7 की संख्या में, शाखाओं के अन्त में चक्करदार क्रम में होते हैं। इसके पुष्प श्वेत अथवा हरिताभ श्वेत वर्ण के होते हैं। इसकी फलियां 2-2 एक साथ, पतली, बेलनाकार, 30-60 सेमी लम्बी, लगभग 3 मिमी व्यास की, गोलाकार तथा गुच्छों में होती हैं। उपरोक्त वर्णित मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त इसकी निम्नलि...

सर्षप (Yellow sarson)

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     समस्त भारत में इसकी खेती की जाती है। सरसों का उपयोग आयुर्वेद में प्राचीनकाल से हो रहा है। चरकसंहिता में कण्डूघ्न, आस्थापनोपग तथा शिरोविरेचनोपग महाकषाय में सरसों का उल्लेख प्राप्त होता है। आचार्य चरक ने सरसों के शाक को अधम माना है। इसके अतिरिक्त आयुर्वेदीय संहिता तथा निघण्टुओं में अपस्मार, उन्माद आदि व्याधियों के उपचार के लिए सरसों का उपयोग नस्य तथा अभ्यंग के रूप में किया गया है। इसके बीज छोटे, चिकने, गोलाकार, 1.2-1.5 मिमी व्यास के, पाण्डुर अथवा गहरे पीताभ-भूरे वर्ण के होते हैं। इनके बीजों से तैल निकाला जाता है। इसकी मूल वर्षायु, पतली तथा कंदीय होती हैं। सर्षप के उपयोग कर्णक्ष्वेड-गुनगुने या हल्के उष्ण सरसों तैल को 2-3 बूंद कान में डालने से कर्णक्ष्वेड तथा कर्णनाद रोग में लाभ होता है। प्रतिश्याय-सरसों को पीसकर सिर पर लगाने से प्रतिश्याय में लाभ होता है। दंतरोग-दांतों से रक्तस्राव हो रहा हो तथा खुजली हो तो सरसों के चूर्ण या कल्क में बनाएं मिलाकर दाँतों को रगड़ने से लाभ होता है। शीताद दंतरोग में रक्तमोक्षण करने के पश्चात् सोंठ, सरसों एवं त्रिफला का क्वाथ बनाकर गण्ड...

सहदेवी (Fleabane)

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     समस्त भारत में यह लगभग 1200 मी0 की ऊचाईं तक पायी जाती है। सामान्यत खरपतवार के रूप में यह खाली पड़े मैदानी भागों में तथा सड़कों के किनारों पर पाई जाती है। इसके सन्दर्भ में कहा जाता है कि इसकी मूल को सिर के नीचे रखकर साने से निद्रा अच्छी आती है तथा सिर में इसकी मूल को बांधने से ज्वर का शमन होता है। यह  15-75 सेमी ऊँचा, सीधा अथवा प्रसरणशील, श्वेत रोमश, शाकीय पौधा होता है। सहदेवी के पुष्प गुलाबी-बैंगनी वर्ण के होते हैं। सहदेवी के उपयोग प्रदर-1 ग्राम सहदेवी मूल कल्क को बकरी के दूध के साथ सेवन करने से प्रदर रोग का शमन होता है। श्लीपद-सहदेवी मूल कल्क में हरताल मिलाकर लेप करने से चिरकालीन तथा दुर्निवार्य श्लीपद रोग का शमन हो जाता है। रक्तचंदन तथा सहदेवी को पीसकर लेप करने से श्लीपद में लाभ होता है। सहदेवी के पत्र-स्वरस को तैल में उबालकर लेप करने से श्लीपद रोग में लाभ होता है। विस्फोटक-सहदेवी के कल्क को घी में सेंककर विस्फोट पर बाँधने से विस्फोटकों का शमन होता है। पिडका-चावल के धोवन में सहदेवी मूल को घिसकर पिडका पर लेप करने से लाभ होता है। शत्रक्षत-शत्रजन्य क्षत में ...

श्यामाक (Saiberian millet)

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     समस्त भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में लगभग 2200 मी की ऊँचाई तक इसकी खेती की जाती है। यह सेवन करने में रुचिकर तथा बल्य होता है। यह ऊँचा, पुष्ट, चिकना, वर्षायु, शाकीय पौधा होता है। इसकी बाली अरोमश तथा भूरे वर्ण की होती हैं। इसके बीज गोल, चपटे तथा चिकने होते हैं। श्यामाक भारतवर्ष के पहाड़ी क्षेत्रों में उत्पन्न होने वाला सुस्वादु व सात्त्विक आहार है। व्रतों व पर्वों में फलाहार के रूप में इसका प्रयोग किया जाता है। यह अत्यन्त पौष्टिक होता है। श्यामाक के उपयोग कास-सावाँ से निर्मित भोज्य पदार्थों को यूष अथवा तिक्त रस प्रधान शाकों के साथ सेवन करने से कास में लाभ होता है। जलोदर-यदि कोई व्यक्ति एक वर्ष तक भोजन में लवण का परित्याग कर, श्यामाक का प्रयोग करे तो उसे जलोदर में निश्चित ही लाभ मिलता है। विबन्ध-जिनको विबंध रहता है उन्हें श्यामाक से निर्मित भोज्य पदार्थो का सेवन करना चाहिए। अर्श-सावाँ के भात का यूष एवं अम्ल पदार्थों के साथ सेवन करने से अर्श में लाभ होता है। प्रमेह-प्रमेह से पीड़ित व्यक्ति को भोजन में श्यामक का प्रयोग पथ्य है। श्यामाक के पौधे का रस निकालकर पीने से रक्...

सागौन (Indian oak)

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     समस्त भारत में 500 से 1200 मी0 की ऊचाईं तक इसकी खेती की जाती है। सागौन की लकड़ी का प्रयोग फर्नीचर तथा घरों के दरवाजे आदि बनाने में किया जाता है। कई स्थानों पर इसके पत्रों का प्रयोग भोजन के लिये पात्र रूप में किया जाता है। यह 24-30 मी ऊँचा वृक्ष होता है। इसके पत्र सरल, बड़े 30-60 सेमी लम्बे एवं 15-30 सेमी चौड़े होते हैं। इसके पुष्प अनेक, छोटे, श्वेत वर्ण के तथा मधुरगंधि होते हैं। सागौन के उपयोग आधासीसी-सागौन की छाल के महीन चूर्ण को घृत में मिलाकर, छानकर नस्य लेने से आधासीसी में लाभ होता है। शिरशूल-सागौन की मूल को घिसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल का शमन होता है। नेत्र-विकार-सागौन के बीजों का क्वाथ बनाकर नेत्रों को धोने से नेत्र-विकारों का शमन होता है। श्वसनिका-शोथ-सागौन छाल को पीसकर गुनगुना करके वक्ष-प्रदेश पर लेप करने से श्वसनिका शोथ में लाभ होता है। प्रवाहिका-15-30 मिली सागौन छाल क्वाथ का सेवन करने से प्रवाहिका तथा उदरकृमियों का शमन होता है। अतिसार-1-3 ग्राम सागौन छाल चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है। मूत्र-विकार-1-3 ग्राम सागौन मूल चूर्ण म...

सिन्दुरिया (Lipistic tree)

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     भारत के समस्त उष्ण, उष्णकटिबंधीय भागों में मुख्यत दक्षिण बंगाल आसाम तथा मैसूर में इसकी खेती की जाती है। इसके फलों के बाह्य भाग पर सिन्दुर जैसा रजावरण होता है, इसलिए इसे सिन्दुरिया कहते हैं। इसके बीज से प्राप्त लाल रंग का प्रयोग खाद्य पदार्थों को रंगने में किया जाता है। यह 2-6 मी तक ऊँचा, सुंदर, शाखा-प्रशाखायुक्त, बृहत् क्षुप अथवा छोटा सदाहरित वृक्ष होता है। इसके पुष्प श्वेत अथवा गुलाबी वर्ण के तथा सुंगधित होते हैं। इसके फल रक्ताभ-भूरे वर्ण के तथा रक्त वर्ण के गूदे से आवरित, होते हैं। सिन्दुरिया के उपयोग कण्ठदाह-सिन्दुरिया पत्र का क्वाथ बनाकर गरारा (Gargle) करने से कण्ठ दाह का शमन होता है। प्रवाहिका-15-30 मिली सिन्दुरिया पत्र फाण्ट का सेवन करने से प्रवाहिका में लाभ होता है। सिन्दुरिया मूल त्वक् तथा बीजों का क्वाथ बनाकर 15-30 मिली मात्रा में सेवन करने से अतिसार तथा प्रवाहिका में लाभ होता है। यकृत्विकार-सिन्दुरिया शाखाओं का क्वाथ बनाकर 15-30 मिली मात्रा में पीने से यकृत्-विकारों में लाभ होता है। कामला-सिन्दुरिया पत्र का क्वाथ बनाकर 15-30 मिली मात्रा में पीने से कामला मे...

सुनिष्णक (Pepuwart)

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     समस्त भारत में मुख्यत तालाबों के किनारे, नहरों के किनारे, आर्द्र मैदानों एवं बाढ़ वाले क्षेत्रों में फर्न (पर्णांग) कुल का यह जलीय पादप प्राप्त होता है। चरकसंहिता में वातजकास, विषजन्य-शूल, ऊरुस्तम्भ तथा वातरक्त से पीड़ित रोगी के लिए इसके शाक के सेवन का विधान किया गया है तथा मूत्रकृच्छ्र में इसके बीजों (बीजाणु-फलिका (Sporocarp) को तक्र के साथ पीसकर पिलाने का विधान है। सुश्रुतसंहिता के शाक-गणों में इसके गुणों का उल्लेख है तथा रक्तपित्त की चिकित्सा में इसके पत्तों को घृत में भूनकर या पकाकर सेवन करने का निर्देश दिया है। वर्षाकाल में इसके छत्ते के जैसे क्षुप जलाशय के समीप के कीचड़ या पानी के ऊपर तैरते हुए दिखाई देते हैं। इसका काण्ड भूशायी, अनेक शाखा एवं प्रशाखायुक्त होता है। इसके पत्र प्रत्येक पत्रवृन्त पर 4-4 या प्रत्येक पत्र चार भागों में विभक्त होते हैं। इसलिए इसे चौपतिया कहा जाता है। इसके पत्र हरे रंग के गोलाकार तथा चक्रों में व्यवस्थित होते हैं। इसकी मूल से लगे हुए गोलाकार या अण्डाकार बीजाणु-फलिका (Sporocarp) प्राप्त होते हैं, जिसमें जिलेटिन प्राप्त होता है। सुनिष्णक...

शाल्मलि (Silk cotton tree)

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     यह भारत के उष्णकटिबंधीय एवं उपउष्णकटिबंधीय वनों में लगभग 1500 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। वैदिक साहित्य में शाल्मली काष्ठ का प्रयोग दूध इत्यादि के निर्माण के लिए किया गया है। चरकसंहिता में अर्श, उरूस्तम्भ तथा पिचुधारणार्थ प्रयुक्त तैल में शाल्मली का प्रयोग बताया है। निघण्टुरत्नाकर के अनुसार मोचरस के सेवन से पारद-विकार दूर होते है। चरकसंहिता के पुरीषविरजनीय, शोणितस्थापन, वेदनास्थापन, कषायस्कन्ध तथा सुश्रुतसंहिता के प्रिंग्वादिगणों में इसकी गणना की गई है। इसकी त्वक से एक निर्यास निकलता है, जिसे मोचरस कहते है। यह स्राव ताजी अवस्था में भूरे रंग का तथा पुराना होने पर काले शीशम के रंग का, भंगुर तथा हल्का होता है। इसकी दो प्रजातियों का प्रयोग चिकित्सा में किया जाता है। कई विद्वान् ऐसा मानते है कि सेमल के फलों से प्राप्त रूई की तकिया बनाकर उसमें सिर रख सोने से निद्रा अच्छी आती है। शाल्मलि (Bombax ceiba Linn.)      इसके वृक्ष लगभग 40 मी तक ऊँचे, अत्यन्त विशाल और मोटे होते हैं। इसका काण्ड कण्टयुक्त होता है। इसके पत्र हस्ताकार होते है। इसके पुष्प चमकीले रक्त वर्...

सैरेयक (Porcupine flower)

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     कटसरैया के बहुशाखी क्षुप, बाग बगीचों में, बाड़ों में खेतों के किनारें कहीं भी देखने को मिल जाते हैं। सैरेयक के पुष्पों के आधार पर विभिन्न भेद किए गए हैं। श्वेतपुष्प-सहचर, (Barleria dichotoma Roxb.) पीतपुष्प-कुंटक, (Barleria prionitis Linn.) रक्तपुष्प-कुरबक, (Barleria cristata Linn.) नीलपुष्प-दासी, वाण, (Barleria strigosa Willd.)      सर्वत्र सुलभ होने के कारण पीतपुष्पी कटसरैया का प्रयोग चिकित्सा में किया जता है। प्रस्तुत विवरण, विशेषरूप से पीली कटसरैया के विषय में हैं। यह भारत के सभी उष्ण भागों में पाई जाती है। यह 60-150 सेमी ऊँचा, कंटकित, झाड़ीदार, बहुशाखित क्षुप होता है। इसके काण्ड चतुष्कोणीय तथा श्वेताभ होते हैं।इसके पुष्प नारंगी-पीत वर्ण के अथवा श्वेत-पीताभ वर्ण के होते हैं। सैरेयक के उपयोग पालित्य-गोदुग्ध, पियाबासा, भृंगराज तथा तुलसी स्वरस प्रत्येक 750 मिली, 200 मिली तैल, 50 ग्राम मुलेठी कल्क तथा 3 ली जल में सम्यक् तैल पाककर, इसे पत्थर अथवा विजयसार के पात्र में सुरक्षित रख लें। इस तैल को नियमित 1-2 बूंद नाक में डालने से पालित्य में लाभ होता ह...

श्योनाक (Indian trumpet tree)

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     श्योनाक के वृक्ष भारतवर्ष में सर्वत्र पाए जाते हैं। इसकी जड़ की छाल का प्रयोग बृहत पंचमूल में किया जाता है। इसके वृक्ष 7-12 मी तक ऊंचे होते हैं, परन्तु यदि परिस्थितियां अनुकूल और उपयुक्त हों तो बकायन की तरह के वृक्ष भी देखे जाते हैं। कुछ प्रदेशों में Ailanthus excelsa (घोड़ानिम्ब) का प्रयोग श्योनाक की जगह करते हैं, परन्तु वास्तव में घोड़ानिम्ब दूसरी जाति का पौधा है। यह दक्षिणी भारत के पर्णपाती आर्द्र वनों, सदाहरित वनों तथा पश्चिम क्षेत्रों के शुष्क भागों में पाया जाता है। हिमालय पर यह 900 मी तक की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसके पुष्प का बाह्य-भाग बैंगनी वर्ण से रक्ताभ-बैंगनी वर्ण का तथा अन्तभाग हल्के, पाण्डुर, गुलाबी अथवा पीत वर्ण का होता है। इसके फल बृहत्, चपटे, काष्ठीय, दोनों ओर मुड़े हुए तथा नुकीले, तलवार के आकार के, 8 मिमी तक स्थूल तथा बीज अनेक, चपटे, पतले, 6 सेमी लम्बे एवं चौड़े होते हैं। श्योनाक के उपयोग कर्णशूल-श्योनाक की छाल को पानी के साथ महीन पीसकर और तैल तथा तैल से दो गुना पानी डालकर मंद अग्नि पर पकाएं, जब तेल मात्र शेष रह जाय, तब इसको छानकर शीशी में भरक...

मोठ (Dew bean)

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     भारत में हिमालयी क्षेत्रों एवं अन्य उत्तर-पश्चिमी उष्णकटिबन्धीय भागों में लगभग1200 मी की ऊँचाई तक इसकी खेती की जाती है। इसके पत्र त्रिपत्रकयुक्त मूंग के पत्तों जैसे तथा हरे रंग के होते हैं। आचार्य सुश्रुत ने मोठ को कृमिकारक कहा है, परन्तु आचार्य चरक ने मोठ को रस और विपाक में मधुर तथा रक्तपित्त व ज्वर आदि विकारों में हितकर माना है। मोठ के उपयोग रक्तातिसार-मकुष्ठ का यूष बनाकर 20-40 मिली मात्रा में सेवन करने से रक्तातिसार (रक्त के साथ अतिसार) संग्रहणी, कम्पवात में लाभ होता है। मोठ को भूनकर-पीसकर अन्य उबटन द्रव्यों के साथ मिलाकर त्वचा में लगाने से त्वचा की सुन्दरता बढ़ती है। ज्वर-मुकुष्ठ का यूष बनाकर 20-30 मिली यूष में 1 ग्राम पिप्पली चूर्ण मिलाकर पिलाने से ज्वर में लाभ होता है। स्थौल्य-मोठ को भूनकर चने के साथ मिलाकर खाने से स्थौल्य तथा मेदो विकारों का शमन होता है। मोठ को सोंठ, लहसुन या मेथी आदि वातशामक द्रव्यों के साथ मिलाकर सेवन करने से यह कम्पवात में अत्यन्त लाभप्रद होती है। मोठ का यूष बनाकर उसमें पुदीना, अदरख तथा अजवायन डालकर सूप बनाकर पीने से पथ्य तथा रुचिकारक ...

हरिद्रु (Yellow teak)

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     यह उत्तरी भारत के उप-हिमालयी पहाड़ी क्षेत्रों मे उत्तराखण्ड से पश्चिम बंगाल एवं असम तक 1500 मी की ऊँचाई पर प्राप्त होता है। उत्तराखण्ड के हल्द्वानी शहर का नाम हल्दु वृक्ष के आधार पर ही रखा गया है। यहाँ पर हल्दु (हरिद्रु) के वृक्ष बहुतायत से पाए जाते है। इसका विशाल वृक्ष लगभग 30 मी तक ऊँचा होता है। इसके पुष्प कदम्ब के पुष्प के जैसे भूरे-पीत वर्ण के होते हैं। इसकी लकड़ी का रंग हल्दी के जैसे पीला होता है। इसलिए इसे हल्दू कहते हैं। हरिद्रु के उपयोग पत्र स्वरस को गुनगुना कर 4-4 बूंद नाक में डालने से जीर्ण कफ का निस्सरण होकर शिरशूल तथा जीर्ण प्रतिश्याय में लाभ होता है। (इस रस को डालने के बाद सिर में वेदना का अनुभव होगा पश्चात् लाभ होगा। इसका प्रयोग सूर्योदय के पहले करना चाहिए। यह अनुभूत प्रयोग है।) 5 ग्राम हरिद्रु पञ्चाङ्ग का क्वाथ बनाकर तथा उसमें 2-3 काली मिर्च मिलाकर पिलाने से कफज विकारों का शमन होता है। प्रवाहिका-हल्दु के मूल का क्वाथ बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पिलाने से प्रवाहिका में लाभ होता है। अग्निमांद्य-हल्दु की छाल का क्वाथ बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पीने से अग...

जंगली हल्दी (Wild turmeric)

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     इस देश के सभी प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। विशेषकर बंगाल एवं दक्षिण के कोचीन, मैसूर, अल्वारा आदि स्थानों में अधिक देखने में आती है। इसका क्षुप वर्षजीवी होता है। गर्मी में इसका क्षुप सूख जाता है किन्तु भूमि के भीतर इसकी गाँठें जीवित रहती हैं और वर्षा-ऋतु में वे अंकुरित हो पौधे के रूप में परिणत होती हैं। पत्ते जब कोमल अवस्था के होते हैं, तब उनके बीच का भाग जामुनी रंग का होता है। जब यह अंकुरित होता है तभी इसमें फूल आते हैं। जंगली हल्दी की गन्ध हल्दी से तेज तथा कर्पूर मिश्रित सोंठ के समान; स्वाद कर्पूर के समान एवं हृल्लासक होता है। इसका प्रयोग हल्दी के स्थान में किया जाता है। इसके पुष्प पीतवर्ण के होते हैं। इसके प्रकन्द बड़े, हस्ताकार, शाखित, सुंगधित तथा पीत वर्ण के होते हैं। हल्दी के उपयोग शिरशूल-वन्य हरिद्रा कन्द तथा लोहबान को पीसकर सिर में लेप करने से शिरशूल का शमन होता है। आमवात-वन्य हरिद्रा कन्द को पीसकर गुनगुना करके जोड़ों में लगाने से वेदना तथा शोथ का शमन होता है। कन्द कल्क का लेप करने से मोच में लाभ होता है। त्वक् विकार-कन्द कल्क को पीसकर लेप करने से कण्डू...

आमा हल्दी (Mango ginger)

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     भारत के समस्त प्रान्तों में इसकी खेती की जाती है। इसके गाँठे आम की तरह गन्धयुक्त होती हैं इसलिए इसे आमा हल्दी कहते हैं। लोग इसकी गाँठों के छोटे-छोटे टुकड़े करके सुखा लेते हैं। प्राय बाजार में आमा हल्दी के नाम से वन्यहरिद्रा की गाँठें बिकती हैं। इसका उपयोग हलदी के स्थान पर किया जाता है। सुगन्धित होने के कारण इसे चटनी आदि में प्रयोग किया जाता है। मिठाईयों में आम की गन्ध लाने के लिए इसके फाण्ट का उपयोग किया जाता है। इसके प्रकन्द बृहत्, स्थूल, बेलनाकार अथवा दीर्घवृत्ताकार, शाखा-प्रशाखायुक्त होते हैं। आमा हल्दी के उपयोग दंतशूल-अकारकरभ, तुत्थ, अफीम तथा आम्रंधी हरिद्रा के चूर्ण से दाँतों का मर्दन करने से दंत गत वेदना का शमन होता है। उदररोग-प्रकन्द का क्वाथ बनाकर उसमें आर्द्रक तथा काली मिर्च मिलाकर पिलाने से उदररोग में लाभ होता है। प्रमेह-3 ग्राम आम्रंधी हरिद्रा में समभाग तिल चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन प्रातकाल सेवन करने से तथा पथ्य पालन करने से प्रमेह में शीघ्र लाभ होता है। आमवात-प्रंद को पीसकर गुनगुना करके जोड़ों में बाँधने से वेदना तथा शोथ का शमन होता है। 1 ग्राम कंद चूर्ण में...

हस्तिकर्ण (Hathikana)

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     भारत के समस्त उष्णकटिबंधीय हिमालयी क्षेत्रों तथा आर्द्र पर्णपाती वनों में पाया जाने वाला कन्दयुक्त पौधा है। इसके पत्ते हाथी के कान के सदृश बड़े होते हैं, जिसके फलस्वरूप इसको हस्तिकर्ण पलास भी कहा जाता है। इसके पुष्प छोटे, श्वेत वर्ण के होते हैं। इसके फल कृष्ण वर्ण के, गोलाकार तथा चिकने होते हैं। हस्तिकर्ण के उपयोग गलगण्ड-हस्तिकर्ण मूल को तण्डुलोदक से पीसकर गलगण्ड पर लेप करने से लाभ होता है। क्षय रोग-1 ग्राम हस्तिकर्ण कंद चूर्ण में समभाग गिलोय चूर्ण मिलाकर सेवन करने से क्षय रोग में लाभ होता है। अतिसार एवं अर्बुद-5 मिली हस्तिकर्ण मूल स्वरस में जल मिलाकर सेवन करने से अतिसार एवं उदरगत अर्बुद में लाभ होता है। उदर-रोग-हस्तिकर्ण की पत्तियों का शाक बनाकर सेवन करने से उदर विकारों का शमन होता है। अर्श-हस्तिकर्ण के कंद को मधु के साथ घिसकर अर्श में लेप करने से लाभ होता है। यकृत्विकार-हस्तिकर्ण कंद में पुनर्नवा मिलाकर क्वाथ बनाकर 15-20 मिली मात्रा में सेवन करने से यकृत् विकार, प्लीहा विकार, पाण्डु तथा उदर कृमियों का शमन होता है। संधिशूल-हस्तिकर्ण कंद का काढ़ा बनाकर जोड़ों पर...

हस्तिशुण्डी (Indian heliotrope)

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     समस्त भारत में मुख्यत पंजाब एवं झेलम के क्षेत्रों में सड़कों के किनारे एवं परती भूमि पर पाई जाती है। इसकी पुष्प मंजरी हाथी की सूड़ के समान होने के कारण इसे हस्तिशुण्डी कहते हैं। यह 30-45 सेमी ऊँचा, सीधा, शाखित, रोमश, वर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसकी शाखाएं हाथ की उंगुली के समान मोटी तथा रोएंदार होती है। इसकी डालियों के शिरे पर सफेद फूलों के गुच्छे आते हैं। फूलों की मंजरी लम्बी तथा हाथी की सूड़ के समान अग्रभाग पर मुड़ी हुई होती है। इसकी मूल जमीन में गहराई तक गई हुई तथा बादामी रंग की होती है। हस्तिशुण्डी के उपयोग नेत्र-शोथ-हस्तिशुण्डी के पत्रों में घृत लगाकर गरम करके आंखों में बांधने से नेत्र शोथ का शमन होता है। तुण्डिकेरी शोथ-हस्तिशुण्डी क्वाथ से गरारा करने से तुण्डिकेरीशोथ में लाभ होता है। कण्ठमाला-हस्तिशुण्डी के पत्तों को पीसकर गले पर लगाने से कंठमाला का शमन होता है। कास-5 मिली हस्तिशुण्डी पञ्चाङ्ग स्वरस का सेवन करने से कास तथा श्वासकष्ट में लाभ होता है। उदर-शूल-हस्तिशुण्डी के 2-4 ग्राम पत्रों को उबालकर सेवन करने से उदरशूल का शमन होता है। गठिया-हस्तिशुण्डी मूल ...