Posts

Showing posts from October, 2020

नीम (Margosa tree)

Image
      नीम भारतीय मूल का एक पर्ण- पाती वृक्ष है। यह सदियों से समीपवर्ती देशों- पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, म्यानमार (बर्मा), थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका आदि देशों में पाया जाता रहा है। लेकिन विगत लगभग डेढ़ सौ वर्षों में यह वृक्ष भारतीय उपमहाद्वीप की भौगोलिक सीमा को लांघ कर अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, दक्षिण पूर्व एशिया, दक्षिण एवं मध्य अमरीका तथा दक्षिणी प्रशान्त द्वीपसमूह के अनेक उष्ण और उप-उष्ण कटिबन्धीय देशों में भी पहुँच चुका है। नीम का वानस्पतिक नाम इसके संस्कृत भाषा के निंब से व्युत्पन्न है। नीम का पेड़ बहुत हद तक चीनीबेरी के पेड़ के समान दिखता है, जो एक बेहद जहरीला वृक्ष है। नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो की भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। आयुर्वेद में नीम को बहुत ही उपयोगी पेड़ माना गया है। नीम के गुणों के कारण इसे धरती का कल्प वृक्ष भी कहा जाता है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे अनेक और बहुत प्रभावशाली है। कई ग्रन्थों में वसन्त-ऋतु (विशेषतः चैत्र मास मतलब 15 मार्च से 15 मई) में नीम के कोमल पत्त...

बबूल (Indian arabic tree)

Image
     बबूल या कीकर अकैसिया प्रजाति का एक वृक्ष है। यह अफ्रीका महाद्वीप एवं भारतीय उपमहाद्वीप का मूल वृक्ष है।बबुल का पेड़ जिसे स्थानीय भाषा में देशी कीकर कहा जाता है। पुरानी मान्यताओं के अनुसार इस पेड़ में भगवान विष्णु का निवास माना जाता है। प्राचीन समय में इस पेड़ की पुजा की जाती थी । इस पेड़ को काटना महापाप माना जाता है। जिस जगह यह पेड होता है वह जगह अत्यंत शुभ मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि जिस घर में यह पेड़ पाया जाता है कि वह घर हमेशा धन धान्य से परिपूर्ण रहता है। यह पेड़ एक मात्र पश्चिमी राजस्थान में पाया जाता है इस पेड़ की गिनती दुर्लभ क्षेणी में होती है ।बबूल का गोद औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा अनेक रोगों के उपचार में काम आता है बबूल की हरी पतली टहनियां दातून के काम आती हैं। बबूल का गोद उतम कोटि का होता है जो औषधीय गुणों से भरपूर होता है तथा सेकडो रोगों के उपचार में काम आता है। बबूल की दातुन दांतों को स्वच्छ और स्वस्थ रखती है। बबूल की लकड़ी का कोयला भी अच्छा होता है। हमारे यहां दो तरह के बबूल अधिकतर पाए और उगाये जाते हैं। एक देशी बबूल जो देर से होता है ...

करमी (Chinese water spinach)

Image
     कलमी शाक एक लता है जो अर्धजलीय उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगती है। इसको पत्तेदार सब्जी के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसको 'करेमू', 'करमी', 'केरमुआ', 'नारी' और 'नाली' भी कहते हैं। यह लता जल के ऊपर या नम भूमि पर पैदा होकर पसरती है। इसकी लता २-३ मीटर या इससे भी बहुत बड़ी होती है। तना खोखला होता है। तथा तने में ग्रंथियाँ होती हैं जहाँ से जड़ निकलकर नया पौधा भी बनता है । इसकी लता को तोड़-तोड़कर आर्द्र भूमि में गाड़ देने से या जल में फेंक देने से नवीन पौधा तैयार हो जाता है। करेमु या कलम्बी साग  मीठी और थोड़ी कड़वी, प्रकृति से ठंडे तासीर की, हजम करने में भारी होती है और संरचना में थोड़ी रुखी होती है। कलम्बी वात और कफ को कम करने वाली, ब्रेस्ट का साइज बढ़ाने में, शुक्र या स्पर्म का काउन्ट बढ़ाने में मदद करती है। कलम्बी देर से पचने वाली होती है। करमी के उपयोग  कलमी के पत्ते का रस आँखों के चारो ओर ओर लगाने से अभिष्यंद ठीक होता है। 1-2 ग्राम कलम्बी साग पञ्चाङ्ग चूर्ण का सेवन करने से सांस की तकलीफ में लाभ होता है। 10 मिली कलमी के पत्ते का काढ़ा दिन में...

ककड़ी (Serpent cucumber)

Image
     ककड़ी ज़ायद की एक प्रमुख फसल है। इसको संस्कृत में 'कर्कटी' तथा मारवाडी भाषा में वालम काकरी कहा जाता है। विश्वास किया जाता है कि ककड़ी की उत्पत्ति भारत से हुई। इसकी खेती की रीति बिलकुल तरोई के समान है, केवल उसके बोने के समय में अंतर है। यदि भूमि पूर्वी जिलों में हो, जहाँ शीत ऋतु अधिक कड़ी नहीं होती, तो अक्टूबर के मध्य में बीज बोए जा सकते हैं, नहीं तो इसे जनवरी में बोना चाहिए। ऐसे स्थानों में जहाँ सर्दी अधिक पड़ती हैं, इसे फरवरी और मार्च के महीनों में लगाना चाहिए। इसकी फसल बलुई दुमट भूमियों से अच्छी होती है। इस फसल की सिंचाई सप्ताह में दो बार करनी चाहिए। ककड़ी में सबसे अच्छी सुगंध गरम शुष्क जलवायु में आती है। इसमें दो मुख्य जातियाँ होती हैं - एक में हलके हरे रंग के फल होते हैं तथा दूसरी में गहरे हरे रंग के। इनमें पहली को ही लोग पसंद करते हैं। ककड़ी के उपयोग ककड़ी के ताजे फलों के टुकड़ों को आंखों पर लगाएं। इसे रखने से आंखों का दर्द ठीक होता है। 2-3 ग्राम ककड़ी के बीजों को पीसकर, जल में घोल लें। इसे नमक-रहित या हल्का नमक मिलाकर सेवन करें। इससे पेशाब में दर्द होने की समस्...

द्रोणपुष्पी (Thumbe )

Image
     द्रोणपुष्पी या 'गोफा' या 'गुमा' औषधीय गुणों से युक्त पौधा है। इसकी गाँठों पर सफेद फूलों के गुच्छे लगते हैं। द्रोणपुष्पी का पौधा बारिश के मौसम में लगभग हर जगह पैदा होता है, गर्मी के मौसम में इसका पौधा सूख जाता है। इसकी ऊंचाई 1-3 फुट और टहनी रोमयुक्त होता है। इसके पत्ते तुलसी के पत्ते से समान 1-2 इंच लंबे 1 इंच चौड़े होते है। इसके पत्तों को रगड़ने पर तुलसी के पत्तों के समान गंध निकलती है। द्रोण (प्याला) के फूल होने के कारण इसका नाम द्रोणपुष्पी है। इनका फल हरा व चमकीला होता है। सर्दी के मौसम में इसमें फूल और हेमंत ॠतु में फल आते है इसकी कई जातियां पाई जाती है। द्रोणपुष्पी के उपयोग   द्रोणपुष्पी के पत्ते के रस से सिर पर लेप करें। इसके साथ ही नाक के रास्ते लें। इससे सिर का दर्द ठीक होता है। द्रोणपुष्पी पंचांग को पीस लें। इसमें काली मरिच का चूर्ण मिलाकर मस्तक पर लगाएं। इससे भी सिर दर्द ठीक होता है। द्रोणपुष्पी का काढ़ा बनाकर भाप दें। स्नान के दौरान इस काढ़ा का उपयोग करें। इससे सर्दी में फायदा होता है। 10 मिली गूमा के पत्ते के रस में बराबर मात्रा में अदर...

दमनक (Indian wormwood)

Image
     दमनक झाड़ीनूमा पौधा होता है। आयुर्वेद में इसके औषधीय गुण अनगिनत होने के कारण सदियों से इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए किया जाता है। दमनक का सुगंधित पौधा दर्दनिवारक की तरह काम करता है। दमनक की झाड़ी 1.8-2.4 मी ऊंचा, सुगन्धित, झाड़ी जैसा बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसकी शाखाएं अंगुलियों के समान मोटी, गुच्छेदार, सफेद  रोमवाली अथवा घना रोमिल जैसा होती है। इसके पत्ते बड़े, अण्डाकार, 1-2 भागों में विभाजित, ऊपर-पीछे की ओर स्पष्ट रोमश, अधपृष्ठ-सफेद रंग के घने रोमवाली; ऊपर की ओर छोटे, 3 भागों में विभाजित अथवा पूर्ण, रेखित भालाकार होते हैं। इसके फूल ऊपर की ओर 3-4 मिमी लम्बे, अण्डाकार अथवा लगभग गोलाकार, एकल अथवा 2 अथवा 1-3 साथ में, वृंतहीन अथवा छोटे पुष्पवृंत वाले होते हैं। इसके फल दीर्घायु-नुकीले अण्डाकार, छोटा, अल्परेखित होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से फरवरी तक होता है। इसकी जड़ बलकारक एवं पूयरोधी यानि एंटीसेप्टिक होती है। दमनक के उपयोग दमनक पत्ते के रस के 1-2 बूंद को कान में डालने से कान दर्द से राहत मिलती है। 5-10 मिली दमनक के पत्ते का का...

गुलमोहर ( Peacock flower)

Image
     गुलमोहर लाल फूलों वाला पेड़ है। वास्तव में गुलमोहर का सही नाम 'स्वर्ग का फूल' ही है। भरी गर्मियों में गुलमोहर के पेड़ पर पत्तियाँ तो नाममात्र होती हैं, परंतु फूल इतने अधिक होते हैं कि गिनना कठिन। यह भारत के गरम तथा नमी वाले स्थानों में सब जगह पाया जाता है। गुलमोहर के फूल मकरंद के अच्छे स्रोत हैं। शहद की मक्खियाँ फूलों पर खूब मँडराती हैं। मकरंद के साथ पराग भी इन्हें इन फूलों से प्राप्त होता है। फूलों से परागीकरण मुख्यतया पक्षियों द्वारा होता है। सूखी कठोर भूमि पर खड़े पसरी हुई शाखाओं वाले गुलमोहर पर पहला फूल निकलने के एक सप्ताह के भीतर ही पूरा वृक्ष गाढ़े लाल रंग के अंगारों जैसे फूलों से भर जाता है। ये फूल लाल के अलावा नारंगी, पीले रंग के भी होते हैं। गुलमोहर के फूल देखने में जितने सुंदर होते हैं उतने ही उपचारात्मक गुणों वाले भी होते हैं। फूलों के वर्ग के आधार पर यह मूलत दो प्रकार का होता है- 1. लाल गुलमोहर तथा 2. पीला गुलमोहर। फूलों के रंग के आधार पर इसके औषधीपरक गुण भी अलग होते हैं। गुलमोहर के उपयोग 1-2 ग्राम लाल गुलमोहर तने की छाल के चूर्ण का सेवन कर...

रीठा (soap nut)

Image
     रीठा  एक वृक्ष है जो लगभग हरजगह भारतवर्ष में पाया जाता है। इसके पत्ते गूलर के पत्तों से बड़े, छाल भूरी तथा फल गुच्छों में होते हैं। इसकी दो जातियाँ हैं। पहली सापीन्दूस् मूकोरोस्सी (Sapindus Mukorossi) और दूसरी सापीन्दूस् त्रीफ़ोल्यातूस् (Sapindus Trifoliatus)। सापीन्दूस् मूकोरोस्सी के जंगली पेड़ हिमालय के क्षेत्र में अधिक पाये जाते जाते हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत में तथा आसाम आदि में लगाये हुए पेड़ बाग-बगीचों में या गांवों के आसपास पाये जाते हैं। इसके फलों को पानी में भिगोने और मथने से फेन उत्पन्न होता है और इससे सूती, ऊनी तथा रेशमी सब प्रकार के कपड़े तथा बाल धोए जा सकते हैं। आयुर्वेद के मत में यह फल त्रिदोषनाशक, गरम, भारी, गर्भपातक, वमनकारक, गर्भाशय को निश्चेष्ट करनेवाला तथा अनेक विषों का प्रभाव नष्ट करेनवाला है। संभवत: वमनकारक होने कारण ही यह विषनाशक भी है। वमन के लिए इसकी मात्रा दो से चार माशे तक बताई जाती है। फल के चूर्ण के गाढ़े घोल की बूंदोंको नाक में डालने से अधकपारी, मिर्गी और वातोन्माद में लाभ होना बताया गया है।सापीन्दूस् त्रीफ़ोल्यातूस् के पेड़ दक्ष...

कुश (Halfa grass)

Image
     कुश एक प्रकार का घास होता है। भारत में हिन्दू लोग इसे पूजा में काम में लाते हैं। कुश की पत्तियाँ नुकीली, तीखी और कड़ी होती है। धार्मिक दृष्टि से यह बहुत पवित्र समझा जाता है और इसकी चटाई पर राजा लोग भी सोते थे। वैदिक साहित्य में इसका अनेक स्थलों पर उल्लेख है। अर्थवेद में इसे क्रोधशामक और अशुभनिवारक बताया गया है। आज भी नित्यनैमित्तिक धार्मिक कृत्यों और श्राद्ध आदि कर्मों में कुश का उपयोग होता है। कुश से तेल निकाला जाता था, ऐसा कौटिल्य के उल्लेख से ज्ञात होता है। भावप्रकाश के मतानुसार कुश त्रिदोषघ्न और शैत्य-गुण-विशिष्ट है। उसकी जड़ से मूत्रकृच्छ, अश्मरी, तृष्णा, वस्ति और प्रदर रोग को लाभ होता है। गरुड़ जी अपनी माता की दासत्व से मुक्ति के लिए स्वर्ग से अमृत कलश लाये थे, उसको उन्होंने कुशों पर रखा था। अमृत का संसर्ग होने से कुश को पवित्री कहा जाता है(महाभारत आदिपर्व के अध्याय 23 का 24 वां श्लोक)। जब किसी भी जातक के जन्म कुंडली या लग्न कुण्डली में राहु महादशा की अति है तो कुश के पानी मे ड़ालकर स्नान करने से राहु की कृपा प्राप्त होती है।  कुश के उपयोग  ...

चम्पा (Magnolia)

Image
     चम्पा के वृक्ष बड़े और बहुत ही सुन्दर होते हैं। चम्पा के फूल पीले रंग के होते हैं जो बहुत ही सुगन्धित होते हैं। यह एक जड़ी-बूटी भी है। आयुर्वेद के अनुसार, चम्पा के औषधीय गुण से सिर दर्द, कान दर्द, आंखों की बीमारियों में फायदा  ले सकते हैं। मूत्र रोग, पथरी या बुखार होने पर भी चम्पा के औषधीय गुण से लाभ मिलता है। चम्पा के वृक्ष लगभग 6 से 8 मीटर ऊँचा होते हैं। ये वृक्ष हमेशा हरा रहते हैं। वृक्ष के तने सीधे, बेलनाकार, गहरे भूरे या भूरे रंग के होत हैं। इसके पत्ते सीधे, 10-30 सेमी लम्बे, 4 से 10 सेमी चौड़े, नुकीले, चिकने और चमकीले होते हैं। चम्पा के फूल सुंदर और बहुत ही अधिक सुगन्धित होते हैं। फूल हल्के पीले रंग के होते हैं। इसके फल 7.5 से 10 सेमी लम्बे, अण्डाकार या नुकीले अण्डाकार होते हैं। फल गहरे भूरे रंग के होते हैं। चम्पा के उपयोग चम्पा के फूल के तेल को सिर पर लगाएं। इसे लगाने से सिर दर्द मिटता है। चम्पा के कोमल पत्तों को पीस लें। इसे पानी में मिलाकर छान लें। इसे 1-2 बूंद की मात्रा में आंखों में डालने से आंखों की बीमारियों और सूजन में लाभ मिलता है।  चम्पा के ...

कर्चूर, सफेद हल्दी (White turmeric)

Image
     कचूर, हल्दी के समान एक क्षुप है, पूर्वोत्तर भारत तथा दक्षिण समुद्रतटवर्ती प्रदेशों में यह स्वत: उगता है और भारत, चीन तथा लंका में इसकी खेती भी की जाती है। इसके लिए कर्चूर, षटकचोरा आदि कचूर से मिलते-जुलते नाम भी प्रचलित हैं।कर्चूर या सफेद हल्दी बहुत दुर्लभ जड़ी-बूटी है लेकिन हल्दी से भी ज्यादा इसके औषधीय गुण है जिसके कारण आयुर्वेद में कई बीमारियों के लिए उपचार के लिए प्रयोग किया जाता है।  कर्चूर के उपयोग  कर्चूर प्रकन्द को पीसकर गले में लेप करने से गले की क्षयज ग्रंथि (गांठ) कम होती है और सूजन कम होने से दर्द भी कम होता है। कर्चूर प्रकन्द (भूमिगत तना) का काढ़ा बनाकर गरारा या कुल्ला करने से मुँह का दुर्गंध कम होता है और निकलने के कारण से भी मुक्ति मिलती है। सफेद हल्दी के पौधे की गांठों के टुकड़ों को दांतों के बीच दबाकर रखने से दाँतों का दर्द तथा सूजन आदि दंत की बीमारी को कम करने में मदद मिलती है। कर्चूर प्रकन्द को पीसकर छाती में लेप करने से फेफड़ों की सूजन तथा सांसों की समस्या कम होती है। कर्चूर, पिप्पली तथा दालचीनी का काढ़ा बनाकर, 10-20 मिली काढ़ा ...

चीड़ (Chir pine)

Image
     चीड़ के वृक्ष पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में पाए जाते हैं। इनकी 90 जातियाँ उत्तर में वृक्ष रेखा से लेकर दक्षिण में शीतोष्ण कटिबंध तथा उष्ण कटिबंध के ठंडे पहाड़ों पर फैली हुई हैं। इनके विस्तार के मुख्य स्थान उत्तरी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका के शीतोष्ण भाग तथा एशिया में भारत, बर्मा, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और फिलीपींस द्वीपसमूह हैं। चीड़ की लकड़ी काफी आर्थिक महत्व की हाती है। विश्व की सब उपयोगी लकड़ियों का लगभग आधा भाग चीड़ द्वारा पूरा होता है। अनेकाने कार्यों में, जैसे पुल निर्माण में, बड़ी बड़ी इमारतों में, रेलगाड़ी की पटरियों के लिये, कुर्सी, मेज, संदूक और खिलौने इत्यादि बनाने में इसका उपयोग होता है। कई जातियों के वृक्षों से चुआ (tap) करके तारपीन का तेल और गंधराल (rosin) निकाला जाता है। इनकी लकड़ी काटकर आसवन द्वारा टार तेल (tar oil), तारपीन, पाइन आयल, अलकतरा (tar) और कोयला प्राप्त करते हैं। कुछ जातियों की पत्तियों से चीड़ की पत्ती का तेल (pine leaf oil) बनाते हैं, जिसका यथेष्ट औषधीय महत्व है। पत्तियों के रेशों से चटाई आदि बनती हैं। चीड़ की बहुत ...

जूट (Indian jute)

Image
     जूट, पटसन और इसी प्रकार के पौधों के रेशे हैं। 'जूट' शब्द संस्कृत के 'जटा' या 'जूट' से निकला समझा जाता है। यूरोप में 18वीं शताब्दी में पहले-पहल इस शब्द का प्रयोग मिलता है, यद्यपि वहाँ इस द्रव्य का आयात 18वीं शताब्दी के पूर्व से "पाट" के नाम से होता आ रहा था। जूट के रेशे साधारणतया छह से लेकर दस फुट तक लंबे होते हैं, पर विशेष अवस्थाओं में 14 से लेकर 15 फुट तक लंबे पाए गए हैं। तुरंत का निकाला रेशा अधिक मजबूत, अधिक चमकदार, अधिक कोमल और अधिक सफेद होता है। खुला रखने से इन गुणों का ह्रास होता है। जूट के रेशे का विरंजन कुछ सीमा तक हो सकता है, पर विरंजन से बिल्कुल सफेद रेशा नहीं प्राप्त होता। रेशा आर्द्रताग्राही होता है। छह से लेकर 23 प्रति शत तक नमी रेशे में रह सकती है। जूट के रेशे से बोरे, हेसियन तथा पैंकिंग के कपड़े बनते हैं। कालीन, दरियाँ, परदे, घरों की सजावट के सामान, अस्तर और रस्सियाँ भी बनती हैं। डंठल जलाने के काम आता है और उससे बारूद के कोयले भी बनाए जा सकते हैं। डंठल का कोयला बारूद के लिये अच्छा होता है। डंठल से लुगदी भी प्राप्त होती है, जो कागज बन...

अपराजिता (Butterfly pea)

Image
     अपराजिता लता वाला पौधा है। इसके आकर्षक फूलों के कारण इसे लान की सजावट के तौर पर भी लगाया जाता है। ये इकहरे फूलों वाली बेल भी होती है और दुहरे फूलों वाली भी। फूल भी दो तरह के होते हैं - नीले और सफेद। बंगाल या पानी वाले इलाकों में अपराजिता एक बेल की शक्ल में पायी जाती है। इसका पत्ता आगे से चौडा और पीछे से सिकुडा रहता है। इसके अन्दर आने वाले स्त्री की योनि की तरह से होते है इसलिये इसे ’भगपुष्पी’ और ’योनिपुष्पी’ का नाम दिया गया है। इसका उपयोग काली पूजा और नवदुर्गा पूजा में विशेषरूप में किया जाता है। जहां काली का स्थान बनाया जाता है वहां पर इसकी बेल को जरूर लगाया जाता है। गर्मी के कुछ समय के अलावा हर समय इसकी बेल फूलों से सुसज्जित रहती है।असाध्‍य रोगों पर विजय पाने की इसकी क्षमता के चलते ही इसे अपराजिता नाम से जाना गया है। अपराजिता का उपयोग  अपराजिता की फली बीज और जड़ को बराबर भाग में लेकर जल के साथ पीस लें। इसकी बूंद नाक में लेने से आधासीसी (अर्धावभेदक) में लाभ होता है। बीज, जड़ और फली को अलग-अलग भी प्रयोग कर सकते हैं। इसकी जड़ को कान में बांधने से भी लाभ होता है।...

अस्थिसंधानक (Bone setter)

Image
      हड़जोड़ या 'अस्थिसंधानक' अंगूर परिवार का बहुवर्षी पादप है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह लता हड्डियों को जोड़ती है। यह छह इंच के खंडाकार चतुष्कोणीय तनेवाली लता होती है। हर खंड से एक अलग पौधा पनप सकता है। चतुष्कोणीय तने में हृदय के आकार वाली पत्तियां होती है। छोटे फूल लगते हैं। पत्तियां छोटी-छोटी होती है और लाल रंग के मटर के दाने के बराबर फल लगते हैं। यह बरसात में फूलती है और जाड़े में फल आते हैं। दक्षिण भारत और श्रीलंका में इसके तने को साग के रूप में प्रयोग करते हैं। आयुर्वेद विशेषज्ञों के अनुसार हड़जोड़ में सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम कार्बोनेट भरपूर पाया जाता है। हड़जोड़ में कैल्शियम कार्बोनेट और फास्फेट होता है जो हड्डियों को मजबूत बनाता है। आयुर्वेद में टूटी हड्डी जोड़ने में इसे रामबाण माना गया है। इसके अलावा कफ, वातनाशक होने के कारण बवासीर, वातरक्त, कृमिरोग, नाक से खून और कान बहने पर इसके स्वरस का प्रयोग होता है। मुख्य रूप से इसके तने का ही प्रयोग किया जाता है। 10 से 20 मिलीलीटर स्वरस की मात्रा निर्धारित है। अस्थिसंहार के उपयोग ब्रोंकियल अस्थमा में हड़जोड़ का...

सुदर्शन (Poison bulb)

Image
     सुदर्शन कुल फूलों का एक कुल है। इस कुल में बहुत सी (एक हजार से कुछ ऊपर ही) जातियाँ हैं और इस कुल के पुष्प लिली से बहुत मिलते-जुलते हैं। सुदर्शन कुल के पुष्प उष्ण तथा उपोष्ण देशों में पाए जाते हैं। अधिकांश में कंद होता है। कई में लिली के समान पुष्प फूलते हैं। इस कुल के कुछ पौधों के (जैसे ऐमारिलिस बेलाडोना और बूफेन डिस्टिका के) कंद अत्यंत विषैले होते हैं। इस कुल में पीला डैफोडिल और श्वेत स्नोड्राप इंग्लैंड में बहुत प्रसिद्ध हैं।सुदर्शन कुल की कुछ जातियाँ भारत में भी होती हैं।सुदर्शन अण्डाकार शल्क कंद वाला शाकीय पौधा होता है। इसके फूल विभिन्न आकार के, सुगन्धित तथा सफेद रंग के होते हैं। इसका कंद बड़ा, 12.5-15 सेमी व्यास  का तथा गोलाकार होता है। यह मई से जून महीने के बीच फलता और फूलता है। सुदर्शन मीठा, कड़वा, तीखा, हजम करने में भारी और गर्म तासीर का होता है। सुदर्शन वात और कफ कम करने में सहायक होता है तथा इसका कंद जोड़ो का दर्द  कम करने में लाभकारी होता है।सुदर्शन समस्त भारत में उपजता है अथवा प्राकृतिक रूप में प्राप्त होता है।  सुदर्शन के उपयोग 1-2 बूंद सुद...