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Showing posts from September, 2020

अश्वगंधा (Winter cherry)

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     अश्वगंधा या असगंध एक पौधा (क्षुप) है। भारत में पांरपरिक रूप से अश्वगंधा का उपयोग आयुर्वेदिक उपचार के लिए किया जाता है। इसके साथ-साथ इसे नकदी फसल के रूप में भी उगाया जाता है। इसकी ताजा पत्तियों तथा जड़ों में घोड़े की मूत्र की गंध आने के कारण ही इसका नाम अश्वगंधा पड़ा। भारत के पश्चिमोत्तर भाग राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश एंव हिमाचल प्रदेश आदि प्रदेशों में अश्वगंधा की खेती की जा रही है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में अश्वगंधा की खेती बड़े स्तर पर की जा रही है। राजस्थान के शेखावाटी क्षेत्र में इसे 'असगण्य' या पाडलसिंह कहा जाता है।इसका फल बेरी जो कि मटर के समान दूध युक्त होता है। जो कि पकने पर लाल रंग का होता है। जड़े 30-45 सेमी लम्बी 2.5-3.5 सेमी मोटी मूली की तरह होती हैं। इनकी जड़ों का बाह्य रंग भूरा तथा यह अन्दर से सफेद होती हैं।आयुर्वेद मे अशवगंधा को मेध्य रसायन भी कहते है जिससे हमारी दिमाग की यादास्त तथा एकाग्रता बढाने के लिए उपयोग किया जाता है। वन में पाए जाने वाले पौधों की तुलना में खेती के माध्‍यम से उगाए जाने वाले अश्‍वगंधा की ...

सूरजमुखी (Sunflower)

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     सूरजमुखी भारतवर्ष में लगभग सभी जगह पाये जाते हैं। सूरजमुखी के पौधे रोग उत्पन्न करने वाली आर्द्र तथा दुर्गन्धयुक्त वायु का शोषण करने की क्षमता रखते हैं। पृथ्वी से जो विष समान भाप उड़कर संक्रामक ज्वर के रूप से देश भर में फैलती है, उस विष रूपी भाप को सोखने की क्षमता सूरजमुखी के पौधे में है। इसके पौधे लगाने से वायु शुद्ध होती है तथा मलेरिया, संधिवात या अर्थराइटिस तथा आर्द्रता से उत्पन्न होने वाली बीमारियां नष्ट हो जाती हैं। सूरजमुखी फूल अमरीका का देशज है पर रूस, अमरीका, ब्रिटेन, मिस्र, डेनमार्क, स्वीडन और भारत आदि अनेक देशों में आज उगाया जाता है। इसका नाम सूरजमुखी इस कारण पड़ा कि यह सूर्य और ओर झुकता रहता है, हालाँकि प्राय: सभी पेड़ पौधे सूर्य प्रकाश के लिए सूर्य की ओर कुछ न कुछ झुकते हैं। सूरजमुखी का सूर्य की ओर झुकना आँखों से देखा जा सकता है। बागों में उगाए जाने वाले सूरजमुखी की उपर्युक्त प्रथम दो जातियाँ ही हैं। इसके पेड़ 1 मी. से 5 मी. तक ऊँचे होते हैं। इनके डंठल बड़े तुनुक होते हैं, हवा के झोंके से टूट जा सकते हैं। इसकी पत्तियाँ 7 सेमी से 30 सेमी लंबी होती है। ...

शिकाकाई ( Soap pod)

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     शिकाकाई एशिया का देशज है और भारत के मध्य तथा दक्षिणी गरम मैदानों में आसानी से उगती है। इस झाड़ी पर पैण्टोपोरिया होर्डोनिया नामक तितली के लारवा को पोषण मिलता है। इसके फलों में एल्केलऑयड की अच्छी मात्रा होती हैं।आयुर्वेद में बताया गया है कि शिकाकाई का पेड़ एक ऐसी जड़ी-बूटी है जो न सिर्फ बाल और त्वचा के लिए लाभकारी होता है बल्कि कई रोगों के लिए औषधि के रूप में भी इस्तेमाल भी किया जाता है।  आयुर्वेद के अनुसार शिकाकाई का पेड़ कड़वा, ठंडा प्रकृति वाला, कफ और पित्त को कम करने वाला, वात को हरने वाला, दिल के लिए उपयोगी और भूख बढ़ाने वाला होता है। शिकाकाई शीघ्र बढ़ने वाला, छोटे-छोटे कांटों से भरा तना होता है। इसकी फली मांसल, पट्टी के आकार की, सीधी, 7.5-10 सेमी लम्बी तथा 1.8 सेमी चौड़ी होती है। कच्ची अवस्था में यह हरी तथा सूखे अवस्था में झुर्रीदार होती है। बीज संख्या में 6-10 होते हैं। शिकाकाई का उपयोग शिकाकाई की फलियों का काढ़ा बनाकर, इस काढ़े से बालों को धोने से केश की वृद्धि होती है।  शिकाकाई  तैलीय त्वचा से होने वाली रुसी लाभदायक होता है, इसकी फली के क्वाथ से...

जूही या चमेली (Jasmine)

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     जूही या चमेली का फूल झाड़ी या बेल जाति से संबंधित है, इसकी लगभग २०० प्रजाति पाई जती हैं। हिमालय का दक्षिणावर्ती प्रदेश चमेली का मूल स्थान है। इस पौधे के लिये गरम तथा समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु उपयुक्त है। सूखे स्थानों पर भी ये पौधे जीवित रह सकते हैं। भारत में इसकी खेती तीन हजार मीटर की ऊँचाई तक ही होती है। आजकल चमेली के फूलों से सौगंधिक सार तत्व निकालकर बेचे जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से इसका व्यवसाय विकसित किया जा सकता है। चमेली एक सुगंधित फूल है, जिसके महक मात्र से लोग मोहित हो जाते हैं इस फूल से बहुत सारी दवाइयां बनायी जाती हैं, जो सिर दर्द, चक्कर, जुकाम आदि में काम आता है। जूही का उपयोग दालचीनी, यूथिका आदि द्रव्यों का चूर्ण तथा इनसे पकाए तेल को 1-2 बूँद नाक में डालने से सिरदर्द से राहत मिलती है। जूही के फूलों को आँखों पर रखने से आँखों को शीतलता (ठंडक) मिलती है या पुष्पों को पीसकर आँखों के बाहर चारों तरफ लगाने से आँखों का जलन कम होता है। जूही के पत्तों को तिल के तेल में मिलाकर पकाकर, छानकर 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द कम होता है। जूही के पत्तों को चबान...

गुग्गुल (Indian bdellium)

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     गुग्गुल या 'गुग्गल' एक वृक्ष है। इससे प्राप्त राल जैसे पदार्थ को भी 'गुग्गल' कहा जाता है। भारत में इस जाति के दो प्रकार के वृक्ष पाए जाते हैं। कुछ स्थानों से प्राप्त गुग्गुल का रंग पीलापन लिए श्वेत तथा अन्य का गहरा लाल होता है। इसमें मीठी महक रहती है। इसको अग्नि में डालने पर स्थान सुंगध से भर जाता है। इसलिये इसका धूप के सदृश व्यवहार किया जाता है। आयुर्वेद के मतानुसार यह कटु तिक्त तथा उष्ण है और कफ, बात, कास, कृमि, क्लेद, शोथ और अर्श नाशक है। आयुर्वेद में इसके पांच भेद बताए हैं। 1 महिषाक्ष 2 महानील 3 कुमुद 4 पद्म 5 हिरण्य ।इनमें से पहले दो हाथियों के लिए, बाद में दो घोड़ों के लिए और पांचवा विशेषकर मनुष्य के लिए उपयोगी होता है। गूगल के वृक्ष से निकलने वाला गोंद ही गूगल नाम से प्रसिद्ध है। इस गूगल से ही महायोगराज गुग्गुलु, कैशोर गुग्गुलु, चंद्रप्रभा वटी आदि योग बनाए जाते हैं। इसके अलावा त्रिफला गूगल ,गोक्षरादि गूगल, सिंहनाद गूगल और चंद्रप्रभा गूगल आदि योगों में भी यह प्रमुख द्रव्य प्रयुक्त होता है। गुग्‍गल एक छोटा पेड है जिसके पत्‍ते छोटे और एकान्‍तर सरल होते हैं। यह ...

कपास (Cotton)

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     कपास एक नकदी फसल हैं।यह मालवेसी कुल का सदस्य है।संसार में इसकी 2 किस्म पाई जाती है। प्रथम को देशी कपास तथा दूसरे को अमेरिकन कपास के नाम से जाता है। इससे रुई तैयार की जाती हैं, जिसे सफेद सोना कहा जाता हैं | कपास के पौधे बहुवर्षीय ,झड़ीनुमा वृक्ष जैसे होते है।जिनकी लंबाई 2-7 फीट होती है। पुष्प, सफेद अथवा हल्के पीले रंग के होते है।कपास के फल बाल्स कहलाते है। फल के अन्दर बीज व कपास होती है। कपास की फसल उत्पादन के लिये काली मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है।भारत में सबसे ज्यादा कपास उत्पादन गुजरात में होता है। कपास से निर्मित वस्त्र सूती वस्त्र कहलाते है। कपास मे मुख्य रूप से सेल्यूलोस होता है। कपास के प्रकार - लम्बे रेशे वाली कपास. मध्य रेशे वाली कपास. छटे रेशे वाली कपास.      भारत की लगभग 9.4 मिलियन हेक्टेयर की भूमि पर कपास की खेती की जाती हैं। इसके प्रत्येक हेक्टेयर क्षेत्र में 2 मिलियन टन कपास के डंठल अपशिष्ट के रूप में विद्यमान रहते हैं। कपास का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जो ये दर्शाता है की भारतीयों का कपास से सूति वस्र बानाने का ज्ञान प्राचीन काल से ही है।...

खेसारी (Chickling pea)

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      लतरी  या  खेसारी  एक वनस्पति है जिससे  दाल  प्राप्त होती है। दुनिया के अनेक राष्ट्रों में इसकी खेती एवं इसका उपयोग प्राचीनकाल से किया जाता रहा है।  खेसारी दाल में ODAP जहरीला तत्व है खेसारी दाल कम कीमत पर मिलने वाली दाल है इसका उपयोग स्वास्थ्य के लिए हानिकारक यदि ज्यादा मात्रा में खाया जाए ।इसके उपयोग से पक्ष घात व गठिया रोग होता है इसे कच्चा खाने से तिरुपुट नामक रोग उत्पन्न होता है।  खेसारी का साग खाने में रुचि बढ़ाने वाला और पित्त कफ दूर करने वाला होता है। खेसारी के बीज पौष्टिक, थोड़े कड़वे, प्रकृति से ठंडे तथा कमजोरी दूर करने वाले होते हैं। खेसारी के बीज का तेल विरेचक गुण वाले यानि पेट से मल या अवांछित पदार्थ निकालने में सहायक होते हैं।  खेसारी के  उपयोग  खेसारी के पत्तों को उबालकर साग के रुप में सेवन करने से आँख की बीमारी दूर होती है। खेसारी के ताजे फल के रस को लगाने से आँखों का सूजन और जलन कम होता है। भुने हुए खेसारी बीज को कलाय सूप के साथ सेवन करने से जीर्ण परिणामशूल यानि पेप्टिक अल्सर में लाभ होता है। खेस...

छुइमुइ (Touch me not)

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     छुइमुइ  या  लज्जावती   एक प्रकार का पौधा है, जिसकी पत्तियां, मानव स्पर्श पाने पर या तेज फूंक मारने पर सिकुड कर बंद हो जातीं हैं, व कुछ देर बाद अपने आप ही खुल जातीं हैं।   लाजवंती के पौधे का प्रयोग आयुर्वेद में औषधी के रूप में किया जाता है।  लाजवन्ती का उपयोग  10-20 मिली लाजवंती के पत्ते के रस को नियमपूर्वक पिलाने से गंडमाला में लाभ होता है। लाजवंती की जड़ को गले में बाँधने से खाँसी में लाभ होता है।  3 ग्राम लाजवंती के जड़ के चूर्ण को दही के साथ खिलाने से रक्तातिसार में अत्यन्त लाभ होता है। 10 ग्राम लाजवंती जड़ का एक गिलास जल में काढ़ा बनाकर चौथाई अंश शेष हो जाने पर उस काढ़े को सुबह-शाम पिलाने से रक्त अतिसार और मधुमेह में लाभ होता है। 5-10 मिली लाजवंती पत्ते के रस को पिलाने से अपच के कारण बुखार, कामला या पीलिया व सभी प्रकार के पित्त संबंधी रोगों में लाभ होता है। लाजवंती के जड़ का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से पेचिश में लाभ होता है। एक चम्मच लाजवंती पत्ते के चूर्ण को दूध के साथ सुबह शाम अथवा तीन बार देने से बवासीर में ला...

ककोड़ा (Spine gourd)

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      ककोड़ा या कर्कोट एक सब्जी है। इसका फल छोटे करेले से मिलता-जुलता होता है जिसपर छोटे-छोटे कांटेदार रेशे होते हैं। राजस्थान में इसे किंकोड़ा भी कहते हैं। ककोड़ा या खेखसा अधिकतर पहाड़ी जमीन में पैदा होता है। यह बरसात के मौसम में होने वाला साग है। ककोड़ा की बेल होती है जो अपने आप जंगलों-झड़ियों में उग आती है और फैल जाती है। इसके 'नर' और 'मादा' बेल अलग-अलग होते हैं। इसका साग बहुत ही अच्छा व स्वादिष्ट होता है। नर्म ककोड़ा का साग अधिक स्वादिष्ट होता है जिसे लोग अधिक पसन्द करते हैं। गर्म मसालों या लहसुन के साथ ककोड़ा का साग बनाकर खाने से वात पैदा नहीं होता है। जमीन के नीचे ककोड़ा के जड़ में आधी फुट लम्बी गांठ होती है जिसका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। ककोड़ा का कन्द चीनी या शहद के साथ 1 से 5 ग्राम की मात्रा में औषधि की तरह प्रयोग किया जाता है। ककोड़ा का कन्द अधिक मात्रा में प्रयोग करने से उल्टी पैदा हो सकती है।  ककोरा के  उपयोग   1-2 बूंद कर्कोटकी के पत्ते का जूस नाक से लेने से सिर में होने वाले दर्द से मुक्ति मिल...

सिंघाड़ा (Water chestnut)

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      सिंघाड़ा  ( संस्कृत  :   शृंगाटक ) पानी में पसरने वाली एक लता में पैदा होने वाला एक तिकोने आकार का   फल   है। इसके सिर पर सींगों की तरह दो काँटे होते हैं।  ये फल हरे खाए जाते हैं।   इसको छील कर इसके गूदे को सुखाकर और फिर पीसकर जो   आटा   बनाया जाता है उस आटे से बनी खाद्य वस्तुओं का   भारत   में लोग व्रत उपवास में सेवन करते हैं क्योंकि इसे एक   अनाज   नहीं वरण एक फल माना जाता है।  अबीर बनाने में भी यह आटा काम में आता है।सिंघाड़ा भारत    के प्रत्येक प्रांत में जलाशयों में रोपकर लगाया जाता है। इसकी जड़ें पानी के भीतर दूर तक फैलती है। इसके लिये पानी के भीतर कीचड़ का होना आवश्यक है, कँकरीली या बलुई जमीन में यह नहीं फैल सकता। वैद्यक में सिंघाड़ा शीतल, भारी कसैला वीर्यवर्द्घक, मलरोधक, वातकारक तथा रुधिरविकार और त्रिदोष को दूर करनेवाला कहा गया है। सिंगाड़ा मूल रुप से सर्दी के मौसम में पाया जाता है।  वैसे तो हर मौसम के फल के फायदे खास होते हैं। सिंघाड़ा मधुर, ठंडे तासिर का, छोटा, रूखा, प...

रामदाना, चौलाई (Amaranth)

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     चौलाई  पौधों की एक जाति है जो पूरे विश्व में पायी जाती है। जिनके  पुष्प   पर्पल  एवं  लाल  से सुनहरे होते हैं।  गर्मी  और  बरसात  के मौसम के लिए चौलाई बहुत ही उपयोगी पत्तेदार सब्जी होती है। अधिकांश साग और पत्तेदार सब्जियां शित ऋतु में उगाई जाती हैं, किन्तु चौलाई को गर्मी और वर्षा दोनों ऋतुओं में उगाया जा सकता है। इसे अर्ध-शुष्क वातावरण में भी उगाया जा सकता है पर गर्म वातावरण में अधिक उपज मिलती है। इसकी खेती के लिए बिना कंकड़-पत्थर वाली मिट्टी सहित रेतीली  दोमट  भूमि उपयुक्त रहती है। इसकी खेती सीमांत भूमियों में भी की जा सकती है।  चौलाई का सेवन भाजी व   साग   (लाल साग) के रूप में किया जाता है जो   विटामिन सी   से भरपूर होता है। इसमें अनेकों औषधीय गुण होते हैं, इसलिए   आयुर्वेद   में चौलाई को अनेक रोगों में उपयोगी बताया गया है। सबसे बड़ा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन भी कहा जाता है। अनेक प्रकार के विष जैसे चूहे, बिच्छू, संखिया, आदि का विष चढ गया ह...

हरसिंगार (Musk flower)

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      हरसिंगार  इसे   पारिजात ,   शेफाली, शिउली आदि नामो से भी जाना जाता है। इसका वृक्ष 10 से 15 फीट ऊँचा होता है।  पारिजात पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और  छाल  का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह पूरे  भारत  में पैदा होता है। यह  पश्चिम बंगाल  का राजकीय पुष्प है।  सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।   इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। हरसिंगार  का उपयोग पारिजात का बीज लें। इसका पेस्ट बनाएं। इसे सिर पर लगाएं। इससे डैंड्रफ की परेशानी खत्म होती है। जीभ के पास एक घंटी जैसा छोटा-सा मांस का टुकड़ा होता है, उसे गलशुण्डी बोलते हैं। इससे जुड़ी बीमारी हो तो हरसिंगार का पौधा लें। इसकी जड़ को चबाएं। इससे गलशुण्डी से जुड़े विकार ठीक होते हैं। 500 मिग्रा पारिजात की छाल का चूर्ण बनाएं। इसका सेवन करने से खांसी ठीक होती है। हरसिंगार का पौधा लें। इसकी ...

शकरकंद (Sweet potato)

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      शकरकंद को मीठा आलू भी कहते हैं। आम तौर पर उपवास के समय शकरकंद को उबालकर खाया जाता है क्योंकि ये एनर्जी या ऊर्जा का स्रोत होता है। शकरकंद में कई तरह की पौष्टिकताएं होती है जिसके कारण आयुर्वेद में औषधि के रुप में उपयोग किया जाता है। शकरकंद  एक ऐसा फल है जो कच्चा या पका दोनों रूपों में सेवन किया जाता है। और उसको उबालकर खाना अच्छा होता है। शायद आपको ये सुनकर आश्चर्य होगा कि शकरकंद मीठा होने के बावजूद डायबिटीज के मरीजों के लिए फायदेमंद होता है। शकरकंद विटामिन सी, विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स, आयरन, फॉस्फोरस   और बीटा कैरोटीन का स्रोत होता है जिसके कारण पौष्टिकता से भरपूर होता है। शकरकंद मीठा, थोड़ा ठंडा और गरम, वात और पित्त को कम करने वाला, कफ को बढ़ाने वाला, शक्ति को बढ़ाने वाला, कब्ज से राहत दिलाने वाला होता है। इसका कंद विरेचक, वाजीकारक, मूत्रल बलकारक, कवकरोधी, जीवाणुरोधी, विबन्ध, प्रदर, अर्श, मधुमेह, कुष्ठ, पूयमेह तथा मूत्रकृच्छ्र में हितकर होता है। इसके भूमिगत कंद,लाल, सफेद अथवा पीले रंग का होता है। आम तौर पर शकरकंद बीच में मोटा तथा दोनों किनारों पर पत...

सुपारी (areca nut)

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      सुपारी , 'अरेका कटेचु' नामक पौधे के फल का बीज है जो दक्षिणी एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया तथा अफ्रीका के अनेक भागों में पैदा होता है।  सुपारी का वृक्ष, ताड़ एवं नारियल के समान ऊंचा होता है। इसका तना सीधा, चिकना, छल्लेदार होता है। इसके पत्ते बड़े, नारियल के पत्तों के समान लम्बे होते हैं। इसके फल चिकने, नारंगी रंग के होते हैं। पक जाने पर फल, गहरे नारंगी रंग का और अण्डाकार होता है। इसी फल के अन्दर सुपारी होती है।   आयुर्वेदिक किताबों के अनुसार, सुपारी एक गुणी औषधि है।  इसकी मुख्यतः दो प्रमुख प्रजातियां प्रचलित हैं -  साधारण सुपारी,  लाल सुपारी ।   सुपारी का उपयोग मुंह में छाले होने पर सुपारी, तथा   बड़ी इलायची  की भस्म बना लें। उसमें शहद मिलाकर मुंह में लगाएं। इससे मुंह के छाले की परेशानी में लाभ होता है। सोंठ, सुपारी, अथवा   मरिच , गोमूत्र, और   नारियल के जल  से काढ़ा बना लें। इससे गरारा करने से मुंह के रोग जैसे अधिजिह्वादि में लाभ होता है। पेट में कीड़े होने पर 10-30 मिली सुपारी के फल का काढ़ा बना लें। इसका सेवन करने...

कदम्ब (Wild Cinchona)

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      कदम्ब या कदम का पेड़ को देव का वृक्ष माना जाता है। कदम्ब आयुर्वेद में अपने औषधीय गुणों के लिए बहुत ही मशहूर है।  यह मुख्य रूप से अंडमान, बंगाल तथा आसाम में पाया जाता है। यह पेढ़ बहुत जल्दी बढ़ता है।इसकी ऊँचाई 20-40 फ़ीट की मध्यम कोटि तक होती है। पत्ते  महुवा   से मिलते हैं, पर थोड़े छोटे और चमकीले होते हैं।   वर्षा ऋतु   पर इस पर फूल आते हैं। इसके डंठल पर चक्राकार पीले गुच्छे के रूप में बहुत छोटे सुगंधमय फूल होते हैं। कहा जाता है कि बादलों की गर्जना से इसके फूल अचानक खिल उठते हैं। पीला   पराग   झरने के बाद, पकने पर लाल हो जाते हैं। इसे 'हरिद्र' और 'नीप' भी कहा जाता था। फूलों में से   इत्र   निकाला जाता है। औरतें इनसे अपना   शृंगार   करती हैं।  इ सकी पत्ती,छाल,फल समान मात्रा में लेकर काढा पीने से टाईप २ डायाबिटीज ठीक होता है। चरक, सुश्रुत आदि प्राचीन ग्रन्थों में कई स्थानों पर कदम्ब का वर्णन मिलता है। कदम्ब कड़वा होता है। यह तीन दोषों को हरने वाला, दर्दनिवारक, स्पर्म काउन्ट बढ़ाने के साथ ब्रेस्ट का साइज...

ईसबगोल (Plantago ovata)

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      ईसबगोल एक एक झाड़ीनुमा पौधा है जिसके बीज का छिलका कब्ज, अतिसार आदि अनेक प्रकार के रोगों की आयुर्वेदिक औषधि है। संस्कृत में इसे ' स्निग्धबीजम् ' कहा जाता है। ईसबगोल का उपयोग रंग-रोगन, आइस्क्रीम और अन्य चिकने पदार्थों के निर्माण में भी किया जाता है  इसबगोल के पौधे एक मीटर तक ऊँचे होते हैं, जिनमें लंबे किंतु कम चौड़े, धान के पत्तों के समान, पत्ते लगते हैं। डालियाँ पतली होती हैं और इनके सिरों पर  गेहूँ  के समान बालियाँ लगती हैं, जिनमें बीज होते हैं। इस पौधे की एक अन्य जाति भी होती है, जिसे लैटिन में 'प्लैंटेगो ऐंप्लेक्सि कैनलिस' कहते हैं। पहले प्रकार के पौधे में जो बीज लगते हैं उन पर श्वेत झिल्ली होती है, जिससे वे सफेद इसबगोल कहलाते हैं। दूसरे प्रकार के पौधे के बीज भूरे होते हैं। श्वेत बीज औषधि के विचार से अधिक अच्छे समझे जाते हैं। एक अन्य जाति के बीज काले होते हैं, किन्तु उनका व्यवहार औषध में नहीं होता। इस पौधे का उत्पत्तिस्थान मिस्र तथा ईरान है। अब यह पंजाब, मालवा और...