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Showing posts from November, 2020

कम्पिल्लक कबीला (Red berry)

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     कम्पिल्लक (कबीला) एक सुन्दर फल है। यह हल्के लाल रंग का गन्धहीन और स्वादहीन फल है। यह ठण्डे पानी में नहीं घुलता है। यह उबलते हुए पानी में थोड़ा घुलता है, और एल्कोहल और ईथर में पूरी तरह से घुल जाता है।कम्पिल्लक के वृक्ष लगभग 10 मीटर तक ऊँचे और अनेक शाखा-प्रशाखाओं से युक्त तथा सदा हरे रहने वाले होते हैं। इस वृक्ष की लकड़ी लाल, चिकनी एवं मजबूत होती है। इसके फल गोलाकार तथा बीज श्यामले रंग के, चिकने और लगभग गोलाकार होते हैं। फलों के पकते समय लालिमा युक्त चमकदार फल पराग उत्पन्न होता है। इसी को कबीला कहते है। फलों के पक जाने पर उन्हें मोटे कपड़े में डालकर रगड़ते हैं। इस तरह रज को अलग निकाल लिया जाता है। शुद्ध कबीला हल्का, सुगन्धरहित, स्वाद रहित तथा लालिमायुक्त होता है। उँगली को जल में गीला कर कम्पिल्लक पर रखने से जो रज उँगली में लगे उसे सफेद कागज पर रगड़ दें। यदि पीले रंग की रेखा व निशान पड़ जाए तो उसे शुद्ध मानना चाहिए।   कम्पिल्लक (कबीला) के उपयोग  टंकण, कम्पिल्लक तथा हरीतकी चूर्ण को समान मात्रा में मिला लें। इसे हरीतकी काढ़ा की भावना देते हुए 125 मिग्रा की वटी ब...

उलटकंबल (Devil’s cotton)

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     उलटकंबल के फूल पीले, बैंगनी अथवा गहरे लाल रंग के होते हैं। जब फूल परिपक्व हो जाते हैं, पुष्पकोष से अलग होकर फूल जब जमीन पर गिर जाते हैं, तब पुष्पकोष उलट कर आकाश की ओर मुड़ जाता है, इसलिए इसे उलट कंबल कहते हैं। उलटकंबल के फल कटे हुए आधे कमरख की तरह पांच कोश का तथा पांच खंड के होते हैं। फलकोष की प्रत्येक धार पर जाली के भीतर महीन रोम जैसी चमकदार रूई होती है, जिसको स्पर्श करने पर त्वचा में जलन-सी होती है। इस फल में रोमों के बीच दो कतारों में काले और पीले रंग के वन तुलसी या मूली के समान अनेक बीज भरे रहते हैं। जड़ की छाल भूरे रंग की होती है तथा अन्दर के भाग में सफेद गूदा भरा रहता है। जड़ों को काटने से एक गाढ़ा गोंद-सा निकलता है। उलटकंबल के उपयोग उलटकंबल के पत्तों को पीसकर लगाने से दर्द से जल्दी राहत मिलती है। उलटकंबल जड़ के रस को पीने से गले के दर्द और फूफ्फूस के सूजन को कम करने में जल्दी काम करता है। उलटकंबल के पत्ते का काढ़ा पीने से मधुमेह रोग के लक्षणों को नियंत्रित कर पाने में सहायता मिलती है। उलटकंबल जड़ के छाल का स्वरस बनाकर 2 मिली की मात्रा में कुछ समय तक ...

पूतिकरंज ( Fever nut)

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     पूतिकरंज की लताएं लगभग 20 मी लम्बी, कांटेदार और ह्मेस्धा हरी रहती हैं। नदियों, तालाबों और कीचड़ वाली जगहों पर पूतिकरंज की लताएं अधिक पायी जाती हैं। आमतौर पर ये लताएं किसी सहारे के चारों तरफ लिपटते हुए ऊपर की दिशा में बढ़ती हैं। इसकी शाखाएँ फैली हुई और भूरे रंग की होती हैं।आयुर्वेदिक ग्रंथों में पूतिकरंज के फायदों और औषधीय गुणों का उल्लेख मिलता है। पूतिकरंज के उपयोग   पूतिकरंज के बीजों की गिरी के साथ बराबर मात्रा में सहजन के बीज, तेजपत्ता, वच और खांड मिलाकर पीस कर महीन चूर्ण बनाकर रखें। इसको थोड़ी सी मात्रा में नाक में डालने से खूब छींकें आती हैं, जिसमें दूषित कफ का स्राव होता है, जिससे माइग्रेन में होने वाले दर्द से आराम मिलता है।  पूतिकरंज के बीजों को पानी में पीसकर थोड़ा गुड़ मिलाकर, थोड़ा गर्म कर लें। सिर के जिस हिस्से में दर्द हो रहा हो उसके उल्टी तरफ वाले नाक के छिद्र में इसकी 1-2 बूँद टपकाएं। इसके आधे घंटे बाद 1-2 बूँद नाक के दूसरे छिद्र में डालें। ऐसा कुछ दिन करने से माइग्रेन की समस्या में आराम मिलता है। गंजेपन की समस्या दूर करने के लिए नियमित ...

कचनार (Mountain ebony)

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     कचनार एक सुंदर फूलों वाला वृक्ष है। कचनार के छोटे अथवा मध्यम ऊँचाई के वृक्ष भारतवर्ष में सर्वत्र होते हैं।कचनार की छाल  के रेशों से रस्सी बनाई जाती है। कई स्थानों पर काचनार की पत्तियों का साग भी खाया जाता है।फूलों के रंगों में अंतर के अनुसार कचनार की विभिन्न जातियां पाई जाती हैं। इनमें से तीन प्रकार के काचनारों का विशेष उल्लेख मिलता है, जो ये हैंः- 1.लाल फूल वाला कचना (Bauhinia purpurea) 2.सफेद फूल वाला कचनार (Bauhinia racemosa) 3.पीला फूल वाला कचनार  (Bauhinia tomentosa Linn.) लाल काचनार – इसमें कुछ जामुनी लाल रंग के फूल आते हैं। अन्य कचनारों की अपेक्षा यह सभी जगह मिल जाता है।लाल फूल वाली प्रजाति को कचनार, और सफेद फूल वाली प्रजाति को कोविदार कहा जाता है। लाल फूल के आधार पर कचनार की दो प्रजातियां पाई जाती हैं, जो ये हैंः- Bauhinia purpurea Linn.  Bauhinia blakeana Dunn  सफेद काचनार – इसके फूल सफेद रंग के और सुगन्धित होते हैं। सफेद फूलों के आधार पर कांचनार की मुख्यतया तीन प्रजातियां पाई जाती हैैं, जो ये हैंः- Bauhinia racemosa Lam. Bauhinia acumina...

अरंडी (Castor)

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     अरंडी तेल का पेड़ एक पुष्पीय पौधे की बारहमासी झाड़ी होती है, जो एक छोटे आकार से लगभग १२ मी के आकार तक तेजी से पहुँच सकती है, पर यह कमजोर होती है। इसकी चमकदार पत्तियॉ १५-४५ सेमी तक लंबी, हथेली के आकार की, ५-१२ सेमी गहरी पालि और दांतेदार हाशिए की तरह होती हैं। उनके रंग कभी कभी, गहरे हरे रंग से लेकर लाल रंग या गहरे बैंगनी या पीतल लाल रंग तक के हो सकते है। तना और जड़ के खोल भिन्न भिन्न रंग लिये होते है। इसके उद्गम व विकास की कथा अभी तक अध्ययन अधीन है। यह पेड़ मूलतः दक्षिण-पूर्वी भूमध्य सागर, पूर्वी अफ़्रीका एवं भारत की उपज है, किन्तु अब उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में खूब पनपा और फैला हुआ है। अरंडी का उपयोग 2 बूंद एरंड तेल को नेत्रों में डालने से नेत्र विकारों का शमन होता है, कुकूणक रोग में उसकी तीक्ष्णता भी कम होती है। एरंड-पत्तों को जौ के आटे के साथ पीसकर, पुल्टिस बनाकर आँखों पर बांधने से पित्त के कारण जो सूजन होता है वह कम होने लगता है। 500 मिग्रा एरंड पत्ते क्षार में 3 मिली तेल एवं समान भाग गुड़ मिलाकर चटाने से खांसी दूर हो जाती है। एरंड के बीजों की मींगी पीसकर,...

लोध्र (Lotur bark)

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     लोध्र एक आयुर्वेदिक औषधीय वनस्पति है। लोध्रा के पेड़ मध्यम आकार के होते हैं। इसकी छाल पतली तथा छिलकेदार होती है। इसके फूल सफेद और हल्के पीले रंग के तथा सुगन्धित होते हैं। लोध्रा के द्वारा लाख (लाक्षा) को साफ किया जाता है, इसलिए इसे लाक्षाप्रसादन भी कहते हैं। इसकी दो प्रजातियाँ पाई जाती हैं जिन्हें क्रमश: लोध्र व पठानीलोध्र कहते हैं। लोध्रा कषैला, कड़ुआ, पचने में हल्का, रूखा, कफ-पित्त का नाशक और आँखों के लिए लाभकारी होता है। लोध्र के उपयोग 15-20 मिली लोध्रासव का सेवन करने से मोटापा जल्दी कम होने में मदद मिलती है। आँख में शुक्र रोग होने पर हल्दी, मुलेठी, सारिवा तथा पठानी लोध्र के काढ़ा से सेंकना चाहिए। इसके अलावा लोध्र के सूक्ष्म चूर्ण  को स्वच्छ कपड़े के टुकड़े में बांधकर पोटली बना लें। इसे गुनगुने जल में डुबाकर आंखों को सेंकना चाहिए। सफेद लोध्र को घी में भूनकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गुनगुने जल में भिगोकर, खूब मल लें। इसे ठंडा करके कपड़े से छानकर आंखों को धोने से आँखों के दर्द से छुटकारा मिलता है। लोध्र को पीसकर आंखों के बाहर चारों तरफ लेप करने से भी आंखों के...

खैर या खादिर (Black Catechu)

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     वृक्ष की लकड़ी के टुकड़ों को उबालकर निकाला और जमाया हुआ रस जो पान में चूने के साथ लगाकर खाया जाता है, खैर या कत्था कहलाता है। खैर की शाखाओं तथा छाल को उबालकर ही कत्था निकाला जाता है। इतना ही नहीं खैर या खादिर का प्रयोग धार्मिक कार्यों में भी किया जाता है। इसके अलावा खादिर या खैर का उपयोग औषधि रूप में किया जाता है।आयुर्वेदिक ग्रंथों में यह बताया गया है कि खैर या खादिर कुष्ठ, एक्ज़िमा इत्यादि चर्म रोगों की अच्छी दवा है। खैर (खादिर) स्वाद में तीखा और कसैला होता है। इसकी तासीर ठंडी होती है। इसमें भूख जगाने और खाना आसानी से पचाने के गुण होते हैं। यह बल देने वाला, ग्रहणी तथा दांतों को मजबूत करने वाला होता है। यह पेट के दर्द से आराम दिलाता है।यह यज्ञ–हवन आदि कामों की समिधा में प्रयोग की जाने वाली नवग्रह लकड़ियों में से एक है। खैर का पेड़ बहुत ही मजबूत होते हैं। इसका तना हड्डियों की तरह कठोर होता है। खैर (खादिर) के उपयोग खादिर या खैर, नीम और जामुन अथवा कुटज की छाल को सेंधा नमक के साथ गोमूत्र में पीस लें। इसका लेप करने से रूसी से छुटकारा मिलता है। खैर से मुंह के सभी प्रकार...

मोथा (Nutgrass)

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     मोथा एक बहुवर्षीय सेज़ वर्गीय पौधा है, जो ७५ सें.मी. तक ऊँचा हो जाता है। भूमि से ऊपर सीधा, तिकोना, बिना, शाखा वाला तना होता है। नीचे फूला हुआ कंद होता है, जिससे सूत्र द्वारा प्रकंद जुड़े होते हैं, ये गूद्देदार सफेद और बाद में रेशेदार भूरे रंग के तथा अंत में पुराने होने पर लकड़ी की तरह सख्त हो जाते हैं। पत्तियाँ लम्बी, प्रायः तने पर एक दूसरे को ढके रहती हैं। तने के भाग पर पुष्पगुच्छ बनते हैं, जो पकने पर लाल-भूरे रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। मुख्यरूप से कंद द्वारा संचरण होता है, इसमें बीज भी कुछ सहयोग देते हैं। नमी वाली भूमि में भी अच्छी बड़वार होती है, पर सामान्यतः उच्च भूमियों में उगाए जाने वाली धान की फसल के लिए प्रमुख खरपतवारों की सूची में आता है। इसका नियंत्रण कठिन होता है, क्योंकि प्रचुर मात्रा में कंद बनते हैं, जो पर्याप्त समय सुषुप्त रह सकते हैं। विपरीत वातावरण में ये लम्बे समय तक सुरक्षित रह जाते है। भूपरिष्करण क्रियाओं से इन कंदों में जागृति आ जाती हैं एवं ओजपूर्ण-वृद्धि के साथ बढ़वार होने लगती है। इससे कभी-कभी ५०% तक धान की उपज में गिरावट पाई गई है। मोथा घ...

अकरकरा (Spanish pellitory)

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     आयुर्वेद में अकरकरा का प्रयोग लगभग 400 वर्षों से किया जा रहा है। अकरकरा के औषधीय और आयुर्वेदिक गुण अनगिनत हैं। आयुर्वेद में अकरकरा पाउडर और चूर्ण का उपयोग दवा के रूप में किया जाता है। अकरकरा को सिर दर्द, दांत दर्द, मुँह के बदबू, दांत संबंधी समस्या, हिचकी जैसे बीमारियों के लिए जादू जैसा काम करता है। मूल-रूप से अरब का निवासी होने के कारण इसको मोरक्को अकरकरा भी कहते हैं। भारत के कुछ हिस्सों में इसकी खेती की जाती है। वर्षाऋतु की प्रथम फूहार पड़ते ही इसके छोटे-छोटे पौधे निकलने शुरू हो जाते हैं। इसकी जड़ का स्वाद चरपरा होता है तथा इसको चबाने से गर्मी महसूस होती है व जिह्वा जलने लगती है। आयुर्वेदीय गुण-कर्म एवं प्रभाव में अरब से आयातित औषधि अधिक वीर्यवान् मानी जाती है। प्रशस्त अकरकरा भारी (वजनदार) और तोड़ने पर भीतर से सफेद होती है। यह स्वाद में अत्यन्त तीक्ष्ण होती है। अकरकरा साइड इफेक्ट्स के तौर पर चबाने से मुख और जीभ में बहुत तेज और एक विचित्र ढंग की सनसनाहट होने लगती है तथा मुंह से लार निकलने लग जाती है। कुछ काल के बाद सनसनाहट बंद हो जाती है तथा मुंह का शोधन हो जाता...

बला (Country mallow)

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     बला की कई जातियां पाई जाती हैं। इनमें बला, राजबला (Sida humilis Cav.), भूमिबला (Sida spinosa Linn.), अतिबला (Abutilon indicum (Linn.) Sw.), महाबला (Sida rhombifolia Linn.) और नागबला (Grewia hirsuta Vahl) मुख्य हैं। इसके पत्ते हृदय के आकार के होते हैं। इसके प्रत्‍येक गांठ पर एक पत्‍ता पाया जाता है। इसके फूल पीले रंग के होते हैं। यह पौधा पूरी तरह से हरा भरा और पत्‍तों से लदा होता है।बला का पौधा बहुत ही गुणकारी है, क्योंकि यह एक जड़ीबूटी है। लोग बला को बरियार, खरेठी, बीजबंद आदि कई नामों से जानते हैं। आयुर्वेद में बला के पौधे के अनेक औषधीय गुण बताए गए हैं। बला के उपयोग बला के पत्तों को पीसकर रस निचोड़ लें। इससे मालिश करने से कफ दोष के कारण होने वाली खुजली और चकत्‍ते की समस्या ठीक होती हैं।  बला पौधा की जड़ तथा बेल में पाया जाने वाला द्रव्य से काढ़ा बना लें। इसमें दूध एवं घी मिला कर पका लें। इसे ठंडा करने के बाद इसकी बूंद नाक में डालें। इससे सिर में होने वाले वात रोग का उपचार होता है। बला तथा बबूल के पत्‍तों को पीसकर आंखों के बाहर लगाएं। इससे आंख आने की समस्या ठ...

कपूर (Camphor)

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     कपूर (संस्कृत : कर्पूर) उड़नशील वानस्पतिक द्रव्य है। यह सफेद रंग का मोम की तरह का पदार्थ है। इसमे एक तीखी गंध होती है। आयुर्वेद के कई ग्रंथों में पक्व, अपक्व और भीमसेनी तीन तरह के कपूर का जिक्र है। मुख्य रूप से दो तरह के कपूर प्रयोग में लाये जाते हैं। एक पेड़ों से प्राप्त होता है और दूसरा कृत्रिम रूप से रासायनिक प्रक्रिया द्वारा बनाया जाता है। प्राकृतिक कपूर को भीमसेनी कपूर कहा जाता है, और यह कृत्रिम कपूर की तुलना में भारी होता है। यही कारण है कि यह जल्दी पानी में डूब जाता है। यह जल्दी उड़ता भी नहीं है।  कपूर का उपयोग शुण्ठी, लौंग, कर्पूर, अर्जुन की छाल और सफेद चंदन को समान मात्रा में लेकर पीस लें। इसे सिर पर लेप करने से सिरदर्द जल्दी ठीक हो जाता है। कपूर के चूर्ण को बरगद (वट) के दूध में पीसकर आंखों में काजल की तरह लगाने से आंखों से जुड़े रोगों में लाभ होता है। कपूर को नारियल तेल में मिलाकर लगाने से त्वचा का रूखापन दूर हो जाता है साथ ही  चेहरे की त्वचा खिलने लगती है।   कपूर को नारियल या किसी तेल में मिलकर लगाने से सूजन कम होती है। लू लगने पर कपू...

शतावरी ( Wild asparagus)

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     शतावरी बेल या झाड़ के रूप वाली शतावरी एक जड़ी-बूटी है। इसकी लता फैलने वाली, और झाड़ीदार होती है। एक-एक बेल के नीचे कम से कम 100, इससे अधिक जड़ें होती हैं। ये जड़ें लगभग 30-100 सेमी लम्बी, एवं 1-2 सेमी मोटी होती हैं। जड़ों के दोनों सिरें नुकीली होती हैं। इन जड़ों के ऊपर भूरे रंग का, पतला छिलका रहता है। इस छिलके को निकाल देने से अन्दर दूध के समान सफेद जड़ें निकलती हैं। इन जड़ों के बीच में कड़ा रेशा होता है, जो गीली एवं सूखी अवस्था में ही निकाला जा सकता है। शतावरी दो प्रकार की होती हैं, जो ये हैंः- विरलकन्द शतावर (Asparagus filicinus -Ham ex D.Don) इसके कन्द छोटे, मांसल, फूले हुए तथा गुच्छों में लगे हुए होते हैं। इसके कन्द का काढ़ा बनाकर सेवन किया जाता है। कुन्तपत्रा शतावर (Asparagus gonoclados Baker) यह झाड़ीनुमा पौधा होता है। इसके कन्द छोटे, और मोटे होते हैं। इसके फूल सफेद रंग के होते हैं, और फल गोल होते हैं। कच्ची अवस्था में फल हरे रंग के, और पकने पर लाल रंग के हो जाते हैं। इसके कंद शतावर से छोटे होते हैं। शतावरी के उपयोग 2-4 ग्राम शतावरी चूर्ण को दूध में पका लें। इस...

निर्गुन्डी (Horse shoe vitex)

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     निर्गुन्डी एक औषधीय गुणों वाली क्षुप (झाड़ी) है। हिन्दी में इसे संभालू/सम्मालू, शिवारी, निसिन्दा शेफाली, तथा संस्कृत में इसे सिन्दुवार के नाम से जाना जाता है। इसके क्षुप १० फीट तक ऊंचे पाए जाते हैं। संस्कृत में इसे इन्द्राणी, नीलपुष्पा, श्वेत सुरसा, सुबाहा भी कहते हैं। राजस्थान में यह निनगंड नाम से जाना जाता है। इसकी पत्तियों के काढ़े का उपयोग जुकाम, सिरदर्द, आमवात विकारों तथा जोड़ों की सूजन में किया जाता है। यह बुद्धिप्रद, पचने में हल्का, केशों के लिए हितकर, नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला तो होता ही है, साथ ही शूल, सूजन, आंव, वायु, पेट के कीड़े नष्ट करने, कोढ़, अरुचि व ज्वर आदि रोगाें की चिकित्सा में भी काम आता है। इसके पत्ते में रक्तशोधन का भी विशेष गुण होता है। निर्गुंडी सफेद, नीले और काले रंग के भिन्न-भिन्न फूलों वाली होती है। इसकी कई जातियाँ होती हैं, किन्तु नीला और सफेद, इसके दो मुख्य भेद हैं। पत्तों के आधार पर निर्गुण्डी की दो प्रजातियाँ मानी जाती हैं। Vitex negundo Linn. में पाँच पत्ते तथा तीन पत्ते भी पाए जाते हैं लेकिन Vitex trifoliaLinn. नामक निर्गुण्डी की प्रजा...

गोरखमुंडी (Indian globe thistle)

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     गोरखमुंडी एकवर्षा आयु वाली, प्रसर, वनस्पति धान के खेतों तथा अन्य नम स्थानों में वर्षा के बाद निकलती है। यह किंचित् लसदार, रोमश और गंधयुक्त होती है। इसके मूल, पुष्पव्यूह अथवा पंचाग का चिकित्सा में व्यवहार होता है। यह कटुतिक्त, उष्ण, दीपक, कृमिघ्न (कीड़े मारने वाली), मूत्रजनक रसायन और वात तथा रक्तविकारों में उपयोगी मानी जाती है। इसमें कालापन लिए हुए लाल रंग का तैल और कड़वा सत्व होता है। तैल त्वचा और वृक्क द्वारा नि:सारित होता है, अत: इसके सेवन से पसीने और मूत्र में एक प्रकार की गंध आने लगती है। मूत्रजनक होने और मूत्रमार्ग का शोधन करने के कारण मूत्रेंद्रिय के रोगों में इससे अच्छा लाभ होता है। अधिक दिन सेवन करने से फोड़े फुन्सी का बारंबार निकलना बंद हो जाता है। यह अपची, अपस्मार, श्लीपद और प्लीहा रोगों में भी उपयोगी मानी जाती है।  गोरखमुण्डी का उपयोग  गोरखमुंडी चूर्ण को कांजी में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाएं। इससे मुंह से दुर्गन्ध आना बंद होता है। आप किसी दन्तमंजन में इसके फूल के चूर्ण मिलाकर मंजन करें। इससे भी मुंह से दुर्गन्ध आना बंद होता है। गोरखमुण्डी के 3-5 मि...

सर्पगन्धा (Serpentine root)

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     भारत तथा चीन के पारंपरिक औषधियों में सर्पगन्धा एक प्रमुख औषधि है। भारत में तो इसके प्रयोग का इतिहास ३००० वर्ष पुराना है। सर्पगन्धा के पौधे की ऊँचाई ६ इंच से २ फुट तक होती है। इसकी प्रधान जड़ प्रायः २० से. मी. तक लम्बी होती है। जड़ में कोई शाखा नहीं होती है। इसका तना मोटी छाल से ढका रहता है। इसके फूल गुलाबी या सफेद रंग के होते हैं। ये गुच्छों में पाए जाते हैं। भारतवर्ष में समतल एवं पर्वतीय प्रदेशों में इसकी खेती होती है। पश्चिम बंगाल एवं बांग्लादेश में सभी जगह स्वाभाविक रूप से सर्पगन्धा के पौधे उगते हैं।  सर्पगंधा की जड़ी साँप के विष को उतारने की एक अच्छी दवा है। सर्पगंधा के बारे में अनेक रोचक कथाएं प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए कहा जाता है कि कोबरा से लड़ने से पहले नेवला सर्पगंधा की पत्तियों का रस चूस कर जाता है। पहले इसे पागलों की दवा भी कहा जाता था क्योंकि सर्पगंधा के प्रयोग से पागलपन भी ठीक होता है। दो-तीन साल पुराने पौधे की जड़ को उखाड़ कर सूखे स्थान पर रखते है, इससे जो दवाएँ निर्मित होती हैं, उनका उपयोग उच्च रक्तचाप, गर्भाशय की दीवार में संकुचन के उपचार में कर...