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Showing posts from April, 2021

मसूर (Slit pea)

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     मसूर का प्रयोग दाल के रूप में पूरे भारत में किया जाता है। मसूर का पौधा लगभग 15-75 सेमी ऊंचा होता है। मसूर के लेप का इस्तेमाल रंग को सुंदर करने के लिए, त्वचा रोग को ठीक करने के लिए और कफ-विकार, रक्त-विकार तथा पित्त-विकारों के इलाज के लिए किया जाता है। इसके साथ ही मसूर  मूत्र रोग, दर्द, पेट की गैस और बुखार में भी उपयोग में लाया जाता है।  मसूर दाल के उपयोग मसूर को भूनकर, छिलका हटा लें। इसे दूध के साथ पीस लें। इसमें मधु और घी मिलाकर मुंह में लेप के रूप में लगाएं। इससे चेहरे के दाग-धब्बे खत्म हो जाते हैं, और चेहरे की कांति बढ़ती है। रक्तचंदन, मंजिष्ठा, कूठ, लोध्र, प्रियंगु, वटांकुर तथा मसूर को पीस लें। इसे चेहरे पर लेप के रूप में लगाएं। इससे चेहरे पर रौनक तो आती ही है, साथ ही चेहरे के दाग-धब्बे ठीक हो जाते हैं। चेहरे की झाई में मसूर को घी से पीस लें। इसमें दूध मिला लें, या दूध से पीसकर चेहरे पर लेप करें। इससे चेहरे की झाई की समस्या ठीक होती है। बरगद के पत्ते और मसूर को समान मात्रा में लेकर पीस लें। इससे लेप करने से चेहरे की झाई या दाग-धब्बे ठीक हो जाते हैं। मुंह...

खरबूज (Muskmelon Fruit)

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     खरबूजा अपनी मिठास एवं स्वाद के लिए बहुत लोकप्रिय है। खरबूज के बीजों की गिरी से मेवा बनाया जाता है जिसका  इस्तेमाल विभिन्न प्रकार की मिठाई में किया जाता है। खरबूज, ककड़ी, फूट एक ही जाति के फल (chibud fruit) है। इन फलों को ताजा ही खाया जाता है। भारत के अलग-अलग राज्यों में खरबूजा की कई उपजातियां मिलती हैं, किन्तु गुणों में विशेष अन्तर नहीं होता है। खरबूज कई रंगों में मिलता है, लेकिन सामान्यतः यह पकने पर हरा से पीला या नारंगी रंग का हो जाता है। इसके फल लम्बी लताओं में लगते हैं। इसकी लता पतली, जमीन पर फैलने वाली, तरबूज की बेल जैसी, और मोटी जड़ वाली होती है। इसमें 90 प्रतिशत तक पानी होता है। इसलिए गर्मियों में खरबूजा का सेवन बहुत लाभ देता है। खरबूज के बीजों (magaz seeds) में 40-50 प्रतिशत तेल पाया जाता है। खरबूज का उपयोग सलाद के रूप में होता है। कच्चे फलों का उपयोग ग्रामीण क्षे़त्रों में सब्जी के रूप में भी किया जाता है।  खरबूजा के उपयोग खरबूजे की बीज (magaz seeds) को घी में भून लें। इसे मिश्री की चासनी में डालकर सेवन करें। इससे सिरदर्द में बहुत आराम मि...

लीची (Litchi)

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     लीची का पेड़ मध्यम आकार का होता है। इसके फल गोल और कच्ची अवस्था में हरे रंग के होते हैं। ये पकने पर मखमली-लाल रंग के हो जाते हैं। फल के अन्दर का गूदा सफेद रंग का, मांसल और मीठा होता है। प्रत्येक फल के अन्दर भूरे रंग का बीज होता है। आयुर्वेद में लीची सिर्फ अपने मधुर स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि अनेक औषधीय गुणों के कारण भी जाना जाती है। लीची गर्म प्रकृति वाली फल है, जो गठिया के दर्द, वात तथा पित्त दोष को कम करती है। लीची के उपयोग लीची के पेड़ की जड़ या तने की छाल का काढ़ा बना लें। इससे कुल्ला करने से मुंह के रोग में फायदा पहुंचता है। लीची फल, मज्जा या गूदे (2-4 ग्राम) को कांजी में पीस लें। इसका सेवन करने से पेट संबंधी समस्याओं से राहत मिलती है। लीची के पेड़ की जड़, छाल और फूल का काढ़ा बना लें। इसे गुनगुना करके गरारा करें, इससे गले का दर्द ठीक हो जाता है। लीची के बीज का प्रयोग तंत्रिका-तंत्र विकारों के इलाज में कर सकते हैं।  लीची के कच्चे फल का प्रयोग बच्चों के चेचक रोग की चिकित्सा  में किया जाता है। लीची के बीज का काढ़ा बना लें। इसे 10-15 मिली मात्रा में ...

नाशपाती (pear fruit)

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     नाशपाती पौष्टिक गुणों से भरपूर फल है जिसका आयुर्वेद में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। ये न सिर्फ त्वचा संबंधी समस्याओं को दूर करने में मदद करती है बल्कि कई तरह के बीमारियों को ठीक करने के लिए औषधि के रुप में काम भी करती है। नाशपाती पहाड़ी, बागी, जंगली तथा चीनी भेद से चार प्रकार की होती हैं। इनमें से पहाड़ी एवं बागी नाशपाती विशेष रुप से कोमल, मधुर व रसीली होती है। नाशपाती आकृति में सुराही जैसी होती है। इन्हें ही नाख या नाक कहते हैं। बाकी प्रकार की नाशपाती खट्टी या खट्टीमिठी होती है। नाशपाती से एक प्रकार की शराब बनाई जाती है। यह सेव की शराब की अपेक्षा कम मधुर एवं कम गुणवाली होती है।  नाशपाती का उपयोग 10-20 मिली नाशपाती के फल के रस में चीनी, बेलगिरि चूर्ण, बेर चूर्ण, सेंधा नमक, काली मिर्च और भुना हुआ जीरा डालें। इस मिश्रण को पीने से सिर दर्द, मूत्र करते वक्त जलन या दर्द, रक्त की उल्टी तथा खाने में अरुचि जैसे बीमारियों में लाभ होता है। नाशपाती को पीसकर नेत्र के बाहर चारों तरफ लगाने से नेत्ररोगों में लाभ होता है। 15-20 मिली नाशपाती फल के रस में 500 मिग्रा पिप्पली...

उड़द ( Black gram)

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     उड़द एक दलहन होता है और इसका तासीर भी ठंडा होता है। इसलिए उड़द दाल को घी में हींग का छौंक डालकर बनाया जाता है। इसमें जो अनगिनत गुण होते हैं वह न सिर्फ खाना को स्वादिष्ट ही बनाता है वरन् कई तरह के बीमारियों के लिए वरदान जैसा साबित होता है। उड़द दाल में बहुत सारे पौष्टिक तत्व होते हैं जिसके कारण इस दाल को सिर दर्द, नकसीर, बुखार, सूजन जैसे अनेक बीमारियों के इलाज करने के लिए प्रयोग किया जाता है। उड़द काली तथा हरी आदि कई तरह की होती है। सब प्रकार के उड़दों में काले रंग की उड़द उत्तम मानी जाती है। वैद्यक ग्रन्थों में अनेक पौष्टिक प्रयोगों में उड़द की प्रशंसा की गई है। वास्तव में आमिष भोजियों के लिए जिस प्रकार मांस पुष्टिदायक माना जाता है, उसी प्रकार या उससे बढ़कर निरामिष भोजियों के लिए माष अर्थात् उड़द मांसवर्धक और पुष्टिकर होता है। उड़द के उपयोग 50 ग्राम उड़द को 100 मिली दूध में पकाकर उसमें घी डालकर खाने से वात के कारण जो सिर दर्द होता है उससे राहत मिलती है।   उड़द को जलाकर उसकी भस्म बनाकर, उसमें चतुर्थांश अर्कदूध तथा सरसों तेल मिलाकर लेप बना लें। इसको सिर ...

भिंडी (Ladiesfinger)

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     भिंडी का प्रयोग भिंडी की सब्जी के रूप में किया जाता है। इसके फल अंगुली के समान लम्बे होते हैं। भिंडी का पूरा पौधा रोमों से युक्त होता है। इसके फूल पीले रंग के होते हैं। इसके फल हरे रंग के होते हैं। भिंडी के फल आगे की तरफ से नुकीले, या पतले होते हैं। भिंडी  के अन्दर सफेद रंग के गोलाकार, चिपचिपे द्रव्य से युक्त अनेक बीज होते हैं। भिंडी के प्रयोग से मुंह का स्वाद अच्छा हो जाता है, और वात-पित्त रोग के साथ-साथ मल संबंधी परेशानी भी दूर होती है। भिंडी के  उपयोग भिंडी के पत्तों को पीसकर घाव पर लगाएं। इससे घाव जल्दी ठीक हो जाता है। भिण्डी के पत्ते के रस को बीमार त्वचा पर लगाएं। इससे त्वचा रोग में तुरंत लाभ होता है। भिंडी के फल को पीसकर लेप बना लें। इसे खुजली वाले स्थान पर लगाएं। इससे खुजली ठीक हो जाती है। दस्त की बीमारी में भिण्डी के फलों को मसल लें। इसमें मिश्री मिला लें। इसका सेवन करें।  भिण्डी के फल की सब्जी बनाकर खाएं। इससे पेचिश में लाभ होता है।  भिण्डी के फूलों का काढ़ा बना लेना है। इसमें 10-15 मिली मिश्री मिलाकर सेवन करना है। इससे पेशाब में जलन...

अमरूद (Guava)

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     अमरूद का स्वाद खट्टा, मीठा और फीका दो तीन तरह का होता है। स्वादिष्ट होने के साथ साथ अमरूद का औषधीय गुण बहुत पौष्टिक  होता है। कई तरह की बीमारियों को दूर करने में लोग इसे घरेलू उपाय के रुप में इस्तेमाल करते हैं। अमरूद भारत में मिलने वाला एक साधारण फल है। लगभग अधिकांश घरों या ग्रामीण इलाकों में इसके पेड़ मिल जाते हैं। कुछ पाश्चात्य विद्वानों का कहना है कि इसे अमेरिका से यहाँ पुर्तगीज लोगों द्वारा लाया गया है तथा साथ ही साथ यह भी कहते है कि अमरूद का पेड़ भारतवर्ष के कई स्थानों पर जंगलों में होता है। परंतु सच यह है कि जंगली आम, केला आदि के समान इसकी उपज अत्यन्त प्राचीन काल से हमारे यहाँ होती रही है तथा यह यहाँ का ही मूल फल है। इसका प्राचीन संस्कृत नाम अमृत या अमृत फल है तथा बनारस में प्रायः सब लोग इसे अमृत नाम से ही पुकारते हैं। अमरूद का स्वाद खट्टा, मीठा और फीका दो तीन तरह का होता है। स्वादिष्ट होने के साथ साथ अमरूद का औषधीय गुण बहुत पौष्टिक  होता है। अमरूद के उपयोग सूर्योदय से पहले प्रातः कच्चे हरे अमरूद को पत्थर पर घिसकर जहां दर्द होता है, वहां खूब अच्छ...

काजू (Cashew nut)

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     काजू एक प्रकार का फल होता है जो सूखे मेवे में शामिल होता है। काजू के गुण यानि पौष्टिक गुण इतने है कि आयुर्वेद में काजू को कई तरह के बीमारियों के लिए प्रयोग में लाया जाता है। काजू दांत दर्द से लेकर दस्त,कमजोरी जैसे अनेक रोगों से राहत दिलाने में मदद करता है। काजू को यूं ही खाने से भी न सिर्फ इसके स्वास्थ्यवर्द्धक गुणों का लाभ मिलता है बल्कि काजू को व्यंजन में  डालने से   व्यंजन का जायका बदलता है। इसके साथ ही काजू खाने से सेहत और सौन्दर्य में भी निखार आता है। काजू छोटा, लगभग 12 मी ऊँचा, मध्यम आकार का आम के वृक्ष के जैसा सदा हरा-भरा रहने वाला वृक्ष होता है। इसकी शाखाएं मुलायम होती है। काजू के वृक्ष की छाल से पीले रंग का निचोड़ या रस निकलता है। काजू का पत्ता कटहल के पत्ता जैसा होता है,किन्तु सुगन्धित होता है। इसके फूल छोटे, गुलाबी धारियों से युक्त, पीले रंग के  होते हैं, जिनमें सफेद गिरी होती है, इसे ही काजू कहते हैं। इसके ताजे फलों के रस से एक प्रकार का मद्य तथा फलों के छिलकों से काला व कड़वा रस युक्त तेल निकाला जाता है। यह तेल त्वचा में लगन...

कटहल (Jackfruit)

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     कटहल एक ऐसा फल है जिसको कच्चा हो तो कटहल की सब्जी के रूप में और पका हो तो फल के रुप में खाते हैं। कटहल के पकने पर उसका कोवा निकालकर खाया जाता है। इसमें विटामिन ए, सी, बी6, कैल्शियम, पोटैशियम, आयरन, फोलिक एसिड, मैग्नेशियम आदि होते हैं।  कटहल फल मीठा, हजम करने में मुश्किल, शक्ति प्रदान करने वाला, शुक्राणु यानि स्पर्म की संख्या बढ़ाने वाला, कफ और वातपित्त को कम करने के साथ-साथ जलन कम करने में भी फायदेमंद होता है। कच्चा कटहल मीठा होता है। लेकिन जैसा कि पहले ही बताया गया है कि कटहल को हजम करना मुश्किल होता है, इसलिए यह वजन कम करने में मदद करता है। कटहल का जड़ घाव को ठीक करने में सहायक होता है। कच्चा कटहल का फल मीठा होने के बावजूद इसका फूल कड़वा होता है। पका हुआ कटहल खाने में स्वादिष्ट होता है। यह वजन बढ़ाने वाला, शक्तिवर्द्धक, देर से पचने वाला, स्पर्म बढ़ाने वाला और कफपित्त कम करने लाभदायक होता है। कटहल के बीज एस्ट्रीजेंट प्रकृति वाला, शीतल, मधुर और कफपित्त को ठीक करने वाला होता है। कटहल के उपयोग कटहल के जड़ को पीसकर-छानकर उसका रस निकालकर, 1-2 बूंद नाक में डालने...

गोभी ( Cauliflower,Cabbage,Kohlrabi )

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     गोभी तीन तरह के होते हैं, फूलगोभी, बंदगोभी या पत्रगोभी और गांठगोभी। गोभी के स्वास्थ्यवर्द्धक  गुणों के कारण आयुर्वेद में इसको औषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है।  पुष्प गोभी  मधुर, उष्ण, गुरु, कफवात कम करने वाला, ग्राही, बल बढ़ाने वाला, देर से हजम करने वाला, स्तम्भक, अग्निमांद्यकारक तथा सूजन कम करने वाली होती है। इसके पत्ते मधुर, शीत, मूत्रल, कृमिनाशक, अनॉक्सीकारक तथा मृदुकारी होते हैं। बंधा गोभी खाने में रूची बढ़ाने के साथ-साथ , वातकारक, मधुर, गुरु, शीतपित्तशामक, मूत्रल, हृद्य, कृमिनाशक, आध्मानकारक, मृदुकारी तथा दीपन होती है। इसके बीज मूत्रल, विरेचक, आमशयोत्तेजक तथा कृमिरोधी होते हैं। इसके पत्र तिक्त, आमशयोत्तेजक, शीत, पाचक, हृद्य तथा शीतादरोधी होते हैं। यह जीवाणुनाशक, पूयरोधी, व्रणनाशक, शीतादरोधी, मृदुकारी, कवकनाशी तथा अल्परक्तशर्कराकारक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है। गांठ गोभी मधुर, शीत, गुरु, बलकारक, रुचिकर, दुर्जर (देर से पचने वाली), ग्राही तथा शीतल होती है। इसको कम मात्रा में उबालकर खाने से यह भेदक तथा अधिक उबालकर खाने से ग्राही होती है। यह कफ, ...

शलजम (Turnip)

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     शलजम एक सफेद कंदमूल वाली सब्जी है, जो पौष्टिकता से भरपूर होने के कारण स्वास्थ्यवर्द्धक होता है। इसमें कैलोरी बहुत कम होता है इसलिए जो फिट रहना चाहते हैं उनके ही बहुत ही फायदेमंद  है। लेकिन आयुर्वेद में शलजम को खाने के अलावा औषधि के रुप में भी उपयोग किया जाता है। क्योंकि शलजम बहुत सारे बीमारियों से राहत दिलाने में सहायता करता है। शलगम के जड़ तथा पत्ते का प्रयोग सलाद के रुप में तथा सब्जी के रुप में किया जाता है। इसके पत्ते मूली के पत्ते जैसे होते हैं। इसके फूल पीले रंग के होते हैं।  इसकी जड़ कुंभरुपी, गोल, सफेद तथा हल्के बैंगनी व गुलाबी रंग की आभा से युक्त होती है। शलगम एक ऐसा सब्जी है जो ज्यादातर शीतकाल में ही पाया जाता है।  आम तौर पर शलगम का सब्जी बनाकर ही खाया जाता है। लेकिन इसका पत्ता बहुत ही कड़वा होता है पर आयुर्वेद में इसको औषधि के रुप में प्रयोग किया जाता है। शलजम मधुर, थोड़ा गर्म, छोटा तथा वात,पित्त और कफ को दूर करने वाला होता है। यह खाने में रुचि बढ़ाने वाला, पेट संबंधी समस्या तथा ज्वर में फायदेमंद होता है। इसका जड़ और पत्ता पित्त को बढ़ाने वाल...

नारंगी (Orange)

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     नारंगी का पेड़ हमेशा ही हरा भरा होता है। यह लगभग 3-4 मीटर ऊंचा या मध्‍यम आकार का होता है। इसमें काफी टहनियां होती हैं और वे कंटीली होती हैं। यह झाड़ीनुमा दिखाई पड़ता है। नारंगी का स्‍वाद खट्टा-मीठा, तासीर गर्म और स्‍पर्श चिकना होता है। इस सुगंधित फल का सेवन बल प्रदान करने वाला तथा आमकारक होता है। संतरा के फूल सुगंधित, मनमोहक होते हैं। ये बुखार मिटाने वाले और बल प्रदान करने में असरदार होते हैं। संतरा के फूल के नियमित सेवन से मूत्र की रुकावट दूर होती है। नारंगी के  फल की बात की जाए तो इसका आकार अर्धगोलाकार या गोलाकार होता है तथा  मांसल होता है। कच्‍चा फल गहरे-हरे रंग का तथा पकने पर यह लालिमायुक्त-नारंगी अथवा चमकीले नारंगी रंग का हो जाता है। यह वात को दूरने करने वाला होता है। इसका सेवन हृदय के लिए फायदेमंद होता है। नारंगी के उपयोग नारंगी के फल का गुदा, फल का छिलका, पत्‍ता और फूलों को भून लें। इसे पीसकर लगाने से शरीर के रोम छिद्रों के सूजन का उपचार होता है। यह बदबूदार घाव को ठीक करने में असरदार औषधि की तरह काम करता है। 10-20 मिलीग्राम नारंगी के रस में शहद तथा स...

सेब (Apple)

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     सुबह खाली पेट सेब खाने से बहुत तरह के रोगों को शरीर से दूर रखा जा सकता है। आयुर्वेद में सेब के फायदों का विस्तार से उल्लेख मिलता है। सेब लाल या हरे रंग का फल है, जो विटामिन से भरपूर होता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे ‘मेलस डोमेस्टिका’ कहते हैं। सेब का पेड़ लगभग 3 से 7 मीटर तक ऊंचा होता है। इसकी छाल भूरे रंग की होती है। इसके फूल गुलाबी से सफेद रंग या खून के रंग के होते हैं। इसके फल मांसल और लगभग गोलाकार होते हैं। कच्ची अवस्था में सेब हरे रंग का, तथा स्वाद में खट्टा होता है। पक जाने पर लाल रंग का और मीठा होता है। सेब के बीज छोटा, काले रंग का तथा चमकीला होता है। सेब के उपयोग सेब चबाकर खाने से लार अधिक बनती है, जो मुंह की साफ-सफाई करने के अलावा बैक्टीरिया को पनपने से भी रोकती है। इस प्रकार से सेब खाने से आपके दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं। सेब को पीसकर, पकाकर आँखों में बांधने से आँखों की बीमारियां दूर होती हैं। 1 गिलास सेब का रस निकाल लें। इसमें मिश्री मिलाकर सुबह के समय पिएं। इससे सूखी खांसी में लाभ होता है। इससे बेहोशी की समस्या में भी फायदा होता है। सूखी खांसी में भर...

नारियल (Coconut)

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     नारियल का फल  और नारियल का पानी दोनों के स्वास्थ्यवर्द्धक गुण अनगिनत होते हैं। इसलिए आयुर्वेद में कई बीमारियों के लिए दोनों का इस्तेमाल औषधी के रूप में किया जाता रहा है। आयुर्वेद में मूल, नारियल जल, फल की गिरी, पुष्प, नारियल जटा, तैल एवं क्षार का प्रयोग औषधी के लिए किया जाता है। उष्णकटिबंधीय समुद्रतटवर्ती प्रदेशों में पाया जाता है। भारत में यह विशेषत केरल, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, गुजरात एवं दक्षिण-भारत में पाया जाता है। यह लगभग 12-24 मी ऊँचा, खजूर या ताड़ के सदृश सीधा, शाखा-प्रशाखाओं से रहित, बहुवर्षायु वृक्ष होता है। इसके फल बृहत्, 20-30 सेमी लम्बे, अण्डाकार, पीताभ अथवा हरिताभ वर्ण युक्त रेशेदार, पक्वावस्था में भूरे वर्ण के होते हैं। फल के भीतर श्वेत वर्ण की अन्तफलभित्ति होती है, जिसे गिरी कहते हैं। कच्ची अवस्था में फल के भीतर मधुर जल भरा रहता है, जो पकने के बाद सूख जाता है। नारियल के उपयोग नारियल के जल (5-10 मिली) को पीने से सिरदर्द, सूर्यावर्त्त तथा अर्धावभेदक आदि बीमारियों से राहत मिलती है। 100 मिली नारियल के दूध में 1 ग्राम कट्फल चूर्ण मिलाकर...

गन्ना (sugarcane)

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     देश भर में कई प्रकार के गन्ना उगाये जाते हैं, जिनमें लाल, सफेद, काला, पौण्ड्रक, मनोगुप्ता इत्यादि गन्ना की मुख्य जातियां हैं। गन्ने से गुड़, शक्कर (चीनी), खांड़ आदि खाद्य पदार्थ बनाए जाते हैं। यह हमारे देश की मुख्य फसलों में से एक है। इसे ईख भी कहा जाता है। गन्ना का प्रयोग बहुत सालों से किया जा रहा है। देश में कई स्थानों पर गन्ना की खेती की जाती है। इसके पेड़ डंडे जैसे लंबे होते हैं। इसका स्वाद बहुत ही मीठा होता है। गुड़ के उपयोग गुड़ के साथ थोड़ा-सा जीरा मिला लें। इसका सेवन करने से पाचनतंत्र संबंधित परेशानी ठीक होती है। ईख के रस को धूप में, या आग में गर्म कर लें। एक ऊफान आने के बाद शीशी, या चीनी मिट्टी के बरतन में भरकर रख लें। एक सप्ताह बाद प्रयोग में लाएं। इससे भोजन ठीक से पचता है, और भोजन के प्रति रुचि भी बढ़ती है।  गन्ने को गर्म रेत, या गर्म राख में गर्म कर लें। इसे चूसें। इससे गला ठीक हो जाता है। ईख के रस को धूप में, या आग में गर्म करें, जब इसमें एक ऊफान आ जाए, तो इसे शीशी, या चीनी मिट्टी के बरतन में भरकर रख लें। इसे एक सप्ताह बाद प्रयोग में लाएं। इसका गरार...

पपीता (Papaya)

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     पपीता एक ऐसा फल है जो बहुत ही आसानी से कहीं भी मिल सकता है। यहां तक कि आप घर के आस-पास थोड़ी-सी जगह होने पर वहां भी लगा सकते हैं। पपीता को कच्चा या पका दोनो अवस्थाओं में खा सकते हैं। कच्चा हो या पका पपीता के औषधीय गुणों के कारण ये कई बीमारियों के लिए उपचारस्वरुप प्रयोग किया जाता है। इस पौधे के किसी भी भाग में हल्का खरोंच आने पर भी दूध जैसा पदार्थ निकलने लगता है, जिसको आक्षीर कहते है। पपीता में विटामिन ए, विटामिन सी, फाइबर, पोटाशियम, एनर्जी जैसे पौष्टिक तत्व होते हैं। जिसके कारण आयुर्वेद में पपीते के पत्ते, बीज, जड़ और फल सबका रोगों के उपचार के तौर पर प्रयोग  किया जाता है। पपीता का मूल रूप से दक्षिण अमेरिका से आया है। 400 वर्ष पूर्व पोर्तुगीज लोगों के द्वारा यह भारत में लाया गया। मालूम होता है पहले यह दक्षिण भारत के केरल देश में आया है। केरल निवासी इसे कप्पकाय‘ कहते हैं। कप्पकाय का शब्दार्थ जहाज से आया हुआ फल है, अत: अनुमान किया जाता है कि यह भारतीय फल नहीं है। यह शायद पहले जहाज से केरल के किनारे उतारा गया था। इसीलिए अभी भी केरल देश में इसकी विशेष ...

खीरा (Cucumber)

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     प्रायः खीरा का सेवन सलाद के रूप में किया जाता है लेकिन इसके अलावा भी खीरा का इस्तेमाल कई तरह के व्यंजन बनाने के लिए किया जाता है। खीरा पचने में भारी, पित्त को शांत करने वाला, कफ और वात को बढ़ाने वाला, मूत्र रोग में फायदेमंद होता है। यह मोटापा कम करने और पीलिया रोग को ठीक करने का काम आता है। पथरी को गलाता है। उलटी को रोकता है। इसके बीज समान गुण वाले ही होते हैं। आकार तथा रंग-रूप के आधार पर खीरा की कई प्रजातियां होती हैं। इसकी फैलने वाली और पेड़ों पर चढ़ने वाली लता होती है। खीरे का ही एक और प्रकार अफ्रीका मूल का है जिसका नाम है बालम खीरा जो दिखने में और गुणों भी खीरे के जैसा ही होता है। खीरा के उपयोग खीरे को पीसकर आंखों के बाहर चारों तरफ लेप लगाने से आंखों के बाहर होने वाले काले धब्बे मिटते हैं। खीरे के टुकड़ों को भी आँख पर रखने से आँखों को ठंडक मिलती है। खीरे के पत्तों का काढ़ा बनायें। 10-20 मि.ली. काढ़े में आधा ग्राम जीरा चूर्ण मिलाकर सेवन करने से गले के रोगों में लाभ होता है। पेशाब करने में तकलीफ होने पर रोगी भोजन में खीरे का सेवन करें। इससे लाभ होता है। ख...

टमाटर (Tomato)

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     लाल टमाटर ऊँचा, सीधा, विशेष गंधवाला, कंटकरहित, शाकीय पौधा होता है। इसके पत्ते असमान रुप से किनारों पर कटे हुए, आगे की तरफ नोंकदार तथा हरे रंग के होते हैं। इसके फूल पीले रंग के लगभग 1.6 सेमी व्यास या डाइमीटर के होते हैं।   इसके फल कच्ची अवस्था में हरे रंग के, पक्वे अवस्था में लाल रंग के, मांसल, 1.3-6 सेमी व्यास के गोल, चमकदार होते हैं। बीज चपटा, गोलाकार तथा वृक्काकार होते हैं। यह सितम्बर से मार्च महीने तक ज्यादा फलता-फूलता है। लाल टमाटर खाने को स्वादिष्ट बनाने के साथ-साथ शक्ति भी प्रदान करता है। टमाटर का फल अम्ल यानि एसिडिक प्रकृति का , मधुर, खाना को जल्दी हजम करने में सहायक, शक्ति बढ़ाने वाला, पूयरोधी या एन्टीसेप्टिक, रक्त को शुद्ध करने वाला तथा उत्तेजक होता है। टमाटर के  उपयोग  ठंड लगने पर यदि गले में दर्द हुआ है तो लाल टमाटर के फल का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पीने से मुख तथा गले की सूजन में लाभ मिलता है। टमाटर के रस में पानी मिलाकर गरारा करने से मसूड़ों से होने वाला ब्लीडिंग कम होता है। 10-15 मिली टमाटर फल के रस या टमाटर का सूप...

धामार्गव (Sponge gourd)

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     लम्बी, विस्तार से फैलने वाली, आरोही, शाकीय लता होती है।समस्त भारत में इसका प्रयोग शाक के रूप में किया जाता है। चरक, सुश्रुत आदि संहिताओं में वामक तथा ऊर्ध्वभागहर द्रव्यों में इसकी गणना की गई है। भारत में मुख्यत गुजरात, उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, आंध्र-प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिमी बंगाल एवं असम में इसकी खेती की जाती है। धामार्गव के उपयोग अभिष्यंद-नेनुआ के ताजे पत्र-स्वरस को नेत्र में अंजन करने से नेत्राभिष्यंद (आँख का आना) में लाभ होता है। काण्ड से प्राप्त 125 मिग्रा शुद्ध सार को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से श्वसनतंत्रगत-विकारों में लाभ होता है। हृदय रोग-घियातोरई के 1-2 ग्राम फल चूर्ण को शहद के साथ सेवन करने से हृद्रोगों में लाभ होता है। हृद्दाह-जीवक, ऋषभक, क्षीरकाकोली, केवाँच बीज, शतावरी, काकोली, श्रावणी, मेदा, महामेदा, धामार्गव अथवा मुलेठी, किसी भी एक के सूक्ष्म चूर्ण (1-2 ग्राम) को मधु तथा शर्करा के साथ सेवन कर गुनगुने जल का अनुपान लेने से हृदयगत दाह तथा कास रोग का निवारण होता है। ग्रन्थि (बद गांठ)-घियातोरई के फल अथवा पत्र-स्वरस में गुड़,...

दूधी (Thyme leaved spurge)

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     निचली पहाड़ियों पर तथा मैदानी भागों में दूधी के स्वयंजात प्रसरण शील पौधे पाए जाते हैं। दूधी की एक अन्य प्रजाति पाई जाती है जिसे बड़ी दूधी (Euphorbia hirta Linn.) कहते हैं। रंग-भेद से छोटी दूधी भी सफेद तथा लाल दो प्रकार की होती है। दूधी की कोमल शाखाओं को तोड़ने से सफेद दूध जैसा पदार्थ (आक्षीर) निकलता है। मुख्यतया दुग्धी की चार प्रजातियां होती हैं। जिनका प्रयोग चिकित्सा के लिए किया जाता है। दुग्धिका (Euphorbia thymifolia Linn.) दुग्धिका लघु पीत (Euphorbia heyneana Spreng.) लघु दुग्धिका रक्त (Euphorbia hypericifolia Linn.)      यह 15-30 सेमी ऊँचा, कदाचित् कृश, स्थूल, सीधा, अरोमश अथवा रोमश, आरोही अथवा उच्चाग्र भूशायी, वर्षायु शाकीय पौधा है। इसके पत्र सरल, विपरीत, 1.3-2.5 सेमी लम्बे, भालाकार तथा झालरदार होते हैं। इसके पुष्प 1.75 मिमी लम्बे होते हैं। इसके फल गोलाकार होते हैं। इसके बीज चिकने अथवा चौड़े अनुप्रस्थ गर्तयुक्त, असमान्य रूप से दंतुर एवं झुर्रीदार तथा शुष्कावस्था में नील वर्ण के होते हैं। दूधी के उपयोग गंजापन-छोटी दूधी पञ्चाङ्ग के स्वरस तथ...

दुग्धिका (Thyme leaved spurge)

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     यह समस्त भारत के उष्ण प्रदेशों में सड़कों के किनारों तथा बेकार पड़ी भूमि पर पाई जाती है। यह 15-50 सेमी तक ऊँचा, सीधा अथवा भूस्तारी, तनु, विसरित, पीताभ दृढ़ रोमयुक्त, वर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसकी शाखाएँ प्राय चतुष्कोणीय, गोलाकार, पीतवर्णी घन रोमों से आवरित होती हैं। इसके पत्र सरल, विपरीत, 1.3-3.8 सेमी लम्बे, भालाकार, ऊर्ध्व-पृष्ठ पर हरित वर्ण के, अधपृष्ठ पर पाण्डुर, तीक्ष्ण अथवा गोलाकार होते हैं। इसके पुष्प हरिताभ-पीत वर्ण के छोटे होते हैं। इसकी फली 1.25 मिमी व्यास की, त्रिखण्डीय होती हैं। बीज 0.8 मिमी लम्बे, हल्के, रक्ताभ-भूरे वर्ण के, अनुप्रस्थ दिशा में झुर्रीदार, अण्डाकार-त्रिकोणीय होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल वर्ष पर्यंत मुख्यत अगस्त से नवम्बर तक होता है। दुग्धिका के उपयोग सिर की गंज (खालित्य)-सफेद बालों को उखाड़कर, बालों के मूल में, दूध से पीसी हुई दुग्धिका कल्क को लगाने से सिर की गंज मिटती है। शिर शूल-इसके आक्षीर को मस्तक में लगाने से शिरशूल का शमन होता है तथा मुँह पर लगाने से मुहासे तथा दाद पर लगाने से दाद का शमन होता है। नेत्रविकार-बड़ी दुग्...

परदेशी लांगली (Mexican daisy)

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     समस्त भारत में लगभग 2400 मी की ऊँचाई पर यह खरपतवार के रूप में पाया जाता है। यह 60 सेमी ऊँचा, दृढरोमी, भूशायी, शाकीय पौधा है। इसके पत्र अण्डाकार, 2-7 सेमी लम्बे एवं 1-4 सेमी चौड़े होते हैं। इसके पुष्प छोटे तथा पीत वर्ण के होते हैं। भृंगराज के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है। यह पौधा देश के सभी प्रान्तों में विशेषतया दक्षिणी भारत, उत्तरी भारत, बंगाल, आसाम तथा हिमालयी क्षेत्रों में 5000 फिट की ऊँचाई तक पाया जाता है। परम्परागत चिकित्सा करने वाले लोग रक्तरोधक के रूप में इसका प्रयोग करते हैं। खेतों व जंगलों में काम करने वाले लोगों को यदि क्षत या व्रण हो जाए तथा रक्त निकलने लगे तो वह इसके स्वरस को या इसके पत्तों को पीसकर व्रण पर लगा लेते हैं इससे रक्त रूक जाता है तथा व्रण का शोधन व रोपण भी शीघ्र हो जाता है। इतना गुणकारी पौधा होते हुए भी शात्रों में इसका वर्णन प्राप्त नहीं होता यह बहुत ही विस्मित करने वाली बात है। जब हमने इसके औषधीय गुणों व प्रयोगों के संदर्भ में जानकारी संग्रहित करने का प्रयत्न किया तो कई विचित्र जानकारियां प्राप्त हुई जिनमें विशेषकर स्वामी ओमानन्द जी गुर...

पर्णबीज (Air plant)

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     यह बहुवर्षायु पौधा होता है। यह वनस्पति भारत के उष्णकटिबंधीय मैदानी भागों पाई जाती है। पर्णबीज के अतिरिक्त इसकी एक प्रजाति और पाई जाती है, जिसे जख्में हयात कहते हैं। कई स्थानों पर पाषाणभेद के स्थान पर इसका प्रयोग किया जाता है। इसके पत्र अतिसार में अत्यन्त उपयोगी होते हैं। पर्णबीज (Bryophyllum pinnatum (Lam.) Oken.) यह लगभग 1.2 मी ऊँचा, मांसल, अरोमश, बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसका काण्ड ऊँचा, सीधा तथा 4-कोणीय होता है, पुराने काण्ड हलके वर्ण के तथा नवीन काण्ड रक्ताभ-श्वेत वर्ण के होते हैं। जख्मे हयात् (Kalanchoe integra (Medik.) Kuntze) यह 30-120 सेमी ऊँचा, मोटा, बृहत्, सीधा, मांसल, बहुवर्षायु शाकीय पौधा होता है। इसका काण्ड कुंठाग्र चतुष्कोणीय तथा नवीन शाखाएँ रक्ताभ-श्वेत वर्ण की होती हैं। पर्णबीज के उपयोग शिरोवेदना-पर्णबीज के पत्रों को पीसकर सिर पर लेप करने से शिरोवेदना में लाभ होता है। नेत्रपीड़ा-पर्णबीज पत्र-स्वरस को आँख के चारों ओर लेप करने से नेत्र पीड़ा में लाभ होता है। नकसीर-1-2 बूँद पर्णबीज पत्र-स्वरस को नाक में डालने से नकसीर बंद हो जाती है। दमा-...

पुनर्नवा (Hogweed)

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     पुनर्नवा का बहुवर्षायु शाक भारतवर्ष में वर्षा ऋतु में सब जगह उत्पन्न होता है। इसकी दो जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है। इसका कांड पत्र एवं पुष्प सभी रक्त वर्ण के होते हैं। फलों के पक जाने पर वायवीय भाग सूख जाता है, परंतु मूल भूमि में पड़ी रहती है, जो वर्षा ऋतु में फिर से उग आती है। इसलिए इसका नाम पुनर्नवा है। यह समस्त भारत में 2400 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। पुनर्नवा का प्रयोग चरक में स्वेदोपग रूप में ज्वर-विरेचन में किया गया है। सुश्रुत ने शाकवर्ग में वर्षाभू और पुनर्नवा का उल्लेख किया है। निघण्टु ग्रन्थों में पुनर्नवा को रसायन, मूत्रल, शोथघ्न, स्वेदल, नेत्र्य एवं शोथघ्न रूप में बाह्य प्रयोगार्थ उपयोगी बताया गया है। रक्त पुनर्नवा की मूल श्वेत मूल पुनर्नवा की अपेक्षा कम मोटी, किन्तु लम्बाई में अधिक, बीच से टूट जाने वाली ऊपर की ओर मोटी तथा नीचे की ओर पतली व अनेक उपमूलों से युक्त होती है। मूल को तोड़ने से दूध जैसा गाढ़ा रस निकलता है। मूल स्वाद में कड़वी तथा उग्रगन्धी होती है। पुनर्नवा के...