बाँस (Bamboo)
बाँस, एक अत्यंत उपयोगी घास है, जो भारत के प्रत्येक क्षेत्र में पाई जाती है। बाँस एक सामूहिक शब्द है, जिसमें अनेक जातियाँ सम्मिलित हैं। इसके लगभग २४ वंश भारत में पाए जाते हैं।इसके परिवार के अन्य महत्वपूर्ण सदस्य दूब, गेहूँ, मक्का, जौ और धान हैं। यह पृथ्वी पर सबसे तेज बढ़ने वाला काष्ठीय पौधा है। इसकी कुछ प्रजातियाँ एक दिन (२४ घंटे) में १२१ सेंटीमीटर (४७.६ इंच) तक बढ़ जाती हैं। थोड़े समय के लिए ही सही पर कभी-कभी तो इसके बढ़ने की रफ्तार १ मीटर (३९ मीटर) प्रति घंटा तक पहुँच जाती है। यह पौधा अपने जीवन में एक बार ही फल धारण करता है। फूल सफेद आता है। पश्चिमी एशिया एवं दक्षिण-पश्चिमी एशिया में बाँस एक महत्वपूर्ण पौधा है। इसका आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। इससे घर तो बनाए ही जाते हैं, यह भोजन का भी स्रोत है। सौ ग्राम बाँस के बीज में ६०.३६ ग्राम कार्बोहाइड्रेट और २६५.६ किलो कैलोरी ऊर्जा रहती है। इतने अधिक कार्बोहाइड्रेट और इतनी अधिक ऊर्जा वाला कोई भी पदार्थ स्वास्थ्यवर्धक अवश्य होगा। बाँस का पेड़ अन्य पेड़ों की अपेक्षा ३० प्रतिशत अधिक ऑक्सीजन छोड़ता और कार्बन डाईऑक्साइड खींचता है साथ ही यह पीपल के पेड़ की तरह दिन में कार्बन डाईऑक्साइड खींचता है और रात में आक्सीजन छोड़ता है। कागज बनाने के लिए बाँस उपयोगी साधन है, जिससे बहुत ही कम देखभाल के साथ-साथ बहुत अधिक मात्रा में कागज बनाया जा सकता है। इस क्रिया में बहुत सी कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। फिर भी बाँस का कागज बनाना चीन एवं भारत का प्राचीन उद्योग है। बांस में मैग्निशियम, सोडियम, जिंक, कॉपर, पोटाशियम, फॉस्फोरस होने के कारण ये आयुर्वेद में इसको औषधी के रूप में प्रयोग किया जाता है।

बांस का उपयोग
- 10 मिली बांस के जड़ के रस में 500 मिग्रा कर्पूर मिलाकर, 1-2 बूंद नाक में डालने से आधासीसी का दर्द कम होता है।
- चौलाई की जड़, अंकोल फल, लहसुन, अदरक तथा वंश आदि द्रव्यों को पीसकर पेस्ट बना लें। फिर उसको सर्पि, तेल, वसा या फैट, मज्जा इन चार प्रकार के स्नेहों में या दही को, तक्र, सुरा, चुक्र आदि के रस में पकाकर 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द कम होता है।
- बांस के कल्क को बकरी तथा भेड़ के पेशाब या घी अथवा तेल में पकाकर, छानकर 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द कम होता है।
- वंशलोचन को शहद में मिलाकर मुंह में लेप करने से मुंह के छाले मिटते हैं।
- बांस के पत्ते का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने व गरारे करने से फुफ्फुस का सूजन, खांसी या गले का दर्द कम होता है।
- वंशलोचन चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से कफ निकलता है तथा सूखी खांसी मिटती है।
- बांस के पत्तों, अंकुरों या तना का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से अतिसार या दस्त आंत्रकृमि या उल्टी में लाभ होता है।
- बवासीर के मस्सों की मालिश कर, वंशपत्र आदि के काढ़े से मस्सों से धोने पर पाइल्स का दर्द कम होता है।
- वंश यव से बने खाद्य पदार्थों का सेवन डायबिटीज को कंट्रोल करने में मदद करता है।
- वंश की जड़ का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से बिन्दुमूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
- गोखरू, वंशलोचन तथा मिश्री से बने 2-4 ग्राम चूर्ण को कच्चे दूध के साथ खिलाने से मूत्रजलन की बीमारी से राहत मिलती है।
- 25 ग्राम वंशपत्र तथा 50 ग्राम शतपुष्पा (सोआ) को मिलाकर काढ़ा बनाकर इसमें गुड़ मिला कर पीने से मासिक-धर्म संबंधी कष्ट कम होता है।
- वंश के पत्ते तथा जड़ को पीसकर लेप करने से कुष्ठ, त्वचा विकारों या रोगों तथा दाद से राहत मिलती है।
- बांस के पत्तों का काढ़ा बनाकर प्रभावित स्थान को धोने से घाव तथा सूजन में लाभ मिलता है।
- वंश के अंकुरों को पीसकर लेप करने से घाव तथा सूजन में लाभ होता है।
- वंशलोचन तथा गिलोय सत् को शहद में मिलाकर चटाने से जीर्ण ज्वर (पुराना ज्वर) कम होता है।
- बांस के कोमल अंकुर, आंवला, कपित्थ, सोंठ, मरिच, पीपल, वचा, कूठ आदि द्रव्यों को लेकर चूर्ण बनाकर लेप, नाक से लेने पर एवं काढ़े के रुप में प्रयोग करने से मकड़ी, चूहा, सांप के काटने आदि के विषाक्त प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
- बांस के कोमल अंकुर, कुटकी, पाटला बीज, सोंठ, शिरीष आदि द्रव्यों को गोमूत्र के साथ पीसकर छानकर पीने तथा, 1-2 बूंद नाक में डालने व अञ्जन आदि के लिए प्रयोग करने से गोनस सर्प का काटने पर विष के प्रभाव को कम करने में सहायता मिलती है।
- छोटी छोटी टहनियों तथा पत्तियों को डालकर उबाला गया पानी, बच्चा होने के बाद पेट की सफाई के लिए जानवरों को दिया जाता है।
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