हरीतकी (Myrobalan)

     हरीतकी एक ऊँचा वृक्ष होता है एवं भारत में विशेषतः निचले हिमालय क्षेत्र में रावी तट से लेकर पूर्व बंगाल-आसाम तक पाँच हजार फीट की ऊँचाई पर पाया जाता है। हिन्दी में इसे 'हरड़' और 'हर्रे' भी कहते हैं। आयुर्वेद ने इसे अमृता, प्राणदा, कायस्था, विजया, मेध्या आदि नामों से जाना जाता है। हरड़ का वृक्ष 60 से 80 फुट तक ऊँचा होता है।दो प्रकार के हरड़ बाजार में मिलते हैं - बड़ी और छोटी। बड़ी में पत्थर के समान सख्त गुठली होती है, छोटी में कोई गुठली नहीं होती, वैसे फल जो गुठली पैदा होने से पहले ही पेड़ से गिर जाते हैं या तोड़कर सुखा लिया जाते हैं उन्हें छोटी हरड़ कहते हैं। आयुर्वेद के जानकार छोटी हरड़ का उपयोग अधिक निरापद मानते हैं क्योंकि आँतों पर उनका प्रभाव सौम्य होता है, तीव्र नहीं। इसके अतिरिक्त वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार हरड़ के 3 भेद और किए जा सकते हैं- पक्व फल या बड़ी हरड़, अर्धपक्व फल पीली हरड़ (इसका गूदा काफी मोटा स्वाद में कसैला होता है।) अपक्व फल जिसे ऊपर छोटी हरड़ नाम से बताया गया है। इसका वर्ण भूरा-काला तथा आकार में यह छोटी होती है। यह गंधहीन व स्वाद में तीखी होती है।
     औषधि प्रयोग हेतु फल ही प्रयुक्त होते हैं एवं उनमें भी डेढ़ तोले से अधिक भार वाली भरी हुई, छिद्र रहित छोटी गुठली व बड़े खोल वाली हरड़ उत्तम मानी जाती है। भाव प्रकाश निघण्टु के अनुसार जो हरड़ जल में डूब जाए वह उत्तम है।

हरीतकी एक प्रभावी औषधि भी है| इसके गुणों का लाभ लेने के लिए विभिन्न ऋतुओं में ही इसका सेवन करना चाहिए:-

वर्षा ऋतु में सेंधा नमक के साथ।शरद ऋतु में शकर के साथ।हेमंत ऋतु में सोंठ के साथ।शिशिर ऋतु में पीपल के साथ।वसंत ऋतु में शहद के साथ।

हरीतकी का उपयोग 

  1. हरड़ की गुठली को पानी के साथ पीस कर सिर में लेप लगाने से आधा सिर दर्द से छुटकारा दिलाने में फायदेमंद होता है।
  2. आम बीज चूर्ण और छोटी हरीतकी चूर्ण को समान मात्रा में लेकर दूध में पीसकर सिर पर लगाने से रूसी कम हो जाती है
  3. हरड़ को रातभर पानी में भिगोकर सुबह पानी को छानकर आँखें धोने से आंखों को शीतलता मिलती है तथा आँख संबंधी बीमारियों से राहत मिलती है। 
  4. हरड़ की मींगी को पानी में 3 पहर तक भिगोकर, घिसकर लगाने से मोतियाबिन्द में लाभ होता है।
  5. हरड़ की छाल को पीसकर लगाने से आँखों से पानी का बहना बन्द होता है।
  6. सभी प्रकार के रोगों में हरीतकी को घी में भूनकर आँखों के चारों ओर बाहर के भाग में लेप लगाया जाता है।
  7. भोजन करने के पहले प्रतिदिन 3 ग्राम हरीतकी  चूर्ण तथा 3 ग्राम मुनक्का पेस्ट को मिश्री, चीनी या मधु मिलाकर खाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है।
  8. हरड़ की मींगी को पानी में 3 पहर तक भिगोकर, घिसकर लगाने से मोतियाबिन्द में लाभ होता है।
  9. हरड़ की छाल को पीसकर लगाने से आँखों से पानी का बहना बन्द होता है।
  10. सभी प्रकार के रोगों में हरीतकी को घी में भूनकर आँखों के चारों ओर बाहर के भाग में लेप लगाया जाता है।
  11. भोजन करने के पहले प्रतिदिन 3 ग्राम हरीतकी  चूर्ण तथा 3 ग्राम मुनक्का पेस्ट को मिश्री, चीनी या मधु मिलाकर खाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है।
  12.  20-40 मिली हरीतकी के काढ़े में 3 से 12 मिली मधु मिलाकर पिलाने से गले के दर्द में आराम  मिलता है।
  13. हरीतकी के चूर्ण का मंजन करने से दांत साफ और निरोग हो जाते हैं।
  14. 10 ग्राम हरड़ को आधा ली पानी में उबालकर चतुर्थांश काढ़े में थोड़ी सी फिटकरी घोलकर गरारा करने से जल्दी ही मुँह और गले से होनी वाली ब्लीडिंग बंद हो जाती है।
  15. हरड़, अडूसा की पत्ती, मुनक्का, छोटी इलायची, इन सबसे बने 10-30 मिली काढ़े में मधु और चीनी मिलाकर दिन में तीन बार पीने से सांस फूलना, खांसी और रक्तपित्त रोग (नाक और कान से खून बहना) में लाभ होता है।
  16. हरड़ और सोंठ को समान भाग लेकर चूर्ण बनाएं, इसे गुनगुने जल के साथ 2-5 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम सेवन करने से खांसी, सांस फूलना और कामला (पीलिया) में लाभ होता है।
  17.  3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण में बराबर मिश्री मिलाकर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से पाचन-शक्ति बढ़ती है। 
  18.  2-4 ग्राम हरड़ के चूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन करने से उल्टी बंद होती है। 
  19. 2 ग्राम हरड़ तथा 1 ग्राम सोंठ को गुड़ अथवा 250 मिग्रा सेंधानमक के साथ मिलाकर सेवन करने से भूख बढ़ती है।
  20. हरड़ का मुरब्बा खाने की इच्छा बढ़ाती  है। 
  21.  हरड़, सोंठ तथा सेंधानमक के 2-5 ग्राम चूर्ण को ठंडे जल के साथ सेवन करें, परन्तु दोपहर और शाम भोजन थोड़ी मात्रा में खाएं।
  22. हरड़,  पिप्पली तथा चित्रक को समान मात्रा में लेकर मिश्रण बना लें। 1 से 2 ग्राम की मात्रा में जल के साथ सेवन करने से खाने की इच्छा बढ़ने लगती  है।
  23. जिस रोगी को अतिसार हो अथवा थोड़ा-थोड़ा, रुक-रुक कर दर्द के साथ मल निकलता हो उसे बड़ी हरड़ तथा पिप्पली के 2-5 ग्राम चूर्ण को सुहाते (गुनगुने) गर्म जल के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है। 
  24. हरड़, सनाय और गुलाब के गुलकन्द की गोलियां बनाकर खाने से कब्ज की परेशानी कम होती है।
  25. हरड़ और साढे तीन ग्राम दालचीनी या लौंग को 100 मिली जल में 10 मिनट तक उबालकर, छानकर सुबह पिलाने से विरेचन (पेट साफ) हो जाता है।
  26. हरीतकी का काढ़ा बनाकर पाइल्स के मस्सों को धोने से लाभ होता है। 
  27. लौह भस्म, हरड़ तथा हल्दी को समान मात्रा में मिलाकर 500 मिग्रा से 1 ग्राम मात्रा में लेकर घी एवं मधु से अथवा केवल 1 ग्राम हरड़ को गुड़ और मधु के साथ मिलाकर दिन में दो से तीन बार सेवन करने से कामला में लाभ होता है।
  28.  हरीतकी, गोखरू, धान्यक, यवासा तथा पाषाण-भेद को समान मात्रा में लेकर 500 मिली जल में उबालें, 250 मिली रहने पर उतार लें। अब इस काढ़े में मधु मिलाकर सुबह, दोपहर तथा शाम 10-30 मिली मात्रा में सेवन करने से मूत्र त्याग में कठिनाई, मूत्र मार्ग की जलन आदि रोगों में लाभ होता है।
  29. 2-5 ग्राम हरीतकी चूर्ण को 1 चम्मच मधु के साथ सुबह-शाम सेवन करने से डायबिटीज में लाभ होता है।
  30. 5 ग्राम हरड़ तथा 1 ग्राम बनाएं को 50 मिली एरंड तेल और 50 मिली गोमूत्र में पकायें।जब सिर्फ तेल शेष रह जाय तो छानकर, गुनगुने गर्म जल के साथ सुबह शाम थोड़ी-थोड़ी मात्रा में लेने से हाइड्रोसील कम होने में मदद मिलती है।
  31.  10-20 मिली त्रिफला के काढ़े  में 10 मिली गोमूत्र डालकर पीने से वात कफ से  के कारण टेस्टीस में  जो सूजन होता है उससे राहत मिलती है।
  32. 10 ग्राम हरड़ को 50 मिली एरंड के तेल में पकाकर 6 दिन पीने से हाथी पाँव रोग में लाभ होता है।
  33.  हरीतकी के काढ़े से घाव को धोने से घाव जल्दी भरता है।
  34. हरड़ की 1-2 ग्राम भस्म को 5-10 ग्राम मक्खन में मिलाकर व्रण (घाव) पर लेप करने से शीघ्र घाव सूखा जाता है।
  35. 20-50 मिली गोमूत्र को 3-6 ग्राम हरड़ चूर्ण के साथ सुबह शाम सेवन करने से फायदा मिलता है।
  36. हरड़, गुड़, तिल तैल, मिर्च, सोंठ तथा पीपल को समान मात्रा में पीसकर 2-4 ग्राम की मात्रा में लेकर एक महीने तक सुबह शाम सेवन करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
  37.  हरड़ के काढ़ा से पके हुए घी का सेवन करने से मद और बेहोशी मिटती है।
  38. 3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण में 1 मिली तिल तेल, 1 ग्राम घी तथा 2 ग्राम मधु मिलाकर सेवन करने से जलन, बुखार,खाँसी, नाक और कान से खून बहना, सांस फूलना तथा उल्टी आदि के परेशानी से राहत मिलती है।
  39. 25 मिली मुनक्के के काढ़े में 3 ग्राम हरीतकी चूर्ण मिलाकर सुबह शाम पीने से बुखार से राहत मिलती है।
  40. 3 से 6 ग्राम हरीतकी चूर्ण का सेवन करने से बुखार के लक्षणों से राहत मिलती है।
  41. 5 ग्राम षट्पल घी को 10-30 मिली हरीतकी काढ़े के साथ सेवन करने से मलेरिया रोग में लाभ होता है।
  42. 3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण को वासा का रस, समान भाग पिप्पली का चूर्ण तथा द्विगुण मधु में मिलाकर सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है। हरड़ के फायदे का सही तरह से लाभ उठाने के लिए सही प्रकार से चूर्ण बनाने की ज़रूरत होती है।
  43. 3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से रक्तपित्त, मलेरिया तथा दर्द से मुक्ति मिलती है।
  44. 3-6 ग्राम हरीतकी चूर्ण को समान भाग किशमिश के साथ सुबह शाम सेवन करने से रक्तपित्त, खुजली,  पुराना बुखार आदि से राहत मिलने में मदद मिलती है।
  45. सूजन से पीड़ित व्यक्ति को यदि सख्त मलत्याग हो रहा हो तो हरीतकी चूर्ण  में समान मात्रा में गुड़ मिलाकर (प्रत्येक 2-2 ग्राम) खाना चाहिए।
  46. गोमूत्र के साथ केवल हरीतकी चूर्ण का सेवन करने से भी सूजन कम होती है। 
  47. 2-4 ग्राम कंसहरीतकी का सुबह शाम सेवन करने से सूजन तथा दर्द से राहत मिलती है।
  48. हरीतकी, सोंठ तथा देवदारु चूर्ण को समान मात्रा में लेकर या त्रिसमा गुटिका (हरीतकी, सोंठ, गुड़ समभाग) को गुनगुने गर्म पानी के साथ सेवन करने से शोथ (सूजन) दूर होती है।
  49.  2-5 ग्राम हरीतकी चूर्ण में गुड़ मिलाकर सेवन करने से सूजन में लाभ होता है।
  50. हरड़, सोंठ और हल्दी को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बनाकर 10-30 मिली की मात्रा में सुबह-शाम पीने से बुखार के बाद जो सूजन की परेशानी होती है उसमें फायदा पहुँचता है।
  51. अगर शरीर में घाव हो जांए हरड़ से उस घाव को भर देना चाहिए।


          • अधिक चलने से थका हुआ व्यक्ति, कमजोर, जिसके पित्त अधिक हो और गर्भवती नारी को हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिए। ऐसे अवस्था में लेने से हरड़ से नुकसान पहुँच सकता है। 
          • अजीर्ण के रोगी, रूखे पदार्थों को खाने वाले, अधिक मैथुन करने वाले, शराब पीने वाले, भूख, प्यास तथा गर्मी से पीड़ित व्यक्तियों को हरीतकी का सेवन नहीं करना चाहिए।

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