नील (Indigo)

     नील एक पादप है। यही नील रंजक का मूल प्राकृतिक स्रोत था। यह एशिया और अफ्रीका के उष्ण तथा शीतोष्ण क्षेत्रों में पैदा होता है। आजकल अधिकांश रंजक संश्लेषण द्वारा कृत्रिम रूप से बनाए जाते हैं न कि इस पौधे से प्राप्त किये जाते हैं। नील के अलावा इस पादप का उपयोग मृदा को उपजाऊ बनाने के लिए भी किया जाता है। कुछ प्रकार के नील अफीम नाम से जाने जाते हैं। ब्रिटिश शासन में भारत में इनकी खेती की जाती थी। भारत में अंग्रेजी शासनकाल में अंग्रेजों द्वारा इसकी जबरन खेती कराने को लेकर किसानों ने कई आन्दोलन तक किये। इस पौधे की पत्तियों के प्रसंस्करण से नील रंजक प्राप्त किया जाता है।नील प्रकृति से कड़वा, तीखा, गर्म, लघु, रूखा, तीक्ष्ण, कफवात से आराम दिलाने वाला, तथा बालों के लिए हितकर होता है।

नील के  उपयोग

  1. समान मात्रा में त्रिफला (आँवला, हरीतकी, बहेड़ा), नील के पत्ते, लौहभस्म तथा भृङ्गराज चूर्ण को अकेले या इसमें आम की गुठली का चूर्ण मिला कर, आरनाल या भेड़ के मूत्र से पीसकर बालों पर लेप करने से बाल सफेद नहीं होते हैं तथा बालों का झड़ना भी बंद हो जाता है।
  2. इसके अलावा कटसरैया, तुलसी, नील बीज, रक्तचन्दन, भल्लातक बीज आदि द्रव्यों को तिल तेल में पकाकर छानकर 1-2 बूंद तेल को नाक से लेने से तथा सिर पर मालिश करने से यह आँखों के लिए हितकर, आयुवर्धक तथा पलित रोग (असमय बाल सफेद होना) में लाभप्रद होता है।
  3. घाव जल्दी ठीक होने का नाम नहीं ले रहा है तो नीली जड़ के पेस्ट का लेप करने से घाव भर जाता है।
  4. दिन के तनाव से अगर आपको हर दिन सिरदर्द होता है तो नीली जड़, तना तथा पत्ते को पीसकर मस्तक पर लगाने से सिरदर्द से आराम मिलता है।
  5. नीली जड़ को चबाकर मुख में रखने से दाँत के कीड़े मर जाते हैं।
  6. नीली जड़, पत्ता तथा तने के चूर्ण (1-2 ग्राम) का सेवन करने से कफ का निसरण होकर सांस फूलना तथा जीर्ण (फेफड़ों में सूजन रोग) लंग्स के नलिका में सूजन, कुक्कुर खांसी या हूपिंग कफ, हृदय रोग में लाभ होता है।
  7. नीली बीज, जलवेतस, त्रिकटु, यवक्षार, सज्जीक्षार, पाँचों लवण (सैंधव, सामुद्र, सोंचर, विड, सांभर नमक) तथा चित्रकमूल के 2-6 ग्राम चूर्ण को घी में मिलाकर खाने से सभी प्रकार के पेट संबंधी रोग तथा गुल्म रोग से जल्दी आराम मिलता है।
  8. 5 ग्राम नीलिन्यादि घी को यवागू व मण्ड (जौ) के साथ सेवन करने से गुल्म, कोढ़, पेट का रोग, सूजन, खून की कमी, प्लीहा, उन्माद आदि रोगों से आराम मिलता है।
  9. 5 ग्राम त्र्यूषणादि घी में नीली-मूल चूर्ण मिलाकर सेवन करने से कब्ज से पीड़ित गुल्म रोगी के मल को ठीक करने में मदद करते हैं।
  10. नीली, निशोथ, दंती, हरीतकी, कम्पिल्लक, विड्नमक, यवक्षार तथा सोंठ से बने गाय के घी को 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से गुल्म रोगी का पूरा मलशोधन हो जाता है।
  11. 1-2 ग्राम नीलनी फल व जड़ के चूर्ण के सेवन से मल कोमल होकर कब्ज व लीवर के सूजन को कम करने में फायदेमंद होता है।
  12. बवासीर के मस्सों पर नीलनी पत्ते के पेस्ट को लगाने से अर्श में लाभ होता है।
  13. नीलनी जड़, तना एवं पत्ते से बने पेस्ट (1-2 ग्राम) एवं काढ़े (10-20 मिली) का सेवन करने से प्लीहा-विकारों से आराम मिलता है।
  14. 5-10 मिली पत्ते के काढ़े का सेवन करने से तथा पत्ते के काढ़े से योनि को धोने से योनिगत स्राव या वैजाइना के स्राव से आराम मिलता है।
  15. नील के बीजों को पीसकर जोड़ो पर लगाने से आमवात या गठिया के दर्द से आराम मिलता है।
  16. सुबह 1-2 ग्राम नीली मूल चूर्ण का सेवन दूध के साथ करने से तथा अजा दूध में मूल को घिसकर लेप व सेवन करने से विसर्प व मूत्र संबंधी समस्याओं में लाभ होता है।
  17. 5 मिली नीली पत्ते के रस का सेवन करने से अपस्मार या मिर्गी के कष्ट से आराम पाने में मदद मिलती है।
  18. 1-2 ग्राम नीली जड़ के पेस्ट को दूध के साथ सेवन करने से क्षयरोग (टी.बी.) में लाभ होता है।
  19. 1 ग्राम नीलीमूल चूर्ण को चावल के धोवन से पीसकर पीने से सांप के काटने पर उसके विष को असर को कम करने में मदद मिलती है।
  20. जिस जगह पर बिच्छु ने काटा हो उस स्थान पर पत्ते तथा जड़ के पेस्ट को पीसकर लेप करने से तथा 10-20 मिली काढ़े का सेवन करने से बिच्छु के विष के असर को कम करने में मदद मिलती है।

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