चिरायता (Swertia chirata)
चिरायता ऊँचाई पर पाया जाने वाला पौधा है। खुजली, रक्तविकार या त्वचा से संबंधित किसी तरह की बीमारी होती है तो अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि चिरायते का सेवन करो। चिरायता का स्वाद बहुत ही कड़वा होता है, लेकिन सच यह है कि जितना चिरायता का स्वाद कड़वा होता है उतना ही रोगों के इलाज में चिरायता से फायदे मिलते हैं।

चिरायता के उपयोग
- चिरायता के फल में पिप्पली पेस्ट और सौवीराञ्जन मिलाकर रख लें। एक सप्ताह के बाद मातुलुंग के रस में पीस लें। इसे रोजाना काजल की तरह लगाने से आंखों की बीमारी (पिष्टक) में लाभ होता है।
- चिरायता, कटुरोहिणी, सारिवा आदि का काढ़ा बना लें। इसे 15-30 मिली की मात्रा में सेवन करने से स्तनों का दूध शुद्ध होता है।
- केवल चिरायता का काढ़ा 15-30 मिली पीने से भी स्तनों के दूध की गुणवत्ता बढ़ती है।
- बराबर मात्रा में चिरायता, सोंठ तथा गुडूची के 15-30 मिली काढ़ा का सेवन करने से भी माताओं के स्तन के दूध की गुणवत्ता बढ़ती है।
- चिरायता का काढ़ा बना लें। इसे 20-30 मिली मात्रा में पिलाने से भूख बढ़ती है। इससे पाचन-शक्ति बढ़ती है।
- चिरायता, गुडूची, सुगन्धबाला, धनिया, पटोल आदि औषधियों का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से अत्यधिक प्यास लगने की परेशानी में लाभ होता है।
- चिरायता का काढ़ा बना लें। इसे 20-30 मिली की मात्रा में पिएं। इससे खांसी में लाभ होता है। इससे आंत में रहने वाले कीड़े खत्म होते हैं।
- सुबह भोजन के पहले (5-10 मिली) चिरायता के रस में मधु मिश्रित कर सेवन करने से आंत के कीड़े खत्म हो जाते हैं।
- 2-4 ग्राम चिरायता चूर्ण में दोगुना मधु मिला लें। इसका सेवन करने से पेचिश रोग ठीक होता है।
- बराबर-बराबर मात्रा में चिरायता, नागरमोथा, इन्द्रजौ तथा रसाञ्जन के चूर्ण (2-4 ग्राम) लें। आप इनकी जगह पेस्ट भी ले सकते हैं। इसमें मधु मिला लें। इसे चाट लें। इसके बाद चावल के धुले हुए पानी को पिएं। इससे पित्त विकार के कारण होने वाली दस्त पर रोक लगती है।
- 2-4 ग्राम बेल गिरी का चूर्ण खाकर ऊपर से चिरायते का काढ़ा पीने से दस्त में लाभ होता है।
- अडूसा, चिरायता, कुटकी, त्रिफला, गिलोय तथा नीम की छाल का काढ़ा बना लें। 15-20 मिली काढ़ा में मधु डालकर पिलाने से कामला तथा पाण्डु (पीलिया या एनीमिया) रोग में लाभ होता है।
- 1-2 ग्राम चंदन के पेस्ट के साथ 5 मिली चिरायता का रस मिला लें। इसका सेवन करने से आमाशय से रक्तस्राव की समस्या ठीक होती है।
- रोजाना सुबह खाली पेट, चिरायता हिम (10-30 मिली) अथवा काढ़ा का सेवन करने से पाचन-क्रिया ठीक होती है। इससे शरीर स्वस्थ रहता है।
- चिरायता तथा एरण्ड की जड़ को बराबर मात्रा में मिलाकर काढ़ा बना लें। इसे 10-30 मिली मात्रा में पिलाने से पेट के दर्द से आराम मिलता है।
- चिरायता काढ़े का सेवन करने से लिवर की सूजन ठीक होती है।
- बराबर मात्रा में दारुहल्दी, चिरायता, नागरमोथा तथा धमासा के चूर्ण (2-4 ग्राम) का सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ हाता है।
- चिरायता, सोंठ, धन्वयास, कुंदन आदि द्रव्यों से काढ़ा बना लें। काढ़ा को 10-30 मिली की मात्रा में सेवन करें। इससे कफज विकार के कारण होने वाली रक्तार्श (खूनी बवासीर) में लाभ होता है।
- बराबर-बराबर मात्रा में चिरायता, लोध्र, चन्दन, दुरालभा, सोंठ, कमल लें। इसके साथ ही केशर, नीलकमल, बहेड़ा, मुलेठी तथा नागकेशर लें। इनका चूर्ण बना लें। इसे 25 ग्राम की मात्रा में लेकर 200 मिली जल में पका लें। जब काढ़ा एक चौथाई बच जाए तो इसे 5-10 मिली मात्रा में पीने से विसर्प रोग (त्वचा रोग) में लाभ होता है।
- चिरायता तथा धनिया के हरे पत्तों से काढ़ा बना लें। इसे (10-20 मिली) की मात्रा में पीने से बुखार में शीघ्र लाभ होता है।
- बराबर-बराबर मात्रा में चिरायता, नागरमोथा, गुडूची तथा सोंठ के काढ़े का सेवन करें। इससे बुखार, अत्यधिक प्यास, भूख की कमी, बुखार एवं मुंह का स्वाद ठीक होता है।
- बराबर मात्रा में चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, पित्तपापड़ा तथा गुडूची का काढ़ा बना लें। 10-30 मिली मात्रा में रोजाना सेवन करने से बार-बार आने वाला बुखार ठीक होता है।
- बराबर मात्रा में चिरायता, गुडूची, द्राक्षा, आँवला तथा कचूर के (10-30 मिली) काढ़े में गुड़ मिलाकर पिएं। इससे वात-पित्त विकार के कारण होने वाले बुखार में लाभ होता है।
- 750 ग्राम चिरायता चूर्ण तथा 50 ग्राम साबुत पिप्पली को चार गुने जल में तब तक उबालें, जब तक कि पूरा जल सूख न जाए। बचे हुए पिप्पली को छाया में सुखा लें। इसे चूर्ण बनाकर 1-2 ग्राम मात्रा में मधु के साथ सेवन करने से बुखार में लाभ होता है।
- 2-4 ग्राम चिरायता चूर्ण में मधु मिलाकर खाने से सभी प्रकार का बुखार का ठीक होता है।
- बराबर मात्रा में चिरायता, नीम, गुडूची, त्रिफला तथा आमाहल्दी के (20-30 मिली) काढ़े का सेवन करें। इससे पित्तज दोष के कारण आने वाला बुखार, आंतों के कीड़े, दाह, तथा त्वचा की बीमारियों में लाभ होता है।
- चिरायता, नीमगिलोय, देवदारु, हरड़, पीपर, हल्दी, दारुहल्दी, हरड़, बहेड़ा, आँवला, करंज के बीज की मज्जा लें। इसके साथ ही सोंठ, काली मिर्च, पीपर, प्रियंगु, रास्ना, अर्कमूलत्वक्, वायविडंग, कुटकी तथा दशमूल ले। इनका काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से पित्त, कफ विकार के कारण आने वाले बुखार में लाभ होता है।
- चिरायता, सैंधव, सोंठ, कूठ, चन्दन तथा नेत्रबाला को पीस लें। इसे सिर पर लेप करने से बुखार ठीक हो जाता है।
- बराबर मात्रा में चिरायता, कुटकी, नागरमोथा, धनिया, इन्द्रयव लें। इसके साथ ही शुण्ठी, देवदारु तथा गजपीपल लें। इनका काढ़ा बना लें। 10-30 मिली में काढ़ा का सेवन करें। इससे पसलियों का दर्द, सन्निपातबुखार, खांसी, साँस फूलना, उलटी, हिचकी, तन्द्रा तथा हृदय विकार आदि में लाभ होता है।
- चिरायता तथा सोंठ को समान मात्रा में मिलाकर पीस लें। इसे 2-4 ग्राम की मात्रा में लेकर पुनर्नवा के काढ़ा के साथ मिलाकर पिएं। इससे सूजन कम होती है।
- बराबर-बराबर मात्रा में चिरायता तथा सोंठ चूर्ण को गुनगुने जल के साथ 2-4 ग्राम की मात्रा में सेवन करें। इससे त्रिदोष के कारण होने वाली सूजन की बीमारी में लाभ होता है। इससे पुरानी सूजन भी ठीक हो जाती है।
- सोंठ तथा चिरायता को बिम्बी के रस में मिला लें। इसका लेप करने से सूजन की समस्या ठीक हो जाती है।
- रक्तपित्त (नाक-कान आदि से खून बहने की परेशानी) में 2-4 ग्राम चिरायता चूर्ण का सेवन करें। इससे लाभ होता है।
- चिरायता का निरन्तर सेवन प्रतिरक्षा तंत्र को मजूबती प्रदान करने में मदद करता है।
- चिरायता को पीसकर उसमें मधु मिला लें। इसे गर्मकर लेप करने से कुबड़ेपन वाली जगह पर लगाएं। इससे लाभ होता है।
Comments
Post a Comment