ओल या सूरन (Yam)

     जिमीकंद एक बहुवर्षीय भूमिगत सब्जी है। जिसका वर्णन भारतीय धर्मग्रंथों में भी पाया जाता है। भारत के विभिन्न राज्यों में जिमीकंद के भिन्न-भिन्न नाम ओल या सूरन हैं। पहले इसे गृहवाटिका में या घरों के अगल-बगल की जमीन में ही उगाया जाता था। परन्तु अब तो जिमीकंद की व्यवसायिक खेती होने लगी है। जिमीकंद एक सब्जी ही नहीं वरन यह एक बहुमूल्य जड़ीबूटी है जो सभी को स्वस्थ एवं निरोग रखने में मदद करता है।
भोज्य पदार्थों के संचन हेतु यह भूमिगत तना का रूपांतर है जिसे घनकंद कहते हैं। यह परिवर्तित तना बहुत अधिक जैसा-तैसा फूला रहता है एवं इसकी सतह पर पर्वसंधियाँ रहती हैं जिनपर शल्क-पत्र लगे रहते हैं। सतह पर जहाँ-तहाँ अपस्थानिक जड़ें लगी रहती हैं। अगले सिरे पर अग्रकलिका तथा शल्कपत्रों के अक्ष पर छोटी-छोटी कलिकाएँ होती हैं। इस पौधे का फल यानी जड़ को बवासीर के दवा में भी उपयोग किया जाता है।

जिमीकंद का उपयोग


  1. वन सूरण को पानी में घिसकर या सूखे हुए कंद को पानी के साथ पीसकर लगाने से कर्णमूलशोथ में लाभ होता है।
  2. 10-12 ग्राम जंगली सूरण कल्क को दही के मध्य रखकर या दही लपेट कर निगल जाने से उदररोग का शमन होता है।
  3. सूरन का शाक बनाकर सेवन करने से उदरशोथ का शमन होता है।
  4. सूरन की नवीन पत्तियों का शाक बनाकर सेवन करने से उदरविकारों का शमन होता है।
  5. सूरण पर मिट्टी की मोटी परत लगाकर, सूखने पर आग में अच्छी तरह पका कर, पकने पर मिट्टी हटा कर, साफ कर तैल में भून कर बनाएं मिलाकर खाने से अर्श में अतिशय लाभ होता है।
  6. 2-4 ग्राम सूरणकंद चूर्ण में समभाग कुटज त्वक् चूर्ण को मिलाकर तक्र के अनुपान के साथ सेवन करने से अर्श में लाभ होता है।
  7. पुटपाक विधि से प्राप्त 50 मिली सूरण स्वरस में 10-12 मिली तिल तैल और 1 ग्राम बनाएं मिलाकर पीने से अर्श रोग में लाभ होता है।
  8. (कल्याणक लवण) समभाग शुद्ध भल्लातक, त्रिफला, दंती, चित्रकमूल तथा सूरण में दो गुना मिलाकर बनाएं, मिट्टी के घड़े में बंद कर, उपलों की मंद अग्नि में पकाकर प्राप्त लवण का मात्रापूर्वक सेवन अर्श में प्रशस्त है।
  9. एक मास तक अन्य कोई आहार न देकर केवल सूरण का शाक आदि रूप में सेवन करना चाहिए और तक्र पिलाना चाहिए, केवल इसी आहार पर रहने से अर्श का शमन होता है।
  10. सूरण आदि औषधियों से निर्मित बाहुशाल गुड़ का मात्रानुसार सेवन करने से अर्श, गुल्म, वातोदर, आमवात, प्रतिश्याय, क्षय, ग्रहणी, पीनस, हलीमक, पाण्डु तथा प्रमेह रोगों में लाभ होता है।
  11. सूरणपिण्डी का उपयोग अर्श की चिकित्सा में किया जाता है।
  12. बृहत् सूरण वटक का सेवन करने से अर्श, ग्रहणी, श्वास-कास, क्षय, प्लीहा, श्लीपद, शोथ, भगन्दर तथा पलित रोग का शमन होता है। यह योग वृष्य, मेधावर्धक, अग्निवर्धक तथा रसायन होता है।
  13. जंगली सूरण के चूर्ण को घी में भूनकर, मूली के रस में घोंटकर, 250 मिग्रा की गोलियां बनाकर प्रातसायं 2-2 गोली खिलाने से अर्श में लाभ होता है।
  14. सूरन घनकंद को पीसकर जोड़ों पर लेप करने से संधिवात का शमन होता है। (लेप करने से पहले संधियों में तैल लगा लेना चाहिए।)
  15. सूरणकन्द कल्क में मधु तथा घी मिलाकर लेप करने से वल्मीक और श्लीपदजन्य शोथ का शमन होता है।
  16. अग्नि पर भूने हुए सूरणकन्द में घी और गुड़ मिलाकर, पीसकर लेप करने से अर्बुद का शमन होता है।
  17. अच्छे पके हुए सूरण के कन्द को सोंठ और जल के साथ भलीभाँति पीसकर ग्रन्थियों पर उसका बारम्बार लेप कराना चाहिए। सात दिन तक लेप करने से ग्रन्थियाँ नष्ट हो जाती हैं।
सूरण को सम्पूर्ण कन्दशाकों में श्रेष्ठ समझा जाता है, किन्तु यह दद्रु, कुष्ठ तथा रक्तपित्त के रोगियों के लिए हितकर नहीं होता है।

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