दूब (Scutch grass)
दूब या दुर्वा एक घास है जो जमीन पर पसरती है। हिन्दू संस्कारों एवं कर्मकाण्डों में इसका उपयोग किया जाता है। मारवाडी भाषा में इसे ध्रो कहा जाता हैँ। इसके औषधीय गुणों के अनुसार दूब त्रिदोष को हरने वाली एक ऐसी औषधि है जो वात कफ पित्त के समस्त विकारों को नष्ट करते हुए वात-कफ और पित्त को सम करती है। दूब सेवन के साथ यदि कपाल भाति की क्रिया का नियमित यौगिक अभ्यास किया जाये तो शरीर के भीतर के त्रिदोष को नियंत्रित कर देता है। यह कान्तिवर्धक, रक्त स्तंभक, उदर रोग, पीलिया इत्यादि में अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। श्वेत दूर्वा विशेषतः वमन, कफ, पित्त, दाह, आमातिसार, रक्त पित्त, एवं कास आदि विकारों में विशेष रूप से प्रयोजनीय है। सेवन की दृष्टि से दूब की जड़ का 2 चम्मच पेस्ट एक कप पानी में मिलाकर पीना चाहिए। घर के आगे खाली जगह में इसे लगा कर सुंदरता देखी जा सकती है।

दूर्वा घास के उपयोग
- दूब घास तथा चूने को समान मात्रा में लेकर पानी में पीसकर कपाल पर लेप करने से सिरदर्द से आराम मिलता है।
- दूर्वा को पीसकर पलकों पर बांधने से आँखों का दर्द कम होता है तथा नेत्र मल का आना बंद हो जाता है।
- अनार फूल के रस को दूब के रस के साथ अथवा लाक्षारस या हरड़ के साथ मिलाकर 1-2 बूंद नाक में डालने से नाक से खून बहना कम होता है।
- दूब का रस या मुनक्का, ईख का रस या गाय के दूध या जवासा जड़ का रस या प्याज का रस या दाड़िम के फूल का रस के प्रयोग से नकसीर में आराम मिलता है।
- दूर्वा रस को 1-2 बूंद नाक में डालने से नाक से निकलने वाले खून से राहत मिलती है।
- 5 मिली दूब का रस पिलाने से उल्टी बन्द हो जाती है।
- दूर्वा पञ्चाङ्ग को पीसकर चावलों के धोवन के साथ पिलाने से उल्टी बन्द हो जाती है।
- चावल के धोवन के साथ दूर्वा के रस का पान करने से त्रिदोषज उल्टी से जल्दी आराम मिलता है।
- दूर्वा को मण्ड के साथ सेवन करने से वमन या उल्टी में लाभ मिलता है।
- दूर्वा के ताजे पञ्चाङ्ग स्वरस का सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है।
- दूब को सोंठ और सौंफ के साथ उबालकर पिलाने से आमातिसार से राहत मिलती है।
- 10-30 मिली दूर्वा घास से बने काढ़े को पीने से जलशोफ तथा प्रवाहिका में लाभ होता है।
- दूर्वा पञ्चाङ्ग को पीसकर दही में मिलाकर देने से और इसके पत्तों को पीसकर बवासीर पर लेप करने से अर्श में लाभ होता है।
- दूर्वा-रस से विधिवत् घृतपाक कर अथवा घृत को दूब रस में भली-भाँति मिला कर अर्श के अंकुरों पर लेप करने से तथा शीतल-चिकित्सा करने से रक्तस्राव शीघ्र रुक जाता है।
- दूर्वा का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पीने से रक्त वाले बवासीर तथा मूत्र संबंधी समस्या में लाभ होता है।
- दूर्वा रस को घी के साथ बनाकर अथवा घृत को दूब रस में भली-भाँति मिला कर अर्श के अंकुरों पर लेप करने से तथा शीतल-चिकित्सा करने से रक्तस्राव शीघ्र रुक जाता है।
- दूब को 30 मिली पानी में पीसकर, मिश्री मिलाकर सुबह-शाम पीने से पथरी टूट-टूट कर निकल जाती है।
- दूब के जड़ का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पीने से वस्तिशोथ, सूजाक और मूत्रदाह का शमन होता है।
- दूब को मिश्री के साथ घोट-छान कर पिलाने से पेशाब के साथ खून आना बंद हो जाता है।
- 1-2 ग्राम दूर्वा को दूध में पीसकर छानकर पिलाने से मूत्रदाह कम होता है।
- दूब के रस में सफेद चन्दन का चूर्ण और मिश्री मिलाकर पिलाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।
- प्रदर रोग में तथा रक्तस्राव, गर्भपात व योनि-व्याधियों में इसका प्रयोग करते हैं। इससे रक्त बहना रुक जाता है। गर्भाशय को शक्ति मिलती है तथा गर्भ को पोषण मिलता है।
- दूर्वा स्वरस से सिद्ध घृत का सेवन करने से विसर्पजन्य व्रण में लाभ होता है।
- तैल तथा घृत-युक्त दूर्वा के लेप से ग्रन्थिविसर्प तथा विषादि रोग दूर होते हैं और दूर्वा पञ्चाङ्ग स्वरस को दूध के साथ सेवन करने से पैत्तिक-मसूरिका में लाभ होता है।
- घृत में दूर्वा को पकाकर लगाने से विसर्प में लाभ होता है।
- चार गुना दूर्वा के रस से सिद्ध तेल को लगाने से कण्डू, पामा, या खुजली आदि में लाभ होता है।
- दूब, हरीतकी, सैन्धव, चक्रमर्द बीज और वनतुलसी के पत्तों को समान मात्रा में लेकर पीसकर लेप करने से कण्डू तथा दद्रु में लाभ होता है।
- दूर्वा तथा दारुहरिद्रा को समान मात्रा में लेकर तक्र के साथ पीसकर लेप करने से कण्डू, पामा, कृमि, दद्रु तथा शीतपित्त आदि रोगों में लाभ होता है।
- हरताल, दूर्वा तथा सेंधानमक इन तीनों को गोमूत्र में पीसकर लेप करने से दद्रु तथा कण्डू रोग में लाभ होता है।
- दूब को हल्दी के साथ पीसकर लेप करने से भी खुजली और दाद का शमन होता है।
- दूर्वा एवं हल्दी का पेस्ट लगाने से कण्डू या खुजली, पामा (Scabies), दद्रु (Ringworm)तथा शीतपित्त या पित्ती में लाभ होता है।
- अगर आप मुँह के छालों से परेशान है तो दूर्वा का रस या दूर्वा की पत्तियों को चबाना होता है।
- चोट लगने पर यदि रक्त एक बहाना बंद नहीं हो रहा है तो दूर्वा का लेप आपके लिये फायदेमंद हो सकती है।
- मानसिक रोग की चिकित्सा में भी दूर्वा का उपयोग मुँह से द्वारा लेकर किया जाता है, जैसे एपिलेप्सी। इसके लिए दूर्वा को सेवन किया जाता है जो कि एपिलेप्सी के दौरों को कम कर देता है, क्योंकि इसमें एंटी कंवलसेन्ट का गुण पाया जाता है।
- दूर्वा का लेप सिर पर लगाए जिससे सिरदर्द की समस्या में आराम मिलता है।
- दूर्वा को पीसकर दूध के साथ लेप बनाये कर चेहरे पर लगाए जिससे त्वचा संबंधी विकार दूर होते है।
- 5-10 मिली दूर्वा पञ्चाङ्ग के रस को पीने से अपस्मार में लाभ होता है।
- दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर, दिन में दो तीन बार चटाने से मलेरिया के बुखार में अत्यधिक लाभ मिलता है।
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