बरगद (Banyana)

     बरगद बहुवर्षीय विशाल वृक्ष है। इसे 'वट' और 'बड़' भी कहते हैं। इसका तना सीधा एंव कठोर होता है। इसकी शाखाओं से जड़े निकलकर हवा में लटकती हैं तथा बढ़ते हुए धरती के भीतर घुस जाती हैं एंव स्तंभ बन जाती हैं। इसका फल छोटा गोलाकार एंव लाल रंग का होता है। इसके अन्दर बीज पाया जाता है। इसका बीज बहुत छोटा होता है किन्तु इसका पेड़ बहुत विशाल होता है। इसकी पत्ती चौड़ी, एंव लगभग अण्डाकार होती है। इसकी पत्ती, शाखाओं एंव कलिकाओं को तोड़ने से दूध जैसा रस निकलता है जिसे लेटेक्स अम्ल कहा जाता है।हिंदू धर्म में वट वृक्ष की बहुत महत्ता है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश की त्रिमूर्ति की तरह ही वट,पीपल व नीम को माना जाता है, अतएव बरगद को शिव समान माना जाता है। अनेक व्रत व त्यौहारों में वटवृक्ष की पूजा की जाती है। यह आस्था के ऊपर निर्भर करता है।बरगद के पेड़ से कफवातपित्‍त दोष को ठीक किया जा सकता है। नाक, कान या बालों की समस्या में भी बरगद के पेड़ के फायदे मिलते हैं।

बरगद के पेड़ का उपयोग

  1. वट वृक्ष के पत्ते लें। इसका भस्म बना लें। 20-25 ग्राम भस्म को 100 मिलीग्राम अलसी के तेल में मिलाकर सिर में लगाएं। इससे बालों की समस्‍या दूर होती है।  
  2. वट वृक्ष के स्वच्छ कोमल पत्‍तों के रस में, बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिला लें। इसे आग पर पका लें। इस तेल को बालों में लगाने से बालों की सभी प्रकार की समस्‍याएं दूर होती हैं।  
  3. बड़ की जटा और जटामांसी का चूर्ण 25-25 ग्राम, तिल का तेल 400 मिलीग्राम तथा गिलोय का रस 2 लीटर लें। इन सभी को आपस में मिलाकर धूप में रखें। पानी सूख जाने पर तेल को छान लें। इस तेल से सिर पर मालिश करें। इससे गंजेपन की समस्या खत्म होती है, और सिर पर बाल आते हैं। इससे बाल झड़ना बंद हो जाता है। बाल सुंदर और सुनहरे हो जाते हैं।
  4. बड़ की जटा और काले तिल को बराबर भाग में मिलाकर खूब महीन पीस लें। इसे सिर पर लगाएं। आधा घंटे बाद कंघी से बालों को साफ कर लें। अब सिर में भांगरा और नारियल की गिरी दोनों को पीसकर लगाएं। कुछ दिन ऐसा करते रहने से कुछ दिनों में बाल लम्बे हो जाते हैं।
  5. बड़ के 10 मिलीलीटर दूध में 125 मिलीलीटर कपूर और 2 चम्मच शहद मिलाएं। इसे आखों में लगाने (काजल की तरह) से आखों की समस्‍याएं दूर होती हैं।  
  6. बड़ के दूध को 2-2 बूंद आंखों में डालने से आंखों से संबंधित रोगों का उपचार होता है। इसका प्रयोग चिकित्सक की सलाह से करें।
  7. 3 ग्राम बरगद की जड़ की छाल लें। इसे लस्सी के साथ पिएं। इससे नाक से खून आने की समस्या में लाभ होता है।
  8. 10 से 20 ग्राम तक वट वृक्ष के कोपलों या पत्तों को पीस लें। इसमें शहद और चीनी मिलाकर सेवन करने से खूनी पित्त में लाभ होता है।
  9. कान में यदि फुंसी हो तो वट वृक्ष के दूध की कुछ बूंदों में सरसों के तेल मिलाकर काने में डालें। इससे कान की फुंसी ठीक हो जाती है।
  10. वट वृक्ष के 3 बूंद दूध को बकरी के 3 ग्राम कच्‍चे दूध में मिलाकर कान में डालें। इससे कान की फुंसी  खत्म हो  जाती है।
  11. वट वृक्ष के 5-6 कोमल पत्ते या जटा को 10-20 ग्राम मसूर के साथ पीसकर लेप तैयार कर लें। इससे चेहरे पर लगाएं। इससे उभरने वाले मुंहासे और झाई दूर होती है।
  12. वट वृक्ष के पीले पके पत्तों के साथ, चमेली के पत्ते, लाल चन्दन, कूट, काला अगर और पठानी लोध्र 1-1 भाग में लें। इनको पानी के साथ पीस लें। इसका लेप करने से मुहांसे तथा झाई की समस्या दूर हो जाती है।
  13. निर्गुण्डी बीज, बड़ के पीले पके पत्ते, प्रियंगु, मुलेठी, कमल का फूल, लोध्र, केशर, लाख तथा इंद्रायण चूर्ण को बराबर भाग में लें। इन्हें पानी के साथ पीसकर लेप तैयार करें। इसे चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ जाती है।  
  14. 10 ग्राम बड़ की छाल के साथ 5 ग्राम कत्था और 2 ग्राम काली मिर्च लें। इन तीनों को खूब महीन पीसकर चूर्ण बना लें। इसका मंजन करने से दांतों का हिलना, दांतों की गंदगी, मुंह से दुर्गंध आने जैसी परेशानी दूर होते हैं। दांत स्वच्छ एवं सफेद होते हैं।
  15. दांतों में दर्द हो रहा है तो दर्द वाले स्थान पर बरगद का दूध लगाएं। इसमें आराम मिलता है।
  16. यदि किसी दांत आ रहा हो तो उस स्‍थान पर बरगद का दूध लगा दें। इससे दांत आसानी से निकल आते हैं।
  17. बरगद की जड़ का दातून बनाकर मंजन करने से दांतों का दर्द और मुंह से आने वाली बदबू दूर होती है। 
  18. वट वृक्ष के दूध (आक्षीर) का लेप करने से कंठ के रोग जैसे टॉन्सिल रोग में लाभ होता है। 
  19. वट वृक्ष के कोमल लाल रंग के पत्तों को छाया में सुखाकर कूट लें। इसके एक या डेढ़ चम्मच चूर्ण को आधा लीटर पानी में पकाएं। जब यह एक चौथाई रह जाए तो इसमें 3 चम्मच चीनी मिलाकर काढ़ा तैयार कर लें। इसे सुबह-शाम चाय की तरह पीने से जुकाम व नजला दूर होकर मस्तिष्क की दुर्बलता भी नष्ट होती है।
  20. बरगद की छोटी-छोटी कोमल शाखाओं से शीत निर्यास (रात भर ठंडे पानी में रखकर सुबह तैयार किया गया रस) तैयार करें। 10-20 मिलीग्राम की मात्रा में इसका सेवन करने से कफ से होने वाली बीमारी में फायदा होता है।
  21. बरगद के 10 ग्राम कोमल हरे रंग के पत्तों को 150 मिलीग्राम पानी में खूब पीस लें। इसे छानकर थोड़ी मिश्री मिला लें। इसे सुबह-शाम 15 दिन तक पिलाने से हृदय रोगों में लाभ होता है।
  22. दस्‍त के साथ खून आता हो तो वट वृक्ष वृक्ष की 20 ग्राम कोपलों को पीस लें। इसे रात में पानी में भिगोकर सुबह छान लें। छने हुए पानी में 100 ग्राम घी मिलाकर पकाएं। इसमें केवल घी बच जाने पर उतार लें। इस घी से 5-10 ग्राम घी लें और इसमें 2 चम्मच शहद और चीनी मिलाकर सेवन करें। इससे खूनी दस्‍त या पेचिश में लाभ होता है।
  23. बरगद के दूध को नाभि के छेद में भरने और उसके आस-पास लगाने से दस्‍त रुक जाती है।
  24. 6 ग्राम वट वृक्ष के कोपलों को 100 मिलीग्राम पानी में घोंट लें। इसे छानकर थोड़ी मिश्री मिला लें। इसे पिलाएं, और ऊपर से छाछ पिल दें। इससे दस्‍त में लाभ होता है।
  25. छाए में सुखाए गए वट वृक्ष की छाल से 3 ग्राम का चूर्ण तैयार करें। दिन में 3 बार चावलों के धुले हुए पानी के साथ या ताजे जल के साथ इसे देने से दस्‍ते में तुरंत लाभ होता है।
  26. वट वृक्ष की 8-10 कोपलों का सेवन दही के साथ करने से दस्‍त में लाभ होता है।
  27. वट वृक्ष की नर्म शाखाओं की टहनियों में चीनी या बतासा मिलाकर सेवन करें। इससे खून की उल्‍टी पर रोक लगती है।
  28. 6 ग्राम वट वृक्ष की जटा के अंकुर लें। इसे जल में घोटकर छान लें। इसे पिलाने से खून की उल्‍टी बन्द हो जाती है।
  29. बराबर भाग में वट वृक्ष की कोपलें, दूब, लोध्र, अनार और मुलेठी लें। इसे पीस लें। इसमें शहद मिलाकर चावलों के धुले हुए पानी के साथ सेवन करें। इससे उल्‍टी और बार-बार प्‍यास लगने की समस्‍या दूर हो जाती है।  
  30. बरगद के 25 ग्राम कोमल पत्तों को 200 मिलीग्राम पानी में घोंटकर पिलाएं। इससे 2-3 दिन में ही बवासीर में खून बहना बन्द हो जाता है।
  31. बरगद के पीले पत्तों की भस्म को बराबर मात्रा में सरसों के तेल में मिलाकर बवासीर के मस्सों पर लेप करें। इससे तुरंत लाभ होता है।
  32. 100 मिलीग्राम बकरी के दूध और इतना ही पानी लें। इसमें वट वृक्ष की 10 ग्राम कोपलों को मिला लें। इसे आग पर पकाएं। जब केवल दूध बचा जाय तो छान कर सेवन करें। इससे खूनी पित्‍त, खूनी बवासीर, खूनी दस्‍त में लाभ होता है।
  33. वट वृक्ष की सूखी हुई शाखा को जलाकर कायेला बना लें। इन कोयलों को महीन पीसकर सुबह-शाम 3 ग्राम की मात्रा में ताजे पानी के साथ लेने से बवासीर में लाभ होता है।
  34. कोयले के चूर्ण को 21 बार धोये हुए मक्खन में मिलाकर मलहम तैयार कर लें। इस मलहम को बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से बिना कष्ट के दूर हो जाते हैं।
  35. 20 ग्राम वट वृक्ष की छाल को 400 मिलीग्राम पानी में पकाएं। जब पानी आधा रह जाए तो छानकर गाय का घी और खांड 10-10 ग्राम मिला लें। इसके सेवन से कुछ दिनों में बवासीर में लाभ होता है।
  36. बड़ के पत्ते, पुरानी इऔट का चूर्ण, सोंठ, गिलोय तथा पुनर्नवा की छाल का चूर्ण को बराबर मात्रा में लें। इन्‍हें जल के साथ पीसकर भगंदर के घाव पर लेप करें। इससे नासूर में लाभ होता है।
  37. 20 ग्राम बरगद के फल के चूर्ण को आधा लीटर पानी में पकाएं। जब इसका आठवां भाग बच जाए तो उतारकर ठंडा होने दें। ठंडा होने पर छानकर सेवन करें। ऐसा 1 महीने तक सुबह और शाम सेवन करें। इससे डायबिटीज में बहुत लाभ होता है।
  38. बरगद के पेड़ की ताजी छाल का महीन चूर्ण बनाएं। इसमें बराबर भाग खांड मिलाकर 4 ग्राम की मात्रा में ताजे जल के साथ सेवन करें। इससे डायबिटीज में फायदा होता है। ध्यान रखें कि यदि बार-बार वीर्य निकले तो खांड न मिलाएं।
  39. पहले दिन बरगद के एक बूंद दूध को 1 बतासे पर डालकर खाएं। दूसरे दिन 2 बतासों पर 2 बूंद, तीसरे दिन 3 बतासों पर 3 बूंद खाए। इसी तरह 21 दिन तक दूध व बतासा बढ़ाते जाएं। 21 दिन बाद इसी तरह घटाते हुए एक बूंद और एक बतासे तक आकर छोड़ दें। यह मधुमेह की विशेष औषधि है। इससे स्वप्नदोष की समस्या दूर होकर वीर्य की वृद्धि होती है।
  40. बरगद के 2.5 किलोग्राम पके पीले पत्ते लें। इसे 15 लीटल जल में 3-4 दिन भिगोने के बाद पकाएं। एक चौथाई पानी शेष रहने पर मसलकर छान लें। अब इस पानी को गाढ़ा होने तक फिर से पकायें। इसे आग से उतार लें। इसमें गिलोय सत् (पानी में गर्म करने के बाद पानी में नीचे जम जाने वाला भाग) व 3 से 6 ग्राम प्रवाल पिष्टी, तथा 2 ग्राम छोटी इलायची के बीज पीसकर मिलायें। इसकी 250 मिलीग्राम की गोली बना कर रख लें। सुबह-शाम 1-1 गोली गाय के दूध या पानी के साथ सेवन करायें। इससे डायबिटीज में फायदा होता है।
  41. 4 ग्राम की मात्रा में बरगद जटा के चूर्ण को सुबह-शाम ताजे पानी के साथ सेवन कराने से मधुमेह में लाभ होता है। इससे धातु का स्राव एवं स्वप्न दोष की शिकायत दूर होती है।
  42. बरगद के फल का चूर्ण लें। चूर्ण की मात्रा 10-20 ग्राम की मात्रा होनी चाहिए। इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करें। इससे मधुमेह में लाभ होता है। यह पौष्टिक व धातुवर्धक है।
  43. बरगद के फलों के बीज को महीन पीस लें। इसे 1 या 2 ग्राम की मात्रा में, सुबह के समय गाय के दूध के साथ सेवन करें। इससे बार-बार पेशाब आने की समस्‍या दूर हो जाती है।
  44. बरगद की जटा का महीन चूर्ण बना लें। अब चूर्ण 9 ग्राम, कलमी शोरा, सफेद  जीरा, छोटी इलायची के बीज लें। सभी का महीन चूर्ण बना लें। अब 2-2 ग्राम को जल में मिलाकर 2-2 ग्राम की बाती बना लें। सुबह के समय गाय के गर्म दूध के साथ सेवन करें। इससे पेशाब के रुक-रुक कर आने की समस्या ठीक होती है। इससे सूजाक में लाभ होता है।
  45. 10 ग्राम बरगद की जटा के अंकुर को 100 मिलीग्राम गाय के दूध में पीस लें। इसे छानकर दिन में 3 बार पिलाने से मासिक धर्म विकार या रक्‍त प्रदर में लाभ होता है।
  46. बरगद के 20 ग्राम कोमल पत्तों को 100 से 200 ग्राम पानी में घोट लें। इसे सुबह-शाम पिलाने से तुरंत लाभ होता है। महिला या पुरुष के पेशाब में खून आता हो तो इसके सेवन से लाभ होता है।
  47. 3 से 5 ग्राम बरगद के कोपलों का काढ़ा बनाकर सुबह और शाम सेवन से मधुमेह और माहवारी से जुड़े रोग में लाभ होता है।
  48. पानी में बरगद की जटा के साथ बराबर भाग में अर्जुन की छाल हरड़, लोध्र और हल्दी को पीस लें। इसका लेप लगाने से सिफलिस (उपदंश) के घाव ठीक होते हैं।  
  49. छाए में सूखाए हुए बरगद की जड़ और छाल का चूर्ण बना लें। इस चूर्ण की 3 ग्राम की मात्रा सुबह-शाम शर्बत या साधारण ताजे पानी के साथ लें। इससे सूजाक में लाभ होता है।
  50. गर्भाधारण के दौरान छाए में सुखाए गए छाल के चूर्ण को लस्‍सी के साथ सेवन करें। इससे गर्भपात नहीं होता।
  51. 20-30 मिलीग्राम बरगद की छाल के काढ़ा में 3-5 ग्राम लोध्र की पेस्‍ट, तथा थोड़ा शहद मिला लें। इसका दिन में दो बार सेवन करने से शीघ्र ही लाभ होता है।
  52. योनि से स्राव यदि ज्‍यादा हो रहा हो तो बरगद की छाल के काढ़ा में मुलायम कपड़े को 3-4 बार भिगोएं। इसे योनि पर रखें। यह दोनों प्रयोग योनी से सफेद पानी (ल्योूकिरिया) आने की शिकायत में लाभदायक होते हैं।
  53. बरगद के दो कोमल पत्त लें। 250 मिली गाय के दूध में बराबर भाग जल मिलाकर पत्तों को पकाएं। केवल दूध शेष रहने पर छानकर पी लें। यह लाभ देता है।
  54. पुष्य नक्षत्र एवं शुक्ल पक्ष में लाये हुए बरगद के कोपलों का चूर्ण तैयार करें। इस चूर्ण का 6 ग्राम ऋतु काल में सुबह में पानी के साथ 4-6 दिन सेवन करें। इससे फायदा होता है।
  55. बरगद के कोपलों को पीसकर बेर जैसी 21 गोलियां बना लें। 3 गोली घी के साथ सेवन करें। ऐसा करने से महिला अवश्य गर्भ धारण करती है।
  56. वट वृक्ष के कोपलों के रस में रुई भिगों कर योनि (पिचू) में रोजाना 1 बार लगभग 15 दिनों तक रखें। इससे योनी की शिथिलता (योनि का ढीलापन) दूर होती है।
  57. बरगद की जटा के बारीक आगे वाले भाग के पीले व लाल तंतुओं को पीस लें। इससे स्तनों में लेप करें। इससे स्तनों की शिथिलता (स्तनों के ढीलापन की समस्या) दूर होती है।
  58. बरगद के दूध को लगाने से कमर दर्द ठीक होता है। 
  59. बरगद के वृक्ष से उतारे हुए फलों को हवादार स्थान में कपड़े पर सुखा लें। ध्‍यान रखें कि इससे लोहे का सम्पर्क न होने पाए। इसका चूर्ण तैयार कर लें। इसमें बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें। 6 ग्राम चूर्ण को सुबह गर्म दूध के साथ सेवन करें। इससे वीर्य का पतलापन, शीघ्रपतन की समस्या आदि विकार दूर होते हैं। इससे शारीरिक शक्ति की वृद्धि होती है।
  60. बड़ के पके फल व पीपल के फल को सुखाकर महीन चूर्ण बना लें। 25 ग्राम चूर्ण को 25 ग्राम घी में भूनकर हलवा बना लें। इसे सुबह और शाम को सेवन करें। ऊपर से गाय का दूध पीने से विशेष शरीरिक शक्ति की वृद्धि होती है। यदि स्त्री और पुरुष दोनों सेवन करे दोनों के लिए फायदेमंद होता है।
  61. छाया में सुखाए गए कोपलों के चूर्ण में बराबर भाग मिश्री मिला लें। इस चूर्ण को 7 दिन सुबह खाली पेट 5-10 ग्राम तक की मात्रा में लस्सी के साथ सेवन करें। इससे वीर्य का पतलापन दूर होता है।
  62. छाया में सूखाए गए वट वृक्ष के कड़े हरे पत्ते लें। इसके 10 ग्राम दरदरे चूर्ण को 1 लीटर जल में पकाएं। जब पानी एक चौथाई रह जाए तो 1 ग्राम नमक मिला लें। इसे 10-30 मिलीग्राम मात्रा में सुबह-शाम पिलाने से अधिक नींद आने की समस्‍या दूर होती है।  
  63. छाया में सुखाए गए वट वृक्ष की छाल का महीन चूर्ण बना लें। इसमें दोगुनी मात्रा में खांड या मिश्री मिला लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम गाय के गर्म दूध के साथ सेवन करें। इससे याददाश्त बढ़ती है। इस दौरान खट्टे पदार्थों से परहेज रखें।
  64. घाव में यदि कीड़े हो गए हों या घाव से बदबू आती हो तो वट वृक्ष की छाल का काढ़ा बना लें। इससे हर दिन धोएं। इससे फायदा होता है।
  65. बरगद के दूध की कुछ बूंद दिन में 3-4 बार घाव पर डालें। इससे कीड़े मर जाते हैं और घाव ठीक (bargad ke pedh ke fayde) हो जाता है।
  66. साधारण घाव पर वट वृक्ष के दूध को लगाने से वह जल्‍दी ठीक होता है।
  67. यदि घाव ऐसा हो जिसमें टाके लगाने की आवश्यकता न हो तो घाव वाले त्वचा के दोनों सिरे को मिला दें। इसके बाद बड़ के पत्ते को गर्मकर घाव पर रख दें। ऊपर से कसकर पट्टी बांध दें। ऐसा करने से 3 दिन में घाव भर जायेगा। ध्यान रखें कि पट्टी को 3 दिन तक खोलें नहीं।
  68. फोड़े और फुन्सियों पर वट वृक्ष के पत्तों को गर्म कर बांधने से वे जल्‍द ही पक कर फूट जाते हैं।
  69. वट वृक्ष के पत्तों को जला लें। इसके भस्म में मोम और घी मिलाकर मलहम तैयार करें। इसे घावों में लगाने से शीघ्र लाभ होता है।
  70. वर्षा ऋतु में पानी में अधिक रहने से अगुंलियों के बीच में जख्म से हो जाते हैं। ऐसे जगह पर बड़ का दूध लगाने से जल्‍द ही बीमारी ठीक हो जाती है।
  71. यदि किसी व्‍यक्ति को साइनस का घाव हो जाए तो बरगद के कोपलें तथा कोमल पत्तों को जल में पीसकर छान लें। इसमें बराबर भाग में तिल का तेल मिलाकर तेल को आग पर गर्म कर लें। इस तेल को दिन में 2-3 बार साइनस के घाव पर लगाएं। इससे लाभ होता है। यह तेल भगन्दर रोग में भी लाभदायक होता है।
  72. रात के समय बड़ वृक्ष के दूध का लेप करें। उसपर वट वृक्ष की छाल का पेस्‍ट बांध दें। इससे कुष्ठ रोग एवं घाव में लाभ होता है।
  73. कूठ व सेंधा नमक को बड़ के दूध में मिलाकर लेप करें। इसके ऊपर छाल का पतला टुकड़ा बांध दें। सात दिन तक दो बार उपचार करने से बढ़ी हुई रसौली की समस्या में लाभ होता है।
  74. गठिया, चोट व मोच पर बरगद का दूध लगाने से पीड़ा तुरंत कम हो जाती है।
  75. यदि गांठ पकने वाली नहीं है तो बड़ का दूध लगाने से बैठ जाती है। यदि फूटने वाली है तो शीघ्र पककर फूट जाती है।
  76. वट वृक्ष के पत्तों पर तिल का तेल चुपड़ कर बंद गाठ पर बांधें। इससे वह पककर फूट जाती है।
  77. आग से जले हुए स्थान पर वट वृक्ष के कोमल पत्ते लें। इसे गाय के दही में पीसकर लगाने से लाभ होता है।
  78. बरगद के पेड़ के आधा किलो पत्तों को कूट लें। 4 लीटर पानी में रात के समय भिगोकर रख दें। इसे सुबह पकाएं। जब एक लीटर पानी बच जाए तो इसमें आधा लीटर सरसों का तेल डालकर फिर से पकाएं। जब केवल तेल रह जाए तो छानकर रख लें। इस तेल की मालिश से गीली और सूखी दोनों प्रकार की खुजली दूर होती है।




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