रामदाना, चौलाई (Amaranth)
चौलाई पौधों की एक जाति है जो पूरे विश्व में पायी जाती है। जिनके पुष्प पर्पल एवं लाल से सुनहरे होते हैं। गर्मी और बरसात के मौसम के लिए चौलाई बहुत ही उपयोगी पत्तेदार सब्जी होती है। अधिकांश साग और पत्तेदार सब्जियां शित ऋतु में उगाई जाती हैं, किन्तु चौलाई को गर्मी और वर्षा दोनों ऋतुओं में उगाया जा सकता है। इसे अर्ध-शुष्क वातावरण में भी उगाया जा सकता है पर गर्म वातावरण में अधिक उपज मिलती है। इसकी खेती के लिए बिना कंकड़-पत्थर वाली मिट्टी सहित रेतीली दोमट भूमि उपयुक्त रहती है। इसकी खेती सीमांत भूमियों में भी की जा सकती है। चौलाई का सेवन भाजी व साग (लाल साग) के रूप में किया जाता है जो विटामिन सी से भरपूर होता है। इसमें अनेकों औषधीय गुण होते हैं, इसलिए आयुर्वेद में चौलाई को अनेक रोगों में उपयोगी बताया गया है। सबसे बड़ा गुण सभी प्रकार के विषों का निवारण करना है, इसलिए इसे विषदन भी कहा जाता है।अनेक प्रकार के विष जैसे चूहे, बिच्छू, संखिया, आदि का विष चढ गया हो तो चौलाई का रस या जड़ के क्वाथ में काली मिर्च डालकर पीने से विष दूर हो जाता है। चौलाई का नित्य सेवन करने से अनेक विकार दूर होते हैं। इसमें सोना धातु पाया जाता है जो किसी और साग-सब्जियों में नहीं पाया जाता। औषधि के रूप में चौलाई के पंचाग यानि पांचों अंग- जड, डंठल, पत्ते, फल, फूल काम में लाए जाते हैं। इसकी डंडियों, पत्तियों में प्रोटीन, खनिज, विटामिन ए, सी प्रचुर मात्रा में मिलते है। लाल साग यानि चौलाई का साग एनीमिया में बहुत लाभदायक होता है।
चौलाई का उपयोग
- चौलाई पेट के रोगों के लिए भी गुणकारी होती है क्योंकि इसमें रेशे, क्षार द्रव्य होते हैं जो आंतों में चिपके हुए मल को निकालकर उसे बाहर धकेलने में मदद करते हैं जिससे पेट साफ होता है, कब्ज दूर होता है, पाचन संस्थान को शक्ति मिलती है।
- छोटे बच्चों के कब्ज़ में चौलाई का औषधि रूप में दो-तीन चम्मच रस लाभदायक होता है।
- प्रसव के बाद दूध पिलाने वाली माताओं के लिए भी यह उपयोगी होता है। यदि दूध की कमी हो तो भी चौलाई के साग का सेवन लाभदायक होता है।
- इसकी जड़ को पीसकर चावल के माड़ (पसावन) में डालकर, शहद मिलाकर पीने से श्वेत प्रदर रोग ठीक होता है।
- जिन स्त्रियों को बार-बार गर्भपात होता है, उनके लिए चौलाई साग का सेवन लाभकारी है।
- तपेदिक होने पर बैक्टिरीया गर्दन के लिम्फ नोड्स को संक्रमित करता है जिसके कारण वह सूज जाता है। रामदाना पञ्चाङ्ग को पीसकर गण्डमाला यानि लिम्फ नॉड में लेप करने से सूजन कम होती है।
- रामदाना के पत्तों का काढ़ा बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से वक्षोगत विकारों या सीने में बैचैनी से राहत मिलती है।
- रामदाना का 5-10 ग्राम पञ्चाङ्ग चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से अर्श या पाइल्स की परेशानी से राहत मिलती है।
- चौलाई में भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है। इसके सेवन से शरीर में प्रोटीन की कमी पूरी होती है एवं शरीर में ऊर्जा बनी रहती है।
- रामदाना पञ्चाङ्ग का काढ़ा बनाकर 20-30 मिली मात्रा में पीने से मूत्रकृच्छ्र में आराम मिलता है।
- 5-10 मिली रामदाना के पत्ते के रस का सेवन करने से मूत्रदाह से राहत मिलती है।


Comments
Post a Comment