लौकी (Bottel gourd)

     लौकी एक सब्ज़ी है। इसे "कद्दू" भी कहा जाता है। लौकी का पौधा एक लता होती है जिसपर लौकियाँ फलती हैं। जब फल बढ़ रहा होता है तो इसे सब्ज़ी के रूप में पकाया व खाया जाता है। इस अवस्था में इसका छिलका हरे रंग का और अंदर का गूदा श्वेत होता है। पूरी तरह पकने पर फल भूरा-खाकी हो जाता है और (भीतरी गूदा फेंककर) इसका प्रयोग बर्तन बनाने व सितार जैसे वाद्यों के निर्माण में होता है। आकार के अनुसार लौकी मुख्यतः दो प्रकार की होती है- लम्बी बेलनाकार लौकी तथा गोल लौकी। लौकी के अनगिनत औषधीय फायदे भी है जिसके कारण आयुर्वेद में लौकी को उपचार के रुप में इस्तेमाल किया जाता है।

   

लौकी का उपयोग




  1. अगर आपको हमेशा सिरदर्द की शिकायत रहती है तो कड़वी लौकी के बीज के तेल को मस्तक पर लगाने से सिर दर्द कम होता है।
  2. लौकी के पत्ते के रस को सिर पर लगाने से खालित्य या गंजेपन में लाभ होता है।
  3. लौकी चूर्ण को नाक से लेने से सर में जो कफ बैठ जाता है वह निकल जाता है।
  4. लौकी के फल के भस्म में शहद मिलाकर अंजन करने से नक्तांध्य (रतौंधी) में लाभ होता है।
  5. किसी बीमारी के साइड इफेक्ट के तौर पर कान में दर्द होता है तो लौकी के रस से बने तेल को 1-2 बूंद कान में डालने से कर्ण रोगों में लाभ होता है।
  6. 1-2 बूंद फल के रस को कान में डालने से कान दर्द आदि रोगों में लाभ होता है।
  7. दांत के कीड़ा या कैविटी की समस्या है तो कड़वी लौकी के जड़ के चूर्ण से मंजन करने से दांत के कीड़े के दर्द में लाभ होता है।
  8. लौकी के पुष्पों को पीसकर दांतों पर रगड़ने से दंत का दर्द कम होता है।
  9. प्रतिदिन एक सप्ताह तक गर्म जल या कांजी में रखे हुए कड़वी तुम्बी या लौकी के पके फलों का सेवन करने तथा खाने से घेंघा रोग में लाभ होता है।
  10. कड़वी तुंबी के रस में सरसों का तेल सिद्ध कर 1-2 बूंद नाक से लेने से भी घेंघा रोग में भी लाभ होता है।
  11. लौकी का शाक बनाकर सेवन करने से श्वास कष्ट, सांस की नली में सूजन, सूखी खांसी, स्तन रोग एवं छाती संबंधी रोगों में लाभ होता है।
  12. प्रतिदिन 100-150 मिली मीठी लौकी के रस का सेवन हृदय रोगों को रोकता है।
  13. 50 मिली लौकी के जड़ का रस को पीने से पेटदर्द, पेट में अल्सर तथा कब्ज में लाभ होता है।
  14. 100-150 मिली फल के रस में एक चुटकी नमक मिलाकर पीने से प्यास तथा अतिसार में लाभ होता है।
  15. 1-2 ग्राम कड़वी लौकी के बीजों को पीसकर बकरी के दूध के साथ पिलाने से वमन या उल्टी, श्लीपद या हाथीपाँव, कुष्ठ तथा पेट के रोग में लाभ होता है।
  16. मीठी लौकी बीज तथा नमक को काञ्जी से पीसकर, बत्ती बनाकर, एक-एक कर तीन वर्त्ति गुदा में रखने से तथा भोजन में दही खाने से अर्श (बवासीर) के अंकुरों का निवारण होता है।
  17. अर्क दूध, थूहर काण्ड, कड़वी लौकी के पत्ते तथा करंज बीज मज्जा को बकरे के मूत्र से पीसकर अर्श या पाइल्स के मस्सों पर लेप करने से लाभ होता है।
  18. लौकी बीज को सैंधव लवण तथा अम्ल यवागू के साथ पीसकर वटी बनाकर प्रयोग करने से अर्श में लाभ होता है।
  19. लौकी तुम्बी स्वरस (1-2 बूंद) का नाक से लेने से पीलिया में लाभ होता है।
  20. 10-20 मिली कड़वी तुम्बी पत्ते के काढ़े में शर्करा मिलाकर पीने से पीलिया में लाभ होता है।
  21. लौकी बीजचूर्ण (1-2 ग्राम) को मधु अथवा बकरी के दूध के अनुपान से सात दिन तक पीने से अश्मरी टूटकर निकल जाती है।
  22. 20-50 मिली लौकी फल के रस में 60 मिग्रा यवक्षार तथा 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने से अश्मरी में लाभ होता है।
  23. मीठी लौकी फल रस को पीने से मधुमेह में लाभ होता है।
  24. 10-20 मिली कड़वी लौकी के स्वरस में 1 बड़ा चम्मच आँवला का रस मिलाकर, प्रतिदिन एक बार कुछ महीनों तक सेवन करने से मधुमेह के रोगी की रक्त शर्करा को कम करता है तथा रक्त की कमी, सामान्य दुर्बलता आदि कष्टों को कम करता है।
  25. मीठी लौकी के फल के चूर्ण में समान मात्रा में चीनी तथा मधु मिलाकर लड्डू बनाकर सेवन करने से प्रदर या सफेद पानी में लाभ होता है।
  26. तिक्त अलाबू फल चूर्ण (2-4 ग्राम) अथवा पत्ते के चूर्ण (1-2 ग्राम) को मिश्री या शहद के साथ मिलाकर प्रयोग करने से श्वेतप्रदर में लाभ होता है।
  27. समान मात्रा में लौकी के पत्तों तथा लोध्र के पेस्ट को पीसकर प्रसूता की योनि पर लेप करने से प्रसूति जन्य क्षत शीघ्र भर जाते हैं।
  28. कड़वी लौकी बीज, जमालगोटा, पिप्पली, गुड़, मदनफल, सुराबीज (किण्व) तथा यवक्षार को थूहर के दूध से पीसकर, वर्त्ति या बत्ती बनाकर योनि में धारण करने से मासिक-विकारों तथा योनि-विकारों में लाभ होता है।
  29. लौकी के फल से सिद्ध तेल की मालिश करने से अर्थराइटिस में लाभ होता है।
  30. लौकी फलमज्जा को पीसकर पैरों पर लगाने से पैरों की जलन मिटती है।
  31. लौकी को तेल में पकाकर, छानकर तैल से स्नान करने से वात एवं कफ दोष का कम होकर कुष्ठ तथा खुजली रोग दूर होता है।
  32. थूहर के दूध में तने को विड नमक एवं सौवर्चल नमक के साथ पीसकर, तीन दिन तक कड़वी तुम्बी में रखकर फिर पैरों में लगाने से विपादिका(एड़ियों के फटने) में लाभ होता है।
  33. शुक्तिभस्म, सेंधानमक, घी, सर्जरस तथा थूहर के दूध को कड़वी तुम्बी में रखकर पैरों पर लेप करने से पादस्फूटन शीघ्र नष्ट हो जाता है।
  34. मदनफल को गोमूत्र से पीसकर, भेड़ के दूध में पकाकर, कड़वी तुम्बी में रखकर पैरों में लेप करने से विपादिका में लाभ होता है।
  35. लौकी फल के रस को लगाने से जलन और खुजली से राहत मिलती है।
  36. लौकी फल स्वरस में नींबू फल के रस को मिलाकर चेहरे पर लगाने से युवानपिडका (मुंहासे) से छुटकारा मिलने में सहायता मिलती है।
  37. लौकी मूल चूर्ण तथा बीज को अम्ल यवागू या सिरका के साथ पीसकर पेस्ट बनाकर लेप करने से रोमकूप के सूजन में लाभ होता है।
  38. समान मात्रा में मीठी लौकी तथा बहेड़े के फल के पेस्ट (1-2 ग्राम) को चावल के धोवन के साथ सेवन करने से शोथ (सूजन) में लाभ होता है।
  39. कड़वी तुम्बी तथा जटामांसी का कांजी अथवा जल में काढ़ा बनाकर सूजन वाले स्थान का लगाने से सूजन जल्दी ठीक होता है।







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