कपास (Cotton)
कपास एक नकदी फसल हैं।यह मालवेसी कुल का सदस्य है।संसार में इसकी 2 किस्म पाई जाती है। प्रथम को देशी कपास तथा दूसरे को अमेरिकन कपास के नाम से जाता है। इससे रुई तैयार की जाती हैं, जिसे सफेद सोना कहा जाता हैं | कपास के पौधे बहुवर्षीय ,झड़ीनुमा वृक्ष जैसे होते है।जिनकी लंबाई 2-7 फीट होती है। पुष्प, सफेद अथवा हल्के पीले रंग के होते है।कपास के फल बाल्स कहलाते है। फल के अन्दर बीज व कपास होती है। कपास की फसल उत्पादन के लिये काली मिट्टी की आवश्यकता पड़ती है।भारत में सबसे ज्यादा कपास उत्पादन गुजरात में होता है। कपास से निर्मित वस्त्र सूती वस्त्र कहलाते है। कपास मे मुख्य रूप से सेल्यूलोस होता है।
कपास के प्रकार -
लम्बे रेशे वाली कपास.
मध्य रेशे वाली कपास.
छटे रेशे वाली कपास.
भारत की लगभग 9.4 मिलियन हेक्टेयर की भूमि पर कपास की खेती की जाती हैं। इसके प्रत्येक हेक्टेयर क्षेत्र में 2 मिलियन टन कपास के डंठल अपशिष्ट के रूप में विद्यमान रहते हैं। कपास का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है जो ये दर्शाता है की भारतीयों का कपास से सूति वस्र बानाने का ज्ञान प्राचीन काल से ही है। कपास के औषधीय दृष्टि से भी बहुत गुण है।इससे उम्दा क्वालिटी के कपड़े बनते हैं जो त्वचा के दृष्टि से सबसे ज्यादा सुरक्षित होते हैं।

कपास का उपयोग
- कपास से बने तेल को सिर में लगाने से अरुंषिका (रूसी) नष्ट होती है।
- कपास की मींगी को पीसकर मस्तक में लेप करने से सिरदर्द की परेशानी कम होती है।
- कपास के पत्तों को पीसकर उसमें दही मिलाकर आँखों के बाहर लगाने से आँखों का दर्द कम होता है।
- सर्ज छालचूर्ण में कपास-फल-का रस तथा मधु मिलाकर, 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णस्राव (कान का बहना) कम होता है।
- जामुन पत्ते का रस, आम पत्ते का रस, कपित्थ तथा कपास फल के रस को समान मात्रा में लेकर, मधु मिलाकर 1-2 बूंद कान में डालने से कर्ण स्राव कम होता है।
- 1-2 बूंद कपास पत्ते के रस को कान में डालने से कान का दर्द कम होता है।
- इंगुदी फल की त्वचा, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, मूसली, मनशिला, कपास की गुठली तथा अश्वगंधा को समान मात्रा में लेकर पीसकर उसकी बत्ती बनाकर, घी में डुबाकर धूम्रपान करने से खाँसी से राहत मिलती है।
- 5 मिली फल के रस में मधु मिलाकर पीने से श्वासनलिका का सूजन कम होता है।
- वन्य एवं गाँव दोनों तरह के कपास के 1-2 ग्राम फल पेस्ट को जल में घोलकर पीने से प्यास लगने की परेशानी में लाभ होता है।
- समान मात्रा में कपास तथा प्लक्ष रस (5 मिली) को मधु के साथ सेवन करने से कफज अतिसार में लाभ होता है।
- 1-2 ग्राम कपास पत्ते के चूर्ण का सेवन करने से पेट की गड़बड़ी, अतिसार तथा प्रवाहिका (पेचिश) में लाभ होता है।
- 5 मिली कपास पत्ते के रस में नींबू रस को समान मात्रा में मिलाकर सेवन करने से प्रवाहिका तथा अतिसार से छुटकारा मिलता है।
- 1 या 2 कपास मींगी को पीसकर छानकर पिलाने से अथवा कपास के पत्तों का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से अतिसार या दस्त में लाभ होता है।
- 2-4 ग्राम कपास फूल के चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करने से जठराग्नि यानि खाने की इच्छा बढ़ती है।
- कपास पत्ते का रस और नींबू का रस दोनों को समान मात्रा में मिलाकर सेवन करने से अर्श (बवासीर) में लाभ होता है।
- कार्पास, वासा, पाषाण भेद, बला तथा गवेधुक आदि के जड़ का काढ़ा बनाकर, 10-20 मिली की मात्रा में सेवन करने से अश्मरीजन्य मूत्रकृच्छ्र (मूत्र संबंधी समस्या) में लाभ होता है।
- 1-2 ग्राम कपास फूल एवं पत्ते के चूर्ण का सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
- 5 ग्राम कपास जड़ का काढ़ा बनाकर पिलाने से मूत्र में जलन तथा वेदना दूर होती है।
- 1-2 ग्राम कपास के जड़ के काढ़े को चावल के धोवन के साथ पीने से पाण्डु (खून की कमी) तथा प्रदर में लाभ होता है।
- कार्पास (बिनौला) से सिद्ध तेल को लगाने से गुह्य रोगों में लाभ होता है।
- जब किसी महिला को मासिक धर्म तीन महीने से ज्यादा महीनों तक नहीं हो रहा है तो इसको अनार्तव कहते हैं। पीरियड तीन बार न होने की वजह ये सारे हो सकते हैं, जैसे- गर्भवती, मेनोपॉज , बर्थ कंट्रोल पिल्स का इस्तेमाल, दवा का साइड इफेक्ट, प्यूबर्टी या तनाव। इस समस्या से निजात पाने में कपास कुछ हद तक मदद कर सकती है। 1-2 ग्राम कपास फूल के चूर्ण का सेवन करने से अनार्तव तथा कष्टार्तव आदि आर्तव रोगों में लाभ होता है।
- 1-2 ग्राम कपास के बीज के चूर्ण में दूध एवं चीनी मिलाकर, सेवन करने से स्तन्य की वृद्धि होती है।
- 1-2 ग्राम कपास जड़ की छाल के चूर्ण में इक्षु जड़ का रस तथा मधु मिलाकर पीने से स्तन्य या स्तन (दुग्ध) की वृद्धि होती है।
- कपास की मींगी को जल के साथ पीसकर, चावलों के साथ मिलाकर खीर बनाकर खाने से स्त्रियों में स्तन्य की वृद्धि होती है।
- कपास के पेस्ट से बने घी को योनि में लेप करने से अथवा कार्पासास्थि चूर्ण से योनि का मसाज करने से योनि का दर्द कम होता है।
- कपास की मीगीं और सोंठ को जल के साथ पीसकर अण्डकोष या टेस्टिकल में लेप करने से अण्डकोष का सूजन कम होता है।
- कपास की गुठली तथा कुलथी के काढ़े में तिल तेल मिलाकर, पकाकर, छानकर सुरक्षित रख लें। इस तेल की मालिश करने से वात की बीमारी कम होती है।
- कपास पत्ते तथा बीजों को पीसकर जोड़ों में लेप करने से जोड़ो का दर्द कम होता है।
- कपास पत्ते को पीसकर संधियों में लगाने से दर्द और सूजन दोनों कम होता है।
- कपास के पत्तों में तेल चुपड़कर हल्का गर्म करके जोड़ों में बांधने से जोड़ों की वेदना कम होती है।
- कपास की मींगी के तेल की मालिश करने से गठिया में लाभ होता है।
- कपास फूल के पेस्ट को लगाने से अथवा कपास पञ्चाङ्ग रस में पकाए हुए तेल को लगाने से कपाल कुष्ठ में लाभ होता है।
- वनकपास मूल तथा चावल को पीसकर, पुपुलिका (पूड़ी) बनाकर सेवन करने से अपची (गले की गांठ) में लाभ होता है।
- कपास फूल के चूर्ण तथा बीज तेल को मिलाकर अग्निदग्ध (आग से जलने), तप्तद्रवदग्ध (गर्म द्रव पदार्थ से जलने) तथा पामा या खुजली में लगाने से लाभ होता है।
- कपास, नागबला या सुवर्चला को पीसकर कल्क या पेस्ट बना लें 1-2 ग्राम कल्क को पानी में घोलकर पीने से पानात्यय में लाभ होता है।
- कपास मज्जा, गुग्गुलु तथा गंधक से बने वटी का धूपन करने से उन्माद या पागलपन से राहत मिलने में फायदा पहुँचता है।
- 5 ग्राम कपास के फूल को जल के साथ पीसकर, उसका शर्बत बनाकर पिलाने से मनोविभम (विक्षिप्तता) में लाभ होता है तथा मन प्रसन्न होता है।
- कपास फल को पीसकर, उसमें घी मिलाकर बिच्छू के कटे हुए जगह पर लेप करने से दंशजन्य दाह एवं वेदना कम होती है।
- 500 मिग्रा से 1 ग्राम कपास की मींगी को दूध के साथ पीसकर पिलाने से समस्त प्रकार के विषों का प्रभाव कम होता है।
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