कुलथी (Horse gram)
कुलथी तीन पत्तियों वाला पौधा है। जिसे सामान्यतः कुर्थी भी कहा जाता है। इसके बीजों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। इसका उपयोग औषधि के रूप में होता है। इसके बीज पशुओं को खिलाने के काम आते हैं। दक्षिण भारत में इसके अंकुरित दाने तथा इसके पकवान बनाए जाते हैं।

कुलत्थ के उपयोग
- कुलथी की फलियों को पानी में भिगोकर मसल-छानकर पिलाने से पथरी निकल जाती है। इसके अलावा 5-10 ग्राम कुलत्थाद्य घी को मात्रानुसार सेवन करने से अश्मरी, मूत्राघात (Anuria) , मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्रविबन्ध में लाभ होता है।
- 20-40 मिली कुलथी जूस का सेवन करने से गण्डमाला (Scrofula), अर्श , आमवात (Rheumatoid arthritis) तथा संधिवात में लाभ होता है। इसके अलावा कुलथी को पीसकर बवासीर के मस्सों पर लगाने से बवासीर में लाभ होता है।
- पंचकोल (पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक, सोंठ) के पेस्ट से सिद्ध 10 ग्राम घी में 10-20 ग्राम कुलथी का काढ़ा मिलाकर पीने से अथवा कुलथी काढ़ा (10-30 मिली) तथा पंचकोल पेस्ट से सिद्ध घी का सेवन करने से बलगम वाली खांसी, सांस संबंधी रोग तथा हिचकी वाले रोग में बहुत लाभ मिलता है।
- कुलथी को भूनकर पीसकर 2-4 ग्राम की मात्रा में खाने से खांसी में लाभ होता है।
- कफज हृदय रोग में कुलथी के जूस को जौ से बने खाने के पदार्थों के साथ सेवन कर तीक्ष्ण द्रव्यों (सोंठ, मरिच, पिप्पली आदि) से सिद्ध जल को पीने से हृदय रोग में लाभ होता है।
- दही के साथ कुलथी के सतू् का सेवन करने से अन्नद्रव शूल में लाभ होता है।
- 20-30 मिली कुलथी के काढ़ा में 60 मिग्रा कुलथी क्षार तथा 60 मिग्रा यवक्षार मिलाकर पीने से उदरकृमि या पेट में जो कृमि होता है वह नष्ट हो जाता है।
- कुलथी के बीजों का काढ़ा बनाकर, 10-20 मिली मात्रा में पीने से मूत्र मार्ग गत संक्रमण तथा अश्मरी या पथरी में लाभ होता है।
- 10-20 मिली कुलथी के काढ़े का सेवन करने से आर्तव अवरोध (रजोरोध) तथा श्वेत प्रदर (लिकोरिया), मासिक विकार तथा शीतज्वर से राहत पाने में मदद मिलती है।
- शीतपित्त शरीर में लाल-लाल दाने की तरह दिखती है। कुलथी रस अथवा काढ़े के साथ भोजन करने से शीतपित्त में लाभ होता है।
- अगर बुखार उतरने का नाम नहीं ले रहा तो भुनी हुई कुलथी के चूर्ण को शरीर में धूल की तरह लगाये तो ज्वर में लाभ होता है।
- मूंग, कुलथी आदि लघु दालों से बने 10-20 मिली जूस का सेवन करने से ज्वर दूर होता है।
किसी कांच के गिलास में 250 ग्राम पानी में 20 ग्राम कुल्थी डाल कर ढक कर रात भर भीगने दें। प्रात: इस पानी को अच्छी तरह मिला कर खाली पेट पी लें। फिर उतना ही नया पानी उसी कुल्थी के गिलास में और डाल दें, जिसे दोपहर में पी लें। दोपहर में कुल्थी का पानी पीने के बाद पुन: उतना ही नया पानी शाम को पीने के लिए डाल दें।इस प्रकार रात में भिगोई गई कुल्थी का पानी अगले दिन तीन बार सुबह, दोपहर, शाम पीने के बाद उन कुल्थी के दानों को फेंक दें और अगले दिन यही प्रक्रिया अपनाएं। महीने भर इस तरह पानी पीने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी धीरे-धीरे गल कर निकल जाती है। एक सरल व्यायाम एक लकड़ी के तख्त पर चढ़ जाएं, फिर जमीन पर कूदें। चढें और कूदें। यह क्रिया ८-१० बार करें। इस क्रिया के करने से पथरी नीचे खिसकेगी और पेशाब के रास्ते बाहर निकल जाएगी। नोट: शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को यह क्रिया नहीं करनी चाहिए।
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