जूही या चमेली (Jasmine)
जूही या चमेली का फूल झाड़ी या बेल जाति से संबंधित है, इसकी लगभग २०० प्रजाति पाई जती हैं। हिमालय का दक्षिणावर्ती प्रदेश चमेली का मूल स्थान है। इस पौधे के लिये गरम तथा समशीतोष्ण दोनों प्रकार की जलवायु उपयुक्त है। सूखे स्थानों पर भी ये पौधे जीवित रह सकते हैं। भारत में इसकी खेती तीन हजार मीटर की ऊँचाई तक ही होती है। आजकल चमेली के फूलों से सौगंधिक सार तत्व निकालकर बेचे जाते हैं। आर्थिक दृष्टि से इसका व्यवसाय विकसित किया जा सकता है। चमेली एक सुगंधित फूल है, जिसके महक मात्र से लोग मोहित हो जाते हैं इस फूल से बहुत सारी दवाइयां बनायी जाती हैं, जो सिर दर्द, चक्कर, जुकाम आदि में काम आता है।

जूही का उपयोग
- दालचीनी, यूथिका आदि द्रव्यों का चूर्ण तथा इनसे पकाए तेल को 1-2 बूँद नाक में डालने से सिरदर्द से राहत मिलती है।
- जूही के फूलों को आँखों पर रखने से आँखों को शीतलता (ठंडक) मिलती है या पुष्पों को पीसकर आँखों के बाहर चारों तरफ लगाने से आँखों का जलन कम होता है।
- जूही के पत्तों को तिल के तेल में मिलाकर पकाकर, छानकर 1-2 बूंद कान में डालने से कान का दर्द कम होता है।
- जूही के पत्तों को चबाने से मुखपाक में लाभ होता है।
- जूही पत्तों का काढ़ा बनाकर कुल्ला या गरारा करने से मुखपाक में लाभ होता है।
- जूही के पत्तों में दारुहरिद्रा और त्रिफला मिलाकर उनका काढ़ा बनाकर कुल्ला करने से भी मुखपाक में लाभ होता है।
- फूल तथा जड़ के काढ़ा को दर्द वाले दाँत पर रगड़ने से जल्दी दर्द कम होता है।
- जूही के पत्ते का रस से बनाए खड्यूष (10-20 मिली) में घी, अम्ल तथा नमक मिलाकर सेवन करने से अतिसार या दस्त से छुटकारा मिलता है।
- 5 ग्राम जूही की जड़ को, 100 मिली बकरी के दूध में पकाकर, छानकर सेवन करने से मूत्रविकारों में लाभ मिलता है।
- जूही की जड़ तथा कुलथी से बने काढ़े (10-20 मिली) का सेवन करने से मूत्रशर्करा तथा मूत्रकृच्छ्र या मूत्र संबंधी समस्या दूर होती है।
- पीली जूही की जड़ को पीसकर योनि पर लगाने से योनि-विकारों यानि योनी संबंधी रोगों में आराम मिलता है।
- जूही के पुष्पों को पीसकर योनि या वैजाइना पर लेप करने से योनि की शिथिलता, योनिदाह या वैजाइना में जलन या वैजाइना के दुर्गंध से छुटकारा मिलती है।
- जूही के पत्तों को पीसकर पैरों में लगाने से बिवाई मिटती है।
- जूही की मूल तथा पत्तों को पीसकर लगाने से त्वचागत रोगों, विशेषकर दाद तथा कण्डु या खुजली में अति लाभ होता है।
- परवल, श्लेष्मातक, चौपतिया, जूही, वट के अंकुर तथा निर्गुण्डी पत्ते के साग को घी से बना कर तथा आँवला व दाड़िम रस मिलाकर सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
- जूही के पुष्पों को पीसकर उसमें मिश्री मिलाकर सेवन करने से क्षतक्षीण यानि सामान्य कटने छिलने पर घाव को ठीक करने में लाभ होता है।
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