छुइमुइ (Touch me not)
छुइमुइ या लज्जावती एक प्रकार का पौधा है, जिसकी पत्तियां, मानव स्पर्श पाने पर या तेज फूंक मारने पर सिकुड कर बंद हो जातीं हैं, व कुछ देर बाद अपने आप ही खुल जातीं हैं। लाजवंती के पौधे का प्रयोग आयुर्वेद में औषधी के रूप में किया जाता है।
लाजवन्ती का उपयोग
- 10-20 मिली लाजवंती के पत्ते के रस को नियमपूर्वक पिलाने से गंडमाला में लाभ होता है।
- लाजवंती की जड़ को गले में बाँधने से खाँसी में लाभ होता है।
- 3 ग्राम लाजवंती के जड़ के चूर्ण को दही के साथ खिलाने से रक्तातिसार में अत्यन्त लाभ होता है।
- 10 ग्राम लाजवंती जड़ का एक गिलास जल में काढ़ा बनाकर चौथाई अंश शेष हो जाने पर उस काढ़े को सुबह-शाम पिलाने से रक्त अतिसार और मधुमेह में लाभ होता है।
- 5-10 मिली लाजवंती पत्ते के रस को पिलाने से अपच के कारण बुखार, कामला या पीलिया व सभी प्रकार के पित्त संबंधी रोगों में लाभ होता है।
- लाजवंती के जड़ का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से पेचिश में लाभ होता है।
- एक चम्मच लाजवंती पत्ते के चूर्ण को दूध के साथ सुबह शाम अथवा तीन बार देने से बवासीर में लाभ होता है।
- लाजवंती के जड़ तथा पत्ते के एक चम्मच चूर्ण को दूध में मिलाकर सुबह शाम देने से बवासीर और भगंदर या में लाभ होता है।
- 1-3 ग्राम लाजवंती पत्ते के चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से अर्श में लाभ होता है।
- लाजवंती के पत्तों को जल में पीसकर वस्ति प्रदेश (ब्लडर) पर लेप करने से मूत्रातिसार में लाभ होता है।
- लाजवंती और अश्वगंधा की जड़ को पीसकर लेप करने से स्तन्य का ढीलापन कम होता है।
- लाजवंती के पत्तों को पीसकर अंडकोष की सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
- लाजवंती की जड़ को घिसकर लेप करने से नाड़ीव्रण व व्रण का सूजन कम होता है।
- लाजवंती के पत्तों को पीसकर लगाने से जीर्ण व्रण व नाड़ीव्रण में लाभ होता है।
- लाजवंती की जड़ को घिसकर लेप करने से व्रणशोथ में लाभ होता है।
- लाजवंती बीज के चूर्ण को व्रण पर लगाने से व्रण या अल्सर कम होता है।
- समान मात्रा में लज्जालु, शरपुंखा तथा भारंगी के जड़ का पेस्ट अथवा किसी एक जड़ का पेस्ट लगाने से जल्दी राहत मिलती है।
- शत्रक्षत का यदि पाक न हुआ हो तो लज्जावती जड़ के पेस्ट से विधिवत् पकाए हुए तेल का प्रयोग भी हितकर होता है।
- लज्जालू के जड़ को पीसकर व्रण या घाव में लगाने से कटने या फटने पर जो रक्तस्राव या ब्लीडिंग होता है वह जल्दी रुक जाता है।
- अश्वगंधा, दालचीनी, नागरमोथा, वाराहकान्ता (विष्णुकक्रान्ता), धाय के पुष्प तथा कुटज को मिलाकर काढ़ा बनाकर 10-20 मिली काढ़े का सेवन करने से ज्वरातिसार में लाभ होता है।
- पिसी हुई लज्जालू के जड़ का सेवन करने से सर्पदंशजन्य वेदना तथा दाह आदि विषाक्त प्रभावों में लाभ होता है।
- पत्ता तथा तने को पीसकर दंशस्थान पर लगाने से वृश्चिक या बिच्छू के काटने पर विषाक्त प्रभाव कम होते हैं।
- छुइमुई के फूलों को पानी में फेंटकर (10-20 मिली मात्रा में) पिलाने से या नमक डालकर पिलाने से धत्तूरे का विष का असर कम होता है।

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