सिंघाड़ा (Water chestnut)

     सिंघाड़ा (संस्कृत : शृंगाटक) पानी में पसरने वाली एक लता में पैदा होने वाला एक तिकोने आकार का फल है। इसके सिर पर सींगों की तरह दो काँटे होते हैं। ये फल हरे खाए जाते हैं। इसको छील कर इसके गूदे को सुखाकर और फिर पीसकर जो आटा बनाया जाता है उस आटे से बनी खाद्य वस्तुओं का भारत में लोग व्रत उपवास में सेवन करते हैं क्योंकि इसे एक अनाज नहीं वरण एक फल माना जाता है। अबीर बनाने में भी यह आटा काम में आता है।सिंघाड़ा भारत  के प्रत्येक प्रांत में जलाशयों में रोपकर लगाया जाता है। इसकी जड़ें पानी के भीतर दूर तक फैलती है। इसके लिये पानी के भीतर कीचड़ का होना आवश्यक है, कँकरीली या बलुई जमीन में यह नहीं फैल सकता।
वैद्यक में सिंघाड़ा शीतल, भारी कसैला वीर्यवर्द्घक, मलरोधक, वातकारक तथा रुधिरविकार और त्रिदोष को दूर करनेवाला कहा गया है।सिंगाड़ा मूल रुप से सर्दी के मौसम में पाया जाता है। वैसे तो हर मौसम के फल के फायदे खास होते हैं।सिंघाड़ा मधुर, ठंडे तासिर का, छोटा, रूखा, पित्त और वात को कम करने वाला,  कफ को हरने वाला, रूची बढ़ाने वाला एवं  वीर्य या सीमेन को गाढ़ा करने वाला होता है। यह रक्तपित्त तथा मोटापा कम करने में फायदेमंद होता है। इसके बीज पोषक, दर्द को कम करनेवाला, ब्रेस्ट साइज को बढ़ाने वाला,  बुखार कम करने वाला, भूख बढ़ाने वाला तथा कमजोरी कम करने वाला होता है। इसके फल अतिसार या दस्त में लाभप्रद होते हैं और फल का छिलका कमजोरी दूर करने और बुखार के लक्षणों से आराम दिलाने में मदद करता है।

सिंघाड़ा का उपयोग 

  1. चलदंत की अवस्था में दाँत को उखाड़कर, उस स्थान का लगाने से, विदारीकंद, मुलेठी,  सिंघाड़ा, कसेरू तथा दस गुना दूध से सिद्ध तेल लगाने से आराम मिलता है।
  2. समान मात्रा में त्रिफला, पिप्पली, नागरमोथा, सिंघाड़ा, गुड़ तथा चीनी में मधु एवं घी मिलाकर सेवन करने से राजयक्ष्मा या टीबी जन्य खांसी, स्वर-भेद तथा दर्द से राहत मिलती है।
  3. कशेरु, सिंघाड़ा, कमल, सेमल, कमल की जड़ तथा इक्षु से बने काढ़े (10-30 मिली) का सेवन करने से प्यास लगने की बीमारी से आराम मिलता है। 
  4. मसालेदार खाना खाने से दस्त की बीमारी हो गई है तो सिंघाड़ा का सेवन इस तरह से करें। इमली बीज को भिगोकर, छिलका निकालकर आधा भाग शृंगाटक चूर्ण तथा चौथाई भाग अपांप्म मिलाकर, पीस कर टिकिया बनाकर, लोहे के तवे पर सेंक कर चावल के धोवन का सेवन करने से अतिसार में लाभ मिलता है। इसके अलावा सिंघाड़ा का सेवन करने से अतिसार या दस्त की परेशानी कम होती है।
  5. कच्चे सिंघाड़े का सेवन करने से पाइल्स के कारण जो ब्लीडिंग होता है उसके दर्द और रक्तस्राव को कम करने में  सहायता करता है।
  6. सिंघाड़े के हिम (15-30 मिली) में शहद तथा चीनी मिलाकर सुबह पीने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
  7. सिंघाड़े का सेवन का सेवन करने से डायबिटीज रोग में लाभ मिलता है।
  8. पीलिया के बीमारी में शरीर में पित्त दोष बढ़ जाता है। सिंघाड़े में पित्त शामक गुण होने के कारण यदि इसका सेवन इस अवस्था में किया जाए तो यह बहुत फायदेमंद हो सकता है।
  9. सिंघाड़े के सेवन से शरीर में ऊर्जा बढ़ने में फायदा मिलता है। इसके मधुर एवं गुरु गुण के कारण यह देर से पचता है और शरीर में ऊर्जावान भी साबित होता है। 
  10. सिंघाड़े में गुरु और मधुर गुण होने के कारण ये वात को शांत करने में मदद करता है जिससे तनाव कम होता है और अच्छी नींद आती है। 
  11. सिंघाड़े के सेवन से पाचकाग्नि को मजबूत कर पाचन तंत्र को स्वस्थ किया जाता है, क्योंकि इसमें मधुर एवं पित्त शामक गुण पाए जाते हैं। 
  12. सिंघाड़े के सेवन से पित्त दोष कम होता है इसके अलावा सिंघाड़े के सेवन से बालों की जड़ों तक पोषण पहुँचता है जिससे बालों को मजबूती मिलती है।
  13. पांचवे महीने में यदि गर्भिणी को गर्भस्राव की आंशका हो तो सिंघाड़ा, कमलगट्टा तथा कशेरु का सेवन करना चाहिए। इससे गर्भस्राव नहीं होता है।
  14. यदि सातवें माह में गर्भिणी को रक्तस्राव हो रहा हो तब सिंघाड़ा, कमलमूल, किशमिश, कशेरु तथा मुलेठी का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली काढ़े में मिश्री मिलाकर सेवन करने से लाभ मिलता है।
  15. गर्भावस्था में होने वाले रक्तस्राव में भी सिंघाड़े का प्रयोग अन्य द्रव्यों के साथ किया जाता है। शारीरिक कमजोरी में यह औषधि बहुत ही लाभदायक होता है।
  16. सिंघाड़े के आटे की रोटी बनाकर खाने से रक्तप्रदर में लाभ होता है।
  17. सिंघाड़े के आटे का हलुआ बनाकर खाने से  शुक्राणु की वृद्धि होती है।
  18. सिंघाडे के 5-10 ग्राम चूर्ण को दूध में मिलाकर सेवन करने से शुक्राणु की वृद्धि होती है।
  19. प्रसूता स्त्री द्वारा सिंघाड़ा का सेवन करने से स्तन की वृद्धि होती है।
  20. समान मात्रा में सिंघाड़ा, धान का लावा, नागरमोथा, खर्जूर तथा कमल केशर के चूर्ण (2-4 ग्राम) को मधु के साथ सेवन करने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
  21. सिंघाड़े के पत्तों को पीसकर लेप करने से जलन कम होता है।
  22. समान भाग में सिंघाड़े के बीज, उड़द की दाल, खजूर, शतावर की जड़, सिंघाड़ा तथा किशमिश को विधि पूर्वक आठ गुना जल एवं आठ गुना दूध डालकर दूध के बचे रहने तक पकायें। फिर इसमें चीनी, वंशलोचन, ताजा घी और शहद मिलाकर पीने से वाजीकरण गुण की वृद्धि करता है।

Comments

Popular posts from this blog

वेत्र (Common rattan)

खैर या खादिर (Black Catechu)

नींबू (Lemon)