मोगरा (Arabian jasmine)
मोगरा, बेला एक फूल देने वाला पौधा है जो दक्षिण एशिया तथा दक्षिण-पूर्व एशिया का देशज है। यह फिलिपिंस का राष्ट्रीय पुष्प है। इसे संस्कृत में 'मालती' तथा 'मल्लिका' कहते हैं। मोगरा एक भारतीय पुष्प है। मोगरे का लैटिन नाम जेसमिनम सेमलेक है। मोगरे का फूल बहुत सुगन्धित होता है। मोगरा के फूल से सुगन्धित फूलों की माला और गजरे तैयार किये व पहने जाते हैं। मोगरे के फूल का रंग सफ़ेद रंग का होता है। स्वभाव मोगरा के फूलों की प्रकृति गर्म होती हैं। दिल्ली सहित अजमेर, जयपुर, कोटा, बीकानेर आदि में टोंक के मोगरे के फूल व मालाएँ पसंद की जाती है। मोगरा का इत्र कान के दर्द में भी प्रयोग किया जाता हैं। मोगरा कोढ़, मुँह और आँखों के रोगों में लाभ देता हैं।

बेला का उपयोग
- शिरोवेदना-बेला के फूलों को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरोवेदना का शमन होता है।
- नेत्र विकार-नेत्रों का तर्पण एवं पुटपाक करने की अवधि में तथा पथ्य सेवन काल में रात्रि में मालती तथा मल्लिका के फूलों को आँखों पर बांधकर शयन करने से नेत्र विकारों में लाभ होता है।
- अक्षिशोथ-बेला पुष्प स्वरस को नेत्रों के बाहर चारों तरफ लगाने से नेत्रशोथ का शमन होता है।
- बेला पत्र एवं मूल का क्वाथ बनाकर ठंडा करके नेत्रों को धोने से नेत्र विकारों का शमन होता है।
- बेला के पुष्पों को तिल तैल में पकाकर, छानकर 1-2 बूँद तैल का नस्य लेने से नासा रोगों का शमन होता है।
- कर्ण विकार-बेला पुष्प से तिल तैल का पाक करके 1-2 बूँद तैल को कान में डालने से कर्णविकारों का शमन होता है।
- दंतविकार-खदिर, अगरु, त्रिफला, अर्जुन, मल्लिका एवं अरिमेद का क्वाथ बनाकर गरारा करने से दंतविकारों में लाभ होता है।
- मुखरोग-बेला पत्र का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मुख रोगों का शमन होता है।
- श्वसनी शोथ-10-15 मिली बेला मूल क्वाथ का सेवन करने से श्वसनी शोथ में लाभ होता है।
- छर्दि-1 ग्राम बेला पुष्प चूर्ण में शहद मिलाकर खाने से छर्दि, हिचकी आदि का शमन होता है।
- अतिसार-गंभारी, मेंहदी एवं मल्लिका की टहनियों तथा पत्र से निर्मित खड्यूष में वसा, अम्ल एवं लवण मिलाकर प्रयोग करने से अतिसार में लाभ होता है।
- रक्तातिसार-बेला के 2-4 कोमल पत्रों को पानी में पीसकर, छानकर, मिश्री मिलाकर सेवन कराने से रक्तज अतिसार में लाभ होता है।
- मासिक विकार (आर्तव विकार)-बेला की मूल का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से आर्तव विकारों में लाभ होता है।
- स्तनविद्रधि-बेला पञ्चाङ्ग को पीसकर लेप करने से स्तनविद्रधि का शमन होता है।
- मोच-बेला मूल को पीसकर लेप करने से मोच में लाभ होता है।
- त्वक्-विकार-बेला के पत्र को पीसकर लगाने से त्वक् विकारों क्षत व व्रण में लाभ होता है तथा घाव पर लगाने से घाव जल्दी भरता है।
- व्रण-बेला के शुष्क पत्रों को जल में भिगोकर, इसको पीसकर प्रलेप बनाकर वेदनारहित व्रण पर लेप करने से लाभ होता है।
- पित्तोन्माद-बेला के पुष्पों का शर्बत बनाकर पिलाने से पित्तोन्माद में लाभ होता है।
- ज्वर-बेला की नवीन कोमल मूल को दिन में अनेक बार चबाकर उसका रस चूसने से आंत्रिकज्वर में लाभ होता है।
- बेला पत्र-स्वरस (5-10 मिली) अथवा क्वाथ (10-15 मिली) का सेवन करने से ज्वर में लाभ होता है।
- रक्तपित्त-10-15 मिली बेला मूल क्वाथ में खांड व शहद मिलाकर पिलाने से लाभ होता है।
- दाह-पत्र में कर्पूर तथा चन्दन मिलाकर, कल्क बनाकर लेप करने से दाह का शमन होता है।
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