चीड़ (Chir pine)
चीड़ के वृक्ष पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में पाए जाते हैं। इनकी 90 जातियाँ उत्तर में वृक्ष रेखा से लेकर दक्षिण में शीतोष्ण कटिबंध तथा उष्ण कटिबंध के ठंडे पहाड़ों पर फैली हुई हैं। इनके विस्तार के मुख्य स्थान उत्तरी यूरोप, उत्तरी अमेरिका, उत्तरी अफ्रीका के शीतोष्ण भाग तथा एशिया में भारत, बर्मा, जावा, सुमात्रा, बोर्नियो और फिलीपींस द्वीपसमूह हैं। चीड़ की लकड़ी काफी आर्थिक महत्व की हाती है। विश्व की सब उपयोगी लकड़ियों का लगभग आधा भाग चीड़ द्वारा पूरा होता है। अनेकाने कार्यों में, जैसे पुल निर्माण में, बड़ी बड़ी इमारतों में, रेलगाड़ी की पटरियों के लिये, कुर्सी, मेज, संदूक और खिलौने इत्यादि बनाने में इसका उपयोग होता है। कई जातियों के वृक्षों से चुआ (tap) करके तारपीन का तेल और गंधराल (rosin) निकाला जाता है। इनकी लकड़ी काटकर आसवन द्वारा टार तेल (tar oil), तारपीन, पाइन आयल, अलकतरा (tar) और कोयला प्राप्त करते हैं। कुछ जातियों की पत्तियों से चीड़ की पत्ती का तेल (pine leaf oil) बनाते हैं, जिसका यथेष्ट औषधीय महत्व है। पत्तियों के रेशों से चटाई आदि बनती हैं। चीड़ की बहुत सी जातियों के बीज खाने के काम आते हैं, जिनमें पश्चिमोत्तर हिमालय का चिलगोजा चीड़ अपने सूखे फल के लिये प्रसिद्ध और मूल्यवान् है। अमरीका में चीड़ की छाल से खरोंचकर रेजिन की तरह एक पदार्थ निकालते हैं, जो चीनी की तरह मीठा होता है। इसे चीड़ की चीनी कहते हैं। कई देशों में चीड़ की कुछ जातियाँ सजावट के लिय बगीचों में लगाई जाती हैं।
चीड़ के उपयोग
- आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार देवदारु, कूठ और सरल के काष्ठों पर क्षौम वत्र लपेट कर तिल तैल में भिगोकर जलाएं। इसे जलाने से मिलने वाले तेल की एक दो बूँद कान में डालें. यह तेल कान के दर्द, सूजन और स्राव से जल्दी आराम दिलाता है।
- चीड़ के पेड़ से प्राप्त गोंद (गंधविरोजा) का काढ़ा बनाकर कुल्ला करने से मुंह के छाले ठीक होते हैं।
- चीड़ के तेल से छाती पर मालिश करें. इसकी मालिश से सांस नली की सूजन कम होने के साथ साथ सर्दी-खांसी में भी फायदा मिलता है।
- चीड़ की लकड़ी के चूर्ण में अगरु, कूठ, सोंठ तथा देवदारु चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर रख लें। इस चूर्ण की 2-4 ग्राम मात्रा गोमूत्र या कांजी में पीसकर पिएं. इसे पीने से सर्दी-खांसी में जल्दी आराम मिलता है।
- चीड़ के तेल में आधा भाग विडंग के चावलों का चूर्ण मिलाकर धूप में रखकर पिलाएं. इसे पिलाने और वस्ति देने से आंत से कीड़े खत्म हो जाते हैं।
- चीड़ के तेल को पेट में लगाएं. इस तेल को पेट में लगाने से या वस्ति देने से पेट फूलना और बवासीर जैसी समस्याओं में फायदा मिलता है।
- पिप्पली, पिप्पली की जड़, सरल और देवदारु को मिलाकर पेस्ट बना लें. इस पेस्ट की 1-3 ग्राम मात्रा में 2 गुना शहद मिलाकर पीने से लकवा रोग में फायदा मिलता है।
- गोंद को पीसकर सीधे घावों पर लगाएं. इसके प्रयोग से कुछ ही दिनों में घाव ठीक होने लगता है. इसके अलावा चीड़ की सूचियों (Needles) को पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी भर जाते हैं।
- चीड़ के तेल को घाव पर लगाने से रक्तस्राव (ब्लीडिंग) बंद हो जाता है. इस तेल के उपयोग से घावों में पस भी नहीं बनता है और घाव जल्दी ठीक होता है।
- चीड़ की गोंद (गंधविरोजा) को दाद या खुजली वाली पर लगाएं. इसके प्रयोग से कुछ ही दिनों में दाद व खुजली की समस्या ठीक हो जाती है।
- छोटे बच्चों को अक्सर सर्दी लग जाने पर या निमोनिया होने पर पसलियां चलने की समस्या हो जाती है. इसके इलाज में आप चीड़ का उपयोग कर सकते हैं. इसके लिए चीड़ के तेल में बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिलाकर इससे बच्चों की मालिश करें. इस तेल की मालिश से तुरंत गर्माहट मिलती है और बच्चों को जल्दी आराम मिलता है।
- अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से, पित्तविकार तथा भम को उत्पन्न करने वाला होता है।

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