गुलमोहर ( Peacock flower)

     गुलमोहर लाल फूलों वाला पेड़ है। वास्तव में गुलमोहर का सही नाम 'स्वर्ग का फूल' ही है। भरी गर्मियों में गुलमोहर के पेड़ पर पत्तियाँ तो नाममात्र होती हैं, परंतु फूल इतने अधिक होते हैं कि गिनना कठिन। यह भारत के गरम तथा नमी वाले स्थानों में सब जगह पाया जाता है। गुलमोहर के फूल मकरंद के अच्छे स्रोत हैं। शहद की मक्खियाँ फूलों पर खूब मँडराती हैं। मकरंद के साथ पराग भी इन्हें इन फूलों से प्राप्त होता है। फूलों से परागीकरण मुख्यतया पक्षियों द्वारा होता है। सूखी कठोर भूमि पर खड़े पसरी हुई शाखाओं वाले गुलमोहर पर पहला फूल निकलने के एक सप्ताह के भीतर ही पूरा वृक्ष गाढ़े लाल रंग के अंगारों जैसे फूलों से भर जाता है। ये फूल लाल के अलावा नारंगी, पीले रंग के भी होते हैं। गुलमोहर के फूल देखने में जितने सुंदर होते हैं उतने ही उपचारात्मक गुणों वाले भी होते हैं। फूलों के वर्ग के आधार पर यह मूलत दो प्रकार का होता है- 1. लाल गुलमोहर तथा 2. पीला गुलमोहर। फूलों के रंग के आधार पर इसके औषधीपरक गुण भी अलग होते हैं।

गुलमोहर के उपयोग

  1. 1-2 ग्राम लाल गुलमोहर तने की छाल के चूर्ण का सेवन करने से अतिसार एवं आमातिसार के इलाज में मदद मिलती है।
  2. 2-4 ग्राम लाल गुलमोहर फूल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से आतर्व-विकारों यानि मासिक धर्म संबंधी बीमारियों विशेषतया कृच्छ्रार्तव में लाभ होता है।
  3. पीले गुलमोहर के पत्तों को पानी में पीसकर सिर पर लगाने से इन्द्रलुप्त या गंजेपन की समस्या में लाभ मिलता है तथा इसके छाल के चूर्ण में शहद मिलाकर मुख में धारण करने से मुख का व्रण भी जल्दी ठीक हो जाता है।
  4. पीले गुलमोहर के पत्ते को दूध के साथ पीसकर बवासीर के कारण बने मस्सों पर लेप करने से अर्श में लाभ होता है।
  5. पीले गुलमोहर के 1-2 ग्राम छाल चूर्ण तथा फूल के चूर्ण का सेवन करने से श्वेतप्रदर या ल्यूकोरिया के उपचार में लाभ मिलता है।
  6. पीले गुलमोहर के पत्तो को पीसकर लगाने से आमवात में तथा पत्तों का काढ़ा बनाकर बफारा यानि भाप देने से आमवात के  कारण जो दर्द होता है उससे आराम मिलता है। 
  7. पीले गुलमोहर के पत्ते तथा फूल को दूध के साथ पीसकर लेप करने से विसर्प में लाभ मिलता है।
  8. पीले गुलमोहर के पत्तों को पीसकर लगाने से तथा गुलमोहर के पत्तों का काढ़ा बनाकर व्रण को धोने से व्रण का सूजन कम होता है।
  9. पीले गुलमोहर के जड़ को पीसकर काटे हुए स्थान पर लगाने से दंशजन्य विषाक्त प्रभाव कम होता है।

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