कम्पिल्लक कबीला (Red berry)

     कम्पिल्लक (कबीला) एक सुन्दर फल है। यह हल्के लाल रंग का गन्धहीन और स्वादहीन फल है। यह ठण्डे पानी में नहीं घुलता है। यह उबलते हुए पानी में थोड़ा घुलता है, और एल्कोहल और ईथर में पूरी तरह से घुल जाता है।कम्पिल्लक के वृक्ष लगभग 10 मीटर तक ऊँचे और अनेक शाखा-प्रशाखाओं से युक्त तथा सदा हरे रहने वाले होते हैं। इस वृक्ष की लकड़ी लाल, चिकनी एवं मजबूत होती है। इसके फल गोलाकार तथा बीज श्यामले रंग के, चिकने और लगभग गोलाकार होते हैं। फलों के पकते समय लालिमा युक्त चमकदार फल पराग उत्पन्न होता है। इसी को कबीला कहते है। फलों के पक जाने पर उन्हें मोटे कपड़े में डालकर रगड़ते हैं। इस तरह रज को अलग निकाल लिया जाता है। शुद्ध कबीला हल्का, सुगन्धरहित, स्वाद रहित तथा लालिमायुक्त होता है। उँगली को जल में गीला कर कम्पिल्लक पर रखने से जो रज उँगली में लगे उसे सफेद कागज पर रगड़ दें। यदि पीले रंग की रेखा व निशान पड़ जाए तो उसे शुद्ध मानना चाहिए।

 

कम्पिल्लक (कबीला) के उपयोग 

  1. टंकण, कम्पिल्लक तथा हरीतकी चूर्ण को समान मात्रा में मिला लें। इसे हरीतकी काढ़ा की भावना देते हुए 125 मिग्रा की वटी बना लें। अब इस वटी को घी में घिस लें। इसे घाव लेप करें। इससे कान के घाव ठीक होते हैं।
  2. कम्पिल्लक के फल एवं पत्तों का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मिली मात्रा में पीने से सर्दी व जुकाम में लाभ होता है।
  3. काले जीरे की बारीक चूर्ण में कम्पिल्लक (कबीला) चूर्ण और घी मिला लें। इसे गले की गांठों पर लेप करने से गण्डमाला रोग में लाभ होता है।
  4. उपदंश (सिफलिस) के घाव पर कम्पिल्लक के चूर्ण को लगाने से घाव तुरंत ही भर जाता है। 
  5. 3 ग्राम कम्पिल्लक के चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करें। इससे पेट साफ हो जाता है, और शरीर के दोष बाहर निकल जाते हैं। इससे पित्तज-गुल्म (पेट फूलने की समस्या) में लाभ होता है।
  6. 1-2 ग्राम कम्पिल्लक चूर्ण में शर्करा अथवा मधु मिलाकर सेवन करने से गुल्म (पेट फूलने) में लाभ होता है।
  7. 1 ग्राम कबीला में 125 मिग्रा हींग मिला लें। इसे पानी में पीसकर 125 मिग्रा की गोलियाँ बना लें। रोज 1 गोली को गुनगुने पानी के साथ सेवन करने से पसली के दर्द में लाभ होता है।
  8. 2 ग्राम कम्पिल्लक के चूर्ण में बराबर मात्रा में गुड़ मिला लें। इसका सेवन करने से पेट के कीड़े खत्म होते हैं। इसे दूध अथवा दही के साथ भी ले सकते हैं।
  9. 1 ग्राम कबीला के चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर चाटने से पेट के कीड़े खत्म होते हैं।
  10. कम्पिल्लक (कबीला) फूल, सप्तपर्ण, साल, विभीतक, रोहितक, कुटज तथा कपित्थ की छाल को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इसे 5 ग्राम की मात्रा में लेकर मधु या आमलकी रस के साथ सेवन करें। इससे कफज और पित्तज दोष के कारण होने वाली डायबिटीज की परेशानी में तुरंत लाभ होता है।
  11. 1/4 या 1/2 ग्राम कम्पिल्लक (कबीला) चूर्ण को जल के साथ 3 दिनों तक रोज 2-3 बार सेवन करें। इससे मासिक धर्म संबंधी विकारों में लाभ होता है।
  12. कबीला के चूर्ण को तिल के तेल में पीस लें। इसे अण्डकोष में लगाने से अण्डकोष की सूजन ठीक होती है। 
  13. कम्पिल्लक को तेल में पका लें। इसे घाव में लगाने से घाव जल्दी भर जाता है। 
  14. कम्पिल्लक के चूर्ण को लगाने से कुष्ठ रोग तथा त्वचा संबंधी विकारों में लाभ होता है।
  15. कम्पिल्लक को पानी या तेल में पीसकर लगाने से त्वचा सुरक्षित रहती हैं।


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