अरंडी (Castor)

     अरंडी तेल का पेड़ एक पुष्पीय पौधे की बारहमासी झाड़ी होती है, जो एक छोटे आकार से लगभग १२ मी के आकार तक तेजी से पहुँच सकती है, पर यह कमजोर होती है। इसकी चमकदार पत्तियॉ १५-४५ सेमी तक लंबी, हथेली के आकार की, ५-१२ सेमी गहरी पालि और दांतेदार हाशिए की तरह होती हैं। उनके रंग कभी कभी, गहरे हरे रंग से लेकर लाल रंग या गहरे बैंगनी या पीतल लाल रंग तक के हो सकते है। तना और जड़ के खोल भिन्न भिन्न रंग लिये होते है। इसके उद्गम व विकास की कथा अभी तक अध्ययन अधीन है। यह पेड़ मूलतः दक्षिण-पूर्वी भूमध्य सागर, पूर्वी अफ़्रीका एवं भारत की उपज है, किन्तु अब उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में खूब पनपा और फैला हुआ है।

अरंडी का उपयोग

  1. 2 बूंद एरंड तेल को नेत्रों में डालने से नेत्र विकारों का शमन होता है, कुकूणक रोग में उसकी तीक्ष्णता भी कम होती है। एरंड-पत्तों को जौ के आटे के साथ पीसकर, पुल्टिस बनाकर आँखों पर बांधने से पित्त के कारण जो सूजन होता है वह कम होने लगता है।
  2. 500 मिग्रा एरंड पत्ते क्षार में 3 मिली तेल एवं समान भाग गुड़ मिलाकर चटाने से खांसी दूर हो जाती है।
  3. एरंड के बीजों की मींगी पीसकर, चार गुना गाय के दूध में पकाएं, जब खोवा (मावा) की तरह हो जाए तो उसमें 2 भाग खांड़ मिलाकर या चीनी की चाशनी मिलाकर अवलेह बना लें। प्रतिदिन 10 ग्राम खाने से पेट के बीमारी से राहत मिलती है।
  4. जीर्ण उदर-वेदना में रोज रात्रि को सोने से पूर्व समय 200 मिली गुनगुने जल में एक नींबू का रस तथा 5-10 बूंद एरंड तेल डाल कर पीने से जीर्ण उदर-शूल में लाभ होता है।
  5. प्रवाहिका में आंव और रक्त गिरता है तो आरम्भ में ही 10 मिली एरंड तेल देने से आम का प्रकोप कम हो जाता है और खून का गिरना भी कम हो जाता है।
  6. इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में ही अरंडी का तेल 5 से 10 मिली की मात्रा में प्रतिदिन देने से सर्जरी की आवश्यकता नहीं रहती।
  7. अरंडी के पत्तों का रस नित्य 2-3 बार बच्चे की गुदा में लगाने से उदरात्र कृमि (चुन्ने) मर जाते हैं। 
  8. हरे एरंड की 20 से 50 ग्राम जड़ को धोकर कूटकर 200 मिली पानी में पकाकर 50 मिली शेष रहने पर पीने से पेट की चर्बी कम होती है।
  9. 20-30 मिली एरण्ड के पत्ते के काढ़े में 15 मिली घृतकुमारी स्वरस मिलाकर प्रात सायं सेवन करने से अर्श में लाभ होता है।
  10. एरंड तेल और घृतकुमारी स्वरस मिलाकर मस्सों पर लगाने से जलन शान्त हो जाती है।
  11. गर्भवती स्त्री को यदि कामला हो जाए और शुरूआती अवस्था हो तो, 5-10 मिली एरंड पत्र-स्वरस को प्रात काल पांच दिन तक पिलाने से कामला में लाभ होता है तथा सूजन भी दूर हो जाती है।
  12. 5 मिली एरंड पत्र-स्वरस में 500 मिग्रा पीपल का चूर्ण मिला के नस्य देने से या अंजन करने से कामला में लाभ होता है।
  13. 6 मिली एरण्ड मूल स्वरस में 250 मिली दूध मिलाकर पिलाने से कामला में लाभ होता है।
  14. 20-30 मिली एरण्ड मूल-क्वाथ में 2 चम्मच मधु मिलाकर पिलाने से कामला में लाभ होता है।
  15. एरंड की मींगी को पीसकर, गर्म कर उदर के अधोभाग में लेप करने से वृक्कशूल व सूजन से राहत मिलती है।
  16. जब किसी स्त्री के स्तनों से दूध आना बन्द हो जाता है और स्तनों में गांठे पड़ जाती हैं, तब एरंड के 500 ग्राम पत्तों को 20 लीटर जल में घंटे भर उबालें तथा गुनगुने पानी की धार 15-20 मिनट त्री के स्तनों पर डाले, एरंड तेल की मालिश  करें, उबले हुए पत्तों की महीन पुल्टिस स्तनों पर बांधे। गांठे बिखर जायेंगी और दूध का प्रवाह पुन प्रारम्भ हो जाएगा।
  17. प्रसव-काल में कष्ट कम हो सके इसके लिए गर्भवती त्री को 5 मास बाद एरंड तेल का 15-15 दिन के अन्तर से हलका जुलाब देते रहें। प्रसव के समय 25 मिली एरंड तेल को चाय या दूध में मिलाकर देने से प्रसव शीघ्र होता है।
  18. अरंडी का तेल में रूई का फाहा भिगोकर योनि में धारण करने से योनिशूल का शमन होता है।
  19. गर्भाशय-शोथ प्राय प्रसव पश्चात् होता है। इसमें रुग्णा को बहुत तेज ज्वर होता है। ऐसी अवस्था में एरंड के पत्तों  के वत्रपूत स्वरस में शुद्ध रूई का फाहा भिगोकर योनि में रखने से लाभ होता है।
  20. एरंड के पत्तों को गर्म कर पेट पर बांधने से मासिक-विकारों से राहत मिलता है। अगर पीरियड्स के दौरान दर्द से हाल बेहाल रहता है यह घरेलू नुस्खा बहुत काम आता है।
  21. 10 ग्राम एरंड बीज गिरी को दूध में पकाकर, खीर बनाकर खिलाने से गृध्रसी, कटिशूल तथा आमवात में लाभ होता है एवं कोष्ठबद्धता का से राहत मिलती है।
  22. एरंड और मेंहदी के पत्तों को पीसकर प्रभावित स्थान पर लेप करने से वातज वेदना का शमन होता है।
  23. 10 मिली एरण्ड तेल को एक गिलास दूध के साथ सेवन करने से वातरक्त में लाभ होता है।
  24. एरंड के बीजों को पीसकर जोड़ों में लेप करने से छोटी सन्धियों और गठिया की सूजन मिटती है।
  25. कटिशूल, गृध्रसी, पार्श्वशूल, हृदय-शूल, कफजशूल, आमवात और सन्धिशोथ, इन सब रोगों में 10 ग्राम एरंड मूल और 5 ग्राम सोंठ चूर्ण का क्वाथ बना कर सेवन करना चाहिए तथा वेदना स्थल पर एरंड तेल की मालिश करनी चाहिए।
  26. एरण्ड की कोमल कोंपलों को पीसकर लेप करने से नाड़ी-व्रण का शोधन तथा रोपण होता है।
  27. 20 ग्राम एरण्ड मूल को 400 मिली पानी में पकाकर, काढ़ा बनाकर, 100 मिली शेष रहने पर पिलाने से चर्म रोगों में लाभ होता है।
  28. एरण्ड के पत्ते को पीसकर लगाने से घाव और सूजन में लाभ होता है।
  29. एरंड तैल में स्निग्धता  होने के कारण यह त्वचा का प्राकृतिक निखार या गोरापन बनाये रखने में मदद करता है।
  30. 30-50 मिली एरण्ड पत्र-स्वरस पिलाकर वमन कराने  से सर्पदंश तथा वृश्चिकदंशजन्य दाह, वेदना आदि विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।
  31. एरण्ड के 10-15 ग्राम फलों को पीस-छानकर पिलाने से अफीम का विष उतरता है।
  32. 5-10 मिली लाल एरंड तेल में गर्म दूध मिलाकर पीने से योनिशूल, गुल्म, वातरक्त, हृदय रोग, जीर्णज्वर, कटि, पृष्ठ और कोष्ठशूल में लाभ होता है। लाल एरण्ड के बीजों को अत्यधिक मात्रा में सेवन करने से छर्दि, मूर्च्छा तथा भ्रम उत्पन्न होता है। इसका अत्यधिक प्रयोग आमाशय के लिये भी अहितकर होता है।




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