आर्तगल (Cocklebur)

     आर्तगल नाम शायद ही किसी ने सुना होगा। इसको हिन्दी में वनोकरा कहते हैं। आयुर्वेद में वनोकरा का प्रयोग मूल रूप से त्वचा संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है।आर्तगल उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों तथा हिमालय क्षेत्रों में 1500 मी की ऊँचाई पर पाया जाता है। इसका प्रयोग त्वचा संबंधी रोगों, सिरदर्द, बुखार, सर्दी-खांसी, अल्सर जैसे अनेक बीमारियों में औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है।

आर्तगल के उपयोग

  1. हर्पिज़ के दर्द और जलन से परेशान हैं तो आर्तगल को पत्ते और जड़ को पीसकर उसका लेप घाव पर लगाने से जल्दी आराम मिलता है।
  2. आर्तगल के जड़ और पत्ते का लेप घाव पर लगाने से जल्दी सूखने लगता है।
  3. आर्तगल के फल और फूल को पीसकर उसका शरबत बनाकर पिलाने से सिफिलिस रोग में फायदा मिलता है।
  4. आर्तगल के कोमल फल तथा पत्तियों को पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की झांईयां दूर होती हैं तथा रोमकूप के सूजन पर लगाने से रोमकूप का सूजन धीरे-धीरे कम होने लगता है। 
  5. आर्तगल पञ्चाङ्ग (10-20 मिली) के सेवन से अनेक मूत्रदाह, मूत्रकृच्छ्र तथा मूत्राश्मरी आदि मूत्र संबंधित बीमारियों तथा श्वेत प्रदर (सफेद पानी) में लाभ प्राप्त होता है।
  6. आर्तगल के 1 चम्मच ताजे पत्र-स्वरस को पानी में मिलाकर पिलाने से उदरकृमियां दूर होती हैं।
  7. 10-20 मिली आर्तगल पञ्चाङ्ग का काढ़ा बनाकर इसका सेवन करने से जीर्ण विषमज्वर में लाभ होता है। 

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