देवदार (Himalayan cedar)
देवदार एक सीधे तने वाला ऊँचा शंकुधारी पेड़ है, जिसके पत्ते लंबे और कुछ गोलाई लिये होते हैं तथा जिसकी लकड़ी मजबूत किन्तु हल्की और सुगंधित होती है। इनका मूलस्थान पश्चिमी हिमालय के पर्वतों तथा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में है, (१५००-३२०० मीटर तक हिमालय में तथा १०००-२००० मीटर तक भूमध्य सागरीय क्षेत्र में) यह इमारतों में काम आती है। इसकी कुछ प्रजातियों को स्निग्धदारु और काष्ठदारु के नाम से भी जाना जाता है। स्निग्ध देवदारु की लकड़ी और तेल दवा बनाने के काम में भी आते हैं। इसके अन्य नामों में देवदारु प्रसिद्ध है। यह निचले पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। पहाड़ी संस्कृति का अभिन्न अंग देवदार का वृक्ष सदा से कवियों तथा लेखकों का प्रेरणा स्रोत रहा है। देवदार के पत्ते हरे रंग के और कुछ लाली लिए हुए होते है। देवदार तीखा तेज स्वाद और कर्कश सुगंन्ध वाला होता है। इसकी तासीर गर्म होती है इस कारण अधिक मात्रा में उपयोग फ़ेफ़ड़ों के लिए हानिकारक होता है। देवदार के दोषों को कतीरा और बादाम का तेल नष्ट करता है। इसकी तुलना अधाख से की जा सकती है। इसे अनेक दोषों को नष्ट करनेवाला कहा गया है। यह सूजन को पचाता है, सर्दी से उत्पन्न होने वाली पीड़ा को शांत करता है, पथरी को तोड़ता है और इसकी लकड़ी के गुनगुने काढ़े में बैठने से गुदा के सभी प्रकार के घाव नष्ट हो जाते है।इसकी उपयोगिता की वजह से ही आयुर्वेद में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। देवदारु का वृक्ष सौ-दो सौ सालों तक जिंदा रहता है। इसको बढ़ने के लिए जितनी जगह मिलती है उतना ही बढ़ता जाता है। देवदारू का वृक्ष जितना पूराना होता है उतना ही उसकी उपयोगिता औषधि और इस्तेमाल करने के सामान के तौर पर बढ़ता जाता है।
देवदार के उपयोग
- देवदारु, तगर, कूठ, खस और शुण्ठी इन 5 द्रव्यों को समान मात्रा में लेकर, कांजी में पीसकर, अरंडी के तेल में मिलाकर मस्तक पर लेप करने से वात के कारण जो सिर में दर्द होता है, उससे राहत मिलती है।
- देवदारु फल से बने तेल को गुनगुना करके 1-2 बूंद को नाक में डालने से सिर, गले तथा नाक के रोगों में लाभ होता है।
- देवदारु के काठ को पीसकर मस्तक पर लेप करने से सिर का दर्द कम होता है।
- देवदारु के सूक्ष्म चूर्ण को बकरी के मूत्र में पीसकर, उसमें स्नेह मिला कर पिल्ल नामक आँखों के रोग से राहत दिलाने में मदद करता है।
- देवदारु का तीक्ष्ण धूम्रपान कराने से नासास्राव में लाभ होता है।
- घी से बना देवदारु तेल का सेवन करने तथा दूध एवं शालि चावल का आहार लेने से कुष्ठ एवं पीनस से राहत मिलने में आसानी होती है।
- देवदारु तथा इन्द्रायण को पीसकर लेप करने से गलगण्ड या गोएटर में लाभ होता है।
- देवदारु, कुष्ठ तथा सरल की लकड़ी को जलाने से प्राप्त तेल (दीपिका तैल) को 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णशूल (कान के दर्द) से छुटकारा मिलने में सहायता मिलती है।
- तेल से लिप्त देवदारु के जड़ पर लपेटकर, उसको जलाने से प्राप्त तेल को 1-2 बूंद कान में डालने से कान की वेदना कम होती है।
- समान मात्रा में सेंधानमक, हींग, देवदारु, वचा, कूठ तथा शुण्ठी के पेस्ट से पकाए हुए तिल तैल का 1-2 बूंद कान में डालने से कान के समस्त रोगों में लाभ होता है।
- देवदारु तेल की बूँदों में सोंठ, मरिच, पीपल तथा यवक्षार मिला कर पीने से बलगम वाली खांसी से छुटकारा दिलाने में मदद करता है।
- देवदारु, पलाशबीज, मदार की जड़, गजपिप्पली, सहिजन की छाल तथा अश्वगंधा को पेट पर लेप करने से जल्दी आराम मिलता है।
- 10-20 मिली देवदार्वाद्यरिष्ट को पीने से मधुमेह या डायबिटीज, वातव्याधि, ग्रहणी, बवासीर, मूत्र संबंधी बीमारी, कण्डु तथा कुष्ठ रोगों में लाभ होता है।
- देवदारु, वच, कूठ, पिप्पली, शुण्ठी, कायफल, नागरमोथा, चिरायता, कुटकी, धनिया, हरीतकी, गजपिप्पली, धमासा, जवासा, गोखरू, बड़ी कटेरी, अतीस, गुडूची, कर्कटश्रृंगी तथा कालाजीरा-इन 20 द्रव्यों से निर्मित अष्टमांश-शेष-काढ़े को 10-20 मिली मात्रा में प्रसूता स्त्री को पिलाने से गर्भाशय में दर्द, खांसी, बुखार, श्वास, बेहोशी, कम्प तथा सिरदर्द आदि में लाभ होता है।
- देवदारु को पीसकर जोड़ों में लगाने से जोड़ों के दर्द से आराम मिलता है।
- चित्रकमूल तथा देवदारु को गोमूत्र में पीसकर थोड़ा गर्म करके लेप करने से श्लीपद या हाथी पांव में लाभ होता है।
- गुडूची, सोंठ तथा देवदारु चूर्ण (1-2 ग्राम) को गोमूत्र के अनुपान के साथ सेवन करने से हाथी पांव में लाभ होता है।
- श्वेत सरसों, सहिजन, देवदारु तथा सोंठ को गोमूत्र से पीसकर लेप करने से श्लीपद तथा सूजन में लाभ होता है।
- देवदारु चूर्ण को सर्षप तेल के साथ पीसकर लगाने से श्लीपद में लाभ होता है।
- 5-6 मिली देवदारु स्नेह में 60 मिग्रा लौह भस्म, 5-6 ग्राम घी तथा 10-12 ग्राम मधु मिला कर लेप करने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
- सरल निर्यास, राल, सरल की छाल, देवदारु तथा सालसारादि द्रव्यों से घाव का धूपन करने से जल्दी ठीक होता है।
- मातुलुङ्ग नींबू, अग्निमंथ, मूली, काँजी, सोंठ और देवदारु से बने लेप को लगाने से वात दोष से होने वाले घाव में लाभ होता है।
- देवदारु तेल को घाव पर लगाने से घाव जल्दी भरता है।
- देवदारु, वर्षाभू तथा सोंठ से पकाए हुए दूध (100-200 मिली) को पीने से सूजन कम होता है।
- देवदारु तथा सोंठ चूर्ण (1-4 ग्राम) को गोमूत्र या वर्षाभू कषाय के अनुपान से एक मास तक सेवन करने से सूजन दूर होता है।
- देवदारु, हरीतकी, वासा, शालपर्णी, शुण्ठी तथा आँवला इन द्रव्यों से बने काढ़ा (10-30 मिली) में मधु 6 माशा या 6 माशा मिश्री मिलाकर प्रयोग करने से खांसी श्वास, मन्दाग्नि तथा चातुर्थक ज्वर में लाभ होता है।
- देवदारु, बृहती, चित्रक, सोंठ तथा पुष्करमूल का काढ़ा (10-30 मिली) बनाकर पीने से वात के कारण हुए बुखार में लाभ होता है।
- देवदारु, धनिया, सोंठ, बृहती तथा कण्टकारी का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली मात्रा में पीने से ज्वर में लाभ होता है।
- देवदारु, हरड़, आँवला, शालपर्णी, वासा तथा सोंठ इन औषधियों से बने काढ़े (10-30 मिली) में मधु तथा शर्करा मिलाकर पीने से बुखार में लाभ होता है।
- नल, वेतस मूल, मूर्वा तथा देवदारु से निर्मित क्वाथ (10-30 मिली) का सेवन करने से ज्वर में लाभ होता है।
- देवदारु तेल की मालिश करने से किसी भी प्रकार का वेदना या दर्द कम होता है।
- देवदार की छाल का उपयोग संक्रमण से बचाने में मदद करता है।
- देवदार का तेल एक्जिमा के लक्षणों को कम करने में मदद करता है।
- गठिया के दर्द से राहत पाने के लिये देवदार के तेल की मसाज एक अच्छा उपाय है।

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