निर्गुन्डी (Horse shoe vitex)

     निर्गुन्डी एक औषधीय गुणों वाली क्षुप (झाड़ी) है। हिन्दी में इसे संभालू/सम्मालू, शिवारी, निसिन्दा शेफाली, तथा संस्कृत में इसे सिन्दुवार के नाम से जाना जाता है। इसके क्षुप १० फीट तक ऊंचे पाए जाते हैं। संस्कृत में इसे इन्द्राणी, नीलपुष्पा, श्वेत सुरसा, सुबाहा भी कहते हैं। राजस्थान में यह निनगंड नाम से जाना जाता है। इसकी पत्तियों के काढ़े का उपयोग जुकाम, सिरदर्द, आमवात विकारों तथा जोड़ों की सूजन में किया जाता है। यह बुद्धिप्रद, पचने में हल्का, केशों के लिए हितकर, नेत्र ज्योति बढ़ाने वाला तो होता ही है, साथ ही शूल, सूजन, आंव, वायु, पेट के कीड़े नष्ट करने, कोढ़, अरुचि व ज्वर आदि रोगाें की चिकित्सा में भी काम आता है। इसके पत्ते में रक्तशोधन का भी विशेष गुण होता है। निर्गुंडी सफेद, नीले और काले रंग के भिन्न-भिन्न फूलों वाली होती है। इसकी कई जातियाँ होती हैं, किन्तु नीला और सफेद, इसके दो मुख्य भेद हैं। पत्तों के आधार पर निर्गुण्डी की दो प्रजातियाँ मानी जाती हैं। Vitex negundo Linn. में पाँच पत्ते तथा तीन पत्ते भी पाए जाते हैं लेकिन Vitex trifoliaLinn. नामक निर्गुण्डी की प्रजाति में केवल तीन पत्ते ही पाए जाते हैं। 
     आयुर्वेद में कहा गया है – निर्ग़ुंडति शरीरं रक्षति रोगेभ्य तस्माद् निर्गुण्डी। इसका मतलब है जो शरीर की रोगों से रक्षा करे, वह निर्गुण्डी (Nirgundi or Vitex in Hindi) कहलाती है। इसके झाड़ (Nirgundi Plant) स्वयं पैदा होते हैं और सभी जगह पाए जाते हैं। इसके पत्तों को मसलने पर एक विशिष्ट प्रकार की दुर्गन्ध आती है। यह बूटी वात दोष के रोगों के लिए एक प्रसिद्ध औषधि है। 

 

निर्गुण्डी के उपयोग 

  1. निर्गुंडी बैक पेन स्लिप डिस्क की एकल औषधि है ढाई सौ ग्राम इसके पत्तों को डेढ़ किलो पानी के अंदर उबालें उस पानी मैं से सौ एम एल पानी के साथ हलवा तैयार करके सुबह खाली पेट एक बार खाएं ऐसा कम से कम 15 रोज करें इससे बैक पेन साइटिका का रोग हमेशा के लिए निर्मल हो जाता है
  2. निर्गुण्डी के पत्तों का रस 14 से 28 मिलीलीटर दिन में 3 बार सेवन करें या निर्गुण्डी के 21 पत्ते लेकर उसका रस निकाल कर उस रस को 3 बराबर भागो में बांट कर दिन में 3 बार ले यह प्रयोग 21 दिन करने से थाइराइड से निजात मिलती है। निर्गुण्डी की जड़ों को पीसकर इसका रस नाक में डालना चाहिए इससे भी फायदा मिलता है। यह थाइराइड से बने गले मे घेंघा या गोइटर बनने पर भी काम करता है।
  3. निर्गुंडी के फूल जॉइंट पेन एंड घुटनो के दर्द का रामबान उपाय निर्गुंडी के फूल 50 ग्राम लोंग 50 ग्राम इन दोनों को किसी खरल में अच्छी तरह पीस लें कम से कम 3 घंटे की पिसाई के बाद इसकी मूंग की दाल के बराबर गोली बना ले दो से तीन गोली सुबह शाम हल्के गर्म दूध के साथ ले। ध्यान रखें जब तक यह दवाई खानी है तब तक ठंडी चीजों का इस्तेमाल बंद कर दें नहाना भी गरम पानी के साथ करें और पीने में भी गर्म जल ही इस्तेमाल करें फ्रिज में रखा हुआ खाना और पानी हरगिज़ ना ले। बस 15 दिन के अंदर अंदर आप के जॉइंट पेन की और घुटनों के दर्द की समस्या पूर्ण रूप से खत्म हो जाएगी।
  4. निर्गुण्डी फल के 2-4 ग्राम चूर्ण को दिन में दो-तीन बार शहद के साथ सेवन करने से सिर दर्द ठीक होता है। 
  5. निर्गुण्डी के पत्तों को पीसकर सिर पर लेप करने से सरदर्द शांत होता है। 
  6. निर्गुंडी, सेंधा नमक, सोंठ, देवदारु, पीपर, सरसों तथा आक के बीज को ठंडे जल के साथ पीसकर गोली बना लें। इस गोली को जल में घिसकर मस्तक पर लेप करने से सरदर्द ठीक होता है।
  7. निर्गुण्डी के पत्तों के रस में पकाए तेल को 1 – 2 बूंद कान में डालने से कान का बहना बंद होता है।
  8. निर्गुण्डी के पत्तों को पानी में उबालकर, उस पानी से कुल्ला करने से मुँह के छालों में लाभ होता है। 
  9. निर्गुंडी तेल को मुंह, जीभ तथा होठों में लगाने से तथा हल्के गर्म पानी में इस तेल को मिलाकर मुंह में रखकर कुल्ला करने से मुँह के छाले एवं फटे होंठों में लाभ होता है। 
  10. 10 मि.ली. निर्गुण्डी पत्तों के रस में 2 दाने काली मिर्च और अजवायन चूर्ण मिला लें। इसे सुबह-शाम सेवन करने से पाचन-शक्ति बढ़ती है, पेट का दर्द ठीक होता है, और पेट में भरी गैस निकलती है।
  11. टायफायड में यदि रोगी की तिल्ली और लीवर बढ़ गए हो तो दो ग्राम निर्गुण्डी के पत्तों के चूर्ण में एक ग्राम हरड़ तथा 10 मि.ली. गोमूत्र मिलाकर लेने से लाभ होता है। 
  12. दो ग्राम निर्गुण्डी चूर्ण में काली कुटकी व 5 ग्राम रसोत मिलाकर सुबह-शाम लेना चाहिए।
  13. सूजाक की शुरुआती अवस्था में निर्गुण्डी के पत्तों का काढ़ा बहुत फायदेमन्द होता है। 
  14. जिस रोगी का पेशाब बंद हो गया हो, वह 20 ग्राम निर्गुण्डी को 400 मि.ली. पानी में उबालकर एक चौथाई शेष रहने तक काढ़ा बना लें। इस काढ़ा को 10-20 मि.ली. दिन में तीन बार पिलाने से पेशाब आने लगता है।
  15. दो ग्राम निर्गुंडी बीज के चूर्ण का सेवन सुबह-शाम करने से मासिक धर्म विकारों में लाभ होता है। 
  16. निर्गुण्डी को पीसकर नाभि, बस्ति प्रदेश और योनि पर लेप करने से प्रसव आसानी से हो जाता है।
  17. 40 ग्राम निर्गुंडी और 20 ग्राम सोंठ को एक साथ पीसकर आठ खुराक बना लें। एक खुराक रोज दूध के साथ सेवन करने से मनुष्य की काम शक्ति बढ़ती है। 
  18. निर्गुण्डी मूल को घिसकर शिश्न पर लेप करने से लिंग का ढीलापन दूर होता है।
  19. 10-12 ग्राम निर्गुण्डी की जड़ के चूर्ण को तिल तेल के साथ सेवन करने से सभी प्रकार के गठिया रोगों में लाभ होता है। 
  20. 5-10 मि.ली. निर्गुन्डी रस में समान मात्रा में एरण्ड तेल (कैस्टर आइल) मिलाकर सेवन करने से वातविकार के कारण होने वाले कमरदर्द में आराम होता है। 
  21. निर्गुण्डी के पत्तों से पकाए तेल की मालिश करने से तथा हल्का गर्म करके तेल लगाकर कपड़ा बाँधने से भी सभी प्रकार के गठिया के दर्दों में अत्यन्त लाभ होता है।
  22. पाँच ग्राम निर्गुण्डी के चूर्ण या पत्तों का काढ़ा बना लें। इसकी 20 मि.ली. की मात्रा दिन में तीन बार पिलाने से साइटिका का दर्द दूर होता है। 
  23. निर्गुण्डी के पत्तों को कुचल कर उसकी पट्टी बाँधने से मोच तथा मोच के कारण होने वाले दर्द तथा सूजन ठीक होते हैं।
  24. धतूरा, एरंड मूल, संभालू, पुनर्नवा, सहजन की छाल तथा सरसों को एक साथ मिला कर लेप करने से पुराने से पुराने हाथीपाँव (फाइलेरिया) में भी लाभ होता है।
  25. 10-20 मिली निर्गुण्डी के पत्तों का रस सुबह-शाम पिलाने, और फफोलों पर पत्तों की सेंक करने से नारू रोग ठीक होता है। 
  26. निर्गुण्डी की जड़ और पत्तों से पकाए तेल को लगाने से पुराने घाव, खुजली,एक्जीमा आदि चर्म रोग ठीक होते हैं।
  27. बराबर मात्रा में निर्गुण्डी के पत्ते, काकमाची तथा शिरीष के फूल को कुचल लें। इसमें घी मिला कर लेप करें। इससे चर्म रोग और विसर्प रोग में काफी लाभ होता है। 
  28. दाद से प्रभावित स्थान पर निर्गुण्डी पत्तों को घिस लें। इसके बाद निर्गुण्डी रस में मिलाकर लेप करें। इससे शीघ्र लाभ होता है। 
  29. निर्गुण्डी की जड़ एवं पत्तों के रस से पकाए हुए तिल तेल को पीने और उसकी मालिश आदि करने से नासूर, कुष्ठ, गठिया के दर्द, एक्जीमा आदि ठीक होते हैं।
  30. निर्गुण्डी के 20 ग्राम पत्तों को 400 मि.ली. पानी में चौथाई शेष रहने तक उबालकर काढ़ा बनायें। 10-20 मि.ली. काढ़े में दो ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिलाकर पिलाने से निमोनिया बुखार में लाभ होता है। 
  31. निर्गुन्डी के 10 ग्राम पत्तों को 100 मि.ली. पानी में उबालकर सुबह और शाम देने से बुखार और गठिया में लाभ होता है। 
  32. मलेरिया यानी ठंड लगकर होने वाले तेज बुखार और कफ के कारण होने वाले बुखार के साथ अगर छाती में जकड़न हो तो निर्गुण्डी के तेल की मालिश करनी चाहिए। प्रयोग को ज्यादा असरदार बनाने के लिए तेल में अजवायन और लहसुन की 1 – 2 कली डाल दें, और तेल हल्का गुनगुना कर लें।
  33. निर्गुण्डी के पत्तों को पानी में उबालें। इस पानी से कुल्ला करने से गले का दर्द ठीक होता है।
  34. निर्गुंडी तेल को मुंह, जीभ तथा होठों में लगाने से, तथा हल्के गर्म पानी में इस तेल को मिलाकर मुंह में रख कर कुल्ला करने से गले का दर्द, टांसिल में लाभ होता है। 
  35. इसकी जड़ को जल से पीस-छानकर 1 – 2 बूँद रस नाक में डालने से गंडमाला यानी गले में गांठों का रोग ठीक होता है।
  36. निर्गुण्डी के पत्तों को पीसकर गर्म करके लेप करने से अंडकोषों में होने वाली सूजन, जोड़ों की सूजन, आमवात आदि रोगों में सूजन के कारण होने वाली पीड़ा में लाभ होता है। 
  37. निर्गुण्डी के काढ़ा में कमर को डुबोने से सूजन से आराम मिलता है।
  38. ठंड में अधिक पानी के साथ काम करने से हाथ और पैरों में छाले पड़ जाते हैं तो उसमें निर्गुन्डी का तेल लगाने से फायदा होता है।
  39. शरीर में किसी भी जगह कट-फट जाने पर, रगड़ लगने या छिल जाने निर्गुण्डी का तेल लगाना बहुत लाभदायक है। यदि रक्त निकलता हो और घाव बन जाये तो पिसी हुई हल्दी बुरककर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
  40. बच्चों के दांत निकलने की परेशानी में निर्गुण्डी की जड़ को बालक के गले में पहनाने से आराम मिलता है। दांत जल्दी निकल आते हैं।
  41. निर्गुन्डी की जड़, फल और पत्तों के रस से पकाए 10-20 ग्राम घी को नियमित पीने से शरीर पुष्ट होता है, तथा शारीरिक कमजोरी दूर होती है।


  • जिनको को ब्लड प्रेशर की समस्या है या फिर पित का प्रकोप बढ़ा हुआ है वह अपने वैद्य की सलाह के बिना ना लें।

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