सेहुंड (Indian spurge Tree)
सेहुंड 1.8-4.5 मी ऊँचा, बड़ा, मांसल, कांटेदार, छोटा वृक्षक अथवा गुल्म या झाड़ी होता है। इस कांटेदार झाड़ी को हिन्दी में थूहर कहते हैं। थूहर की जातियों में त्रिधारा, चतुर्धारा, पंच, षष्ठ और चतुर्दश धारा तथा विंश धारा भी होती है। चरक के विरेचन, मूलिनी तथा सुश्रुत के अधो भागहर एवं श्यामादि-गणों में इसकी गणना की गई है। चरक के कल्पस्थान में इसके विविध-कल्पों का वर्णन मिलता है। चरक तथा वाग्भट ने भी सेहुण्ड के तीक्ष्ण बहुंटक-युक्त तथा तीक्ष्ण, किंतु अल्पकंटक युक्त ऐसे दो भेद माने जाते हैं। इनमें अल्पकंटक यानि कम कांटों की अपेक्षा ज्यादा कांटों वाले सेहुण्ड श्रेष्ठ माने जाते हैं। इसकी शाखा या पत्रों को तोड़ने से दूध निकलता है। इसके फूल लाल रंग के या पीताभ होते हैं। इसके फल लगभग 1.3 सेमी व्यास के, गहरे 4-पालिक तथा अरोमश (रोम वाले) होते हैं। इसके बीज चपटे, कोमल तथा रोमयुक्त होते हैं। इसकी शाखाओं को तोड़कर आर्द्र-भूमि यानि नम मिट्टी में लगा देने से नया क्षुप या झाड़ तैयार हो जाते हैं। इससे निकलने वाला आक्षीर या दूध अत्यन्त विरेचक तथा विषाक्त होते हैं। अत: इसका प्रयोग चिकित्सकीय परामर्शानुसार तथा सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इसका पुष्पकाल फरवरी से मार्च तक तथा फलकाल अप्रैल से मई तक होता है।
थूहर के उपयोग
- बाल झड़कर यदि गंजेपन की नौबत आ गई है तो आस्नुही आक्षीर या दूध को समान मात्रा में सर्षप (सरसों) तेल के साथ मिलाकर सिर में लगाने से गंजेपन में लाभ होता है।
- स्नुही-क्षीर का उस स्थान में प्रयोग करने से आँखों के बीमारियों के उपचार में लाभ मिलता है।
- छिलका-रहित थूहर के तने को आग पर पकाकर, रस निकाल कर 1-2 बूंद कान में डालने से कान के दर्द से जल्दी राहत मिलती है।
- थूहर की त्वचा को अर्क के पत्ते में लपेटकर, आग पर गर्म कर उससे प्राप्त रस को सुबह 1-2 बूंद कान में डालने से वातज तथा पित्तज के कारण कान से रस जो बहने लगता है उसमें शीघ्र लाभ होता है।
- 10-20 मिली थूहर के दूध को सरसों के तेल में पकाकर, जब तेल मात्र शेष रह जाय, तब 2-2 बूंद तेल कान में डालने से बहरापन दूर होता है।
- थूहर के जड़ को मुख में रखने से दांत के कीड़े धीरे-धीरे नष्ट होने लगते हैं।
- थूहर का दूध (आक्षीर) हिलते हुए दांत पर लगाने से वह दांत सहज ही गिर जाता है, परन्तु दूसरे दांत पर दूध नहीं लगना चाहिए।
- थूहर के दूध का लेप लगाने से गलशुण्डिका से राहत मिलती है।
- थूहर के दो पत्तों को आग पर गर्म करके, मसलकर, रस निकाल कर थोड़ा-सा नमक मिलाकर, पीने से खांसी में आराम होता है।
- इसके अन्त के कोमल डंडों को आग में गर्म कर उनका रस निकालकर, उसमें गुड़ मिलाकर पिलाने से बच्चे को उल्टी और विरेचन होकर खांसी मिटती है।
- त्रिधारा के रस में अडूसे के 10-20 पत्तों को पीसकर छोटी-छोटी गोलियां बनाकर 1 से 2 गोली दिन में दो-तीन बार चूसने से खांसी मिटती है।
- उदर रोगों में काली मिर्च को थूहर के दूध (आक्षीर) में डुबोकर सुखा लें। तीव्र रेचन की आवश्यकता होने पर 1-2 दाने खिलाने से रेचन हो जाता है।
- हरड़, पीपल और निशोथ आदि रेचक औषधियों को थूहर के दूध में तर करके खिलाने पर तीव्र विरेचन होकर जलोदर (Ascitis), सूजन व अफारा या पेट फूलने की बीमारी से आराम मिलता है।
- थूहर के रस को लम्बे समय तक बुखार आने के कारण पैदा हुए जलोदर रोग में तथा विस्फोटक रोगों में 5-10 मिली की मात्रा में इलाज स्वरूप प्रयोग किया जाता है।
- थूहर के दूध और हल्दी के चूर्ण को समान मात्रा में मिलाकर लेप तैयार करें, इस लेप को लगाने से बवासीर नष्ट हो जाता है।
- थूहर, अर्क, करंज तथा चमेली के पत्तों को गोमूत्र के साथ पीसकर लेप करने से सड़े हुए घाव, बवासीर तथा नासूर के कष्ट से जल्दी राहत मिलने में थूहर का औषधीय गुण काम करता है।
- त्वचा के ऊपर जो मस्से और दूसरे कठोर फोड़े-फून्सी हो जाते हैं, वे इसके दूध को लगाने से मिट जाते हैं।
- पेशियों की सूजन पर थूहर का दूध लगाने से सूजन कम होने लगती है और यह पकती भी नहीं है।
- जिस घर की छत पर त्रिधारा के गमले रखे हों, उस पर बिजली नहीं गिरती है।

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