खेजड़ी या शमी (Khejri plant)
खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है। खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब खाने को कुछ नहीं होता है तब यह चारा देता है, जो लूंग कहलाता है। इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है। अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे। इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है। शमी एक औषधि भी है, जिसका इस्तेमाल बीमारियों की रोकथाम के लिए किया जाता है।
शमी के उपयोग
- ताम्र के बर्तन में शंख को दूध से घिस लें। इसे घी युक्त जौ, तथा शमी के पत्तों की धूम दिखाकर आंखों में लगाएं। इससे आंखों का दर्द ठीक होता है।
- लोहे के बर्तन में गूलर के कच्चे फल को गाय के दूध के साथ घिस लें। इसे घी युक्त शमी के पत्तों की धूम दें। इसे आंखों में लगाने से आंखों की जलन, दर्द, लालिमा, पानी बहना आदि विकार ठीक होते हैं।
- कण्टकारी, दालचीनी, मुलेठी तथा ताम्र भस्म को बकरी के दूध के साथ पीस लें। इसे घी युक्त शमी, तथा आंवला के पत्तों की धूम देकर आंखों में लगाएं। इससे आंखों का दर्द और सूजन ठीक होता है।
- कौड़ी (Conch-shell) को गाय के दूध के साथ घिसकर तांबे के बर्तन में रखें। इसे घी युक्त शमी के पत्तों का धूम देकर प्रयोग करने से आंखों के रोगों में लाभ होता है।
- बराबर मात्रा में अरलू, तिन्दुक, अनार, कुटज तथा शमी की छाल का चूर्ण (1-4 ग्राम) लें। इन्हें कांजी, गुनगुना जल या मधु के साथ सेवन करें। इससे पेट के रोग जैसे दस्त पर रोक लगती है।
- बराबर मात्रा में शमी के कोमल पत्ते, तथा मरिच से बने पेस्ट का सेवन करें। इससे दस्त में लाभ होता है।
- पिप्पली, सोंठ, शमी, बेल के वृक्षों के पत्तों से बनाई हुई विलेपी (खिचड़ी) और तेल सहित बनाए गए अपूप (पुआ), तथा पेस्ट का सेवन करने से पेचिश में लाभ होता है।
- शमी की छाल या पत्ते के काढ़ा का सेवन करने से पेचिश में लाभ होता है।
- बवासीर के मस्सों पर अभ्यंग के बाद अर्कमूल, तथा शमी की पत्तियों के धूम से धूपन करें। इससे लाभ होता है।
- शमी के नए कोमल पत्तों के पेस्ट (1-2 ग्राम) में बराबर मात्रा में मिश्री मिला लें। इसका सेवन करने से एनीमिया रोग में लाभ होता है।
- शमी के पत्तों को पीसकर गुनगुना करें। इसे नाभि के नीचे लगाने से पेशाब के रुक-रुक कर आने और पेशाब में दर्द होने की समस्या में लाभ होता है।
- 15-20 मिली शमी पत्ते के रस में जीरा चूर्ण, तथा मिश्री मिला लें। इसे पिलाने से मूत्र संबंधी रोग ठीक होते हैं।
- 2-4 ग्राम शमी के कोमल पत्तों में 500 मिग्रा जीरा मिलाकर महीन पीस लें। इसे 200 मिली गाय के दूध में मिलाकर, छान लें। उसमें 1 ग्राम गुड़हल की जड़ का चूर्ण, तथा 4 ग्राम मिश्री मिलाकर पिलाने से डायबिटीज में लाभ होता है।
- शमी के फूल के चूर्ण (1-3 ग्राम) में बराबर मात्रा में शर्करा मिलाकर सेवन करने से गर्भ का पौषण होता है।
- शमी, मूली बीज, सहिजन के बीज, जौ एवं सरसों को कांजी से पीसकर, पेस्ट बना लें। इसका लेप करने से ग्रन्थि तथा गले के रोग में लाभ होता है।
- केला तथा सोनापाठा की भस्म में हरताल, नमक तथा शमी के बीज मिला लें। उसे शीतल जल से पीसकर लेप करने से रोम छिद्र विकारों में लाभ होता है।
- शमी के पत्तों को पीसकर दही मिलाकर लेप करने से जलन वाले विसर्प रोग में लाभ होता है।
- पूतिकरञ्ज, क्षीरीवृक्ष, बर्बरी, कटुतुम्बी, इन्द्रायण, अरलु, शमी, बेल तथा कपित्थ के पत्ते एवं छाल से पकाए जल से बालक को स्नान कराएं। इससे लाभ होता है।ग्रह रोगों का प्रतिषेध होता है।
- शमी के तने की छाल को पीसकर बिच्छू के डंक मारने वाले दंश स्थान पर लगाएं। इससे लाभ होता है।
- शमी की छाल में बराबर मात्रा में नीम, तथा बरगद की छाल मिलाकर पीस लें। इससे सांप के काटने से होने वाले दुष्प्रभाव में लाभ होता है।
- शमी के क्षार को हरताल के साथ मिलाकर लगाने से बाल झड़ जाते हैं। इसलिए इसे केशहंत्री भी कहते हैं।

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