मोथा (Nutgrass)

     मोथा एक बहुवर्षीय सेज़ वर्गीय पौधा है, जो ७५ सें.मी. तक ऊँचा हो जाता है। भूमि से ऊपर सीधा, तिकोना, बिना, शाखा वाला तना होता है। नीचे फूला हुआ कंद होता है, जिससे सूत्र द्वारा प्रकंद जुड़े होते हैं, ये गूद्देदार सफेद और बाद में रेशेदार भूरे रंग के तथा अंत में पुराने होने पर लकड़ी की तरह सख्त हो जाते हैं। पत्तियाँ लम्बी, प्रायः तने पर एक दूसरे को ढके रहती हैं। तने के भाग पर पुष्पगुच्छ बनते हैं, जो पकने पर लाल-भूरे रंग में परिवर्तित हो जाते हैं। मुख्यरूप से कंद द्वारा संचरण होता है, इसमें बीज भी कुछ सहयोग देते हैं। नमी वाली भूमि में भी अच्छी बड़वार होती है, पर सामान्यतः उच्च भूमियों में उगाए जाने वाली धान की फसल के लिए प्रमुख खरपतवारों की सूची में आता है। इसका नियंत्रण कठिन होता है, क्योंकि प्रचुर मात्रा में कंद बनते हैं, जो पर्याप्त समय सुषुप्त रह सकते हैं। विपरीत वातावरण में ये लम्बे समय तक सुरक्षित रह जाते है। भूपरिष्करण क्रियाओं से इन कंदों में जागृति आ जाती हैं एवं ओजपूर्ण-वृद्धि के साथ बढ़वार होने लगती है। इससे कभी-कभी ५०% तक धान की उपज में गिरावट पाई गई है। मोथा घास को संस्कृत साहित्य में मुस्ता कहा जाता है। वैदिक साहित्य में वशीकरण और चिकित्सा के लिए मुस्ता का प्रयोग मिलता है।

मोथा का उपयोग

  1. मोथा के जड़ के प्रकन्द को घी में भूनकर पानी से घिस लें। इसे रात को आँखों में काजल की तरह लगाएं। इससे नेत्राभिष्यंद यानी कन्जेक्टिवाइटिस तथा आँखों के अन्य रोगों में काफी लाभ होता है।
  2. शक्कर, सफेद चंदन, द्राक्षा यानी मुनक्का, मधु, आँवला, नीलकमल, मोठा और काली मिर्च का अवलेह यानी चटनी बना लें। इस 5 ग्राम अवलेह में घी मिलाकर सेवन करने से खाँसी ठीक होती है।
  3. पिप्पली, मोथा, मुलेठी, द्राक्षा, मूर्वा तथा सोंठ से निर्मित अवलेह (5 ग्राम) में घी और मधु मिला कर सेवन करने से पित्तज विकार के कारण होने वाली खांसी ठीक होती है।
  4. सोंठ, हरड़ तथा मोथा लें। इन तीनों द्रव्यों का चूर्ण बना लें। 1-3 ग्राम चूर्ण में गुड़ मिलाकर प्रयोग करने से सभी प्रकार के दमा तथा खाँसी में लाभ होता है।
  5. मोथा तथा कर्कट शृंगी के (1-2 ग्राम) चूर्ण में मधु मिला कर सेवन करने से बढ़े हुए कफ के कारण होने वाली उलटी बंद होती है।
  6. 50 ग्राम मोथा को 400 मिली दूध तथा 1200 मिली जल में (दूध शेष रहने तक) उबालकर ठण्डा कर लें। इस मिश्रण को 50 मिली की मात्रा में पीने से आँवयुक्त पेचिश तथा पेटदर्द ठीक होता है।
  7. मोथा तथा पित्तपापड़ा को बराबर मात्रा में लेकर उसका काढ़ा बना लें। 10-30 मिली काढ़े को पीने से आमदोष यानी पेट में जमा अनपचे भोजन का पाचन हो जाता है और इससे पेट की सभी समस्याएं ठीक होती हैं।
  8. मोथा के महीन पेस्ट यानी चटनी में बराबर मात्रा में दूध मिलाकर एक चौथाई शेष रहने तक पकाएं। ठंडा होने पर इसमें मधु मिलाकर मात्रानुसार सेवन करने से कफ तथा रक्तदोष के कारण होने वाले पेचिश में लाभ होता है।
  9. दो किग्रा मोथा को 640 मिली दूध तथा जल में मिला ले। दूध शेष रहने तक पका कर फिर ठंडा करके उसका दही जमा लें। इस दही का सेवन करने से पेचिश तथा पेट की अन्य समस्याएं ठीक होती हैं।
  10. मोथा, मोचरस, लोध्र, धाय का फूल, बेलगिरी तथा कुटज के बीज को पीसकर चूर्ण बना लें। इस 1-2 ग्राम चूर्ण को गुड़ तथा छाछ में मिलाकर सेवन करने से तेज पेचिश में लाभ होता है।
  11. मोथा को पानी में पीसकर चटनी बना लें। इस चटनी की 1-2 ग्राम मात्रा में मधु एवं शक्कर मिलाकर पीने से पेचिश ठीक होता है।
  12. मोथा के 10-30 मिली काढ़े को ठण्डा करके मधु मिलाकर पीने से पित्त यानी एसिडिटी तथा रक्तदोष के कारण होने वाले पुराना पेचिश ठीक होता है।
  13. मोथा तथा इन्द्रयव को 50-50 ग्राम लेकर महीन पीस लें। इसे 400 मिली पानी में डाल कर चौथाई शेष रहने तक उबालें। इस काढ़े में 10 ग्राम मधु मिलाकर पीने से खूनी पेचिश में लाभ होता है।
  14. मोथा आदि द्रव्यों से बने बृहद गंगाधर चूर्ण लें। चूर्ण की 1-3 ग्राम मात्रा में छाछ, मधु, चावल के धोवन तथा गुड़ के साथ करने से कब्ज, दस्त तथा पेचिश में लाभ होता है।
  15. 1-3 ग्राम मोथा को जल के साथ सेवन करने से दस्त के कारण लगने वाली प्यास मिटती है।
  16. रोजाना नियमित रूप से मोथा, आँवला तथा हल्दी को समान मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनायें। 10-30 मिली काढ़े में मधु मिलाकर पीने से सामान्य तथा कफयुक्त गठिया में लाभ होता है। 
  17. मोथा के कन्द को पीसकर लगाने से गठिया के दर्द में लाभ होता है।
  18. 1-2 ग्राम मुस्तादि चूर्ण (बराबर भाग नागरमोथा, व्योष, त्रिफला, मंजिष्ठा, देवदारु, सप्तपर्ण, दशमूल, नीम, इंद्रायण, चित्रक, मूर्वा तथा 9 भाग सत्तू) को विषम मात्रा में मधु और घी के साथ रोज सेवन करे। इससे कुष्ठ, सूजन, कब्ज, घाव, बवासीर आदि रोग ठीक होते हैं।
  19. काले तिलों में बाकुची चूर्ण और मोथा चूर्ण को मिलाकर गुड़ के साथ सेवन करने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
  20. मोथा को पीसकर, शतधौतघृत मिला लें। इसे बाहरी चोट और उसके कारण हुए घाव पर लेप करें। इससे घाव शीघ्र भर जाता है।
  21. मोथा की जड़ को पीसकर लगाने से कटे-फटे, घाव, कुष्ठ तथा खुजली रोग में लाभ होता है।
  22. बुखार में मोथा तथा पित्तपापड़ा का प्रयोग करना काफी लाभकारी होता है। मोथा, पित्तपापड़ा, खस, चन्दन, सुगन्धवाला तथा सोंठ के काढ़े को 10-20 मिली की मात्रा में पीने से बुखार ठीक होता है।
  23. मोथा तथा पित्तपापडा के बराबर भाग का काढ़ा (10-30 मिली) अथवा देशी चिरायता, कालमेघ, गिलोय, मोथा तथा सोंठ का काढ़ा (10-30 मिली) या पीने से बुखार में लाभ होता है। काढ़ा न बनाना चाहें तो उपरोक्त पदार्थों बारीक कूट को छह गुणा पानी में रात भर भिगो कर रख दें। सुबह इसे छान लें, इस प्रकार तैयार पानी को शीतकषाय या हिम कहते हैं। इस शीतकषाय पानी को भी 10-30 मिली की मात्रा में सेवन करने से बुखार उतर जाता है।
  24. मोथा, जवासा, नेत्रबाला तथा कुटकी का काढ़ा बनाकर 10-30 मिली की मात्रा में सेवन करने से बुखार में लाभ होता है।
  25. गिलोय, नीम, पटोलपत्र, नागरमोथा, हरड़, बहेड़ा, आँवला तथा धनिया इनको समान मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इस 10-30 मिली काढ़े में शहद तथा शक्कर मिलाकर सेवन करने से बुखार समाप्त हो जाता है।
  26. कमलनाल, आँवला, चन्दन, गिलोय, मोथा, पित्तपापड़ा तथा धनिया को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े की 10-30 मिली मात्रा में शहद अथवा शक्कर मिलाकर सेवन करने से बुखार में लाभ होता है।
  27. समभाग सेंधा नमक, मोथा, बड़ी कटेरी तथा मुलेठी के चूर्ण का नस्य लेने (नसवार की तरह नाक में डालने या सूँघने से) से बुखार के कारण होने वाली बेहोशी समाप्त होती है।
  28. गिलोय, सोंठ, मोथा तथा पर्पट का काढ़ा बना लें। 10-30 मिली काढ़े को पीने से पित्त के कारण होने वाले बुखार में लाभ होता है। कफ के कारण होने वाले बुखार में सोंठ, वासा तथा मोथा के काढ़े को पीएं। अवश्य लाभ होगा।
  29. गुडूची, मोथा तथा आँवला से निर्मित क्वाथ (10-30 मिली) में मधु मिलाकर पीने से विषम बुखार यानी मलेरिया में लाभ होता है।
  30. 200 मिली जल में 5 ग्राम मोथा तथा पित्तपापड़ा डालकर पकाएं। ठंडा होने पर छानकर पीने से तेज चढ़ा नशा उतर जाता है।

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