विधारा (Elephant creeper)

     विधारा सदाबहार लता है जो भारतीय उपमहाद्वीप की देशज है। यहाँ से यह हवाई, अफ्रीका, केरेबियन देशों में गई है। इसे 'अधोगुडा' भी कहते हैं। इसकी दो प्रजातियाँ हैं: अर्गीरिया नर्वोसा प्रजाति नर्वोसा (Argyreia nervosa var. nervosa) तथा अर्गीरिया नर्वोसा प्रजाति स्पेसिओसा (Argyrea nervosa var. speciosa) जो आयुर्वेदिक औषधियों में प्रयुक्त होती है। अर्गीरिया नर्वोसा प्रजाति नर्वोसा से मन:प्रभावी औषधि (psychoactive drug) बनाए जाते हैं। वर्षा ऋतु में इसके फूल आते हैं। विधारा को घाव बेल भी कहते हैं। यह मांस को जल्दी भर देता है या कहें कि जोड़ देता है। आयुर्वेद में इसका प्रयोग रसायन यानी सातों धातुओं को पुष्ट करने वाले पदार्थ के रूप में किया जाता है। आधुनिक वैज्ञानिक समुद्रशोष को ही विधारा मानते हैं तथा दक्षिण में मुम्बई, सूरत आदि के बाजारों में बरधारा या विधारा के नाम से समुद्रशोष या फांग की मूल या शाखाओं के टुकड़े ही प्राय देखने में आते हैं। इसका एक मात्र कारण यही है कि समुद्रशोष (Salvia plebeia R. Br.) और विधारा में बहुत कुछ समानता पाई जाती है, लेकिन सच यह है कि दोनों पौधे पूरी तरह भिन्न हैं। इस समानता और भ्रम के कारण ही नेपाली और समुद्री इलाकों की भाषाओं तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, गुजराती आदि में इसका नाम समुद्रशोष से मिलता-जुलता है। कुछ विद्वान विधारा तथा निशोथ को एक ही पौधा मानते हैं, लेकिन यह पौधे भी आपस में पूर्णतया भिन्न है। विधारा के वृद्धदारक और जीर्णदारू नाम से दो भेद हैं। वृद्धावस्था का नाशक होने से वृद्धदारक कहलाता है। इसकी लता लंबे समय तक चिरस्थायी रहने से इसे वृद्ध कहा गया है। इसकी लता की आकृति बकरी की आंत जैसी टेढ़ी-मेढ़ी होने से इसे अजांत्री या छागलांत्रिका कहते हैं। विधारा की लता खूब लम्बी होती है। इसलिए यह दीर्घवल्लरी भी कहलाती है।

विधारा के उपयोग

  1. विधारा के जड़ को चावल के पानी के साथ पीसकर माथे में यानी ललाट पर लगाने से सिर दर्द ठीक हो जाता है।
  2. कई बार पेट में फोड़ा हो जाता है जिसमें बहुत सारे छेद होते हैं। इन्हें दबाने से इनमें से पीव भी निकलता है। ऐसे फोड़े को विद्रधि यानी बहुछिद्रिल फोड़ा या कार्बंकल कहते हैं। ऐसे फोड़े पर विधारा की जड़ को पीसकर लगाने से फोड़ा ठीक हो हो जाता है।
  3. पेट दर्द को ठीक करना हो तो विधारा के पत्तों के 5-10 मिली रस में शहद मिलाकर सेवन करें। 
  4. विधारा, भल्लातक तथा सोंठ, तीनों द्रव्यों को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस 2-4 ग्राम चूर्ण का सेवन गुड़ के साथ करने से बवासीर रोग में लाभ होता है।
  5. एक से दो ग्राम विधारा चूर्ण में शहद मिलाकर सेवन करना चाहिए। इससे पूयमेह यानी गोनोरिया में भी लाभ होता है।
  6. विधारा पेशाब को बढ़ाता है और जलन तथा दर्द में आराम दिलाता है। दो भाग विधारा की जड़ के चूर्ण में एक भाग गाय का दूध मिलाकर सेवन करें। अवश्य लाभ होगा।
  7. विधारा तथा प्लक्ष की जड़ के काढ़े को एक वर्ष तक प्रतिदिन सुबह सेवन करें। इससे स्त्री के गर्भवती होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
  8. विधारा के सत् (जूस) का प्रयोग करने से उपंदश यानी सिफलिस रोग ठीक होता है।
  9. विधारा चूर्ण को ठंडे या सामान्य जल के साथ सेवन करने से सफेद प्रदर में लाभ होता है।
  10. विधारा के पत्ते में एरण्ड तेल को लगाकर थोड़ा सा गरम करके अण्डकोष पर बाँध दें। इससे अण्डकोष की सूजन ठीक होती है।
  11. विधारा की जड़ एवं कई अन्य घटक द्रव्यों के द्वारा बनाए अजमोदादि चूर्ण का सेवन करने से अर्धांग पक्षाघात में लाभ होता है।
  12. विधारा मूल में बराबर भाग शतावर मूल मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को 15-30 मिली मात्रा में पीने से गठिया में लाभ होता है।
  13. विधारा की जड़ का काढ़ा बना लें। इसे 15-30 मिली मात्रा में पीने से अथवा 1-2 ग्राम विधारा की जड़ के चूर्ण का सेवन करने से जोड़ों के दर्द, आमवात यानी रयूमैटिस अर्थराइटिस तथा सभी प्रकार की सूजन में लाभ होता है।
  14. विधारा के पत्तों की सब्जी बनाकर खाने से वात के कारण होने वाले जोड़ों के दर्द आदि विकार ठीक होते हैं।
  15. गौमूत्र अथवा सौवीर कांजी के अनुपान से विधारा चूर्ण का सेवन करें। इससे एक वर्ष पुराने एवं कठिनाई से ठीक होने वाले हाथीपांव या फाइलेरिया रोग में भी लाभ होता है।
  16. 2-4 ग्राम विधारा की जड़ के चूर्ण को कांजी के साथ सेवन करने से हाथीपाँव रोग में लाभ होता है।
  17. त्रिकटु (पिप्पली, मरिच, सोंठ), त्रिफला (आँवला, हरीतकी, बहेड़ा), चव्य, दारुहल्दी, वरुण, गोक्षुर, अलम्बुषा तथा गुडूची के बराबर-बराबर भाग लें। इसका चूर्ण बना लें। सबके बराबर विधारा चूर्ण मिलाकर 10-12 ग्राम की मात्रा में काञ्जी के साथ सेवन करें। पच जाने पर इच्छानुसार भोजन करने से हाथीपाँव, मोटापा, जोड़ों के दर्द, पेट फूलना, कुष्ठ रोग, भूख न लगना आदि वात तथा कफ प्रधान रोग ठीक होते हैं।
  18. 2 भाग मिश्री, एक भाग विधारा मूल, आधा भाग हल्दी तथा चौथाई भाग काली मिर्च के बारीक चूर्ण लें। इसे 5-6 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन जल के साथ सेवन करें। इसके बाद हाथों पर लगाएं। इससे खून की खराबी के कारण होने वाले खाज में छह दिनों में ही काफी लाभ होने लगता है।
  19. विधारा के पत्तों के रस को लगाने से एक्जिमा रोग में लाभ होता है।
  20. विधारा के पत्तों को पीसकर घाव पर लगाने से घाव की शुद्धि होती है और वह शीघ्र भरता है।
  21. इससे चेचक के फोड़ों में भी लाभ होता है।
  22. विधारा के पत्तों के रस में करंज के बीज का तेल मिलाकर प्रयोग करने से मोटापे में लाभ होता है।
  23. सात दिनों तक मधु तथा घी मिला कर विधारा की जड़ के चूर्ण का सेवन करें। इसके बाद दूधयुक्त भोजन करने से शरीर की पुष्टि होती है।
  24. विधारा चूर्ण में बराबर भाग शतावरी चूर्ण मिलाकर सेवन करने से स्मरणशक्ति तेज होती है।
  25. विधारा की जड़ में पकाए घी को दूध के साथ सेवन करने से शारीरिक और मानसिक ताकत बढ़ती है।
  26. 5 मिली विधारा रस में बराबर भाग मधु मिलाकर आँखों में काजल की तरह लगाने से कुकूणक रोग यानी आँखों में लाली, खुजली, चौंधियाना आदि में लाभ होता है।

Comments

Popular posts from this blog

वेत्र (Common rattan)

खैर या खादिर (Black Catechu)

नींबू (Lemon)