सारिवा (Indian sarsaparilla)
सारिवा एक प्रकार की लता है। यह पेड़ों के ऊपर फैलती है। यह वर्षा ऋतु में हरी-भरी होती है। वर्षा की पहली बौछार से ही इसकी जड़ से नए अंकुरण होने लगते हैं। सारिवा के पौधे उत्तरी भारत, ख़ासकर पंजाब के जंगली क्षेत्रों में पाई जाती है। यह लाल मिट्टी वाली पहाड़ी भूमि में जहाँ कीचड़ हो, वहां अधिक मात्रा में पाई जाती है।सारिवा चार प्रकार की होती हैं।
- सारिवा (Hemidesmus indicus (Linn.) R. Br.)
सारिवा की लताएं लम्बी और पतली होती हैं तथा ज्यादातर जमीन पर फैलती हैं। ये नीचे से ऊपर की ओर जाती हैं। ये लताएं रसीली और चिकनी होती हैं। इसकी शाखाएँ लम्बी, चिकनी तथा पतली होती हैं। शाखाओं की संख्या अधिक होती है। लताओं का रंग हरी छाया लिए हुए भूरे रंग का होता है। कभी इन लताओं पर स्पष्ट रोएँ होते हैं तो कभी नहीं भी होते हैं। इसकी जड़ 30 सेमी लम्बी और 3-6 मिमी मोटी होती हैं। जड़ गोलाकार, कठोर एवं चारों ओर सफ़ेद रंग की होती हैं। जड़ की त्वचा भूरे रंग की होती है जिसकी चौड़ाई में दरार देखने को मिलती है। जड़ की लम्बाई में धारियाँ बनी होती है।
- कृष्ण सारिवा (Ichnocarpus frutescens (Linn.) R.Br.)
कृष्ण सारिवा को जड़ रूप से कुटज कुल की वनस्पति माना जाता है। इसकी पत्तियां छोटी और अंडाकार तथा लम्बाई में गोल होती हैं। इसकी जड़ में सुगंध नही होती।
- जम्बू पत्र सारिवा (Cryptolepis buchananii Roem. & Schult.)
यह अर्क कुल की वनस्पति है। इसकी पत्तियां जामुन की पत्तियों जैसी, चमकीले हरे रंग की होती हैं और तोड़ने पर दूधिया द्रव निकलता है।
- शैलुपत्री सारिवा (Decalepis hamiltonii Wight)
शैलपुत्री सारिवा की लताएं लम्बी, चिकनी और झाड़ीदार होती हैं। यह नीचे से ऊपर चढ़ती हैं। इसकी शाखाएं बहुत फैली हुई, पतली तथा कठोर होती है। इसके पत्ते अण्डाकार, चिकने, चमकीले तथा मोटी छाल वाले होते है। इसके फूल सफेद रंग के होते है। इसके फल भाला के आकार के, लम्बे, तथा पतले होते हैं। ये पत्ते आगे की और से नुकीले तथा आधार पर मोटे होते हैं।
सारिवा के उपयोग
- सिर के बाल खो चुके लोगों के लिए सारिवा वरदान है। इसकी जड़ के 2 ग्राम चूर्ण को दिन में तीन बार लेने से गंजेपन में लाभ होता है। इस चूर्ण को जल के साथ लिया जाना चाहिए।
- मण्डूर, कमल, सारिवा , भृंगराज तथा त्रिफला को तेल में पका लें। इस तैल पाक से सर की मालिश करें। ऐसा करने से डैंड्रफ दूर होता है।
- सारिवा की जड़ को बासी पानी में घिसकर आँखों में लगाने से आंख की फूली कट जाती है।
- इसके पत्तों की राख को कपड़े में छान लें। इसे शहद के साथ मिला लें। इस मिश्रण को आँखों में लगाने से भी से फूली कट जाती है।
- सारिवा के ताजे मुलायम पत्तों को तोड़ने से दूध जैसा द्रव्य निकलता है। इस दूध में शहद मिला लें। इस मिश्रण को भी आंखों में लगाने से आँखों की बीमारी में बहुत लाभ होता है और फूली कट जाती है।
- सारिवा के काढ़ा से आंखों को धोने से या काढ़ा में मधु मिलाकर लगाने से आँखों के विभिन्न रोगों में लाभ होता है।
- यदि मासिक धर्म चक्र में अनियमितता हो या ऐसी कोई अन्य समस्या हो तो सारिवा के काढ़ा में मधु मिला लें। इसे 15-30 मिली की मात्रा में पीने से इन समस्याओं से छुटकारा मिलता है।
- दांतों में दर्द हो या दांतों में कीड़े लगते हों तो सारिवा के पत्तों को पीसकर दांतों के नीचे दबा लें।
- दमा के इलाज के लिए सारिवा की जड़ और अडूसा के पत्ते के 4-4 ग्राम चूर्ण को मिला लें। इस मिश्रण में 2-4 ग्राम मात्रा में दूध मिलाएं। इस तरह तैयार मिश्रण का सुबह और शाम प्रयोग करने से लाभ होता है।
- पेट दर्द की हालत में सारिवा की 2-3 ग्राम जड़ को पानी में घोल लें। इस घोल को पीने से पीने से पेट का दर्द शांत हो जाता है।
- पाचन की गति धीमी (मन्दाग्नि) हो तो सारिवा की जड़ के 3 ग्राम चूर्ण को सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करें। ऐसा करने से जठराग्नि प्रदीप्त होती है और पाचन-क्रिया तेज होती है।
- सारिवा की जड़ की छाल के 2 ग्राम चूर्ण और 11 नग काली मिर्च को 25 मिली जल के साथ पीस लें। इस मिश्रण को सात दिन तक लगातार पिलाने से आँखों एवं शरीर का पीलापन दूर हो जाता है। इससे पीलिया के कारण भूख न लगने और बुखार आने की समस्या भी दूर हो जाती है।
- सारिवा की जड़ का 1-3 ग्राम चूर्ण सुबह और शाम सेवन करने से स्तन शुद्ध होते हैं। इसके सेवन से स्तन में दूध की मात्रा बढ़ती है। जिन महिलाओं के छोटे बच्चे बीमार और कमजोर हों, उन्हें सारिवा की जड़ का सेवन करना चाहिए।
- सारिवा की जड़ के 15-30 मिली फाण्ट में दूध और मिश्री मिलाकर मिश्रण बना लें। इस मिश्रण के सेवन से गर्भपात की आशंका दूर हो जाती है। गर्भधारण से पहले ही इसका यह फाण्ट पिलाना शुरू कर देना चाहिए। गर्भधारण हो जाने के बाद से प्रसव के समय तक यह पिलाने से बच्चा निरोग और गौरवर्ण का उत्पन्न होता है।
- सारिवा की जड़ को केले के पत्ते में लपेटकर भूभल (गरम राख या रेत आदि) में रख दें। जब पत्ता जल जाय तो जड़ को निकाल कर भुने हुए जीरे और शक्कर के साथ पीस लें। इस मिश्रण में गाय का घी मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से मूत्र और वीर्य संबंधी विकार दूर हो जाते हैं।
- लिंग में जलन होने की हालत में लिंग पर सारिवा की जड़ का लेप करने से जलन खत्म हो जाती है।
- सारिवा की जड़ के 5 ग्राम चूर्ण लें। इसे गाय के दूध के साथ दिन में दो बार सेवन करने से गुर्दे की पथरी ख़त्म होने लगती है। पेशाब में जलन होने की हालत में भी इसके सेवन से बहुत लाभ होता है।
- सारिवा की जड़ का 1-2 ग्राम चूर्ण लेकर इसे काढ़ा के रूप में 15-30 मिली तक सेवन करने से श्वेतप्रदर या ल्यूकोरिया में लाभ होता है।
- सारिवा की जड़ के 3 ग्राम चूर्ण को शहद के साथ दिन में 3 बार सेवन करें। इससे गठिया में लाभ होता है।
- बृहती, खस, परवल तथा सारिवा आदि द्रव्यों का काढ़ा बना लें। इससे स्नान करने पर और इसे पिलाने से कुष्ठ रोग में लाभ होता है।
- सारिवा, आँवला, खस तथा नागरमोथा का काढ़ा पीने से दाद-खाज आदि में लाभ होता है।
- सारिवा, कमल केसर, खस, नीलकमल, मंजिष्ठा, चन्दन, पठानीलोध्र तथा हरीतकी को समान मात्रा में मिलाकर पीस लें। इसका लेप करने से भी दाद-खाज तथा घाव आदि में लाभ होता है।
- सारिवा, जाती तथा कनेर के पत्तों का काढ़ा बना लें। इस काढ़ा से घाव को धोने से घाव साफ़ होता है और इसमें संक्रमण का ख़तरा कम होता है।
- सारिवा की जड़ को पीसकर लेप करने से सभी प्रकार के घाव साफ़ होते हैं।
- सारिवा की जड़ के 1-2 ग्राम चूर्ण का दूध के साथ सेवन करने से त्वचा सम्बन्धी विभिन्न विकार जल्द ही खत्म हो जाते हैं।
- खुजली, कुष्ठ आदि रोग जिनमें खून की शुद्धि से सुधार हो सकता है, उनमें सारिवा के प्रयोग से फ़ायदा होता है। इसके लिए 30 ग्राम सारिवा को जौ के साथ कूट कर एक लीटर जल में पकाएं। इस घोल का आठवाँ हिस्सा बच जाए तो इसे छान लें। इसमें 10-30 मिली मात्रा में मिश्री मिला लें। इस काढ़ा का सेवन करने से खुजली व कुष्ठ रोगआदि में सुधार होता है।
- सारिवा की 50 ग्राम जड़ को जौ के साथ कूट कर 500 मिली खौलते हुए जल में भिगो दें। इस काढ़ा को 2 घण्टे बाद मलकर छान लें। इस काढ़ा दिन में 4-5 बार 30 मिली पिलाने से खून और त्वचा के विकारों का नाश होता है।
- पीपल की छाल और सारिवा की जड़ को मिलाकर चाय के समान फाण्ट बनाकर सेवन करें। इससे पामा (खुजली), फोड़े-फुन्सी तथा गर्मी आदि समस्याओं में लाभ होता है।
- एक चम्मच सफेद जीरा में सरिवा की जड़ का एक चम्मच चूर्ण मिलाकर काढ़ा बनाकर पिलाने से खून साफ होता है।
- इसके सेवन से पित्त के विकार भी शांत होते हैं।
- सारिवा की जड़ का काढ़ा बनाकर 20-30 मिली मात्रा में पिलाने से फोड़े-फुन्सी, गंडमाला (गले के रोग) आदि रोगों में लाभ होता है।
- सारिवा की 1 ग्राम जड़ का चूर्ण तथा एक ग्राम वायविडंग चूर्ण मिलाकर पीस लें। यह मिश्रण खिलाने से मरणासन्न बच्चे भी नवजीवन पा जाते हैं।
- सारिवा की जड़ के 125 से 500 मिग्रा चूर्ण को घी में भून लें। इसे 5 ग्राम शक्कर के साथ मिलाकर कुछ दिन तक सेवन करने से चेचक, टाइफायड आदि रोगों में लाभ होता है।
- सारिवा की जड़ को पीसकर मस्तिष्क पर लेप करने से बुखार उतर जाता है।
- किसी भी प्रकार की बुखार की स्थिति में सारिवा की जड़, खस, सोंठ, कुटकी व नागरमोथा को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बनाएं। इस काढ़ा को आठवां भाग शेष रहने तक खौलाएं। इस तरह तैयार काढ़ा (sogade beru juice) को पिलाने से सब प्रकार के बुखार दूर होते हैं।
- विषम-ज्वर या टॉयफायड की स्थिति में सारिवा की जड़ की छाल की 2 ग्राम चूर्ण को सिर्फ चूना और कत्था लगे पान के बीड़े में रखकर खाने से लाभ होता है।
- परवल के पत्ते, सारिवा, नागरमोथा, पाठा तथा कुटकी को बराबर मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इसे 10-30 मिली की मात्रा में सेवन करने से विषम ज्वर यानि टॉयफायज ठीक हो जाता है।
- सारिवा, आमलकी, भूई-आमलकी, शालपर्णी, छोटी पीपल, सुंगधबाला, त्रायमाण, अंगूर, बेल, पृश्निपर्णी, चंदन, अतीस, मोथा तथा कुटज को मिला लें। इस काढ़ा का 10-30 मिली मात्रा में सेवन करने से विषम ज्वर या टॉयफायड ठीक हो जाता है।
- इससे क्षयरोग (टीबी), सर दर्द, भूख न लगना, दस्त, सूजन तथा पीलिया में भी लाभ होता है।
- सारिवा की जड़ के 125 से 500 मिग्रा चूर्ण को घी में भून लें। इसे 5 ग्राम शक्कर के साथ मिलाकर कुछ दिन तक सेवन करने से शरीर की जलन ख़त्म हो जाती है।

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