वृक्षाम्ल (Kokam butter tree )

     वृक्षाम्ल एक जड़ी-बूटी है। सदियों से आयुर्वदाचार्य वृक्षाम्ल का प्रयोग कर बीमारी को ठीक करने का काम करते आ रहे हैं। वृक्षाम्ल को कोकम भी कहा जाता है। यह एक सदाबहार वृक्ष होता है जिसकी शाखाएं छोटी और फैली हुई होती हैं। इसके फल गोलाकार, 2.5-3.8 से.मी. व्यास के होते हैं। फल पकने पर गहरे बैंगनी रंग के तथा उनमें 5-8 चिकने, चमकीले, भूरे रंग के बीज होते हैं। बीज निकालकर सुखाए हुए फल को कोकम या वृक्षाम्ल कहा जाता है। इसके बीजों से जो तेल निकलता है, वह मोम के समान जम जाता है।

कोकम का उपयोग

  1. 400 ग्राम कोकम के फल को चार लीटर पानी में डालकर एक चौथाई बचने तक उबालें। इसे छान लें और ठंडे स्थान पर रख दें। रोजाना सुबह इस रस को खाली पेट 100 मिली की मात्रा में सेवन करें। एक माह में ही वजन कम होगा।
  2. वृक्षाम्ल के पत्तों को बताशों के साथ बार-बार चबाने से सूखी खांसी में काफी लाभ होता है।
  3. वृक्षाम्ल के रस को मुंह में रखकर देर तक रख कर कुल्ला करने से अधिक प्यास लगाने की समस्या में लाभ होता है।
  4. कोकम के रस (यदि रस न प्राप्त हो तो इसका काढ़ा लें) में सेन्धा नमक डालकर पीने से गले के गाँठ की समस्या ठीक हो जाती है।
  5. वृक्षाम्ल, अनार के बीज, हींग, विड्नमक, पंचमूल, बेल, जीरा, धनिया, पिप्पली आदि द्रव्यों के साथ विधिपूर्वक चूरन बना लें। इसका विशेष अन्नपान भूख बढ़ाती है। यह पाचक, ताकत बढ़ाने वाला एवं रोचक होता है।
  6. 750 ग्राम वृक्षाम्ल फल में लगभग 300 ग्राम मिश्री तथा 35 ग्राम जीरा मिलाकर, चूर्ण बना लें। इसका सेवन करने से कब्ज नष्ट होता है और भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है।
  7. वृक्षाम्ल के ताजे फल के 5-10 ग्राम गूदे को खिलाने से खूनी पेचिश में लाभ होता है।
  8. वृक्षाम्ल बीज के 5 मि.ली. कोकम तेल को 200 मि.ली. दूध में मिलाकर पिलाने से पेचिश तथा खूनी पेचिश में लाभ होता है।
  9. सूखे फल के 2-3 ग्राम चूर्ण में घी तथा कोकम तेल मिलाकर गुनगुना करके सेवन करें। इससे दर्द तथा गैसयुक्त पेचिश में लाभ होता है।
  10. वृक्षाम्ल फल के चूर्ण में छोटी इलायची के दाने और शक्कर मिला लें। इसे चटनी बनाकर भोजन के साथ सेवन करने से एसिडिटी में लाभ होता है।
  11. वृक्षाम्ल फल से बनी चटनी या चूर्ण को दही में मिलाकर सेवन करें। इससे खूनी  बवासीर में होने वाला रक्तस्राव बंद हो जाता है।
  12. वृक्षाम्ल के बीज का तैल लगाने से होंठ, हाथ तथा पैरों की त्वचा के फटने में लाभ होता है।
  13. वृक्षाम्ल की छाल या फल के रस से मालिश करने से पित्तियाँ बैठ जाती हैं।
  14. धनिया (1 भाग), श्वेत जीरा (2 भाग), सौवर्चल नमक (1 भाग), सोंठ (1/4 भाग) तथा कपित्थ के गुदे (5 भाग) के सूक्ष्म चूर्ण में 16 भाग चीनी मिला लें। इसका सेवन करने से भूख की कमी तथा दस्त से पीड़ित टी.बी. रोगी को काफी लाभ होता है।
  15. वृक्षाम्ल आदि द्रव्यों से बने सैंधवादि चूर्ण को 1-3 ग्राम मात्रा में सेवन करें। इससे लंबी बीमारी के कारण हुई कमजोरी दूर होती है। यह चूर्ण काफी रुचिवर्धक व शक्ति बढ़ाने वाला होता है।
  16. कोकम को पेय के रूप में लू से बचने के लिए पीया जाता है क्योंकि ये शरीर की गर्मी को कम करने में सहायक होता है जिससे लू के लक्षणों में कमी आती है। 
  17. जंगली बेर, अनार, वृक्षाम्ल, चांगेरी तथा चूका के मिश्रित रस को मुंह के अंदर लेप के रूप में लगाएं। इससे शराब पीने के कारण लगी प्यास शांत हो जाती है।
  18. सौवर्चल नमक, जीरा, वृक्षाम्ल तथा अम्लवेतस बराबर मात्रा में लेकर उसमें आधा-आधा भाग दालचीनी, इलायची, काली मिर्च तथा एक भाग चीनी मिला लें। इसका चूर्ण बना लें। इसका सेवन करने से भूख बढ़ती है और शरीर स्वस्थ रहता है।

  • उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) के रोगियों को वृक्षाम्ल का सेवन नहीं करना चाहिए। 
  • इसके जमे हुए तेल के प्रयोग से कई बार चर्म रोग भी होते हैं।

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