पीलू (Meswak tree)
पीलू एक कांटेदार वृक्ष है।पीलू भारत में बिहार, राजस्थान, कर्नाटक, सिंध आदि शुष्क प्रदेशों में पाया जाता है। यह 500 मीटर की ऊँचाई तक पाया जाता है। इसके फल मीठे तथा स्वादिष्ट होते हैं। आयुर्वेदिक जानकार ये बताते हैं कि पीलू एक बहुत ही गुणी औषधि है। पेट के रोग, पथरी, बवासीर और तिल्ली विकार में पीलू का उपयोग कर लाभ पाया जा सकता है। इसकी टहनियों की दातून मुस्लिम संस्कृति में बहुत प्रचलित है। मिस्वाक की लकड़ी में नमक और खास क़िस्म का रेजिन पाया है जो दातों में चमक पैदा करता है। मिसवाक करने से जब इस की एक तह दातों पर जम जाती है तो कीड़े आदि से दन्त सुरक्षित रहतें हैं। इस प्रकार चिकित्सकीय दृष्टि से मिस्वाक दांतों के लिए बहुत लाभदायक है।पीलू का वृक्ष 2-3 मीटर ऊँचा होता है और इसकी दो जातियां होती है। इसकी शाखाएं कमजोर और नीचे की ओर झुकी हुई होती हैं। शाखाएं छोटी और हमेशा हरी रहती हैं। पीलू के फल 3 मिमी व्यास के, गोल, चिकने होते हैं। ये कच्ची अवस्था में हरे और पके अवस्था में लाल रंग के, चमकीले तथा रस-युक्त होते हैं। प्रत्येक फल में एक बीज होता है। फलों को मसलने से तेज गन्ध आती हैं। (1) छोटा पीलू, (2) बड़ा पीलू।
पीलू का उपयोग
- पीलू के फलों को खाने से मुंह के छाले की समस्या खत्म होती है।
- पीलू की लकड़ी का दातून करने से दांत तथा मसूड़े मजबूत होते हैं, इससे मुंह की बदबू खत्म होती है।
- पीलू के पत्तोंं का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से श्वास (सांस फूलना/दमा) और खांसी में लाभ होता है।
- पीलू के पेस्ट से पकाए हुए घी का सेवन करने से पेट के फूलने की समस्या में लाभ होता है।
- निशोथ, पीलू, अजवायन, कांजी आदि अम्ल द्रव्य तथा चित्रकादि पाचन द्रव्यों को मिलाकर सेवन करें। इससे पेट दर्द और आंतों के रोग में लाभ होता है।
- रोज सुबह 7 दिन से एक माह तक पीलू को अकेले या छाछ के साथ सेवन करें। इससे बवासीर, पेट की गैस, पाचन विकार, गुदा विकार आदि में लाभ मिलता है।
- सहिजन बीज, जड़ी बीज, कनेर पत्ते, पीलू वृक्ष की जड़, बेलगिरी तथा हींग को थूहर के दूध के साथ पीस लें। इसे बवासीर के मस्सों पर लेप करने से लाभ होता है।
- पीलू के तेल में बत्ती भिगोकर गुदा में रखने से बवासीर में लाभ होता है।
- पीलू के फलों का काढ़ा बनाकर 10-40 मिली मात्रा में पिएं। इससे मूत्र विकार ठीक होते हैं।
- 10-40 मिली पीलू की जड़ का काढ़ा पीने से सुजाक में लाभ होता है।
- बलाजड़, शतावरी जड़, रास्ना, दशजड़, पीलू फल, काली निशोथ, एरण्डजड़ तथा शालपर्णी के पेस्ट को दूध में पका कर सेवन करें। इससे गठिया में लाभ होता है।
- पीलू के पत्ते को पीसकर लगाने से भी जोड़ों के दर्द या गठिया में लाभ होता है।
- पीलू के पत्ते तथा निर्गुण्डी के पत्तोंं को समान मात्रा में लेकर पीस लें। इसे जोड़ों पर बांधने से जोड़ों के दर्द का ठीक होता है।
- पीलू की बीज के तेल की मालिश करने से जोड़ों का दर्द मिटता है।
- तिल्वक, नीम, पीलू, आरग्वध पत्ते, विडंग, कनेर बीज, हरिद्रा, दारुहरिद्रा, लघु तथा बड़ी कटेरी को जल में पीस लें। इसका लेप करने से सफेद दाग खत्म हो जाते हैं।
- पीलू के पत्तों को पीसकर आग से जले हुए स्थान पर लगाने से लाभ होता है।
- पीलू के पत्तों को पीसकर घाव के ऊपर लगाने से घाव में पीव नहीं बनती तथा घाव जल्दी भर जाते हैं।
- इसमें पीलू के रस का सेवन करना चाहिए। यह मद्यपान मतलब शराब पीने के बाद अत्यधिक प्यास लगने की समस्या खत्म होती है।
- पीलू के फलों का सेवन करने से पित्त की अधिकता से होने वाली बीमारियां जैसे- शुक्राणु विकार, कफ एवं वात दोष में लाभ होता है।
- पीलू के पत्तोंं को जैतून के तेल में पकाकर छान लें। इस तेल से मालिश करने से दर्द ठीक होता है।

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