कुटकी (Picrorhiza root)

     कुटकी एक जड़ी-बूटी है। आयुर्वेद में कुटकी के बारे में विस्तार से अनेक अच्छी और महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं। कुटकी का इस्तेमाल रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। बरसों से आयुर्वेदाचार्य मरीज को स्वस्थ करने के लिए कुटकी का उपयोग करते आ रहे हैं। कुटकी का स्वाद कड़वा और तीखा होता है। इसलिए इसे कटुम्भरा भी कहा जाता है।

कुटकी का उपयोग

  1. कुटकी चूर्ण का काढ़ा बना लें। 10-15 मि.ली. काढ़े में गोमूत्र अर्क मिलाकर पीने से गले के रोगों में लाभ होता है।
  2. कुटकी के काढ़े से गरारा करने से मुंह का स्वाद ठीक होता है और मुँह के छाले ठीक होते हैं। 
  3. कुटकी आदि औषधियों से बने काढ़े का 10-15 मि.ली. मात्रा में सेवन करें। इससे प्यास लगने, मुंह सूखने, शरीर की जलन और खाँसी आदि की परेशानी ठीक होती है।
  4. 1-2 ग्राम स्वर्ण गैरिक तथा कुटकी के बराबर मात्रा चूर्ण में मधु मिला लें। इसका सेवन करने से हिचकी में लाभ होता है।
  5. दुरालभा, पिप्पली, कुटकी और हरीतकी को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस 1-2 ग्राम चूर्ण में मधु एवं घी मिलाकर सेवन करने से खांसी में लाभ होता है।
  6. मुलेठी और कुटकी से बने 2 ग्राम पेस्ट को मिश्री युक्त जल में घोल लें। इसे पीने से पित्तज विकार के कारण होने वाले हृदय रोग में लाभ होता है।
  7. 2 ग्राम कुटकी चूर्ण  में 2 ग्राम शक्कर तथा मधु मिलाकर चाटने से एसिडिटी की परेशानी में लाभ होता है।
  8. 1-2 ग्राम कुटकी चूर्ण में 500 मिग्रा काली मिर्च का चूर्ण मिलाकर सेवन करने से पेट का  दर्द ठीक होती है।
  9. कुटकी का तेल बनाकर आमाशय पर मालिश करने से भी पेटदर्द ठीक होता है।
  10. कुटकी के 1-2 ग्राम चूर्ण में शहद मिलाकर खाने से भूख बढ़ती है।
  11. 20 मिली कुटकी के काढ़ा को 21 दिन तक नियमित सेवन करने से जलोदर रोग में लाभ होने लगता है।
  12. 5-10 ग्राम कटुकाद्य घी का सेवन करने से पीलिया, रक्तपित्त (नाक-कान से खून निकलने की परेशानी), बुखार, शरीर की जलन, सूजन, बवासीर, रक्तप्रदर (मासिक धर्म में अधिक खून आना) आदि रोगों में लाभ होता है।
  13. कुटकी के 10-12 ग्राम चूर्ण को मिश्री के साथ सेवन करने से पीलिया में लाभ होता है।
  14. कुटकी के 2 ग्राम चूर्ण में चीनी में मिलाकर गुनगुने जल के साथ खाने से पीलिया में लाभ होता है।
  15. बराबर मात्रा में कुटकी तथा निशोथ का चूर्ण लें। इनकी 3-6 ग्राम की मात्रा को गुनगुने पानी के साथ, सुबह और शाम सेवन करने से पीलिया में लाभ होता है।
  16. कुटकी की जड़ के 3-5 ग्राम चूर्ण को बराबर मात्रा में मधु के साथ सेवन करें। इसे रोज दिन में तीन बार सेवन करने से किडनी विकारों में लाभ होता है।
  17. यदि कब्ज भी हो तो दोगुनी मात्रा में गर्म जल के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करना चाहिए।
  18. दुरालभा, पिप्पली, कुटकी और हरीतकी को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस 1-2 ग्राम चूर्ण में मधु एवं घी मिलाकर सेवन करने से सांसों के रोग जैसे दमा में लाभ होता है।
  19. बराबर मात्रा में प्रियंगु, निर्गुण्डी बीज, कुटज बीज, अतिविषा, खस, लाल चंदन तथा कुटकी को पीस लें। इसके लेप को घाव पर लगाएं। इससे पित्तज विकार के कारण होने वाले कुष्ठ रोग के घाव ठीक होते हैं।
  20. मिट्टी के नए बर्तन में कुटकी का काढ़ा बनाकर छानकर रख लें। 20 मिली काढ़ा में 10-12 ग्राम घी मिलाकर पीने से बुखार तथा शरीर की जलन की परेशानी ठीक होती है।
  21. इंद्रयव, नागरमोथा तथा कुटकी का काढ़ा बनाकर ठंडा कर लें। इसमें मधु मिलाकर पीने से पित्तज विकार के कारण होने वाली बुखार में लाभ होता है।
  22. कुटकी के 2 ग्राम चूर्ण में 1 ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिला लें। इसे पीने से एक दिन रहने वाला बुखार, दमा तथा खांसी ठीक होती है।
  23. इंद्रयव, परवल के पत्ते तथा कुटकी से बने 10-20 मिली काढ़ा को पीने से मियादी बुखार या टॉयफाइड में लाभ होता है।
  24. परवल के पत्ते, सारिवा, नागरमोथा, पाठा तथा कुटकी से बने काढ़ा (10-20 मिली) या चटनी का प्रयोग करने से भी टॉयफॉयड में लाभ होता है।
  25. कुटकी का 10-20 मिली काढ़ा का सेवन करने से पित्तज विकार के कारण होने वाली बुखार में लाभ होता है।
  26. कुटकी के 1-2 ग्राम चूर्ण में बराबर मात्रा में नीम की छाल मिला लें। इस काढ़ा को पिलाने से बुखार तथा अत्यधिक प्यास लगने की परेशानी ठीक होती है।
  27. बराबर मात्रा में कुटकी, द्राक्षा, मुलेठी तथा नीम से काढ़ा बना लें। इस काढ़ा का 10-20 मिली मात्रा या चटनी का सेवन करें। इससे अथवा 2-3 ग्राम कुटकी चूर्ण में दोगुना चीनी मिलाकर नियमित सेवन करने से पित्तज विकार के कारण होने वाली बुखार और कफज विकार के कारण होने वाली बुखार में लाभ होता है।
  28. कुटकी के 1-2 ग्राम चूर्ण को चीनी के साथ सेवन करें। इसके बाद गुनगुना जल पीने से कफ-पित्त- बुखार में लाभ होता है।
  29. बराबर मात्रा में कुटकी, हरीतकी, द्राक्षा, नागरमोथा तथा पित्तपापड़ा का काढ़ा बना लें। इसे 25-50 मिली मात्रा में पीने से भी कफ-पित्तज बुखार में लाभ होता है।
  30. ज्वर-कुटकी, खस, बला, धनिया, पर्पट तथा नागरमोथा से काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मिली की मात्रा में सेवन करने से हर तरह के बुखार का नाश होता है।

  • कुटकी के प्रयोग से त्वचा में जलन उत्पन्न हो सकती है।
  • इसमें उपस्थित कुकुरबिटेसिन (Cucurbitacin) के कारण पेचिश की समस्या, पेट की गैस के परेशानी हो सकती है।
  • इसके साथ-साथ ठंड लगकर बुखार भी आ सकता है।

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