नागरमोथा (Umbrella edge), (Cypriol)

     नागरमोथा एक पौधा है जो पूरे भारत में खरपतवार के रूप में उगता है। इससे इत्र बनता है और औषधि के रूप में इसका उपयोग होता है। संस्कृत में इसे नागरमुस्तक या भद्र मुस्तक कहते हैं। यह नमी वाले तथा जलीय क्षेत्रों में अधिक पाया जाता है। नागरमोथा पूरे भारत में नमी तथा जलीय क्षेत्रों में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं। इसके झाड़ीनुमा पौधे समुद्र तल से 6 हजार फुट की ऊंचाई तक पाये जाते हैं। नागरमोथा नदी और नालों के किनारे की नमी वाली भूमि में पैदा होते हैं। पुष्प (फूल) जुलाई में तथा फल दिसम्बर के महीने में आते हैं। नागरमोथा तीखा और कड़वा होता है। इसकी तासीर ठंडी होती है। यह पचने में हल्का होता है। यह कफ, पित्त, खून की अशुद्धता को ठीक करने में सहायता करता है।  नागरमोथा का पौधा अधिकांशतः तालाबों और नदियों के किनारे नमी वाली जमीन में होता है। इसमें फूल जुलाई तथा फल दिसम्बर में लगते हैं। नागरमोथा तीन प्रकार का होता हैः– 1.मोथा 2.नागरमोथा 3.केवटीमोथा

     नागरमोथा का पौदा कोमल, पतला, सुगंधित और घास की तरह छोटा होता है। नागरमोथा का तना जमीन से ऊपर सीधा, तिकोना और बिना शाखा का होता है। नीचे कंद होता है, जिससे प्रकंद जुड़े होते हैं। ये गूदेदार सफेद होते हैं, लेकिन बाद में रेशेदार भूरे रंग के, और पुराने होने पर लकड़ी की तरह कठोर हो जाते हैं। इसके पत्ते विभिन्न आकार के, लम्बे, पतले, घास जैसे तथा कमजोर होते हैं। इसके भूमि में रहने वाले हिस्से में अंडाकार, सुगन्धित, बाहर से पीले रंग के दिखने वाले और अन्दर से सफेद दिखने वाले अनेक कन्द लगे रहते हैं। इन कंदों को ही नागरमोथा कहते हैं।
बाजारों में नागरमोथा के स्थान पर Cyperus diffusus Vahl नामक पौधे के प्रकन्द को बेचा जाता है। यह नागरमोथा से भिन्न दूसरी प्रजाति है। नागरमोथा के प्रकन्द सुगन्धित होते हैं, लेकिन इसके प्रकन्द नागरमोथा से कम गुण वाले और कम सुगन्धित होते हैं। 

नागरमोथा के उपयोग

नागरमोथा को बकरी के दूध व जल में घिसकर आँखों में काजल की तरह लगाएं। इससे आँखों में होने वाली जलन, लालिमा, कालापन व रात में कम दिखने की बीमारी ठीक होती है।
नागरमोथा प्रकंद का काढ़ा बनाकर ठंडा कर लें। इससे आँखों को धोने से नेत्र रोग में लाभ होता है।
नागरमोथा, सोंठ, हरीतकी, मरिच, पिप्पली, वायविडंग तथा नीम को पीस लें। इसमें गोमूत्र मिलाकर छाया में सुखा लें। इसकी वटी बना लें। रात में 1-2 मुंह में रखने से दाँतों के रोग में लाभ होता है।
नागरमोथा, पिप्पली, मुनक्का तथा बड़ी कटेरी के अच्छे पके फलों को बराबर-बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह घोट लें। इसे घी और मधु के साथ मिलाकर चाटें। इससे टीबी के कारण होने वाली सूखी खाँसी और अधिक प्यास लगने की समस्या में लाभ होता है।
अडूसा, सोंठ, नागरमोथा, भारंगी, चिरायता तथा नीम की छाल का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मि.ली. काढ़ा में मधु डालकर पिलाएं। इससे सूखी खाँसी तथा सांस के फूलने की समस्या ठीक ठीक होती है।
नागरमोथा, पित्तपापड़ा, उशीर (खस), लाल चन्दन, सुगन्धबाला, सोंठ को डालकर काढ़ा बना लें। इसे ठंडा करके रोगी को पिलाने से अधिक प्यास लगने की समस्या तथा बुखार ठीक होता है।
नागरमोथा, इंद्रजौ, मैनफल तथा मुलेठी को समान मात्रा में लेकर कूट-पीसकर लें। इसे कपड़े से छान लें। इसके चूर्ण में मधु मिलाकर सेवन करने से उलटी बंद होती है।
नागरमोथा की जड़ का काढ़ा बनाकर 10-30 मि.ली. मात्रा में पिलाने से पाचनक्रिया तेज होती है।
5-10 ग्राम नागरमोथा चूर्ण का सेवन करने से पेट के कीड़े खत्म होते हैं।
नागरमोथा, सोंठ तथा अतीस से बने काढ़े का सेवन करने से अनपच की समस्या ठीक होती है।
नागरमोथा, अतीस, हरड़ अथवा सोंठ चूर्ण को गर्म पानी के साथ सेवन करने से अपच की समस्या ठीक होती है।
10 ग्राम नागरमोथा तथा 10 ग्राम पित्तपापड़ा का काढ़ा बना लें। इसे सुबह और शाम भोजन से 1 घण्टा पहले पिएं। इससे बुखार तथा बुखार के कारण भूख न लगने की परेशानी ठीक होती है।
नागरमोथा का काढ़ा बनाकर सुबह, दोपहर तथा शाम को सेवन करने से अनपच के कारण होने वाली दस्त की समस्या ठीक होती है।
अदरक और नागरमोथा को पीस लें। इसे 2.5 ग्राम की मात्रा में मधु के साथ सेवन करें। इससे अनपच के कारण होने वाले दस्त में लाभ होता है।
बराबर मात्रा में सुंधबाला, नागरमोथा, बेल, सोंठ तथा धनिया का काढ़ा बना लें। इससे 10-40 मि.ली. की मात्रा में पीने से दस्त में लाभ होता है।
3-6 ग्राम नागरमोथा चूर्ण में 125 मि.ग्रा. लौह भस्म मिलाकर खैर सार काढ़ा के साथ पीने से पीलिया (हलीमक) रोग में लाभ होता है।
नागरमोथा का ठंडा काढ़ा पीने से हैजा रोग ठीक होता है। इस रोग के लिए नागरमोथा का प्रयोग करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर सलाह लें।
पिप्पली मूल, अकरकरा, नागरमोथा, अजगंध, वच, पीपर तथा काली मिर्च एक-एक भाग लें। इन सबके समान भाग में सोंठ तथा गुड़ मिलाकर 2.5 ग्राम की गोली बनाएं। सुबह और शाम एक-एक गोली सेवन करने से सन्धिवात (गठिया), जोड़ों का दर्द (ग्रन्थिवात) तथा वात दोष के कारण होने वाले अन्य रोग ठीक होते हैं।
नागरमोथा, हल्दी तथा आंवला को काढ़ा बनाकर ठंडा होने दें। इसे मधु मिलाकर सेवन करने से गठिया रोग में लाभ होता है।
यदि स्तनपान कराने वाली महिलाओं को दूध कम हो रहा है तो नागरमोथा को जल में उबाल लें। इसे पिलाने से दूषित दूध शुद्ध हो जाता है।
ताजे नागरमोथा को पीसकर माता के स्तनों पर लेप करने से दूध की वृद्धि होती है।
नागरमोथा, पिप्पली, मुनक्का तथा बड़ी कटेरी के अच्छे पके फलों को बराबर-बराबर मात्रा में लें। इसे अच्छी तरह घोटकर घी और मधु के साथ मिलाकर चाटें। इससे सूखी खाँसी में फायदा होता है।
अडूसा, सोंठ, नागरमोथा, भारंगी, चिरायता तथा नीम की छाल का काढ़ा बना लें। 10-20 मि.ली. काढ़ा में मधु डालकर पिलाने से सूखी खाँसी ठीक होती है।
नागरमोथा का काढ़ा बनाकर 50 मि.ली. मात्रा में सुबह और शाम पिलाने से सूजाक में लाभ होता है।
नागरमोथा, दारुहल्दी, देवदारु तथा त्रिफला को समान मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। इसे 10-40 मि.ली. काढ़ा सुजाक के रोगी को सुबह और शाम देना चाहिए।
अगर कंठ में जोंक चिपक गई हो तो नागरमोथा के कन्द को मुंह में रखने से निकल जाती है, लेकिन इस प्रयोग को करने से पहले किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से जरूर सलाह लें।
10 ग्राम नागरमोथा को पीस लें। उसमें 50 ग्राम गुड़ मिलाकर 5-5 ग्राम की गोलियां बनाकर खाने से मासिक धर्म संबंधी विकारों में लाभ होता है।
नागरमोथा की जड़ का पेस्ट एवं काढ़े का सेवन करने से मासिक धर्म विकारों में फायदा होता है।
नागरमोथा, मुलेठी, कैथ की पत्ती तथा लाल चंदन को समान मात्रा में लेकर पीस लें। इसका लेप लगाने से फुंसियां ठीक होती हैं।
नागरमोथा के ताजे प्रकंद को घिसकर गाय का घी मिला लें। इसे घाव पर लगाने से घाव ठीक होता है।
उत्तर-दिशा की तरफ से नागरमोथा को पुष्य नक्षत्र में उखाड़ लें। इसे गाय के दूध के साथ पिलाने से अपस्मार (मिरगी) रोग में लाभ मिलता है।
नागरमोथा, सिंघाड़ा, धान का लावा, खजूर, कमल तथा केशर को समान भाग लें। इनका चूर्ण बना लें। 3 ग्राम चूर्ण को मधु के साथ रक्तपित्त के रोगी को दिन में तीन से चार बार चटाएं। इससे लाभ होता है।
नागरमोथा की जड़ के काढ़े का सेवन और काढ़े से घाव को धोने से उपदंश (सिफलिस) रोग में लाभ होता है।
नागरमोथा और गिलोय का काढ़ा बना लें। इसे 20-30 मि.ली. मात्रा में पिलाने से बुखार में लाभ होता है।
नागरमोथा और पित्तपापड़ा का काढ़ा बनाकर 20-40 मि.ली. की मात्रा में पिलाएं। इससे ठंड लगकर आने वाले बुखार में लाभ होता है। इससे पाचन-शक्ति बढ़ती है।
नागरमोथा, सोंठ तथा चिरायता को 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बना लें। यह काढ़ा कफ, वात, अपच तथा बुखार को ठीक करता है, तथा पाचन-क्रिया को बढ़ाता है।
नागरमोथा की जड़ का काढ़ा बनाकर 10-40 मि.ली. मात्रा में पीने से बुखार उतर जाता है।
गिलोय, सोंठ, नागरमोथा, हल्दी तथा धमासा का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मि.ली. काढ़ा में 500 मिग्रा पिप्पली का चूर्ण डालकर पीने से वातज-बुखार में लाभ होता है।
मुनक्का, अमलतास, नागरमोथा, पित्तपापड़ा तथा हरड़ का काढ़ा बना लें।  इसे 10-20 मि.ली. काढ़ा में शहद मिलाकर पीने से पित्तज-बुखार में लाभ होता है।
नागरमोथा, सोंठ, चिरायता, पित्तपापड़ा तथा गिलोय का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मि.ली. मात्रा में पिलाने से वात-पित्तज बुखार में लाभ होता है।
धान्यक, नेत्रवाला, नागरमोथा, हल्दी, हरड़ तथा जीरा का काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मि.ली. मात्रा में पीने से कफ-पित्तज बुखार में लाभ होता है।
नागरमोथा, छोटी कटेरी, गुडूची, शुण्ठी तथा आँवला से काढ़ा बना लें। इसमें पिप्पली चूर्ण 2.5-5 ग्राम तथा मधु 5 ग्राम मिलाकर पीने से टायफॉयड ठीक हो जाता है।
नागरमोथा, गिलोय, सोंठ, धमासा, आँवला, दोनों कटेरी, नीम की छाल तथा भृंगराज को समान भाग लेकर काढ़ा बना लें। इसे 10-20 मि.ली. में मधु डालकर पिलाने से भी टायफॉयड में लाभ होता है।
खूनी दस्त या डीसेंट्री में नागरमोथा को अदरक और मधु के साथ दे सकते हैं। 
नागरमोथा की जड़ का पेस्ट एवं काढ़ा बनाकर सेवन करें। इससे एनीमिया (खून की कमी), शारीरिक कमजोरी, कमर का दर्द तथा सूजन आदि में लाभ होता है।
छाछ के साथ नागरमोथा के चूर्ण का सेवन करने से पेशाब खुल कर आता है। 
नागरमोथा कंद को पीसकर बिच्छु या अन्य कीड़े-मकौड़ों के काटने वाले स्थान पर लेप के रूप में लगाएं। इससे बिच्छू के डंक से होने वाला दर्द ठीक होता है।
देवदारु, सरसों तथा नागरमोथा के समान भाग चूर्ण को मक्खन में मिलाकर लेप करने से भिलावे का विष उतर जाता है।



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