कुरी (Beggar tick)

     यह सर्वत्र उष्णकटिबंधीय भागों में सड़क के किनारे पर परती भूमि पर पाया जाता है। भारत में यह साधारणतया 2000 मी की ऊँचाई पर खरपतवार के रूप में पाया जाता है। यह लगभग 60- 90 सेमी0 तक ऊचा शाकीय पौधा है। इसके पुष्प पीत वर्ण के होते हैं।

कुरी के उपयोग

  1. कर्णशूल-ताजे पौधे से प्राप्त स्वरस को 1-2 बूंद कान में डालने से कर्णशूल में लाभ होता है।
  2. श्वासकष्ट-इसके मूल एवं बीज का प्रयोग श्वासकष्ट में किया जाता है।
  3. 2-5 ग्राम मूल का क्वाथ बनाकर पीने से श्वास तथा कास में लाभ होता है।
  4. 1-2 चम्मच पत्र स्वरस को नियमित रूप से कुछ समय तक पिलाने से प्रमेह में लाभ होता है तथा उदरकृमियों का शमन होता है।
  5. 5 ग्राम बीज तथा मूल का क्वाथ बनाकर, इसमें अजवायन मिलाकर पिलाने से मासिक-विकारों में लाभ होता है।
  6. व्रण-पञ्चाङ्ग को पीसकर व्रण में लगाने से व्रण का रोपण होता है।
  7. इसके पत्रों को पीसकर रस निकालकर अंगुलियों के मध्य में होने वाले व्रणों पर लगाने से व्रण का रोपण होता है।
  8. पत्रों को पीसकर लगाने से कण्डू का शमन होता है।
  9. 5 ग्राम पञ्चाङ्ग का क्वाथ बनाकर पीने से जीर्ण ज्वर तथा रक्तार्बुद में लाभ होता है।
  • इसका प्रयोग गर्भावस्था में नहीं करना चाहिए।
  • इस पौधे में अनेक कौमेरिन डेरीवेटिव्स पाए जाते है। इसलिए यह रक्त को पतला कर सकता है।
  • जिन रोगियों में कैफीन के प्रति एलर्जी हो, उन्हें इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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