रामबाँस (Century Plant)

     यह पौधा समस्त भारत के शुष्क वन्य भागों में साधारणतया खुले स्थानों एवं सड़कों के किनारे पाया जाता है। स्थानीय लोग इसकी पत्तियों का प्रयोग रस्सी बनाने के लिए करते हैं। रामबाँस की एक प्रजाति से निकलने वाले कन्द को कई स्थानों पर लोग कन्दमूल के नाम से बेचते हैं। इसका पौधा प्रकन्दयुक्त होता है
इसके पत्र  मोटे, अग्रभाग पर नुकीलें, बड़े तथा किनारों पर कांटो से युक्त होते हैं। इसके पत्र देखने में घृतकुमारी के पत्रों जैसे किन्तु उससे बड़े, मोटे व कठोर होते हैं। इसके पुष्प श्वेत अथवा पीताभ-हरित वर्ण के होते हैं।
उपरोक्त वर्णित मुख्य प्रजाति के अतिरिक्त निम्नलिखित दो प्रजातियों का प्रयोग भी चिकित्सा में किया जाता है।
Agave angustifolia Haw. (पाण्डर पर्णिका)- यह भारत के हिमालयी तथा पहाड़ी क्षेत्रों में पाया जाता है। कई स्थानों पर शोभनीय पौधे के रूप में लगाया जाता है। यह बहुवर्षायु पौधा होता है, इसके पत्ते सीधे, दोनों सिरों पर पतले, किनारों पर कटे हुए तथा चक्करदार क्रम में व्यवस्थित होती है। इस पौधे में सैपोजेनिन पाया जाता है तथा सैपोनिन, कार्टीसोन ड्रग्स का स्रोत होता है। इस पौधे का प्रयोग संधिवात, ज्वर, गृधसी, त्वक्विकार तथा अनूर्जता जन्य विकारों की चिकित्सा में किया जाता है।
Agave sisalana Perrine (दामपर्णी, रज्जुपर्णिका)- यह बहुवर्षायु, मध्यमाकार शाकीय क्षुप है। इसका काण्ड छोटा होता है। इसके पत्र गहरे हरे रंग के, मोटे, मांसल तथा शूक रहित होते है। ये पत्र चक्करदार क्रम में व्यवस्थित होते है। इसके काण्ड तथा पत्र में रेशे प्राप्त होते है। अत कई स्थानों पर इसकी खेती की जाती है। इसका प्रयोग सन्धिवात, ज्वर तथा त्वचा विकारों में चिकित्सा में किया जाता है।

रामबाँस के उपयोग

  1. कर्णशूल-1-2 बूँद रामबाँस पत्र-स्वरस को कान में डालने से कर्णशूल का शमन होता है।
  2. उदर-विकार-रामबाँस पत्र-क्वाथ (10-15 मिली) या स्वरस (5 मिली) का सेवन करने से उदर-विकारों का शमन होता है।
  3. रामबाँस पत्र तथा पुष्प को उबालकर बफारा देने से शोथ में लाभ होता है।
  4. मूत्रकृच्छ्र-5 मिली रामबाँस पत्र-स्वरस का सेवन करने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
  5. उपदंश-रामबाँस पत्र-स्वरस का लेप करने से उपंदश में लाभ होता है।
  6. रामबाँस के पत्रों का क्वाथ बनाकर तथा फिटकरी मिलाकर योनि का प्रक्षालन करने से योनिदाह, योनिकण्डू तथा योनिदौर्गन्ध्य का शमन होता है।
  7. रोमकूपशोथ-रामबाँस पत्र को पीसकर लगाने से रोमकूपशोथ, दाह, शोथ तथा अन्य त्वक् विकारों का शमन होता है।
  8. रामबाँस के पत्र-स्वरस में सिरस तथा नीम पत्र-स्वरस मिलाकर घाव को धोने से घाव का शोधन तथा रोपण होता है।
  9. 5 मिली रामबाँस पत्रस्वरस में समभाग नीम पत्र-स्वरस मिलाकर सेवन करने से फिरंङ्ग में लाभ होता है।
  10. रामबाँस के पत्रों को बीच से फाड़कर हल्का गर्म कर शोथ में बाँधने से लाभ होता है।

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