सुगंधबाला (Fragrant swamp mallow)

     सुगंधबाला 1 मी तक ऊँचा, सीधा, शाकीय पौधा होता है। इसकी जड़ 42.5-50 सेमी लम्बी, 6 मिमी मोटी, चिकनी, भूरे रंग की होती है। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इसकी सुगंध कस्तूरी की तरह होती है। सुगन्धबाला कड़वा, छोटा, लघु, रूखा और ठंडे तासीर का होता है। यह पित्त और कफ कम करनेवाला, पाचक शक्ति व खाने की रुचि बढ़ाने वाला, जलन व बार-बार प्यास लगने की इच्छा कम करने वाला तथा घाव को जल्दी सूखाने में मदद करनेवाला होता है। पूरे भारतवर्ष में  सुगंधबाला खरपतवार के रुप में पाया जाता है। 

सुगंधबाला के उपयोग

  1. हरीतकी को गोमूत्र में पकाकर चूर्ण बनाकर, उसमें जटामांसी, ह्रीबेर तथा कूठ का चूर्ण मिला कर सेवन करने से मुँह की दुर्गंध तथा अन्य मुखरोगों में लाभ होता है।
  2. स्वर्ण गैरिक तथा ह्रीबेर के सूक्ष्म चूर्ण (1-3 ग्राम) में मधु मिलाकर चावल के धोवन में घोलकर पीने से उल्टी में लाभ होता है।
  3. सुगंधबाला से बने पेस्ट को तण्डुलोदक के साथ मिलाकर कर सेवन करने से उल्टी (वमन) में लाभ होता है।
  4. सोंठ तथा ह्रीबेर से षड्ङ़्गपानीय-विधि द्वारा सिद्ध जल का सेवन करने से अतिसार या दस्त को रोकने में मदद मिलती है।
  5. बेल फल मज्जा, दारुहल्दी, दालचीनी तथा ह्रीबेर चूर्ण (2-4 ग्राम) में मधु मिला कर सेवन करने से तथा अनुपान में चावल के धोवन को पीने से भी दस्त में आराम मिलता है।
  6. सुगन्धबाला, धातकीपुष्प, लोध्र, पाठा, लज्जालू, कुटजत्वक्, धनिया, अतीस, नागरमोथा, गुडूची, बिल्वमज्जा तथा शुण्ठी मिलाकर जो काढ़ा बनता है। उसका 10-30 मिली सेवन करने से अतिसार, अरुचि लाभ होता है।
  7. चावल के धोवन में ह्रीबेर का सूक्ष्म चूर्ण, (1-2 ग्राम) शर्करा तथा मधु मिलाकर बच्चों को मात्रानुसार पिलाने से सभी प्रकार के अतिसार, प्यास, जलन से आराम पाने में मदद मिलती है।
  8. समान मात्रा में में चंदन, ह्रीबेर, खस तथा पद्मकाष्ठ चूर्ण का लेप बनायें और उसको सिर पर लेप की तरह लगाने से प्यास लगना कम होता है।
  9. मोथा, खस, इंद्रयव, सुगन्धबाला, मोचरस तथा बिल्वमज्जा इन सब चीजों को पीसकर पेस्ट बना लें। इस पेस्ट से सिद्ध घी का प्रयोग करने से संग्रहणी (पेचिश) रोग में लाभ होता है।
  10. ह्रीबेर तथा सोंठ से सिद्ध जल में मधु मिलाकर सेवन करने से पित्तज अर्श जन्य तृष्णा का शमन होता है।
  11. ह्रीबेरादिघृत का सेवन करने से सभी प्रकार के अर्श, अर्श जनित शूल, अतिसार, प्रवाहिका, गुदामार्ग से पिच्छास्राव, गुदभ्रंश, मूत्रकृच्छ्र, ग्रहणी आदि रोगों में लाभ होता है।
  12. पुण्डरिया काठ, सुगन्धबाला, दारुहल्दी, मुलेठी तथा बला को अलग-अलग अथवा एक साथ मिलाकर, पीसकर, घी मिलाकर लेप करने से विसर्प या हर्पिस में लाभ होता है।
  13. सुगन्धबाला का पेस्ट बनाकर स्मॉल पॉक्स के पर लगाने से आराम मिलता है।
  14. सुगन्धबाला से सिद्ध जल का सेवन करने से मदीरा पीने या नशा करने की आदत छुट सकती है।
  15. सुगन्धबाला, खस, नागरमोथा, पित्तपापड़ा, सोंठ तथा लाल चंदन के औषधियों से बने काढ़ा (10-30 मिली) का सेवन करने से बुखार तथा बुखार के कारण जो जलन व प्यास में लाभ होता है।
  16. ह्रीबेरादि योग (ह्रीबेर, विकंकत सारिवा, आदि) के चूर्ण को लगाने से विषाक्त प्रभाव कम होता है।

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