बड़हल (Monkey jack)

     बड़हल या बड़हर या एक फलदार वृक्ष है। इसका वृक्ष १०-१५ मीटर ऊँचा होता है। इसकी पत्तियाँ २५-३० सेमी लम्बी एवं १५-२० सेमी चौड़ी होती हैं। इसके फल गोल आकार के या बेडौल होते हैं। हरे रंग का कच्चा फल पकने पर पीला हो जाता है जिसे खाया जाता है। इसके अन्दर छोटे-छोटे कोए (जैसे कटहल में) होते हैं। फल का आकार २ से पाँच इंच का होता है। उत्तरी भारत के अर्ध सदाहरित एवं आर्द्र पर्णपाती जंगलों व उष्णकटिबंधीय हिमालय में लगभग 1200 मी की ऊँचाई तक पाया जाता है। मुख्यत यह उड़ीसा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडू तथा अंडमान द्वीप में पाया जाता है। समस्त फलों में इसका फल निकृष्ठ माना जाता है।

बड़हल के उपयोग

  1. नेत्र रोग-5-10 मिली लकुच स्वरस में सैंधवनमक तथा शहद मिलाकर कांसे (कांस्य पात्र) के बर्तन में रगड़कर, अञ्जन (काजल) की तरह लगाने से पिल्ल नामक नेत्र रोग का शमन होता है।
  2. कर्णरोग-लकुच के फल में थोड़ा नमक डालकर रख दें तथा फिर रगड़कर उसका रस निकाल लें, इस रस (1-2 बूँद) को लगातार तीन दिन तक कान में डालने से कान की पीड़ा तथा पूय (मवाद) का शमन होता है।
  3. मुखशोधनार्थ-आर्दक को लकुच स्वरस में डालकर भोजन के पूर्व चूसने से मुखशोधन होता है।
  4. प्रवाहिका-10 मिली लकुच फल स्वरस को 40 मिली बकरी के दूध के साथ मिलाकर प्रातकाल सेवन करने से रक्त एवं पीड़ा से युक्त प्रवाहिका का शमन होता है।
  5. अवबाहुक-हरिद्रा, शतपुष्पा, देवदारु, सर्जरस तथा लकुच के रस से सिद्ध तैल को लगाने से अवबाहुक में लाभ होता है।
  6. कुष्ठ-बाण (सैरेयक) के पत्तों का रस तथा लकुच के कल्क में तैल मिलाकर लेप करने से उपद्रव युक्त कुष्ठ (कोढ़) रोग में लाभ होता है।
  7. व्रण (घाव)-लकुच स्वरस, हरिद्रा, गन्धक एवं पुन्नाग से सिद्ध तैल में गोमूत्र एवं नमक मिलाकर व्रण में लगाने से व्रण का शोधन तथा रोपण होता है।
  8. रोमकूप शोथ-गूलर या लकुच (बड़हल) वृक्ष के आक्षीर का लेप करने से रोमकूपशोथ का शमन होता है।
  9. खुजली-लकुच पत्र-स्वरस का लेप करने से खुजली का शमन होता है।
  10. विपादिका-लकुच पत्र-स्वरस को विपादिका (बिवाई) में लगाने से लाभ होता है।
  11. ज्वर-बड़हर काण्डत्वक् का क्वाथ बनाकर 15-20 मिली मात्रा में पिलाने से ज्वर में लाभ होता है।

Comments

Popular posts from this blog

वेत्र (Common rattan)

खैर या खादिर (Black Catechu)

नींबू (Lemon)