लताकस्तूरी (Musk-mallow)

     भारत के समस्त उष्णकटिबंधीय प्रदेशों विशेषतया महाराष्ट्र, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश तथा उत्तराखण्ड के कई स्थानों पर इसकी खेती की जाती है। इसके पौधे देखने में भिण्डी के समान होते हैं। लता कस्तूरी का पौधा पूर्ण रूप से रोमो से आवृत होता है। इसके पुष्प भिण्डी के पुष्प के समान, बड़े, पीत वर्ण के, मध्य में बैंगनी वर्ण के, बिन्दु से होते हैं। इसके फल रोमों से युक्त तथा अग्र भाग पर नुकीले होते हैं। इसके बीज कृष्ण अथवा धूसर भूरे वर्ण के तथा कस्तूरी गंधी होते हैं। लताकस्तूरी की कई प्रजातियां पाई जाती है जो आकार प्रकार में इसके समान दिखाई देती है परन्तु यह गुणों में अल्प होती है। उपरोक्त वर्णित मुख्य लताकस्तूरी के अतिरिक्त निम्नलिखित दो प्रजातियों का प्रयोग भी चिकित्सा में किया जाता है।
Abelmoschus crinitus Wall.  (अरण्यकस्तूरिका)- यह लताकस्तूरी की तरह दिखने वाला 0.5-1.5 मी तक ऊँचा रोमश क्षुप होता है। इसके पत्र 10-15 सेमी चौड़े तथा हस्ताकार व लताकस्तूरी के जैसे होते हैं। इसके पुष्प पीत वर्ण के तथा फल लताकस्तूरी से छोटे, रोमश तथा कोणीय होते है।
Abelmoschus manihot (Linn.) Medik. (वन्यकरपर्णिका)- यह सीधा शाखाप्रशाखायुक्त रोमश काष्ठीय क्षुप होता है। इसके पत्र 3-7 पालीयुक्त, हस्ताकार, रोमश, खुरदरे तथा 10-15 सेमी चौड़े होते हैं। इसके पुष्प पीत वर्ण के होते हैं, इसके फल कोणीय लताकस्तूरी की तरह दिखने वाले व लताकस्तूरी से अल्प गुण वाले होते हैं। इसका प्रयोग रोमकूपशोथ, व्रण आदि त्वचा विकारों की चिकित्सा में किया जाता है।

लताकस्तूरी के उपयोग

  1. नेत्र विकार-लता कस्तूरी के बीजों को पीसकर नेत्रों में लगाने से नेत्र विकारों का शमन होता है।
  2. लता कस्तूरी के फल का हिम बनाकर गरारा करने से मुख की शुद्धि होती है, भोजन के प्रति अरुचि नष्ट होती है तथा मुख सुंधित होता है।
  3. कण्ठ विकार में फायदेमंद है कस्तूरी लता कस्तूरी के 1-2 बीजों को चूसने से कंठ विकारों का शमन होता है।
  4. खाँसी से आराम दिलाती है लता कस्तूरी -लता कस्तूरी पञ्चाङ्ग को पीसकर छाती पर लेप करने से खाँसी में लाभ होता है।
  5. 5-10 मिली लता कस्तूरी पत्र-स्वरस में शहद मिलाकर पिलाने से खाँसी का शमन होता है।
  6. लता कस्तूरी के बीजों का फाण्ट बनाकर 25-30 मिली मात्रा में पिलाने से तमक श्वास, तंत्रिका दौर्बल्य, योषापस्मार तथा अन्य तंत्रिका विकारों में लाभ होता है।
  7. मूत्रकृच्छ्र-5 मिली लता कस्तूरी मूल तथा पत्र-स्वरस को पिलाने से मूत्रकृच्छ्र में लाभ होता है।
  8. प्रमेह में फायदेमंद है लता कस्तूरी  –लता कस्तूरी मूल तथा पत्र का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पिलाने से प्रमेह में लाभ होता है।
  9. योनिरोग में लाभदायक है लता कस्तूरी  –लता कस्तूरी पत्र तथा मूल से प्राप्त पिच्छिल पदार्थ (Mucilage) को योनि में लगाने से योनिरोगों में लाभ होता है।
  10. शुक्रमेह-लता कस्तूरी बीज चूर्ण का सेवन कराने से शुक्रमेह में लाभ होता है।
  11. लता कस्तूरी बीज को दूध के साथ पीसकर कण्डू प्रभावित भाग पर लगाने से कण्डू का शमन होता है।
  12. लता कस्तूरी काण्डत्वक् को पीसकर लगाने से क्षत, रोमकूपशोथ तथा व्रण में लाभ होता है।
  13. ज्वर से आराम दिलाती है लता कस्तूरी –5 मिली लता कस्तूरी के ताजे पत्र-स्वरस को पिलाने से ज्वर का शमन होता है।

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