जटामांसी (Musk root)
जटामांसी हिमालय क्षेत्र में उगने वाला एक सपुष्पी औषधीय पादप है। इसका उपयोग तीक्ष्ण गंध वाला इत्र बनाने में होता है। इसे जटामांसी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी जड़ों में जटा (बाल) जैसे तन्तु लगे होते हैं। इसे मारवाङी में'बालछड़' नाम से भी जाना जाता है।
जटामांसी का उपयोग
- समान मात्रा में जटामांसी, बला, कमल तथा कूठ को पीसकर सिर पर लेप करने से बालों का गिरना कम हो जाता है और असमय बालों का सफेद होना भी कम होता है।
- जटामांसी को पीसकर या इसके पाउडर का मस्तक पर लेप करने से सिर का दर्द कम होता है।
- समान मात्रा में जटामांसी, कूठ, काला तिल, सारिवा तथा नीलकमल को दूध से पीसकर मधु मिलाकर सिर पर लेप करने से बाल लंबे होते हैं और चमक आती है।
- पद्मकाठ, मुलेठी, जटामांसी तथा कालीयक को ठंडे जल में पीसकर छानकर उससे नेत्रों या आँखों को धोने से पित्त के कारण जो आँख संबंधी रोग होता है उसमें लाभ होता है।
- जटामांसी चूर्ण से दाँतों मांजने से मुँह की दुर्गंध दूर होती है। इसके अलावा जटामांसी का काढ़ा बनाकर गरारा करने से भी मुख से बदबू आना कम होता है।
- हल्दी, तेजपत्र, एरण्ड की जड़, कच्ची लाख, मन शिला, देवदारु, हरताल तथा जटामांसी को पीसकर वर्ति या बत्ती बनाकर घी में भिगो कर उसका धूम्रपान करने से श्वासनली में चिपका हुआ कफ पतला होकर बाहर निकालने में मदद मिलती है और हिक्का आने पर तथा श्वास में लाभ मिलता है।
- मन शिला, हरताल, मुलेठी, नागरमोथा, जटामांसी तथा इंगुदी से धूमपान करने के बाद गुड़ युक्त गुनगुने दूध का सेवन करने से खांसी से राहत मिलती है। इसके अलावा जटामांसी का शर्बत बनाकर पिलाने से कफ संबंधी रोगों से राहत मिलती है।
- जटामांसी को पीसकर छाती पर लेप करने से छाती की होने वाली समस्याओं या बीमारियों और हृदय रोगों से राहत मिलती है।
- समान भाग में चन्दन, चव्य, जटामांसी, मुनक्का, सुगन्धबाला तथा स्वर्ण गैरिक का पेस्ट (1-2 ग्राम) बनाकर सेवन करने से उल्टी होना बन्द हो जाती है।
- 500 मिग्रा जटामांसी चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर चाटने से पेट फूलने की समस्या से राहत मिलती है।
- जटामांसी तथा नमक को सिरके के साथ पीसकर उदर या पेट पर लगाने से जलोदर में लाभ होता है।
- जटामांसी 10 भाग, दालचीनी तथा इलायची 8-8 भाग, कूठ, पोखरमूल, लौंग, कुंजन, सफेद मिर्च, नागरमोथा, सोंठ 6-6 भाग, बलसां 5 भाग केशर 4 भाग और चिरायता 10 भाग इन सबको मिलाकर अष्टमांश काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से वीर्य या स्पर्म संबंधी समस्या से राहत मिलती है।
- यदि वातरक्त (गठिया) प्रभावित स्थान में लालिमा, पीड़ा तथा जलन हो तो पहले दूषित रक्त को बाहर निकालकर, समान भाग में मुलेठी, पीपल छाल, जटामांसी, क्षीरकाकोली, गूलर छाल तथा हरी दूब का लेप बनाकर लगाने से दर्द और जलन से राहत मिलती है। इसके अलावा जटामांसी, राल, लोध्र, मुलेठी, निर्गुण्डी के बीज, मूर्वा, नीलकमल, पद्माख और शिरीष पुष्प इन 9 द्रव्यों का चूर्ण बनाकर उसमें शतधौत घी मिलाकर लेप करने से वातरक्त (गठिया) में लाभ होता है।
- जटामांसी, काली मिर्च, सेंधानमक, हल्दी, तगर, सेंहुड़ की छाल, गृहधूम, गोमूत्र, गोरोचन तथा पलाश क्षार को मिलाकर पीसकर लेप करने से कुष्ठ में लाभ होता है। इसके अलावा समान भाग में पूतिकरंज की गुद्दी, देवदारु, जटामांसी, शहद, मुद्गपर्णी तथा काकनासा को पीसकर लेप लगाने से मण्डलकुष्ठ में लाभ होता है।
- जटामांसी, लाल चंदन, अमलतास, करंज छाल, नीम छाल, सरसों, मुलैठी, कुटज छाल तथा दारुहल्दी को समान मात्रा में लेकर अष्टमांश काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से चर्मरोगों में लाभ होता है।
- जटामांसी में हल्दी मिलाकर उबटन की तरह चेहरे पर लगाने से व्यंग तथा झांई मिटती है और त्वचा की कांति बढ़ती है।
- जटामांसी आदि द्रव्यों से बने 5-10 ग्राम महापैशाचिक घी का सेवन करने से उन्माद (पागलपन), अपस्मार (मिर्गी), बुखार में अत्यन्त लाभ होता है ।यह बुद्धि एवं यादाश्त बढ़ाने में तथा बच्चों के शारीरिक विकास में सहायक होता है। इसके अलावा जटामांसी के प्रंद का काढ़ा बनाकर 10-20 मिली मात्रा में सेवन करने से मिरगी में लाभ हाता है। और 500 मिग्रा जटामांसी को 5 मिली ब्राह्मीस्वरस, 500 मिग्रा वच तथा शहद के साथ मिलाकर देने से मस्तिष्क संबंधी रोगों में अत्यन्त लाभ होता है।
- जटामांसी 4 भाग, दालचीनी, कबाबचीनी, सौंफ तथा सोंठ 1-1 भाग व शक्कर या मिश्री 2 भाग मिलाकर सबका चूर्ण बनाकर 2-4 ग्राम मात्रा में सेवन करने से पेट दर्द, मोटापा से होने वाली बीमारी तथा आक्षेपक या शरीर के किसी अंग में ऐंठन आने पर उससे जल्दी राहत मिलती है।
- जटामांसी 8 तोला, अश्वगंधा 2 तोला तथा अजवायन 1 तोला को मिलाकर काढ़ा बनायें। काढ़े का 10-20 मिली मात्रा में पीने से योषापस्मार या हिस्टीरिया में लाभ होता है।
- जटामांसी के 10-15 मिली शीत कषाय में शहद मिलाकर पिलाने से खून साफ होता है।
- जटामांसी को पीसकर सम्पूर्ण शरीर पर लगाने से अत्यधिक पसीने का आना बन्द होता है तथा पसीने की वजह से होने वाली दुर्गंध कम होती है।
- जटामांसी, केसर, तेजपत्ता, दालचीनी, हल्दी, तगर, चन्दन आदि को पानी से पीसकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से तथा 1-2 बूंद नाक में डालने तथा अञ्जन व लेप के रुप में प्रयोग करने से सूजन तथा स्थावर या जङ्गम-विष के कारण उत्पन्न विषाक्त प्रभाव कम होते हैं।
- जटामांसी का अधिक मात्रा में प्रयोग और सेवन घातक होता है। इसकी जड़ नर्व को कमजोर करती है और उससे संबंधित बीमारियों को आमंत्रित करती है।

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