राजादन (Six stamens balata)
भारत के समस्त प्रान्तों में यह विशेषत गुजरात, दक्कन प्रायद्वीप, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों, उत्तरप्रदेश तथा मध्य प्रदेश में पाई जाती है। इसके फल चपटे, कच्ची अवस्था में हरे तथा पकने पर पीले रंग के व जैतून के आकार जैसे होते हैं। इसके बीजों के भीतर की पीताभ गिरी या मज्जा से तैल निकाला जाता है। चरक संहिता में पित्तजप्रदर की चिकित्सा में तथा सुश्रुत-संहिता में झाँई की चिकित्सा में व परूषकादिगण में इसका उल्लेख प्राप्त होता है।
राजादन के उपयोग
- शिरशूल (सिर दर्द)-खिरनी मूल को पीसकर मस्तक पर लेप करने से (सिर दर्द) शिरशूल में लाभ होता है।
- नेत्ररोग-खिरनी के बीजों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों तरफ लगाने से नेत्रशूल, नेत्रदाह आदि नेत्र विकारों का शमन होता है।
- मुखरोग-(स्नैहिक धूम) शाल, राजादन, एरण्ड, सारवृक्ष आदि को पीसकर उसमें घृत तथा मधु मिलाकर, श्योनाक के वृंत (डंठल) पर लेप करके जला कर धूम का सेवन करने से सर्वसर मुखरोग में लाभ होता है।
- दन्त रोग-खिरनी छाल चूर्ण को दांतों पर मलने से दन्तरोगों का शमन होता है।
- तृष्णा-राजादन को रातभर जल में डाल कर मसलकर, छानकर प्रात शर्करा, मधु एवं मुनक्का मिलाकर, (10-20 मिली) पीने से क्षतज तृष्णा में लाभ होता है।
- अतिसार-खिरनी की छाल का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली क्वाथ में शहद मिलाकर पिलाने से अतिसार में लाभ होता है।
- कामला (पीलिया)-खिरनी काण्डत्वक् का क्वाथ बनाकर 10-20 मिली मात्रा में पीने से कामला (पीलिया) में लाभ होता है।
- प्रमेह-राजादन आदि से निर्मित अरिष्ट, अयस्कृति, लेह, आसव आदि का सेवन प्रमेह में हितकर होता है।
- पित्तप्रदर-कपित्थ तथा राजादन पत्र को घी में भूनकर सेवन करने से वातज तथा पित्तज प्रदररोग में लाभ होता है।
- योनिगत-स्राव-5 मिली खिरनी पत्र-स्वरस का सेवन करने से योनिरोगों में लाभ होता है।
- व्रण (घाव)-कृमि युक्त व्रण में वेदना एवं रक्तस्राव हो रहा हो तब सुरसादि-गण की औषधियों से व्रण को धोने के बाद सप्तपर्ण, करंज, अर्क, नीम तथा राजादन की छाल के समान भाग लेकर गोमूत्र या क्षारोदक के साथ पीसकर लगाने से व्रण जल्दी भर जाता है तथा व्रण कृमि का निस्सारण होता है।
- न्यच्छ-कपित्थ तथा खिरनी को पीसकर लेप करने से त्वचा पर पड़े हुए काले धब्बे मिट जाते हैं।
- घाव-खिरनी के बीजों को पीसकर घाव पर लगाने से घाव जल्दी भर जाता है।
- व्रणशोथ-छाल या कच्चे फलों से निकलने वाले आक्षीर (दुग्ध) को लगाने से व्रण तथा व्रणशोथ में लाभ होता है।
- अपस्मार-खिरनी छाल का पुटपाक-विधि से स्वरस निकालकर उसमें पिप्पली चूर्ण तथा शहद मिलाकर सेवन कराने से अपस्मार में लाभ होता है।
- वृश्चिक-विष-खिरनी के बीजों को पीसकर दंश स्थान पर लेप करने से वृश्चिक-दंशजन्य विषाक्त प्रभावों का शमन होता है।

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