राखीफूल (Stinking passion flower)
समस्त भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में इसकी लता पाई जाती है। इसकी दो प्रजातियां होती हैं 1. जंगली कृष्ण कमल (Passiflora foetida Linn.) 2. कृष्ण कमल (Passiflora edulis Sims.)। इसके पुष्प अत्यन्त सुन्दर तथा देखने में राखी जैसे लगते हैं। इसलिए इन्हें राखीपुष्प कहा जाता है।
जंगली कृष्ण कमल (Passiflora foetida Linn.) इसके पुष्प हरिताभ-श्वेत, गुलाबी, गहरे रक्त वर्ण के अथवा बैंगनी वर्ण के होते हैं। इसके फल संख्या में अनेक, गोलाकार, चिकने तथा हरित वर्ण के व अनेक बीजों से युक्त होते हैं।
कृष्ण कमल (Passiflora edulis Sims.) इसके पुष्प श्वेत तथा बैंगनी वर्ण के होते हैं। इसके फल गोलाकार, अण्डाकार, गूदेदार, पक्वावस्था में पीत अथवा गहरे बैंगनी वर्ण के कठोर आवरण से युक्त व रसदार होते हैं। इसके बीज काले रंग के होते हैं।
राखीपुष्प के उपयोग
- पत्र को पीसकर मस्तक पर लगाने से शिरशूल, पामा, जीर्ण व्रण, क्षत व भ्रम का शमन होता है।
- अक्षिशोथ-पत्रों को पीसकर नेत्र के बाहर चारों तरफ लगाने से अक्षिशोथ का शमन होता है।
- दंतरोग-इसका प्रयोग शीताद दन्त रोग तथा अन्य विटामिन-C की कमी से उत्पन्न होने वाले विकारों की चिकित्सा में किया जाता है।
- श्वासकष्ट-पत्रों का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में सेवन करने से श्वासकष्ट में लाभ होता है।
- उन्माद-पत्र तथा मूल क्वाथ का सेवन 10-15 मिली मात्रा में करने से वातज उन्माद में लाभ होता है।
- अनिद्रा-पत्रों का क्वाथ बनाकर 10-15 मिली मात्रा में पीने से नींद अच्छी आती है।
- योषापस्मार-मूल का प्रयोग योषापस्मार की चिकित्सा में किया जाता है।
- उच्चरक्तचाप-पञ्चाङ्ग क्वाथ से निर्मित मिष्टोदक का सेवन करने से उच्चरक्तचाप में लाभ होता है।
- पित्तज-विकार-पञ्चाङ्ग से निर्मित क्वाथ का सेवन करने से पित्तज विकारों में लाभ होता है।

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